गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026

दादा का दौर

 दादा को हम बाबा कहते थे | माँ पर्दा करती थी बाबा से | बाबा जब दालान से घर की दहलीज पर आते तो झूठमूठ का खाँसते | अहम अहम | कुछ ऐसे | 

माँ जहाँ भी होती लम्बा पल्लू कर देती | और मैंने भाप लिया था कि कुछ ताकत है खांसने में | मैं खांसता कई बार दूकड़ी में | महसूस करना चाहता वो ताकत | 

बाबा अँधेरा होने से पहले खा लेते थे | बैठ जाते दूकड़ी में | मैं परोसता | उसारा था हमारा कच्चा जिसका छप्पर जब चौमासे में  चूअता तो माँ झींकती | और अगले पीर की हाट से बरसाती ले आते बाबा | बाँध देते | 

मैं चक्कर लगाता ओसारे  से दोकड़ी , दोकड़ी  से ओसारा | गरमागरम फुल्के ढोता | पानी का गिलास भरता | जी से खिलाता बाबा को | 

खाने के बाद मैं हुक्का भरता | चिलम की तली में तम्बाखू जमाता और गुलाबी रंग के बड़े बड़े अंगारो से चिलम में कुतुबमीनार सी  देता | फिर हुक्के की नाली को ठंडा करता | पानी की सही मात्रा को भांपने को हुक्का गुड़गुड़ाता | और तसल्ली होने पर ही बाबा के आगे रखता | फिर खाट की पायत पर झूलता रहता | घंटो | 

बाबा का कोई मिलनियाँ आता तो बाबा कहते मैं बाजी लगाऊँ हूँ जो ढूढ़ के दिखा दो कोई मुन्नू से अच्छा हुक्का भरावा !

अपनी बढ़ाई सुन मैं झेप जाता | 

और बाबा रख देते मेरे हाथ में कभी जंगल से चुने झड़बेरिओं के बेर तो कभी तोता कुतरा अमरुद | 

दर्जनों गायें होतीं , उनमे से जो भी सबसे सजीली होती उसका निपानिया दूध पिलाते मुझे | एक ही साँस में एक लोटा | दूध इतना होता था कि तीन तीन मिट्टी के मलसों में खोलता | सेर दो सेर छाछ तो लोग ऐसे ही ले जाते मुफ्त में | 

ऐसा अमीर बचपन था मेरा | 

हाँ , ये बात अलग है कि रिश्तेदार गरीब समझते थे हमे | उनके मुकाबिल जोत की जमीन काफी कम थी हमारे पास | 


पर जब दादा का दौर था मैं राजकुमार था | आज मजदूर हूँ मैं अपने दौर में |  




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