दादा को हम बाबा कहते थे | माँ पर्दा करती थी बाबा से | बाबा जब दालान से घर की दहलीज पर आते तो झूठमूठ का खाँसते | अहम अहम | कुछ ऐसे |
माँ जहाँ भी होती लम्बा पल्लू कर देती | और मैंने भाप लिया था कि कुछ ताकत है खांसने में | मैं खांसता कई बार दूकड़ी में | महसूस करना चाहता वो ताकत |
बाबा अँधेरा होने से पहले खा लेते थे | बैठ जाते दूकड़ी में | मैं परोसता | उसारा था हमारा कच्चा जिसका छप्पर जब चौमासे में चूअता तो माँ झींकती | और अगले पीर की हाट से बरसाती ले आते बाबा | बाँध देते |
मैं चक्कर लगाता ओसारे से दोकड़ी , दोकड़ी से ओसारा | गरमागरम फुल्के ढोता | पानी का गिलास भरता | जी से खिलाता बाबा को |
खाने के बाद मैं हुक्का भरता | चिलम की तली में तम्बाखू जमाता और गुलाबी रंग के बड़े बड़े अंगारो से चिलम में कुतुबमीनार सी देता | फिर हुक्के की नाली को ठंडा करता | पानी की सही मात्रा को भांपने को हुक्का गुड़गुड़ाता | और तसल्ली होने पर ही बाबा के आगे रखता | फिर खाट की पायत पर झूलता रहता | घंटो |
बाबा का कोई मिलनियाँ आता तो बाबा कहते मैं बाजी लगाऊँ हूँ जो ढूढ़ के दिखा दो कोई मुन्नू से अच्छा हुक्का भरावा !
अपनी बढ़ाई सुन मैं झेप जाता |
और बाबा रख देते मेरे हाथ में कभी जंगल से चुने झड़बेरिओं के बेर तो कभी तोता कुतरा अमरुद |
दर्जनों गायें होतीं , उनमे से जो भी सबसे सजीली होती उसका निपानिया दूध पिलाते मुझे | एक ही साँस में एक लोटा | दूध इतना होता था कि तीन तीन मिट्टी के मलसों में खोलता | सेर दो सेर छाछ तो लोग ऐसे ही ले जाते मुफ्त में |
ऐसा अमीर बचपन था मेरा |
हाँ , ये बात अलग है कि रिश्तेदार गरीब समझते थे हमे | उनके मुकाबिल जोत की जमीन काफी कम थी हमारे पास |
पर जब दादा का दौर था मैं राजकुमार था | आज मजदूर हूँ मैं अपने दौर में |
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