शुक्रवार, 31 मई 2019

दरकती जमीन

अक्सर ऐसा होता। हम सात आठ लड़के मिलकर उस औरत को घेर लिया करते।
चार आगे से और तीन चार पीछे से।
वो भांप जाती और पहले से ही मुँह बिगाड़ना शुरू कर देती।
हम नाचते और खूब ऊंचा ऊंचा गाते
" सांति ओ सांति। तू कहना क्यू ना मानती।"

वो हमलावर हो जाती। पैर पटकती हुई हमारी ओर लपकती। हमारे साइकिल के पुराने टायर , सरकंडो की कम्मचों की चोट से भाग निकलते।
कुछ देर तितर बितर हो जंगली कुत्तो से हम फिर गुच्छा बनाते ।
फिर वही पैरोडी" सांति ओ सांति। तू कहना क्यो ना मानती।"

शांति चिंघाड़ती" ओ कलुआ के, ओ गजुआ के। हरामजादो। मरो तुम आधी रात। तुम्हारी मेहतारियों से खाल उधड़वा दूँगी।" ईंटा उठा वो पुरजोर भागती।
बचपना था। तफरीह की उम्र थी। क्या सही, क्या गलत। पूरा गांव उसे पागल कहता पर वो औरत हमारे लिए खिलौना थी।

एक बड़े पहुँचे हुए पत्रकार अभी तस्करा कर रहे थे" दीदी जुझारू है। सड़क पर उतर कर आमने सामने की लड़ाई में यकीन रखती है। कद्दावर हैं। मत भूलिए, बंगाल से कम्युनिस्टों को इन्होंने ही उखाड़ फेंका है।"

ममता दीदी को बार बार 'जय श्री राम' का नारा लगाने पर खाल उतरवाने की धमकी देता देख शांति की याद आती है।
दीदी फड़फड़ा रही है। ललकार रही है। पब्लिक मजे ले रही है।
देखना, आने वाले दिनों में ऐसा न हो कि सड़क किनारे से ईंटा उठा सचमुच पब्लिक के पीछे दुडकी लगा दें।

बंगाल की जमीन दरक रही है। पुराने हथकंडे देर तक नही चलने वाले।
कोई समझबार, और उससे भी ज्यादा हिम्मतवार मानुस होवे तो दीदी को सलाह दे दे।
यही कि वो एक ठों बढ़िया सा बंगला बनवा लेवें हुगली किनारे।
और हाँ, सरकारी बंगले में जो भी टोंटी पत्री अपने निजी खर्च पे लगवाई हो उसकी भी लिस्ट  बनवा लेवें।
पुराने ढोल बजाने वालो के बोरिया बिस्तर बंधने का सिलसिला चल पड़ा है।

                                            सचिन कुमार गुर्जर
                                             1 जून 2019

फिर कभी

ऐसा महीने दो महीने में एक बार होता, जब किनारे के क्यूबिकल में बैठा वो लड़का अपना बैकपैक साफ करता।
जरूरी डाक्यूमेंट्स के प्रिंटआउट जो अब गैर जरूरी हो गए होते, टैक्सी बिल जो कभी क्लेम नही किये गए होते, आफिस के आस पास के ईटिंग आउटलेट्स के पैम्पलेट, और एक दो 'घातक'  किताबें।  अमूमन ये सब ही निकला करता।
'हाऊ टू विन फ्रेंड्स...', 'थिंक एंड ग्रो रिच', 'अलकेमिस्ट' कु छ इस तरह की किताबें।
ऐसा जखीरा जो इंसान को अपनी औकात भूलकर कुछ बड़ा, कुछ अदभुत करने की हवा भर देता है।

कुछ ऐसी ही चरस के नशे में धुत्त वो शर्मीला, दब्बू सा लड़का , पहले चार क्यूबिकल और उसके बाद बीच का गलियारा लाँघ कर चला गया था।
सीने तक उठी क्यूबिकल की दीबार पर कोहनी तक दोनों हाथ सपाट लिटा कर बोला" चाय पीने चलोगी?"
पहला संवाद था और बस ये तीन शब्द!

और जबाब?
उस चश्मिश ने कम्प्यूटर स्क्रीन से  नज़र हटाई। चश्मे को गोरी, पतली नाक पर पीछे धकेला।
पल भर को ऐसे सोचा जैसे पेशकश पर बड़ी संजीदगी से विचार करती हो।
और फिर बड़ा सपाट सा जबाब" अहह.. सॉरी। मैं चाय नही पीती।"

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 48 से चिपककर खड़ी सात मंजिला इमारत।
शाम के 4 बजे के आस पास फ्लोर पे हालात ऐसे होते जैसे अघोषित कर्फ्यू लगा हो।
तीन ,चार, पाँच.. कुछ ऐसी ही संख्या में कर्मचारियों के गुट उतरते जाते। चाय , समोसा, सिगरेट , बस यही सब  चूसने, फ़ूखने।

और वो लड़का। वो सातवी मंजिल पर लगे नीले शीशों के सीखचों से बाहर की दुनिया को टुक टुकाता रहता।
शंकर चौक, इफको चौक, राजीव चौक....।
एक के बाद एक , हाइवे में फ्लाईओवर के उतार चढ़ाव यू आते जैसे बड़े रेगिस्तान में रेत के ऊंचे नीचे टीले।
और उन टीलों के इर्द गिर्द काले नीले काँच के कुछ ऊंचे तो  कुछ बहुत ऊंचे कैक्टस जमे होते।
चींटियों की कतारों से मोटर कार, ट्रक, बस बाइक , टेम्पो एक दूसरे को धकियाते जाते। बदहवास, अजीब सी आपाधापी।
कभी रेंगते, कभी भागते उन आदमीयों के ग़लों के कौवे सूखे होते, आंखे चिरमिराती। पर मीठे शर्बत की तलाश में वो घिसटते जाते।

पर अंदर का नजारा कुछ इतर होता। खुशपुश होती जो कभी नोंक झोंक में तब्दील हो जाती।
कोई फॉर्मल , कोई कैज़ुअल, कोई प्रौढ़ तो अधिकतर जवादिल। कुछ इस तरह के जीवों के कहकहे , ऐ सी की ठंडी हवा के साथ साथ तैरते रहते।

इस सबके बीच वो लड़का अदृश्य रहता। कभी कोई विरला गौर करता तो कहता" तू चोर जैसा क्यो रहता है, हुह!"
हाँ, वो एक अदृश्य आदमी ही तो था। 'मिस्टर इंडिया' वाला नही!
हांसिये पर लटका गुमनाम आदमी।
ऐसा इंसान जो रंग रूप, भेषभूषा, बोलचाल, कद काठी, बुद्धिमत्ता , हर लिहाज से मामूली होता है। और वो इस कदर मामूली होता है कि सामने वाले का दिमाग इसकी मौजूदगी गैरमौजूदगी को रजिस्टर ही नही करता।
उसका वजूद हल्का होता है। चरित्र के लिहाज से नही, प्रस्तुति के हिसाब से।

मैं आपको ज्यादा मशक्कत नही करवाऊंगा। पर जरा सा पेशानी पर बल देंगे तो आप ऐसे किरदार पा लेंगे।

इस तरह का प्राणी अगर कतार में लगा हो तो बाद में आया आदमी इसके आगे लग जाता है, बिना किसी अपराध बोध।
ट्रैन में ,बस में बैठा हो तो नया आदमी इस भाव से चढ़ बैठता है जैसे सीट खाली ही हो।
जरूरी मीटिंग में ये जीव कितना भी महत्वपूर्ण सुझाव दे दे, वार्ता आगे बढ़ जाती है , बिना गौर।
और सबसे बड़ा दर्द। अपनी जवानी के चढ़ते दिनों में जब ऐसे शखस ने किन्ही आँखों से गुजारिश की नज़र से , बड़ी उम्मीद लिए देखा होता है, तो सामने की पथ्थर आंखों ने आरपार पेड़ पौधे, सड़क, बस, रिक्शा, कंकड़ पत्थर, यहां तक की गुटखों के लावारिश रैपरों को भी देखा होता है, पर इस आदमी का वजूद नज़र नही आता।

चलो, कोशिश तो की.. बस इस होंसले का झुनझुना थामे , हमारा नायक सात्विक , कैफेटेरिया की घटिया कॉफी लिए अपनी सीट पर आ जमा था।
रोबर्ट कियोसकी की मुस्कुराती तस्वीर कुछ यूं भाव लिए सांत्वना दे रही थी :शाबाश , ये पहल मील का पत्थर साबित होगी। देखना।

आप सोचते होंगे कि जब इंसान इस कदर शर्मीला है, किरदार सीधा, सपाट है, तो फिर वर्णीय क्या है।
ज़नाब, यकीन कीजिये, जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ।
ये जो बेहद शर्मीले और सीधे इंसान हुआ करते है ना,इनके सीने में तमाम किस्से, शरारते, और और ...
कई कई औरतें एक साथ दफन हुआ करती हैं।

घंटे भर बाद उस चश्मिश का मैसेज आया था" सात्विक, प्लीज डोंट टेक इट अदर वाइज। थोड़ा बिजी हूँ। चल लेंगे।फिर कभी..:)।"

                                         क्रमशः.......
                                    
                                       सचिन कुमार गुर्जर
                                       31 मई 2019
 
                                         

गुरुवार, 16 मई 2019

बड़ा सबक


मौसम अनुकूल हो ,जमीन की परतें नरम हों,तो बिना बीज, बिना रखवाल भी कुकुरमुत्तों के गुच्छे यहाँ वहाँ छितरा जाया करते हैं। देखा होगा आपने।  ये सब कुदरत के बंदोबस्त हुआ करते है।
बस कुछ यूं कर ही दिल्ली हापुड़ बाईपास पर दर्जनों छोटे बड़े इंजीनियरिंग कालेज उग आए हैं।
राजधानी और उसके इर्दगिर्द कुर्सी पर बिठा काम कराने वाले कारखाने हैं।कामगारों की फौरन पूर्ति की जा सके, इसी सोच के साथ ही ये इमारतें जमायी गयी हैं।

रोजगार मेला लगा था ऐसे ही एक कॉलेज में। एक बड़ी ही नामचीन कंपनी , जॉब आफर दे रही थी।
हिंदुस्तान है, भीड़ तो होगी ही, लिहाजा इस बारे में लिखना समय और शब्द दोनो की बर्बादी है।
जैसे जैसे टेक्निकल , नॉन टेक्निकल ,मैनेजरियल राउंडस का सिलसिला आगे बढ़ता गया ,  खुशकिस्मतों की सूची सिकुड़ती गयी।

दिन भर आग उगल थका हारा सूरज अपनी आरामगाह  को चला तो एक प्यारी सी ,मुलायम सी एच आर वाली लड़की ने ,यही कोई दो दर्जन भर आफर लेटर बांटे।
भटकने के कुछ सिलसिले थमे तो ज्यादातर नौजवान, नवयोवनाये  पसमांदा ,चलने को मजबूर हुए।उन्हें नए अवसर की तलाश में अगली सुबह फिर जाना था। 
ताड़ की कतारों के समानांतर चलते वो लड़के लड़कियों के गुच्छे कॉलेज गेट से रुखसती कर , बाहर दुनिया की भीड़ में पिघल गए।

मुझे बस एक अदद मौके की दरकार थी सो वो मुझे मिल गया। कॉलेज कैम्पस से बाहर आकर रुका। अपने  नक़ली वाइल्ड क्राफ्ट के नीले बैकपैक में आफर लेटर को सही से जमा के,  कंधे उचका कर  फेफड़ो में बड़ी गहरी सांस भरी। ठहरा रहा काफी देर ।विजेता का भाव लिए गोधूलि के लाल काले आसमान को देखता रहा। उन लम्हो में आपने मुझे देखा होता तो आप मुझमे किसी सिकंदर या नेपोलियन का अक्स पाते!

खैर, विचार टूटा पर जश्न नही।कोई देखें न देखे। अपने दाएं हाथ को ताकत के साथ पीछे खींच मैंने जोरदार पम्प किया। वैसे ही जैसे खिलाड़ी लोग किया करते हैं।
मस्त बछड़े जैसे कुछ तेज डग भरे और फिर अपनी गाढ़ी क्रीज वाली काली पेंट को नाभि की ओर खींचा।
दिन भर की आपाधापी के बाबजूद मेरे पैरों में ताजा खून दौड़ रहा था।
अपने नए गोल्डस्टार के जूते से मैंने यू ही खामखाँ , चुपचाप लेटी कंकड़ को  हवा में उछाल दिया।वो दिन भी क्या दिन था। आंखें खुशी से नाच रहीं थीं। काश उन पलों में कोई मेरा अपना, मेरे साथ होता।

माँ का हक़ पहला था सो पहला फ़ोन माँ को ही किया और बोला" माँ, दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी में मेरी नौकरी लग गयी!"
सच्ची,यही बोल थे मेरे। मां की खुशी का पैमाना छलक पड़े बस इसी ख्वाईश के चलते बातचीत मे थोड़ा सा, हल्का सा छोंक लगा बैठा था।

वापस शहर जाना था। लक्ष्मीनगर-पांडवनगर में अपना ठोर ठिकाना हुआ करता था। बाँट जोहता रहा पर कम्बक्त की मारी बस न मिले।अकेला ना था। पांच छह लड़के लडकियां और भी थे।बड़े इंतेज़ार के बाद सब्जी दूध सप्लाई का जो मिनी ट्रॅक होता है ना, उसका ड्राइवर मेहरबान हुआ। गदापदद.. हम सारे उसी में पीछे। ट्रक की छत खुली थी, रस्सियों का जाल था जो तिरपाल थामने के काम आता होगा। बस, उसे ही पकड़े हम खड़े हुए।
एक तो सफर भी बहुत लंबा न था ऊपर से वो मुफलिसी का दौर , लिहाजा असुविधा का रोना रोना फिजूल की बात होगी।

एक लड़का था। वो जो लड़का था, लंबा दूहरे हाड़ का, जो अपनी मित्र के साथ सटकर ट्रक के अगले हिस्से में चिपका खड़ा था उसका सलेक्शन हो गया था। चेहरे पे सुकून था।
पर उसकी मित्र का चेहरा उदासी ने ढांप रखा था। बहुत ही गहरी उदासी। दिल्ली गाजियाबाद के स्मोग जैसी गहरी। ऐसा लगता था कि दुनिया जहान की सारी आफतों का बड़ा सा गट्ठर भड़भड़ा के उस बेचारी की काख पे आ गिरा हो। सभी रास्ते मूंद गए हो।आत्मा दर्द में कराह रही थी।वो दोनों एक दूसरे को संबल दे खड़े थे।

ताज्जुब न कीजियेगा। अगर आप उस दौर से गुजरें हैं तो इस तरह के हालातों से जरूर रूबरू हुए होंगे।
देखिये, जब तक आपका खुद का कोई आफर लेटर हाथ नही आ जाता, हर दोस्त, हर बैच मेट को मिलने वाला  आफर सीने पे हथोड़े की चोट सा ही होता है।
उस पर गोया कोई कमतर बाजी मार जाए तो हालत ऐसे होती है जैसे कोई महीन छैनी से धीरे धीरे कलेजा खुरेज रहा हो।

चेहरे पे बारीक कतरन की दाढ़ी लिए वो लड़का उस लड़की के कान में बार बार कुछ कहता। निसंदेह वो सांत्वना के शब्द होते होंगे। बेहतर कल की आस जागते शब्द।
और वो लड़की ।
थोड़ी सी सावली, मंझले कद की सुत्वा वो लड़की अपने पीले टॉप को एडजस्ट करती ,पर बोलती कुछ भी नही।
ट्रक की जाली से वो अपनी बड़ी दीवे जैसी आँखों से  पीछे भागते पेड, सड़क किनारे की दुकानें ,गुमटियां और यहां तक कि कूड़े के ढेरों को भी ऐसे देख रही थी जैसे पहली बार इन सबका दीदार करती हो।

अपनी जिम्मेदारी का एहसास कर लड़का हर थोड़ी देर में कोई छोटी सी बात लड़की के कान में कहता।
ऐसा करने के लिए उसे तिरछा हो थोड़ा नीचे आना होता।
वो थोड़ा रुकता और फिर कोई लंबी सी बात से अपनी मित्र का ढांढस बांधता ।
ये दौर चलता रहा। सड़क के गड्ढो, स्पीड ब्रेकरों जैसे ही भावनाओँ की लहरें उछलती, उतरती रहीं।

शब्दो का मरहम जब उस लड़की को सदमे के कुहासे से बाहर न खींच सका तो उस लड़के के अंदर का 'महात्मा बुद्ध' जाग उठा!
जिस भाव से राजकुमार गौतम ने तीर से घायल हंस को आलिंगन कर दुलारा था उसी भाव से उस लड़के ने अपनी मित्र का हल्का सा आलिंगन कर उसके बालो में हाथ फिराया।
फिर यकायक परोपकार का भाव इस कदर हावी हुआ, कि  दयाभाव से वशीभूत वो मानव काफी देर तक हाथ फिराता रहा, दुलारता रहा, पुचकारता रहा!!

शहर ज्यो ज्यो नजदीक आता जाता उस लड़के की व्याकुलता बढ़ती जाती। अपने शरीर का भार वो कभी दाये पैर पर ले जाता तो कभी बाये पैर पर।
एक ही लक्ष्य, एक ही ध्येय।
कैसे भी हो वो अपनी मित्र का दर्द खींच लेना चाहता था।

इसी प्रयास के क्रम में जब दर्द असह हो चला तो उसने अपने होठ अपनी मित्र के माथे के  सिरे पर कुछ इस भाव से टिका दिए जैसे कि वो दर्द के जहर को चूँस फेकना चाहता हो। हमदर्द को कौन नही पहचानता!
लड़की ने अपने मित्र की आँखों मे देखा तो उसने आँखे झपका दी। सब ठीक हो जायेगा। होंसला रख पागल!!

फिर वो किसी हुनरमंद सपेरे की तरह जहर खींचता ही गया  और खींचता ही चला गया। कभी माथे पर ,तो कभी गाल पर तो कभी गर्दन पर।
शहर आया तभी ये सिलसिला रुका।

मैं वापस कमरे पर पहुँचा तो तीन चार साथी इंतेज़ार में थे।
बियर की बोतलें प्लास्टिक की बाल्टियों में डूबी हुई थी। मुर्गे काटे जा चुके थे।
मिंटू से रहा नही गया , वो अभी काम की तलाश में था। तंज कसा" तुझे कैसे ले लिया बे, लगता है इस कंपनी को कुछ ज्यादा ही बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया है।"

मैं हंस पड़ा , बोला" पिंटू भाई, जा तेरे लिए एक बियर एक्स्ट्रा। ऐश कर।"
एक तो पिंटू मेरे ही जंगल का लड़का था, मेरठ मुरादाबाद बेल्ट का।
फिर उस पर अभी कोई पौन घंटे के सफर में मैं बड़ा सबक सीखकर आया था।

सबक?
हाँ,  यही की हमे दूसरे के दुख दर्द में शरीक होना चाहिए।
वो भी सही समय पर और पूरी शिद्दत के साथ!!!

         
                                                   -सचिन कुमार गुर्जर
                                                    18 मई 2019

गुरुवार, 9 मई 2019

पांचवा आदमी

उस बूढ़े आदमी का मर जाना बेहद जरूरी था। सात जात की खिचड़ी बस्ती में एक चिड़ी का बच्चा भी ऐसा ना था  जो ये विचार रखता हो कि होरी बुड्ढा जीवत रहे! जनाना-मर्दाना , हर कोई उसे ऐसे देखता जैसे निढाल, दम तोड़ते मवेशी को गिद्ध| 
पर वो बूढ़ा न मरता।
घसियारिनो के झुंड घास फूस जुटाने जंगल जाते तो एक दो जरूर कुढ़ती और धीमी आवाज़ में कहती" जुआन जुआन आदमी जा रहे हैंगे, इस बुड्ढे कु मरी न आती| "
तो कोई ठलोरा,लुखण्डर सामने के चबूतरे से दांत निपोरता कहता" इनकी तो फ़ाइल ही गुम हो गयी दीखे है भाभी!"

बूढा मैला ,फटेहाल दिन भर चबूतरे पर ,नीम की छांव में पड़ा रहता । ढीली सी मैली धोती में अपनी टांग सिकोड़े वो चित्त लेटा रहता। कोई बड़ा रास्ते से गुजरता तो गुस्से में ताना मार कहता " ओ दददा,  धोती तो संभाल लय करो , बालक बच्चे निकले बढ़े हैंगे, तुम अपना सामान बिखेरे पड़े रओ हो दिन भर|  "
बूढा उहूह की आवाज़ करता , फड़फड़ाता और अपनी धोती के इधर उधर भागते सिरों को अपनी टांगों के बीच मे घोस लेता, लाज के अंगों को ढांप लेता।
टाँगों में दम था ।पड़े पड़े बोर होता तो आस पास के घरो की चौखटों तक घूम आता। कोई चाय पिला देता ।आने जाने वालों से मांग के बीड़ी पीता रहता।
जिंदिगी चलती जाती , पर उसे मौत न आती।

होरी की मूँछे किसी पुरानी झाड़ू जैसी झाबेदार थीं, जो चेहरे से काफी आगे तक पहले तो सीधी आती थी और फिर अचानक नीचे की ओर मुड़ जाती थीं। गालो में दो बड़े बड़े  पानी के पोखर जैसे गड्ढे थे जो मूछो के सिरों से जुड़े थे। आँखे बड़ी लेकिन हमेशा गन्दीली रहती थी। नाक किसी उम्र में ऊंची हठीली रही होगी पर अब थकी सी आगे से ढलक गयी थी। ज्यादा खाँसने से कंधे उचक गए थे। पेट किसी पतली लकड़ी की धाच सा मालूम होता था।

असल मे वो आदमी किसी ऐसी पुरानी सरकारी इमारत जैसा था जिसे कंडम कर खुद से गिर जाने के लिए वीरान छोड़ दिया गया हो।परिवार के बेटे, पोते पोती उसे अपनी जिंदगी का मैल समझते थे ।पर अपने हाथों गला कौन दबाये, उनकी यही ख्वाइश होती कि बस ऊपर वाला ही कुछ बहाना करे, विपदा से जान छूटे। पर उस बूढ़े की मौत पता नही कहाँ सोती थी।

सात घरो के फासले पर कथा का पाठ चलता था , चार पांच मानुस फर्श पर बैठे पंडित जी का वाचन सुने थे। घर की मालकिन जमाने को कोसती हुई घर मे दाखल हुई" सब से कह आई, सब टीवी देखे हैंगे। रांम नाम कौन सुने है आजकल। "
घर का मालिक बोला " पंडित जी ऐसा करो, शंख फूख दो एक बार जोर ते, जो धर्मी होगा , आय संगत करेगा।"
कोई पहुचा न पहुँचा, होरी बुद्धा पहुच गया।

पंडित जी ने कथागान किया :सुनो जजमान, राजा परीक्षित ज्यो ही महल से बाहर निकल रथ में सवार हो चले, एक भिखारी कही से रथ के नीचे आन मरा।
राजन बोले, हे इष्ट , मैं धर्म लाभ को निकला, ये कैसा अधर्म कमा लिया।
राज पुरोहित से परामर्श किया तो पुरोहित गंभीर हो बोले" हे राजन, विपदा बड़ी है। जिस काल में ये भिखारी कालगति को प्राप्त हुआ, उस घड़ी को पांडव काल से जाना जाता है। यानी के अगर उपाय न हुआ तो पांच मृत्यु होंगी, और फिर पांच पांडवो की भांति सभी आत्माये एक साथ परलोक की गामी होंगी।"

पंडित जी रुके, पोथी का पन्ना पलटा और फिर शुरू किया: राजा परीक्षित विचलित हुए और बोले, " चूंकि ये व्यक्ति मेरे रथ नीचे आ मरा। मैं दोषी हुआ। कुछ उपाय बताओ गुरु।
तब पुरोहित बोले" सोमवार की प्रातः में जिस वक्त सूरज आसामान का कलेजा फाड़ बाहर आता हो, पांच काली , दुधारी गायो का दान करने से आया काल टल सकता है।"
"प्रबंध हो जायेगा , पुरोहित जी" ऐसा कह राजा अपने इष्ट को प्रणाम कर चल पड़े।"

" धर्म श्रद्धा से चलता है" ऐसा कह पंडित जी ने अपनी दक्षिणा के करारे नोट जेब मे रख, खीर पूड़ी का भोज किया। होरी के भी भाग जागे, एक तो धर्म लाभ ,ऊपर से खीर पूड़ी। मालकिन  ने पांच रुपए बीड़ी माचिस खातिर भेट दे दिए| 

फसल काट किसान मजदूर खेत क्यारियों में पेड़ो तले सुस्ताते  थे। लू के थपेडे ऐसे लगते  थे जैसे गरम तवा खाल से छूआ दिया हो।  नन्हे कुम्हार ने जैसे तैसे अपनी लंगड़ी घोड़ी समेत यूकेलिप्टिस के बाड़े में स्थान लिया। पसीने से लथपथ, ईंट भट्ठे की मिट्टी में कुर्ता पुता हुआ।
खेत के बटाईदार से पानी मांगा । हलक खुसक था, बेचारा मंजिल काट के आया था। उखड़ू बैठ पानी पीने लगा तो पीता ही गया, पीता ही गया। फिर एक ठों पीछे की ढाल लुढक गया। ज्यादा पानी पीए से उसका कलेजा डूब गया था| 

अगली सुबह नन्हे का लड़का पंडित जी के घर से झल्लाता हुआ निकला " बेबकूफ समझो हो हमे पंडित, हम अपने आप कर लेवेंगे  रसम पगड़ी। अरे, बूढ़े थे बाबा हमारे, कौन सी बुरी मौत मरे जो हम ये सब जतन करें।"

वो गरीब किसान मज़दूरों का टोला था। वहां इंसान का जीवन जितना बेरंग और फीका था ,मौत भी ऐसे ही सस्ती सी आती थी।
अब मटरू को ही ले लो। बेचारा अच्छा खासा खेत क्यारी का काम करके आया। नहाय धोय के लत्ता बदले।
बरामदे पे बैठ कढ़ी चावल खाता था । भूख जबर थी, जल्दबाजी में कढ़ी चावल का कुछ बड़ा गोसा ले लिया। साँस की नली में ऐसा गुच्छा लगा कि बेचारा वही लंबा हो गया। भोजन का थाल धरा का धरा रह गया, पंछी उड़ गया। दो चार जिक्र हुआ, फिर नर नार अपनी जिंदगियो की जदोजहद में उलझ भूल गए।

लेकिन जब जगता और उसकी घरवाली ने गृहकलह में एक साथ कीटनाशक पी लिया तो समूचे गाँव मे कपकपी सी दौड़ गयी। बड़े , समझदारों के मुतालवे हुए।
पंडित जी को बुला भेजा। बड़ी बैठक की घनी पाखड़ तले चार चारपाइयों पे गाँव के बड़े और गंभीर लोग बैठे।
गोद मे पोथी लिए पंडित जी कुर्सी पे बिराजमान ।
बड़े काका ने मूछो को अंगूठे से दबाया और चिंता सुनाई तो पंडित जी भड़भड़ा उठे" एक बात बताओ, उस दिना, जब नन्हे का लौंडा पूरे गाँव के सामने मुझे लालची और पता नहीं क्या क्या बका, किसी ने बूझ की उस दिन?"

" जे बताओ कि गाँव की भलाई से बड़ा काम है कोई मेरे ताई।" पंडित जी का गुस्सा जायज था।

बड़े काका बोले" देखओ पंडित जी, मानू हुँ। बात तुम्हारी जायज  है,पर अब आगे का सोचो। दिशा काल का कुछ गणित करो। चार चार मानस उठ गए तीन महीना के भीतर!"

पंडित जी ने अपनी कुर्सी को आगे खिसका के बड़े काका की खाट से मिला दिया और फिर धीमे और गंभीर शब्दो मे बोले" देखो, पांडव काल मे गया है नन्हे। उपाय होता तो तभी होता, अब बात कब्जे से बाहर है। गऊ दान तभी का कारगर होता।" पंडित के ओठो के सिरों ले थूक जम गया था। ऐसा बोल उन्होंने तीनों खाटों पर अपनी नजर ऐसे घुमाई जैसे घूमती गर्दन वाला बिजली का पंखा।

करीब बीस जन होंगे, तीन तीन खाटें भरी थी, पंडित जी की बात सुन ऐसी मुरदाई सी फ़ैली कि सबसी साँसों की आवाज सुनी जा सकती थी। गाँव मे विपदा थी!
कुछ सोच समझ के सुझाइयो पंडित, बड़े काका ने ये कह सभा खत्म कर दी थी।

आदमी के अंगूठे के कटे नाखून जैसा चाँद था उस रात।
गुप्प स्याह रात के तीसरे पहर में दूर , साफ खलिहानों में गीदड़ों के झुंड हुडहुडाये " हुत हुत , हुती हाउ....।"
तो गाँव के किनारे से आवारा कुत्ते जबाब में रोये" आउ..आउ..उ।"
उस रात के सन्नाटे में एक आदम आवाज़ हुई" होरी लाल , सोओ हो क्या!"
चार आकृतियां , तीन पतली और लंबी और एक नाटी, खाट के चार पायो पे चार खड़ी थीं। झक सफेद चादर में सर से पाँव तक ढकी हुई।
कुछ जबाब ना आया तो सिरहाने की लंबी आकृति ने
हल्के से खाट को झटका" होरीलाल, सोये हो?"
कोई जबाब नही।

कुछ पल पीछे पायत खड़ी नाटी आकृति बड़े ही मीठे सुर में बोली, जैसे कोई कविता गाई हो" तुम्हारा दाना पानी पूरा हुआ होरीलाल । अब चलो।मोह न करो"
पर तमाम कोशिशों के बाबजूद वो आकृतियां बूढ़े के हलक से एक बोल न निकलवा सकी।
हाँ, नाटी आकृति की आवाज सुन उसने अपने दोनों हाथ खाट के किनारों से उठा अपने सीने पे जरूर जमा लिए।

सुबह सूरज ने पूरब दिशा को फोड़ा ही था।। बूढ़े के चबूतरे पे सिर ही सिर दिखते थे।
भीड़ को चीर जमनिया बूढ़े के पाँवों तक जैसे तैसे पहुची।
सफेद चादर पैरो में डाल बोली" दादा ओ दादा, कहा सुना माफ करियो हमारा। हमारे बड़े बूढ़े हुए तम, मेहर करियो।"

चबूतरे से जैसे ही अर्थी उतरी , मोहल्ले के चार नए कंधो ने भार अपने ऊपर ले लिया। तीन पतले , लंबे और एक बेहद नाटा!

आगे की ओर लगे लंबे जवान ने साथ मे चलते काका से रुआंसा हो कहा "कक्का ओ कक्का  देखो तो पश्चिम से क्या गाढ़ी घटा का बादल उठा हैगा। मेह बरसेगा। पहुँच गए दादा हमारे। जाए लगाई दरबार मे हाज़िरी!

बड़े काका ने पंडित जी की तरफ देखा तो उनके  चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे किसी देव ने बड़े तूफान का रास्ता मोड़ दिया हो।
पांचवा आदमी जा चुका था!
                                          -सचिन कुमार गुर्जर
                                            11 मई 2019

शनिवार, 4 मई 2019

एक परकार से

वो आदमी नाउम्मीद था। पढ़ा लिखा जरूर था पर संपत्ति , ओहदा , हुनर , डिग्री , खूबसूरती ऐसे जो तमाम पैमानें है , जिनके आधार पर दुनिया आदमी का पायदान तय करती है , उन सबमें उसका स्कोर काफी कम था | मेरे कालेज  के गेट के बाहर जो मोड़ पड़ता था, बस ठीक उसी ठोर पे, उसकी चाय-मैगी की टपरी हुआ करती थी। सलेटी पत्थरों की कच्ची भींत, टीन के टुकड़ों  की छत और पुराने टाट के अजीबोगरीब से गठबंधन से बनी थी डिमरी भाई की टपरी।
ऐसा बिना चूक होता था कि जब भी मैं उधर से गुजरता , मैं जरूर पूछता  " सुनाओ , डिमरी भाई  क्या हाल चाल।"
और जबाब में वो चौंतीस पैंतीस साल का दुबला , पीतवर्ण आदमी , पहले अपनी पेंसिल मूछों को सहलाता , कुछ सोचता सा मालूम होता फिर  ठेठ गढ़वाली  लहजे में हर बार इतना भर कहता" बस भय जी , ठीक छै | कट रही है।"
वाकई में उसकी जिंदगी बस कट ही तो रही थी। बहुत कुछ पा लेने , भोग लेने के जो इंसानी मूल तत्व होते हैं, इन सबके कतरों से उसकी तबियत महरूम थी | असल मे उसका किरदार किसी पुरानी  , सूखी लकड़ी के लंबे ,सपाट लटठे जैसा था, बेरंग और रूखा | जो बिना इस्तेमाल यूँ ही पड़ा हुआ था और समय का कठफोडवा उस लठ्ठे को एक सिरे से कुतर रहा था। 

टपरी के बाहर  ढाई डग भर की  डामर की सड़क थी ,जिस पर मुख्य सड़क को आते जाते कॉलेज के लड़के लड़कियों के कुछ झुण्ड , ठिगनी नस्ल की कुछ गायें, एक दो भोटिया कुत्तों के अलावा शायद ही कोई गुजरता था | सड़क के पार सलेटी पत्थरों की कोई दो फ़ीट ऊँची दीवार थी | दीवार से उतरते ही नीचे की तरफ ढलान में दूर तक सीढ़ीदार क्यारियाँ उतरती चली जाती थीं , जिनमें गहत की दाल के पौधे छितराये होते | क्यारियों को थामे मिटटी के पुस्तों पर कंडेली घास(बिच्छू घास) का साम्राज्य पसरा होता था जो बिना पानी ,बिना खाद , गहत और लोभिया की पैदावार से भी घनी उगती थी | इसी दीवार से सटा कुर्सी डाल, वो आदमी दिन भर पहाड़ की मीठी धूप सेंकता था ।चट्टान पर पसरे किसी अजगर की मानिंद वो घंटो बिना हड़क बिना फड़क यूँ ही जमा रहता |अखबार के विज्ञापन तक चाट डालता | 
कोई विरला ग्राहक पहुचता तो कुछ समय के लिए उसके अंदर का दुकानदार जागता।

फिर ऐसा हुआ, कि उस आदमी की शादी हो गयी|  संयोगवश।
मेरी तो राय ये है कि उस आदमी से किसी ने पसंद न पसंद का कुछ पूछा भी न होगा।
और अगर पूछा भी होता तो वो शायद कहता कि लड़की होनी चाहिए बस और क्या।बस एक अदद लड़की। यही उसका पैमाना होता।

रात भर मोटा पानी बरसने के बाद आसमान एक दम साफ़ था | छुट्टी का दिन था | पिछले कई दिनों से हमारा एक मित्र बकरे की आंत से बने  भुटवा की तारीफ के कसीदे पढ़े  जा रहा था | और उसकी तलब में हम भी तलबगार हो पौड़ी शहर को जा रहे थे | हालाँकि ज़िब्हा चटान के लिए जो जगह तय हुई थी वो हाइजीन और गुणवत्ता के लिहाज से उत्साह भरने वाली नहीं थी, लेकिन उम्र के उस दौर में तबज्जो स्वास्थ्य को कम , नए अनुभवों को ज्यादा दी जाती है | एक तो दो दिनों से बारिश के चलते हॉस्टल में कैद होने की ऊब , ऊपर से ये खबर कि पहाड़ से नीचे देहरादून के सभी छोटे बड़े टेक्निकल कॉलेजेस में जमकर प्लेसमेंट हुआ है , कम्पनियाँ दर्जनों के हिसाब से मोटे पैकेज के ऑफर लेटर देकर लौट रही हैं  , दबाब हल्का करने हम चार पाँच पौड़ी शहर के लिए चल पड़े | गंतव्य :  शहर की बूचड़ गली !  

कॉलेज के बाहर मौसम इतना साफ़ और खुशगवार कि डिमरी भाई की टपरी पर तो नज़र भी नहीं पड़ी |  हवा की गर्त जमीन पर टपक नदी नालों में बह गयी थी | दूर तक क्षितिज इस कदर धुल गया था कि चन्द्रबदनी मंदिर का शिखर ,  जिसकी कॉलेज से सड़क यात्रा में अमूमन दो से तीन घंटे का समय लगता है , उस शिखर पर लगी लाल पताकाएँ साफ़ साफ़ दर्शनमय थीं | चौखंबा , त्रिशूल , दूनागिरी, वासुकि सब की सब हिमाच्छादित चोटियाँ इतने नजदीक जान पड़ती थीं कि मानों घण्टे दो घण्टे में पैदल चल दूरी नाप लेंगे | खैन्ट पर्वत जिसके बारे में कहा जाता है कि वहाँ परियों का निवास है , और पसंद आ जाने पर जहाँ परियाँ  नौजवानो का अपहरण तक कर लेती हैं , बेहद नजदीक खिसक आया था | सीढ़ीदार खेतों के नीचे अलकनंदा नदी का रंग गहरा हरा प्रतीत होता था | बाँझ और बुरांश के घने जंगल से उठने वाली सर्द तर हवा कुछ ऐसे लग रही थी जैसे बेहद नजदीक से कोई पिपरमिंट के फब्बारे से शरीर को भिगो  रहा हो | चीड़ की सूखी पत्तियों के नीचे बारिश में भीगी मिटटी की खुशबू से नथुने तर थे | मांद से निकले बाघ के शावकों की तरह हम कुछ दूर चलते फिर कुदरत की छटा से तबियत को जी भर सींच लेने को  ठिठक जाते |  


खैर, बकरे की आंत के भुटुये , उसके बाद होने वाली फ़ूड पोइसीनिंग , घर वालों की फटकार अपने आप में एक अलग कथा है | पर फीके अनुभव के साथ हम शहर से वापस लौट आये | डिमरी भाई की टपरी में हम बैठे | पतली गरम मैगी , स्टील की पुरानी ,उथली प्लेटों में हमें परोसी गयी । सस्ते प्लास्टिक के पतले , डिस्पोजल गिलासों में मिरिंडा उड़ेली गयी।  

अचानक हमारा एक मित्र उचका " भाई लोग ,भाई लोग, डिमरी भाई को बधाई तो दे दो। शादी कर ली इन्होंने!!"
चार पाँच आवाजें एक साथ फूटीं" क्या बात, क्या बात। डिमरी भाई । बताया नही। पार्टी तो दे दो ।"
फिर जैसा होता है हर ग्रुप में एक मसखरा , एक मित्र उछला, उसने टेबल में हाथ मार कर कहा" मैं दावे के साथ कह सकता हूँ , डिमरी भाई ने लव मैरिज की है। लिखवा लो मुझसे!"
व्यंगों के तीर उड़ रहे थे" क्या बात , क्या बात , लव मैरिज हुह। छुपे रुस्तम निकले भई जी!" वगैराह वगैराह।

और वो आदमी । पुराने ,उखड़े काउंटर के पीछे खड़ा वो आदमी मारे शर्म के सिकुड़ा जा रहा था।
मैं भी मौज में था ,फिर उस ठिठोली में मुझे भी किरदार अदा करना  था। मैंने डिमरी को कुरेदा" सच बताओ भय  जी, लव मैरिज है ना, अहू हु। ये देखो, शर्म आ गयी ,क्यों खिलाड़ी | "

वो आदमी सरल मन जरूर  था, लव मैरिज के बड़े रुतबे को भली भांति समझता था, काउंटर को दसवीं बार साफ करता हुआ धीमे से बोला" लव मैरिज ही समझो, ..एक परकार से | "

ये जो उसने धीमे से ' एक परकार से ' जोड़ा था, बस उसी में उसकी सारी भावनाओ का निचोड़ था।
उसके पीले गाल मारे लाज के टमाटर जैसे लाल हुए जा रहे थे।
उसकी तबियत से खुशी इस कदर टपक रही थी जैसे रुई के सूखे फाहे को देर तक, बहुत देर तक ,शहद के गहरे बर्तन में डुबो ककर  ताजा ताज़ा निकाला जाए ।
वो आदमी एक तरह से स्वर्ग में था। उसकी अनुभूति को मैं कभी भूल नही सकता। जिंदिगी भर नही।
पुराने जार में ,लंबे अरसे से बर्फी के जो पीस यतीम से पड़े थे, उस आदमी ने बड़े गदगद हो, अखबार के टुकड़े पर हमारे सामने परोस दिए।

अट्टाहस के बीच मुझे कुछ सनक सी हुई और मैंने बिना किसी खयाल , यूँ ही डिस्पोजल गिलास को, जो कि आधा भरा था , अपने अंगूठे और दो उँगलियों से जोर से सिकोड़ दिया। किनारे तोड़ती हुई कोल्ड ड्रिंक मेज पर फैल गयी। और मित्र मंडली ने बिना देर किए सारे रिश्ते याद दिला दिए!

तब नहीं सोचता था अब सोचता हूँ | यही के खुश होना इतना असाध्य भी तो नही है, पैमाना थोड़ा सिकोड़ लिया जाए, उम्मीदों के दामन छोटे कर लिए जाए , जो मिले स्वीकार किया जाए  तो कई बार खुशियां यूँ ही उन्ध पड़ती हैं। है कि नही?

दशक भर से  ज्यादा अरसा बीत गया। जिस जद्दोजहद में आप जीते है उसी में मैं जीता हूँ |  सफल कहाने को , खांचे में फिट होने को अपने किनारे घिस रहा हूँ ।  दूसरों की शर्तों पे जीता दिल कई बार बेज़ार हो जाता है। लक्ष्य असाध्य, अभेद लगते हैं तो कभी कभी  डिमरी भाई का शर्माता, आंनद के सागर में गोते लगाता चेहरा याद आ जाता है।

और मन कह उठता है कि ये जो होड़ की दुनिया है ना दुनिया , सच पूछो तो ये  **यापा ही है , एक परकार से ..!

                                           -सचिन कुमार गुर्जर
                                              04   मई   2019  

बुधवार, 1 मई 2019

पितृ बोध

आसपास के आठ दस गाँवो के लोग जमा हो गए थे|  जिसे भी खबर मिली कि अमीन साब खत्म हो गए, वो आखिर बार अमीन साब की मिट्टी को देखने आया।
विधाता का विधान तो देखिये , सातो जात के दुख सुख में काम आने वाले आदमी का अंत कितना दुखद हुआ।

जाड़े की उस ठिठुरती कोहरे वाली सुबह में उत्तर प्रदेश सरकार में संग्रह अमीन  जगतपाल सिंह डयूटी जाने की जल्दी में थे ।
गाँव के बाहर पथरीली ,निर्माणाधीन सड़क पे एक सब्जी का ट्रक मिला सो उसी में सवार होने का सोचे। ट्रक के पिछौटे में जैसे ही पाँव उठाये , किसी कील में पैंट फंस गई । बेचारे न चढ़ पाए न उतर पाए। सस्ते बॉलीवुड गानों की झूम में ट्रक ड्राइवर ट्रक को हवा की रफ्तार से ले उडा। तीन किलोमीटर बाद जब पक्की सड़क आयी तब किसी बाइक वाले ने इशारा करके ट्रक रुकवाया।
पत्थर की सड़क पे तीन किलोमीटर घिसटने से अमीन साब का शरीर जगह जगह से फ़ट गया था।बुशर्ट और पैंट की जगह अब चीथड़े ही बचे थे | 
पोर पोर से खून ऐसे छूट रहा था जैसे किसी ने सैकड़ो नश्तर एक साथ घोप दिए हो।
अस्पताल तक सांस तो थी पर देह में नुकसान इस कदर था कि स्ट्रेचर पे ही चोला छूट गया।
बेचारे साल भर मे रिटायर होने को थे।

अमीन साब के दो दो  मलंग हाथी जैसे बेटे थे | दोनों ही  दिशाहीन और बेरुजगार। जमीन थी , बाप धकियाता तो निठल्ले लड़के थोड़ा बहुत उसमे कमाते बाकी 'टैम'  गाँव के अड्डे की बड़ी पाखड़ तले ताश पीटते।
अच्छा ये हुआ कि सरकार मेहरबान हुई , वरना रोटियों से मोहताज़ हो जाते। चूँकि अमीन साब ड्यूटी निभाते निभाते खर्च हुए थे,बड़े लडक़े को उनकी एवज नौकरी मिल गयी| 

कुछ ही महीनों बाद अमीन साब का बड़ा लड़का , जो नया नया सरकारी नौकर हुआ था, बड़ी हुनक में अपनी नई बुलेट पे सवार , गाँव की बड़ी चौपाल के सामने से गुजरा।
हुक्के का गहरा कस मार ताऊ ने बड़े गंभीर हो कहा" खैर अमीन तो जैसा था , था ही । अब वो अच्छी जगह है, हम बुरी जगह। पर भैया ,इस सारे (साले)  कलुवा के भाग जग गए बाप मरे से। नही तो ,यो ससुर चपरासी बनने लायक भी नाय हा।"

हुक्का सभा मे सब लोग ताऊ की बात से मुतमईन थे | पर छंगा ने हद कर दी, हुक्के के नाल दूसरे की तरफ  फेरते हुए बोला , " इन ससुरो ने मारा है अमीन | अपनी मौत नहीं मरा | "

चौपाल में सबके माथे ठनक गये | कुछ खाँसे तो कुछ ने बेचैन हो बैठने की मुद्रा बदली | सब एक आवाज़ बोले" अरे हाँ, कलयुग है , पर इतना ना है छंगा, जबान कु लगाम दे ले, इतनी रंजिश न खा ।"
पर छंगा का इल्जाम बेबुनियाद न था, उसने सुनाया," अमीन साब का इलाज़ चल रहा था कई साल से|  टीबी बेकाबू थी|  फेफड़े खत्म से ही हो लिए थे | दिल्ली तक के डाक्टर ने नू कहि कि ये अब बचेंगे नहीं |  "

"हाँ , जू बात तो है,साल भर न पकड़ पाते अमीन साब| " सितम सिंह खाट की सिरहाने से बोल पड़े थे।

सितम सिंह की बात में बात जोड़ छंगा बोला" रिटायरमेंट कु साल भर भी न था|  रिटायर होके निपटते तो जे लल्ला का क्या होता। इस सारे कु कोई पानी पिवाने लाये बहिन रखता। मानो हो मेरी बात या ना ।"

सब मौन थे पर छंगा अपनी बात बढ़ाता चला जा रहा था"इन्होंने निपटाया है अपना बाप। देख लीजियो ।कभी न कभी तो छन के बाहर आयेगी बात।"

बड़े ताऊ जो सरकंडो के बने ऊंचे मूढ़े पे बिराजमान थे , उन्होंने बिना कश मारे ही हुक्का आगे बढ़ा दिया।
दोनो हाथ ठोड़ी में लगा के आगे की ओर झुक के ध्यान लीन से हो गए, फिर एकाएक तिरछी गर्दन कर बोले" मुझे यू लगे है कि अमीन खुद मरा है , औलाद की खातिर। उसे एहसास था कि ज्यादा वो जियेगा नही, सो इनका भला कर गया।"

खाट की पायत पे जमा नया लड़का ताव खा गया " क्या बूझो हो। तुम बूढ़ो  की निराली बातें । मरना होता तो ट्रक के पीछे घिसट के मरता।हुह, चुपचाप सैल्फास के, या भूसा  के कोठरे में फांसी का फंदा न लगाय सके हा। ऐसी दर्दनाक मौत मरना जरूरी था। तुम बुढऊ लोगों  के दिमाग भी। हुह।"

बहस कोई नही कर रहा था, क्योकि पक्का कुछ भी न था।बस सब अपनी अपनी रायसुमारी कर रहे थे।

पोस्टमैन साहब जो गांव के मान्य लोगो मे से थे , कुर्सी एडजस्ट कर धीमे से बोले, " सैलफास खाने में, या फांसी लगाने में डयूटी पे मरना नही माना जाता। कलवा को नौकरी न मिलती| "
सब मौन थे , ज्यादा बोलकर पाप नही कमाना चाहते थे।

छंगा अब शांत था  ,जो भी था उसकी बात को बल मिला था, हुक्के का कश ले आराम से बोला " तुम्हारे अंगूठे के क्या हुआ पोस्टमॉस्टर साब। तुम भीरिटायरमेंट  के आते आते अंगूठा गँवा बैठे| "

" पोस्ट आफिस में ही रद्दी काटते हुए सरोते के नीचे आ गया।"

" तो हो सके है कुछ?"

पोस्टमॉस्टर साब के चेहरे के भाव मिश्रित थे, वैसे ही जैसे आशा और निराशा के बीच झूलते किसी भी आदमी के होते है।

गहरी सांस लेकर पोस्टमॉस्टर साब बोले "देखो , हेड आफिस इलाहाबाद  में अर्जी दी तो है। पर ससुरे बाबू बोलें है कि अंगूठा भर कटने को डयूटी जनित अपंगता नही माना जा सकता। हाँ , दो तीन उंगलियां भी साथ चली गयी होती तो | "

पोस्टमॉस्टर साब के चेहरे पे मलाल के भाव थे , जैसे वो कहना चाहते हो  "काश अंगूठे के साथ उँगलियाँ भी उड़ गई होती!"

जो भी हो , पित्र बोध तो पोस्टमॉस्टर साहब का भी जोर मारता होगा | आखिर उनका स्वास्थ्य भी ठीक नही रहता था और उनका लड़का जीतू भी मस्त सांड सा गांव भर में कुत्ते भोकाने में ही मशगूल रहा करता था | 
                                            -सचिन कुमार गुर्जर
                                              20 अप्रैल 20189

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...