शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

सब नसीबों की बात है

सुनो , कभी  कोसना मत किस्मत को , कि कब  तक पापड़ बिलबायेगी | 

कब तक आजमाएगी | 

क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत तुम्हारे सामने ऐसे शानदार नज़ारे खोलेगी कि देखने वाले कहेंगे कि सब नसीबों की बात है | 


गुरुवार, 20 अगस्त 2026

ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?

जानते हो ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?

क्योकि ये जवानियों पर फलते फूलते हैं | 

इन नौकाओं में आती जवानियों पर | 

जवानियाँ जो आती है दूरदराज के गाँवों से | 

मेरे इलाके के गाँव से | 

फिर वे सींचती है इन शहरों को , भरती हैं इनकी रगो में अपना खून | 

और जब ये शहर उन जवानियों को निचोड़ चुके होते है , तब उनके बचे खुचे मलबे को वापस भेज देते है | 

इन्ही नौकाओं में | उन्ही गावों में जहाँ से वे आये थे | 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

मामूली बातें



ट्रैन पटरी पर चल रही है , सही समय पर | 

एस्कलेटर इंसानो को पाताल में बने स्टेशनो से जमीन की सतह तक ले जा रहे है | 

ट्रैफिक लाइटें जल रही है और ट्रैफिक स्मूथ है | 

आदमी काम पर जा रहा है | 

कैसी रोजमर्रा की बातें हैं | मामूली हैं | 

मामूली चीज़े मामूली होती हैं तब तक जब तक वे हो रही होती है | उनका रुक जाना गंभीर होता है | 



शनिवार, 15 अगस्त 2026

उत्सव

जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ? 

शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं | 

रोज रोज कहाँ टांगी जाती है ऐसी रंगीन कंदीले | 

और ये सोचकर मैं सुकून पाता हूँ कि शायद तुम अब भी उत्सव सा मानती होंगी अपने मिलन का 

जो उत्सव की ही तरह लघु था , दुर्लभ था | 

असहज

 असहज 

यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं | 

कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ | 

सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली  मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ | 

और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर  , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी | 

कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो  पति होने से पहले मर्द  हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद |  मरद जो घोड़े की गर्दनों  पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद  आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे  मरद आपने पाषाण पर | 

सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे  परिवार जहाँ  मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !



गुरुवार, 13 अगस्त 2026

ये जो अपने होते है न अपने

अच्छी खासी पढ़ती लड़की | 

सपने ऊँचे गढ़ती लड़की | 

फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है 

और पढाई छुड़ा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा | 

गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी | 

फिर प्रलोभन में बिहा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे 

आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे | 

भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर 

मनबल सकल गिरा देते हैं | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी | 

दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी | 

फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

Order Number 22

जानते हो मुझे ऐसे कैफे  में बैठ कर चाय पीना क्यों पसंद है | वो यूँ के ऐसे ही चाय के साथ बैठ मैंने न जाने कितने ही लोगो को खोला है |  ऐसे लोग जो खुशहाल शादियों में है पर जिन्होंने सालों से अपने पार्टनर का हाथ तक नहीं थामा | लोग जो ऊँचे ओहदो पर है पर उनका बस चले तो सब कुछ छोड़छाड़  कर पहाड़ भाग जाए ,अकेले।

लोग जिनकी अपने भाई बहनो से बात तक नहीं होती , प्रॉपर्टी के चक्कर में | 

चाय की चुस्कियों के साथ पीना सीख रहा हूँ मैं उनका अकेलापन , उनका गिल्ट , उनकी बेबसी , उनका ट्रामा | 

हर इंसान भरा बैठा है | मैं सीख रहा हूँ उसे खोलना , हर एक कप चाय के साथ | 

सब नसीबों की बात है

सुनो , कभी  कोसना मत किस्मत को , कि कब  तक पापड़ बिलबायेगी |  कब तक आजमाएगी |  क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत त...