रविवार, 2 अक्तूबर 2022

निस्वार्थ भाव



विचार , महज एक विचार आदमी को बौरा सकता है | फिर चाहे आदमी स्वर्ग में ही क्यों न बैठा हो | आप ही बताएं , पुरुष की इच्छाएँ कितनी सी होती हैं ? कुछ अदद सामान ही तो लगता है | मेज पर यार-चौकड़ी  की गिनती भर  के कांच के गिलास , आइस क्यूब्स , सस्ती महंगी कैसी भी व्हिस्की , भुनी हुई  मुर्गी , शाम की ठंडी हवा ,हल्का म्यूजिक और ऊँगली के इशारे भर पर लपक कर गिलास भर देने को तैयार  युवतियाँ |  बस इतना भर ही न | 

बाबजूद इस सबके , छब्बीस सत्ताईस साल का वो युवक कुलबुलाए जा रहा था | घूट दो घूट  लेता फिर किसी बोडम की तरह मन ही मन बुदबुदाता, इधर उधर घूरता  | उसका प्रौढ़ साथी उसे समझाता | 

'क्लार्क की' से गुजरती सिंगापुर नदी का वेग बेहद धीमा था उस दिन | ऐसा जैसे मानो नदी का अपना प्राण हो जो कहता हो : "आराम से | इत्मीनान से | हे सोमवार से शुक्रवार बैल की तरह जुतने वाले इंसान  , शुक्रवार की इस शाम को आराम से | खुल कर जी  और खींच इन लम्हों को , जितना खींच सकता  हो | "   

और लम्हे | क्या ही खूबसूरत | मलक्का की खाड़ी से उठने वाली धीमी हवा नदी के ऊपर यूरोपियन वास्तुकला में बने कैंटीलीवर के पुलों को बिना आवाज एक के बाद एक कर पार करती , फ़ुलर्टन होटल के आगे से वलय लेते हुए रिवरसाइड में बने दर्जनों मयखानो में हाजरी लगा रही थी | 'लिटिल सैगोन' , 'विंग्स बार' , 'टोमो इसाकाया' , 'हूटर्स' , 'हाई लैंडर' , 'लेवल अप' ऐसे दर्जनो, कुछ नामचीन  तो कुछ नए बार्स की कतार दूर तक जगमगा रही थी | नदी के उस पार शॉपिंग काम्प्लेक्स की बत्तियों का प्रतिबिम्ब नदी की सतह पर कुछ ऐसे बनता था जैसे किसी ने एक साथ सैकड़ो दिये तैरते छोड़ दिए हों | एक्का दुक्का टूरिस्ट बोट जब पानी को चीरती तो लहरों के साथ वो दिए भी किनारे की ओर भागते | 'यू ओ बी'  बैंक के ऊँचे टावर के कोने पर चाँद कुछ ऐसे निकला था जैसे मानो कोई बिजली का बड़ा गोल हाण्डा  बिल्डिंग की मुंडेर से टाँगा गया हो | 

नदी के उस पार कोई लोकल बैंड अंग्रेजी गाने गा रहा था | नदी के किनारों को बांधती सीढ़ियों पर कॉलेज के कम उम्र लड़के लड़कियाँ , एक दूसरे के हाथ थामे कसमें खा रहे थे  |कसमें ,जो तोड़ी जानी थी |  और इस पार | थाई , वियतनामी , चीनी , फिलिपीनो | जितनी विविधता लिए व्यंजन उतनी ही वैरायटी लिए बार गर्ल्स | बेहद कम उम्र | उनमे से अधिकांश ने बामुश्किल वर्क परमिट की वैध उम्र को छुआ होगा |  कद काठी, नैन नक्श , चाल ढाल, बोल चाल , इस सब मे  ऐसी जैसे उन्हें 'बार' नहीं  किसी इंटरनॅशनल एयरलाइन्स में एयरहोस्टेस होने को चुना गया हो | 

'ड्रमस्टिक्स' , 'चिकन विंग्स' , 'सीक कबाब' , 'बारबेकु चिकन' , 'टाइगर प्रॉन' , 'पड थाई' , 'टॉम यम सूप' , 'स्मोक्ड सैमन'  ये कुछ चंद डिशेस है | ऐसी न जाने कितनी एक्सोटिक रेसेपी की तस्तरियाँ लिए युवतियाँ दौड़ रहीं थी | व्हिस्की , वोदका , मोजिटो , शिर्ले , बियर , वाइन इन सबके ग्लास खाली होते और फिर से भर दिए जाते | 

अजी , शाम कुछ ऐसी कि आदमी शराब ना भी पिए तो माहौल ही चढ़ जाए ! 

 और इस सबके बीच वो छब्बीस सत्ताईस का बाँका मारे कुढ़ के जला भुना जा रहा था | कुढ़ ? हाँ , बात सिर्फ इतनी सी कि जिन हिरणी  जैसी चाल  के साथ उँगलियों पर तस्तरियाँ उठाये युवतियों को उसे बार बार 'एक्सक्यूज़ मी ' कहकर बुलाना होता था वे ही युवतियां रेलिंग के सहारे लगी मेज पर जमा चार पांच गोरों  पर इस कदर न्योछावर थीं जैसे किसी अमीर रियासतों के  वारिस  पधारे हों  | 

वे उनके हर नए पुराने , अच्छे घटिया हर जोक पर खिल उठती|  बोतल छूट न जाए इस लिए मेज पर रख देतीं |  उनके छोटे छोटे वक्षस्थल देर तक थरथराते  रहते   | गोरों की  फ़रमाहिशों को फेहरिस्त में सबसे ऊपर रखतीं |  दूसरे कस्टमर्स को निपटाती और  फुर्सत होते ही गोरों  की  मेज पर फूलदान सी झूल जातीं |  


प्रौढ़ साथी ने समझाया "ये व्हाइट प्रिविलेज है भाई | इनको हर जगह मिलता है | एक परसेप्शन है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है | परसेप्शन ये कि गोरे ज्यादा खर्च करते है , रईस होते हैं | अच्छी टिप देतें है | पैदाइशी जेंटलमैन होते है | इज़्ज़त से पेश आते है | दिल से सॉरी , थैंक्स बोलते  हैं |बड़े ही सेंसिटिव होते है | अपने लोगो की इमेज कुछ इतर है |"

 "ये एक फसल है जो इनके पुरखे बो गए है जिसे ये आज काट रहे है | और फिर 'बार' में ही क्या | अपने वर्क एनवायरनमेंट में भी ये दिखता है की नहीं ?"

सोया सॉस में तर जूसी चिकन लेग को व्हिस्की से गले में उतारते हुए नवयुवक कुछ नरम तो हुआ, पर उसके अहम् पर लगे दाग का धुआँ देर तक उठता रहा  " ऐसा कुछ नहीं है , आज की दुनिया में कोई किसी से कम नहीं है | "

"हाँ , सही हैं | लेकिन जो पेसेप्शन है सो है | उसके बनने में और बिगड़ने में पीढ़ियां लगती है मेरे भाई , पीढ़ियाँ |  " प्रौढ़ ने कर्त्तव्य भाव से समझाया  |  

घडी का काँटा ग्यारह की तरफ जा रहा था | बिल चुकता करने के बाद बार की कुर्सियों से उठते हुए प्रौढ़ ने बार गर्ल की हथेली पर  दस दस डॉलर के दो नोट रख दिए " ये तुम्हारी मेहनत और सेवा भाव के लिए | शुक्रिया , दिल से शुक्रिया "| युवती ने थाई मुद्रा में झुककर अभिवादन किया |  एक मुस्कान से उसका चेहरा खिल उठा | मुस्कान जो उसकी नाक के नीचे से शुरू हो कान के सिरों तक जाती थी | ऐसी गहरी और आत्मा की गहराईयों से उठने वाली मुस्कान सिर्फ और सिर्फ पैसा ही पैदा कर सकता है !

ट्रैन स्टैशन के लिए कैंटीलीवर  पुल को पार करते हुए नवयुवक ने टिप को लेकर कहा " बड़े भाई इसकी जरूरत नहीं थी | कम से कम आज तो नहीं | " 

और  प्रौढ़ ने मुस्कुराते हुए इतना भर कहा " ये अपने लिए नहीं था छोटे | ये अपनी नस्ल के उन लोगों  के लिए था जो हमारे बाद इस बार में आएंगे !" 


                            --  सचिन कुमार गुर्जर      

सोमवार, 19 सितंबर 2022

पहली दफा



जो दूसरों के पास है , वही सब अपने बच्चों के लिए जुटाने की जद्दोजहद | अपनी ऊर्जा-सामर्थ्य  से  मिडिल क्लास आदमी यही  साधता है | पर एक मलाल है | मलाल ये कि नौकरी से समय मिलता तो मैं बच्चों को कुछ सिखाता | एक विचार , कि माँ , स्कूल टीचर्स, दादा दादी , ये सब समझाते तो होंगे |  अपनी कूबत अपनी इच्छा के हिसाब से | पर क्या वो सब , जो मैं बता पाता !

आप इसे गुमान कहिये  | पर  चम्पक , आविष्कार , मनोहर कहानियाँ , सुपर कमांडो ध्रुव , नागराज से होते हुए उपकार ,प्रतियोगिता दर्पण  ,इंडिया टुडे , दी हिन्दू ,  फिर  टेड टॉक्स , न्यूज़ डिबेट्स से निकल  दाँते ,लियो टॉलस्टॉय , मैक्सिम गोर्की  तक को छूने वाले आदमी को आप थोड़ी नरमाई से नापिये | उसे इस अहसास के साथ जीने की मोहलत दीजिये कि जिंदगी में तीर मारे हों या न मारे हों , विषयवस्तु की पकड़ उस अधेड़ को है | इतना कुछ तो उसके तरकश में है कि एक बच्चे की जीवन दिशा की प्रस्तावना तो बांध ही दे |  

और इसी अहसास से तरबतर वो  आदमी , दस साल के बच्चे का हाथ पकडे सिंगापुर के एक लोकल मार्किट से गुजरा जा रहा था   |बच्चा जो कि अभी अभी विलायत आया था  | पहली दफा , नयी आँखें  |  रविवार की अलसाई सुबह  | ताजा सब्जी , फल, दूध , अंडे ,ब्रेड यही सब रोजमर्रा की चीज़े उठाए कुछ अच्छे पति , वृद्ध  गृहणियां , कम उम्र काम वाली बाइयाँ ,  | नुकक्कड़ो पर , मुनिसिपलिटी की सीमैंट की बैंचों पर ,  कॉफी हाउस के बाहर बूढ़े जमा थे |  बूढ़े जो काफी बूढ़े थे | 


"अच्छा , तुमने ऑब्ज़र्व किया बेटा | सिंगापुर में अपने देश के मुकाबले कितने ज्यादा बूढ़े लोग दीखते है ? "

"सोचो , ऐसा क्यों हैं ?"

और फिर वो दिमाग में गढ़ने लगा कि बच्चे को कुछ समझायेगा   - विकसित देश , क्वालिटी ऑफ़ लाइफ , हेल्थ केयर , लोंगेटिविटी इसी सब के बारे में | 

बच्चे ने सोचा , एक दो दुकान के होर्डिंग पढ़े और  फिर बोला " हाँ , तो क्या पापा , सिंगापुर भी ब्लू जोन में आता है ?"

"ब्लू ज़ोन ?" 

"हाँ , ब्लू जोन , जिसमे जापान आता है , इटली आता है | "

"ओह , ये क्या होता है ?" आदमी  ने इतना कहा पर उसका दिमाग ब्लू जोन , जापान , दीर्घायु इन सबका युगुम बनाने में कामयाब रहा | धीरे से चलते चलते गूगल से कन्फर्म किया | 

"तुमने ये सब कहाँ से सीखा ?"

"पापा आप यू ट्यूब पर नास डेली को फॉलो नहीं करते क्या ? आपको करना चाहिए |  "


मार्किट के किनारे बबल टी की एक एक स्टाल की तरफ इशारा करते हुए बच्चे ने  कहा " पापा , वाओ , बबल टी मिलती है यहॉ !मैंने कभी पी नहीं | ट्राई करें ?" 

आदमी ने पूछा नहीं कि जब कभी पी ही नहीं , अपने शहर में मिलती भी नहीं तो ये 'वाओ !बबल टी ' कहाँ से आया |   रेमैन , किमची ये सब शब्द इसकी वोकैब में आये कहाँ से | 

 हाँ, बबल टी स्टाल की तरफ जाते हुए उसने सोचा कि उसकी दुनियादारी की समझ सिकुड़ रही है  | दुनिया बदल गयी है तरीके बदल गए है , इनफार्मेशन कई गुना तेज रफ़्तार से दौड़ रही है |  आप जो खाली छोड़ रहें हैं ,यू ट्यूब उसे भर रहा है | 

"पापा आपको अगर इंटरेस्टिंग फैक्ट्स चाहिए ना तो मैं  आपको कुछ चैनल्स बता दूंगा | सब्सक्राइब कर लेना | " 

"ठीक है बेटा|  अच्छा  सुनो , सिंगापुर ब्लू जोन में नहीं आता | वो कुछ दूसरी थ्योरी है | बाद में डिटेल में बताऊंगा | "बबल टी लगे स्ट्रा को घुमाते हुए आदमी ने कहा | 

 लेकिन पहली दफा , गुमान में तरबतर रहने वाले आदमी को  ऑउटडेटेड हो चलने ,और फिर  अप्रासंगिकता की ओर लुढ़क जाने का का डर सताने लगा है    | 


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

अगले साल वापस

 


 

सिंगापुर  का  सिटी हॉल मेट्रो स्टेशन | शाम को ऑफिस छूटने की भीड़ है |   दिल्ली जैसी धक्का मुक्की तो नहीं पर डब्बा फुल है |  अंग्रेजी , केंटोनीज़ , होक्कैन , तमिल , मलय मिक्स  के ऊँचे डेसीबल के बीच  सामने की सीट पर दो पुरुष हिंदी में बतला रहे है | बोलचाल , मिजाज से दिल्ली के आसपास के लगते है | कॉर्पोरेट की चाकरी करते है | बड़ा चालीस जमा का है | छोटा शायद पैंतीस हो या उससे भी कम | खाता पीता है , शायद शरीर के भारीपन से उम्रदराज दीख पड़ता है |  

छोटा बड़े से मुखातिब हो कह रहा है " पता नहीं क्यों , ऑफिस में सब सरप्राइज क्यों होते है , जब मैं पेरेंट्स के लिए इंडिया वापस जाने की बात करता हूँ | "

और बड़ा आदमी कुछ ऐसी तबियत से सुन रहा है जैसे कोई साइको थेरेपिस्ट हो  | "हाँ ये तो है | " इतना भर कहता है बस | 

मैंने  लाइब्रेरी से उधार में ली शार्ट स्टोरीज की बुक खोली है पर उनका वार्तालाप मेरा ध्यान खींच रहा है | 

छोटा पुरुष " वो इंफ़्रा टीम का जतिन है न ? "

" हाँ | "

"उसका एक छोटा भाई भी है | पुणे में जॉब करता है | उसकी मदर इंदौर में रहती है | अकेले | कभी गाँव चली जाती है बेचारी | फिर वापस अकेले इंदौर के मकान में | "

वो झुंझुला रहा है | "यार हम अपने किड्स के लिए सब कुछ करते है | हर स्ट्रगल , हर सैक्रिफाइस | क्या हमारे पेरेंट्स ने हमारे लिए ये सब सैक्रिफाइस नहीं किया | किया है कि नहीं ?अपने टाइम के हिसाब से उनसे जो बन पड़ा , वो किया है | गलत बोल रहा हूँ ?"

"बिलकुल किया है | " बड़ा पुरुष हामी भरता है | 

"फिर हमारी कोई ड्यूटी बनती है कि  नहीं ? मैं तो अकेला नहीं छोड़ सकता | पैसा ही सब कुछ थोड़े ना है | "

"और आरती ? वो वापस जाना चाहती है ?" बड़े ने पहली बार सवाल दागा | 

"वो कभी हाँ नहीं करेगी | मुझे ही कदम लेना पड़ेगा | "

मेरे स्टेशन से पहले ही वे दोनों ट्रैन से उतर रहे है | और कोहलाहल के बीच मैं छोटे आदमी को घोषणा करते हुए सुनता हूँ " इस साल देखता हूँ बस | अगले साल वापस !"


पास की सीट खली होने से मैं  तिरछा हो बाहर देख मुस्कुरा रहा हूँ | ट्रैन की  रफ़्तार के साथ हाउसिंग बोर्ड की बिल्डिंग्स पीछे छूटती जा रही है | इन बिल्डिंगस पे अलग रंग की पट्टियां जरूर खिची हैं | कुछ की सपाट सतहों पर मुराल बने हैं | पर ये सब किस हद तक एक जैसी है | इनके खाके , इनका मैटेरियल ,  इनका इतिहास , इनका मुस्तकबिल | सब मिलता जुलता ही है | 

और ठीक वैसी ही मिलती जुलती है हम हिन्दुस्तानियों की कहानियाँ , हमारी जद्दोजहद , हमारे सपने , हमारे फ़र्ज़ | 

अगर वो पुरुष मेरा परिचित होता न | तो मैं  उसकी उद्धघोषणा के बाद उसके कंधे पर हाथ मारता और कहता " नहीं जा पायेगा भाई | अगले साल वापस नहीं जा पायेगा | शायद अगले दस साल भी नहीं !" 

"वो यूँ कि जिस  फ़र्ज़ की तराजू का एक पड़ला तुम्हे इंडिया जाने के लिए खींचता है | उसी फ़र्ज़ की तराजू का एक दूसरा पड़ला भी है | जो अमूमन पहले पडले से भारी होता है | "


                                                                                सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                                बेडोक मेट्रो स्टेशन , सिंगापुर 

                                                                                 5 अगस्त , 2022 

                                                                                 

 

सोमवार, 21 जून 2021

फ्लोरल मास्क



पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े छः बजने का इंतज़ार करता हूँ | साढ़े छः बजते ही मैं अपना मास्क अपनी कलाई में लपेट जॉगिंग के लिए झील के किनारे निकल लेता हूँ | इधर जॉगिंग करते हुए मास्क न लगाने की मोहलत है , पर वापसी में धीमी चाल लौटने पर मुझे मास्क चाहिए होता है | झील की परिधि पर लगभग साढ़े चार किलोमीटर का ग्रेवल ट्रैक है |  ट्रैक के आखिर में झील के ऊपर एक फ्लोटिंग वुडेन ब्रिज बना है ,जहाँ जिंदिगी के ढलते सूरज के बाबजूद कुछ जिंदादिल बूढी , चीनी मूल की महिलाएं मैंडरिन गानो पर नियमित रूप से  सालसा करती हैं | कुछ दंपत्ति अपने बच्चों के साथ कछुओं और मछलियों को  ब्रैड क्रम्स खिलाते रहते है | और वही कहीं खड़ा मैं पसीना सुखाता जिंदगी के तमाम फिलोसॉफिकल सवालों  के जबाब तलाशता रहता हूँ | 

मौसम अच्छा था आज | ना ज्यादा उमस , हलकी हवा थी | टीले पर लगे समन के पेड़ो के झुण्ड के पीछे डूबते सूरज का रंग सुरमई था | कुछ बादळ का टुकड़े यहाँ वहाँ रूई के फाहे से छितराये थे , कुछ ऐसे जैसे किसी मंझे हुए पेंटर ने तस्वीर पूरी करने के बाद ब्रश के दो चार स्ट्रोक यहाँ वहाँ मार दिए हों | एक एयर फाॅर्स का ट्रैनिग प्लेन झील के किनारे लगे पेड़ो की कैनोपी से काफी पीछे , धीमी गति से  उड़ रहा था | एयर फाॅर्स का प्रैक्टिस ग्राउंड है उधर | हर बार में एक के बाद एक आठ पैराट्रूपर्स प्लेन से कूदते | ब्रिज से उनकी बड़ी छतरी में लटके ट्रूपर्स   किसी आधी इस्तेंमाल की हुई पेंसिल से दीखते और महज मिनट भर में उनकी आकृतियाँ पेड़ो की कनोपी की आड़ में आ गायब हो जातीं | ट्रैक पर चलते, ब्रिज पर खड़े  लोग रुक रुक कभी सनसेट तो कभी पैराट्रूपर्स की काली आकृतिओं  को अपने फ़ोन्स में कैद कर रहे थे | 

सड़क  झील से थोड़ा ऊपर की तरफ  है | मास्क चढ़ाये मैं वापसी में सड़क की तरफ चढ़ रहा था |  एक युवक , कोई छब्बीस या सत्ताईस का रहा होगा , जॉगिंग करते से मेरे पास रुका और बोला : हेलो , हाऊ आर यू डूइंग  टुडे ?"

"फाइन फाइन वैरी फाइन , थैंक्स !"

खुशगवार मौसम में आदमी का मूड भी खिल जाता है , वरना आजकल कौन किसका हाल पूछता है , रेड लाइट पर खड़ा मैं यही सोच रहा था |  

दो अपार्टमेंट ब्लॉक्स पार करने के बाद एक पार्क कनेक्टर आता है | एक पतला ग्रीन कॉरिडोर , जहाँ काफी हरियाली है | कुछ झूले और एक्सरसाइज मशीन्स लगीं है | छोटे बच्चों  और उनके पेरेंट्स को ये जगह काफी मुफीद आती है | 

एक युवक , मेरा ख्याल है , तीस का रहा होगा , पार्क कनेक्टर से मेरी तरफ आया | काफी बड़ी मुस्कान लिए था | नस्ल का उल्लेख गैरजरूरी जानकारी है | स्वागत भरी मुस्कान | जैसे वो मेरा परिचित हो और मेरा इंतज़ार करता हो | आज मौसम वाकई खुशगवार था !

ग्रेन कॉरिडोर के बाद एक हाई वे आता है | हाईवे क्रॉस करने को एक फुट ब्रिज है | मैं चढ़ने को ही था | एक आदमी , जो थोड़ा उम्रदराज था , पर काफी वेल ग्रूम्ड , स्लिम ड्रिम , स्पोर्ट्स वियर डाले , वाइट स्नीकर्स में , मुझे देख कर वो ठिठक गया | उसका देखने का तरीक थोड़ा अजीब था | उसकी आँखे किसी जंगली बिल्लौटे जैसी थीं | घूरने की मुद्रा थी उसकी | जैसे पूछ रहा हो तू इधर कैसे ? मुझे समझ नहीं आया | मैं चलता गया | शायद कुछ गलतफहमी हुई हो |  या मेरी शक्ल किसी से मेल  खाती हो | आखिर उसके पास मुझे नफरत करने की कोई वजह तो थी नहीं | मैंने उसका रास्ता तो काटा नहीं | पूरा मास्क चढ़ाये एक दरमियाने से प्राणी से उसकी क्या नफरत | 

फुट ब्रिज सुनसान था | दूसरे कोने से भी कोई आदमी नहीं दीखता था | स्थिति का फायदा उठा मैंने मास्क उतार लिया | 

और मास्क उतारते ही मेरे  दिमाग में जैसे बिजली दौड़ गयी " ओह्ह , ये मास्क "

"ओह्ह्ह , ये मास्क! " 

मैं रुक गया | ये मास्क मैंने अभी दो दिन पहले ही एक माल से खरीदा था | मेरे पास कई सारे काले, नीले मास्क है |  जब मैंने इसे शॉप कार्ट से उठा देखा तो मुझे लगा कि थोड़ा फ्लोरल है , थोड़ा फेमिनिन लगता है | पर काले बेस पर डर्टी वाइट में बने जैस्मीन के फूल के छापे वाला मास्क , मुझे लगा ठीक ही है | कभी कभी लगाया जा सकता है | इसका फ्लैप नाक के जोड़ तक जाता है | कपडा सूती है | कानों के पीछे जाने वाली तनियाँ कानों की नसों को नहीं दबातीं | आरामदायक है | 

पर कहीं ये ही तो कारण नहीं | 'हेलो' , फिर  स्माइल और और वो वो  पैंथर की आँखे लिए वो आदमी | अहह , ये जैस्मीन का फ्लावर मास्क | कुछ रॉंग सिग्नल हो गया क्या ? गलत दुनिया में कदम रख दिया शायद | 

मैंने पैर जमीन पर मारा | धत्त्त | फिर खुद को ही दुत्कारा "सचिन , टू मच फिक्शन , हुह्ह। .. " एक इंडियन शॉप पर रुका , कुछ रस्क के पैकेट लिए , एक सेवई का पैकेट भी | खुश हुआ , काफी अरसे से सेवई खाने का मन था | 

पर मेरा दिमाग अब भागने लगा था | मैट्रिक्स मूवी , जोमंविज जो रात को निकलते हैं , दूसरे गृह के प्राणी जो इंसान बनके हमारे बीच में रहते है और हम उन्हें परख नहीं पाते | ये दुनिया कई सारे आयामों में  चल रही होती है | हम जिस घेरे में रहते है, सोचते है बस उतने में ही सब कुछ है | ये वाइट स्नीकर्स पहने , स्लिम ड्रिम , वेल ग्रूम्ड , लगभग परफेक्ट बॉडी लिए , ऐसे जिन्हे देख मेरे जैसे लोग हीन भावना से भर उठते है, ये सब शायद  अलग घेरे में  रहने वाले लोग हैं | क्या सुन्दर, फैशनअबल  दिखने वाले सभी पुरुष ? नहीं नहीं | 

महज इत्तेफाक भी तो हो सकता है | घर के नजदीक आते आते मैं  सोच रहा था | आखिर किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वाकई कुछ ठोस साबित करे | 

हाँ ये महज संयोग भी हो सकता है | देखो न , फिर आज मौसम भी कितना अच्छा है | 

घर से ठीक पहले बस स्टॉप पर , मेरे पीछे पीछे एक युवक चल रहा था | काफी सुडोल , जिम का शौक़ीन | 

"हेलो ब्रदर " पीछे से आवाज आयी | वो शायद फ़ोन पर था |  

कुछ देर बाद उसने फिर कहा "हेलो ब्रदर "

अब वो बिलकुल मेरे बगल में आ गया | 

"नाइस मास्क ब्रदर " बड़ी चौड़ी मुस्कान लिए उसने कहा | 

"कहाँ से लिया ?" उसने पूछा | 

अचानक से मुझे याद भी नहीं पड़ा | "यहीं से किसी दुकान से "

फिर मुझे याद आया और मैंने कहा " बेडोक मॉल से |"

"वैरी नाइस ब्रो , वैरी नॉइस "

फिर वो मेरे घर की ओर मुड़ने वाली स्ट्रीट तक  साथ साथ चलता रहा | 

होता है कई बार | इत्तेफाक में इत्तेफाक जुड़ते चले जाते है | आखिर आज मौसम भी तो बड़ा प्यारा है | 

लेकिन ये मास्क ? मुझे लगता है इसे उठा कर रख देना ही मुनासिब रहेगा  !


                                     - सचिन कुमार गुर्जर 

                                      २१ जून २०२१ 

शनिवार, 5 जून 2021

जाने भी दीजिये |



सिंगापुर  में बारिश वैसे ही गिरती है जैसे अचानक बिना खबर, डोरबैल दबाने वाला कोई आगंतुक | नीचे उतरने से पहले कमरे की खिड़की से,  अपार्टमेंट्स की पहाड़ियों के पीछे काला बादल जरूर था, पर था बहुत  दूर |दूर,  वैसे ही जैसे वजूद की हकीकत के बैकड्रॉप में उभरते सपनों  में पलने वाली खुशहाली , सुकून और मनचाहा प्यार | ढाई फर्लांग की दूरी पर 'न्यू रेज़की इंडियन मुस्लिम रेस्टोरेंट' है |  छोटा दुकाननुमा , पांच छः टेबल | इंडियन के साथ मुस्लिम लिखने का यहाँ चलन है | इससे भारतियों के साथ साथ मलय मूल के मुस्लिम भी ग्राहक हो जाते हैं | आजकल डाइनिंग तो बंद ही है | एक मलयाली लड़का काम करता है , मेरे लिए चपाती बना देता है | थोड़ी आत्मीयता रखता है | मैं कुछ दिन उधर नहीं जाता तो शिकायती लहजे में कारण पूछता है|  चीनी मूल की युवती है | आर्डर लेने , परोसने , बिल काटने का काम करती है | शरीर से थोड़ा भारी ,आँखे चीनी मानक के लिहाज से भी छोटी ,चेहरे मोहरे से आकर्षक नहीं | लेकिन उम्र के गुलाबी सालों में है | सबसे बात करती है, तुकी बेतुकी हर बात पर हंस देती है | तोते पालने वाले, आर्थिरिटस से जूझते बूढ़े ,पड़ोस की दूकान का नाई , बेकरी में काम करने वाला कमउम्र लड़का, साइकिलों पर मछली पकड़ने के हुक लटकाये झील को जाते शौक़ीन अधेड़, हर कोई उससे कुछ कहता है और उसकी सुनता है | दर्जनों दिल हलके होकर जाते है |  वो मुझे देखते ही रसोई की तरफ देखकर चिल्लाती है: चपाती , टू चपाती | शायद वहाँ चपाती खाने वाला मैं अकेला हूँ | चपाती मेरी पहचान हो गयी है | 

बारिश का मौसम , घर में बैठकर कौन खाये | यही सोचकर बिल्डिंग के पटिओ कवर में जमी कंक्रीट की बेंच पर आ जमा हूँ | दो चीनी मूल के आदमी पहले से विधमान  हैं | पोक्का जापानी ग्रीन टी पी रहे हैं | एक कोई पचपन छप्पन का होगा | मूछें रखे हुए है ,चूहे जैसी मूछें, बाल गिनने भर लायक है बस | तोतई रंग की मैंडरिन कालर की शर्ट पहने है | इस कदर दुबला कि उसकी कोहनियों के जोड़ उसकी भुजाओं से बड़े है | दूसरा चौतीस पैंतीस का होगा | बाल साइड जीरो कट , मुर्गे की कलगी की तरह बीच से छोड़े है बस | दोनों औसत चेहरे , शायद सामने की सेमीकंडक्टर फैक्ट्री के वर्कर हैं  | जिंदगी की भाग दौड़ में खर्च होने वाले आम इंसान |

पचपन साला कुछ सुना रहा है | शिकायतें हैं कुछ | कुछ नहीं बहुत सारी | होक्कीयन में बात कर रहें है शायद | या फिर केंटोनीज़ में | मैं फर्क नहीं कर सकता |  शिकायतें , उफ्फ कितनी शिकायतें | उसका साथी जब बीच बीच में उसकी शिकायतों को कमतर आंकने की कोशिश करता जान पड़ता है तो वो अपने पिटारे से कोई नयी बात निकाल पेश करता है|  कंक्रीट की मेज पर हाथ मारता हुआ दोगुने दम से फड़फड़ाता है जैसे कहता हो : "क्यों ,पर क्यों , मेरे साथ ही क्यों ? "

अवेनुए के किनारे चौड़े पत्ते की महोगनी के पेड़ों की कतार है |  पेड़ , लैम्पपोस्ट , स्पीडमॉनीटर कैमरे के पोल , रोड सिग्नल, सबके ऊपर जैसे आसमान टूट पड़ा है | लोहे के सरिये जैसे मोटे धार की बारिश है | मैंने चाय आर्डर की थी लेकिन कवर वाले डिस्पोजल कप में पहली सिप ली तो एहसास हुआ कि रेस्टोरेंट वाले लड़के  ने कॉफ़ी डाल दी है | कोई शिकायत नहीं | 

लेकिन इस पचपन  साला आदमी को क्या शिकायत है | बीवी से अनबन ? नापसंदगी अभी तक ? लेकिन क्यों ? क्या उसके पास माँ नहीं रही ,जिसने जब वो पैंतीस का हुआ हो ,  उसके बालों में हाथ फेर कहा हो , अब अपना सोचना छोड़ , बच्चों का सोच | उसकी खुद के लिए जीवनसाथी से जुडी आकांक्षाओं, उम्मीदों को तो उसी दिन मर जाना चाहिए था | है कि नहीं ? 

फिर ? शायद बेटा सही राह न चलता हो ?  पर उसका बेटा तो कॉलेज कर चूका होगा या जो भी राह पकड़नी होगी ,पकड़ चुका होगा | क्या बेटे की मसें भींगने के साथ ही इस आदमी की संतान के भाग्य का विधाता बनने की इच्छा नरम नहीं पड़ जानी चाहिए थी ? संतान तो तरकश के तीर की भांति ही है | बल लगा के छोड़ दीजिये , फिर जो भी ऊंचाई ले | कमान से निकलने के बाद भला क्या इच्छा,  क्या उम्मीद | शायद इस आदमी का बॉस उसे तंग करता हो | या स्वास्थ्य सही न रहता हो | इंसान के पास माथा पटकने के लिए लम्बी फेहरिस्त होती है | 

महोगनी के तने से चिपटी पुरानी छाल बारिश के पानी भर जाने से तना छोड़ गिर रही है और उसकी जगह नयी छाल में तना नया हो गया है | इंसान की उम्मीदों को  , सपनों को उम्र के साल गिरने के साथ गिर जाना चाहिए |  उम्मीदे , सबसे पहले खुद से| फिर  बीवी से, संतान से, समाज से , सरकार से , भगवान से | सबको ढह जाना चाहिए | 

घास पर चलते हुए घुटने दर्द नहीं करते तो मुस्कुरा दीजिये | अच्छा खाइये , अच्छा पहनिए | 

हाँ , जेब इजाजत देती है तो अच्छे लेदर के महंगे जूते पहनिए | महंगा जूता राजा होने जैसा फील देता है | सच्ची !

  पुराने सपनों  को गिर जाने दीजिये |  जाने भी दीजिये |    


                                                                 - सचिन कुमार गुर्जर 

शनिवार, 8 मई 2021

क्या कह दूँ |

खैर ये अच्छा बुरा समय तो सभी के पल्ले आता है | पर पहली दफा जिंदगी में हालात कुछ यूँ हैं कि दिन हफ्ते में, हफ्ते पखबाड़े में तब्दील होते जा रहें है और मुझे समझ ही नहीं आ रहा कि क्या कह दूँ |   

कई दिनों से बस सोचता ही जा रहा हूँ | कुछ तो कहना बनता है | दूर से ही सही | वो अपना अपना ही क्या जो इन हालातों में भी कुछ न कहे | 
पर क्या कह दूँ , उस बाप से जिसकी वंश वेल में बस एक ही पत्ता था | जड़ जमीन , योजना प्रयोजना , सौंज साधन सब उसी के लिए तो था | और वही चला गया | 
 उस बाप से कैसे कह दूँ कि  सब्र करो | किस ठिठाई से कह दूँ ? बेहयाई नहीं होगी ये ?
और उस माँ से ? उस माँ से जिसके हाथ में नौकरी की पहली तनख्वाह धर वो बोला था "बहू ढूढ़ ले माँ , जिसे तू हाँ कर देगी उसे ही सिर  माथे रखूँगा | "कॉलेज तक पढाई , कॉर्पोरेट की नौकरी , माँ की पसंद से शादी ,बताइये ,मिडिल क्लास के पैमाने के लिहाज से आदर्श बेटा और  क्या होता है ?
उस माँ से क्या कह दूँ जिसे घर द्वारे में रिश्तेदारों का इंतज़ार तो था पर यूँ कर नहीं | 
क्या ये कह दूँ कि जो गया सो गया ,आगे की जिंदगी के जो भी पन्ने बचे हैं ,उन्हें संवारों | उनसे , जिनकी किताब के सारे पन्नों पर काली स्याही उंध पड़ी है |  जाने वाले का दुःख अपनी जगह है पर जो पीछे छूट गए उनकी जो टीस होती है ना , बस वैसे कि जैसे बबूल के गहरे कांटे देह में गहरे घोप बस अंदर ही छोड़ दिए जाएँ | 
उफ्फ ये कोविड, ये काल | और किस पर तोहमत जडूँ ?

छोटे बच्चों  के दिमाग इंटरनेट से जुड़े है | कोई आठ साल का बच्चा यूटुब पर सच्चे झूठे , अधकचरे वीडियो देख अपने बाप से मुखातिब हो पूछ रहा है " पापा , पहली लहर बूढ़ों  के लिए थी ना और दूसरी जवानों  के लिए | तो क्या तीसरी बच्चों के लिए होगी ? क्यों? "
आप बच्चे को डाँट सकते है | लेकिन ये बोल , महज इतने से बोल आपको खौफ और लाचारी से  तरबतर करके ही जायेंगे | पसीना छूटता है | 
क्या कह दूँ ? जब बड़ों को समझाने के लिए बोल नहीं हैं , तो बच्चों  को समझाने का असाइनमेंट किस हौसलें से ले लूँ |


पहली दफा ऐसा हुआ है कि मरीज अस्पताल जाने से डर रहा है | आई सी यू , वेंटीलेटर , ऑक्सीजन इन शब्दों में भय की प्रतिध्वनि क्यों है | आखिर ये सब तो जान बचाने के साधन हैं ना ? आदमी की साँस फूल रही है , उसकी क्या जरूरत है ,जानता है|   पर  उसे क्यों लग रहा कि अस्पताल जायेगा तो वापस नहीं लौटेगा | व्यवस्था , शासन , समानता , न्यायोचित, अवसर, अधिकार इन मूल तत्वों में आदमी का भरोसा क्यों नहीं है  | ट्रैक्टर ट्राली में गन्ने की जगह अपने मरीज की चारपाई जमाये किसान शहरों की तरह जा रहे है | अस्पताल में बेड , ऑक्सीजन , सही इलाज पा जाने की उनकी आस कुछ उतनी ही है जितनी रात भर अपना तेल जला चुके भोर में फड़फड़ाते दीये की | पर अपनों का जी कहाँ मानता हैं | कोशिश ना करने का अपराध बोध समझते हैं ना आप ?

उन कुछ हार कर लौटते तो कुछ आस लिए जाते ट्रैक्टर ट्रॉलियों के रंग लाल हों या हरे ,अमूमन हर किसी के पीछे लिखा होता है :"खेत पर किसान , सीमा पर जवान | "
और इससे भी बड़े , बोल्ड अक्षरों में : "मेरा भारत महान ! "

हम्म , भारत तो महान रहेगा ही ,  पर ये लिख कर इतराने वाले शायद हताहतों की गिनती में भी ना आएं  | 


                                                                               -- सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                                              

 

  

  

शनिवार, 3 अप्रैल 2021

परिवार की लड़कियाँ

माता के जगराते बोले गए | तीर्थों के बरगदों से डोरे बाँधे गए | पचास पचास कोस के बाबाओं की राख भभूत देह से लपेटी गयी | तब जाकर लल्ला पैदा हुआ | तीन तीन देवियों के पीछे आया घर का वारिस | पूरे गाँव में लड्डू बाटें गए | बड़े जनों को चार और छोटे बच्चों को दो दो लड्डू | और तब से ही हर साल कुलदीप के जन्म के त्यौहार  पर पूरा मोहल्ला दावत न्योता जाता है | और वो तीन लड़कियां भाग भाग खीर पूड़िया परोसती हैं | 'थोड़ा और, थोड़ा और' खुशामंद कर कर सब जनों को इतना खिलाती हैं कि वे  मारे बोझ के कराहते हुए उठते हैं |  उन तीनों का जन्मदिन नहीं होता | पर त्यौहार तो परिवार का होता है ना | पूरे परिवार का | और वो परिवार की लड़कियाँ हैं | वैसे ही जैसे परिवार की गायें , परिवार की जमीन , परिवार की अलमारी में रखी उधारी की पर्चियां, पीढ़ी दर पीढ़ी हाथ बदलते जाते पुराने गहने  |

हाँ इतना ही वजूद है उनका  | वो परिवार की हैं | महज, परिवार की लड़कियाँ |  

 


                                                                                     

निस्वार्थ भाव

विचार , महज एक विचार आदमी को बौरा सकता है | फिर चाहे आदमी स्वर्ग में ही क्यों न बैठा हो | आप ही बताएं , पुरुष की इच्छाएँ कितनी सी होती हैं ?...