"ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं? इसलिए... क्योंकि तरक्की की सीढ़ी के पायदान लकड़ी के नहीं होते, ज़िंदा आदमियों के सिर के ऊपर पैर रखकर ऊपर चढ़ना होता है। शरीफ़ दिल का भोला आदमी या तो ऊपर चढ़ ही नहीं पाता, या भूले से चढ़ भी गया... तो वहां उसका कोई वक़ार, कोई रुतबा नहीं होता।"
संवाद
Simple and short Hindi stories from day to day life
शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026
गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026
असली स्त्रियों के मूछें भी होती हैं |
सारी उम्र बाहरी रूप और रोमांच के पीछे भागने वाले पुरुष ये स्वीकार ही नहीं कर पाते कि असली स्त्रियों के मूछें भी होती हैं |
और ये स्वीकार न कर पाना , उनके भीतर एक नासूर की तरह रिसता है | जिसके चलते वे एक चमक से दूसरी चमक , एक शरीर से दुसरे शरीर के पीछे भागते रहते है | पर सुकून कही भी नहीं आता |
असलीप्रेम असली लोगों से ही मिल सकता है , मोम के पुतलो से नहीं |
मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026
बजरबानी
बजरबानी
बजरबानी नहीं जानती, क्या होता है फेमिनिज्म !
उसका मर्द जब शराब में धुत्त , किसी के चबूतरे पे पड़ा होता है ,तो वो उठाती है उसे उसकी गुदधी से पकड़ |
ला पटकती गई भूसे के कोठड़े में , जहाँ सूख जाता है आदमी का नशा और गुरूर , दोनों ही |
बजरबानी , नहीं जानती क्या होते है वीमन राइट्स के शिगूफे |
हाँ , वो जब देखती है कि विष्ठा खाने निकला है उसका आदमी ,तो वो अपने घुटने के सटीक वार से चटका देती है उसकी मरदी !
और उतार देती है इश्क़ का बुखार | बजरबानी को क्या पता , क्या होते है गुड पेरेंटिंग के चोचले | वो जब पाती है कि स्कूल को निकला उसका जाया , बस्ता छुपा
खदाने में गेंद बल्ला नचा रहा है | तो वो आग फूखने की फुकनी से तोड़ देती है अपनी कोख से जने जाए का मंघर |
और जोड़ देती है बिगड़ा हुआ अनुशासन | ठोकती , बजाती , दनदनाती , सबको सही रास्तों पे लाती |पालनकर्ता, मुखिया ,करताधर्ता , सब कुछ होती है बजरबानी |
बस गिड़गिड़ाती बेचारी अबला नहीं होती !
सचिन कुमार गुर्जर
रविवार, 10 अगस्त 2025
नवोदय के दिन
बक्सा , बाल्टी, एक अदद मग्गा , कुछ जोड़ी कपडे , बिस्कुट , दालमोठ और पंजीरी |
इंतज़ाम तो कुछ ऐसा था जैसे कोई फौजी पल्टन को जाता हो |
ऐसे जैसे सयाना हो कोई , रुजगार कमाने को जाता हो |
पिता जी जब संदूक उठा चले तो माँ रोई नहीं ,
वो यूँ के उसकी हिड़की में हमारी हिम्मत टूट जाने का खर्चा था |
दूर रहेगा, पर मुन्ना कुछ बन निकलेगा ,ऐसा घरवालों में चर्चा था |
स्कूल ईमारत , जेल सलाखें ,कुछ ऐसी ही लगती थी |
तोड़ भगेंगे किसी तरह भी, इच्छा ऐसी सी जगती थी |
हम रोये और कितना ही रोये |
फिर देखा यार , बगल के बंकर बैड का साथी अपने से भी ज्यादा रोता है |
कितना प्यारा है आडी अपना , ये भीं तो बचपन खोता है |
फिर दोस्तियाँ चल निकली | चल क्या निकली , दौड़ पड़ी |
क्या डोरमेट्री ,क्या क्लासरूम ,नलके पर बाल्टियों की कतारें , गप्पें शप्पे, तक़रारे |
बातें ,बातें , बातें ,इतनी सारी , इतनी जैसी ,जैसे सड़कों पर मोटर कारें |
सपने साझे हो गए अपने , साँझे हीरो , नागराज , ध्रुव , डोगा का तिलिस्मी संसार |
वो एकलौता रंगीन टीवी , चद्रकांता , संडे शाम की मूवी और चित्रहार |
मिडनाइट मैगी , मोमबत्ती पे ट्राई पोड लगा बनाई हुई ऑमलेट |
बैड पर अखबार लगा सजी वो खांचेदार थाली , बजती चम्मचे , इक्का दुक्का चॉक्लेट |
चेरी ब्लॉसम किये हुए जूते , जेब में रेनॉल्ड्स संभाले सफ़ेद बुशर्ट ,निक्कर ग्रे |
हम नवयुग की नयी भारती नयी आरती , हर दिन नया थॉट ऑफ़ दा डे |
सदन शिवाजी , गाँधी , सुभाष, अपनी पहचान अपने निशान , अब मन रमने लगा था |
क्लस्टर की तैयारी , खोखो, कबड्ड़ी से स्कूल ग्राउंड सजने लगा था |
जमने लगी थीं यारियाँ , वो पारियाँ , जमने लगा था गेंद बल्ला |
क्लास रूम में जो गुरु हमारे , मैदान में सखा थे ,मचता था हल्ला |
पेरेंट्स डे के दिन अब घर वाले आते , कभी न भी आते |
हाँ ,जिसके भी आते , जो भी लाते , सब बँटता ,सब प्यार पाते |
लड़कियाँ खरगोश सी , वे चश्मिशे जो नाक संभालती थी कभी, अब कितना जंचने लगी थी |
स्कूल कैम्पस के खड़ंजों में लगे लाल गुलमोहर , चंपा ,कनेर डाली डाली लचने लगी थी |
कुछ बातें जो कह दी गयी , कुछ बातें जो कभी नहीं कहीं |
कुछ मुलाकाते जो हुई कुछ मुलाकातें जो कभी नहीं हुई |
बस कुछ ऐसी दुनिया में हम डूबते उतराते न जाने कब सीनियर हो गये |
कुछ हो गए अफसर , कुछ टीचर , डॉक्टर , कुछ इंजीनियर हो गए |
स्कूल की दुनिया छोड़े थे तो दिल से रोये थे
कुछ ऐसे ही जैसे संसार छिना जाता है |
नवोदय तू बहुत याद आता है |
विद्या कसम , अभी तलक बहुत याद आता है|
सचिन कुमार
नवोदय विद्यालय , सैंधवार , बिजनौर , 1st बैच
शनिवार, 24 मई 2025
तलाक़ की लड़ाई
जब नहीं चला गृहस्थ , तो वह हो गयी वापस |
वैसे ही , जैसे कोई ग्राहक लौटा दे ,नापसन्द आया सामान |
फिर उलझ गयी बड़ों की मूछें , बिगड़ गयीं जुबान |
दिखा देंगे , दिखा दो , माँ बहन के रिश्ते हुए तार तार |
खड़े हो गए वकील , चले मुदकदमे चार , दहेज़ , अप्राकृत सम्बन्ध , फौजदारी व् व्याभिचार |
वकीलो के चैम्बर में , जहाँ आदमी से आदमी पिसते हैं|
तारीखों के मकड़जाल में , चप्पल जूते घिसते है |
वह जिसका गृहस्थ था जेरे नज़र , कोने में खड़ी होती थी |
शतरंज चाल की मूक गवाह वह , जीवन अपना खोती थी |
मर्दो के उस हुजूम को चीरकर आती थी एक अनपढ़ भंगन|
बदलने को रद्दी का टोकरा , उठाने को कानून के रखवालों की जूठन |
उसने ना जाने कितने मुक़दमे देखे थे , दाँव पेंच , टूटती कटती पतंगे |
रोता था उसका दिल जब वह देखती थी सूखते स्त्री गात ,भाव शुन्य मुखड़े , हाथ नंगे |
और वह हर बार समझाती थी , देख बहन यहाँ से कोई जीत कर नहीं जाता |
लीपो उस पर जो बिगड़ गया , छोड़ो उसे जो छूट जाना चाहता |
बसाओ कोई नया नीड , लीपो नया आँगन , सजाओ कोई नया उसारा |
मिट्टी डालो इन तारीखों पर, मत बनो मगरमच्छों का चारा |
और वह मुद्दई अबला , उसकी आँख के कुएँ से चला आँसू ,गाल का सिरा छूने से पहले ही सूख जाता |
क्योकि 'देख लेने' , 'दिखा देने' के द्वन्द में , साहस दिखाया जाता है , आंसू नहीं दिखाया जाता |
Sachin Kumar Gurjar
#desiWordsBySachin , #desiWords
रविवार, 18 मई 2025
शक्ति का सफर जलन पैदा करता है |
ये लेख मैं तब लिख रहा हूँ जब भारत ऑपरेशन सिन्दूर से जुड़े अपने पक्ष को रखने के लिए अपने प्रतिनिधिमंडल दुनिया भर में भेज रहा है | यह हर लिहाज से सही कदम है | पहलगाम हमले के बाद से अब तक के घटनाक्रम में सरकार व् एजेंसियों ने बड़े ही नपे तुले ढंग से काम लिया गया है | ऐसे में सवाल ये उठता है कि नैतिक पक्ष मजबूत होने व संयम के दायरे में रहने के बाबजूद हमें ग्लोबल आउटरीच की जरूरत क्यों आन पड़ी है ? हाई स्पीड इंटरनेट और स्वतंत्र मीडिया के युग में जहाँ दुनिया जहान की जानकारी एक क्लिक भर करने पर उपलब्ध है , ऐसे में क्या वाकई पाकिस्तान की प्रोपेगंडा मशीनरी दुनिया में भारत के खिलाफ भ्रम फैलाने में कामयाब रही है ? एक आम नागरिक की नज़र से मैं दुनिया, खासकर पश्चिमी देशों ,की इस मामले पर प्रतिक्रिया को उदासीन ही पाता हूँ |
इस लेख के जरिये मेरा तर्क ये है कि पश्चिम के उदासीन रवैये के बीज तत्कालीन ऑपरेशन सिंदूर से जुड़े घटनाक्रम में हैं ही नहीं | मेरा मानना है कि राष्ट्र छोटे हो या बड़े , उनके व्यवहार में भी वे सब मनोवैज्ञानिक विसंगतियाँ मौजूद होती हैं जो कि किसी एक आम इंसान के व्यवहार में होती हैं | जलन एक ऐसी कुदरती भावना है जो शत्रुपक्ष में ही नहीं विचरती बल्कि तटस्थ व मित्रपक्ष में भी कमोबेश इसके लक्षण आ ही जाते हैं |
हम अपने पौराणिक ग्रंथो में ही झांककर देखें तो पाएंगे कि जब जब मृत्युलोग से उठा कोई सद्पुरुष अपने तप व कर्म से देवतुल्य हो चला , स्वर्गलोक में देवताओं के सिंहासन ईर्ष्या से डोलने लगे | राजा हरिश्चंद्र सदा से ही सत्यनिष्ठ रहे , दानवीर रहे | फिर राजा हरिश्चंद्र को पराकाष्ठा की हद तक परेशान करने की क्या वजह रही होगी | राजपाठ छुड़ाया गया | पत्नी व् पुत्र को बेचना पड़ा | शमशान में काम करना पड़ा | स्वयं के पुत्र को मृत देखना पड़ा | वजह, हरिश्चद्र का मृत्युलोक में रहते देवतुल्य हो जाना ही था |
लेकिन भारत से जलन क्यों ? शायद इसलिए कि आतंकवाद के अनवरत दुष्चक्र के बाबजूद भारत का रवैया जुबानी धमकी से आगे कभी नहीं गया | हमने सदा दुनिया के लम्बरदारों के आगे अपना दुखड़ा रोया , मदद मांगी | भीरु व्यवहार, घर की दहलीज न लाँघने की नीति पर हम सदा कायम रहे | अब अचानक से करवट लेकर दुश्मन के घर में घुसकर मिसाइल मारने की कूबत का जो ये खुलेआम प्रदर्शन हुआ है , यह बहुतों को नागावार गुजरा है | ये एक तरह से परंपरागत वर्ल्ड आर्डर को चैलेंज करने जैसा है |
मैंने दशक भर से ज्यादा दक्षिण पूर्व एशिया में बिताया है | कॉरपोरेट जॉब ने मुझे अलग अलग जियोग्राफी के लोगों के साथ काम करने का मौका दिया है | चीन के साथ हमारा युद्ध का अनुभव है , सीमा विवाद है, सो चीन को संदेही नज़र से देखने व् उसकी चालों से व्यथित होने की हमारे पास वजह हैं | लेकिन मैंने अपने निजी अनुभव में पोलैंड के आईटी प्रोफेशनल्स, जर्मनी के इतिहास के रिसर्च स्कॉलर्स को चीन के बढ़ते रसूख को लेकर खुद से भी ज्यादा चिंतित पाया है | और यह चिंता व्यक्तिगत नहीं है | यह राष्ट्रों की सीमा लांघते हुए पूरे पश्चिम में पसरी है | उभरता हुआ पूरब पश्चिम की चिंता है | पश्चिम के लिए चीन अपने आप में एक बहुत बड़ा टास्क है| ऐसे में अगर भारत भी खुद को नयी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है तो उनकी चिंता दोगुनी हो सकती है |
पश्चिम को कमजोर और गरीब राष्ट्रों को अपनी दया से उपकृत करने की आदत रही है | यही उनके बाकि दुनिया से बेहतर होने के भाव को जीवित रखता है | इसी दृष्टिकोण के चलते उन्हें 'स्लमडॉग मिलेनियर' फिल्म भाती है | भारत आकर झुग्गी झोपडी पर्यटन भी इसी भाव की अभिव्यक्ति है | आप इस पहलु पर भी विचार करें कि आर्थिक, सामाजिक व् सैन्य मापदंडो पर भारत और पाकिस्तान को समतुल्य मानना कहाँ तक तर्कसंगत है ? हर मापदंड के हिसाब से भारत पाकिस्तान से मीलों आगे निकल चुका है | बाबजूद इसके , पश्चिम मीडिया व् लीडरशिप, हमें 'इंडो -पाक' हायफ़न के लेंस से ही देखना चाहते हैं | बदलते परिवेश, उभरते नए शक्ति केंद्रों पर उनकी नज़र है | भारत के मामले में उनकी असहजता अस्वीकृति के रूप में सामने आ रही है | और शायद इसी भावना के चलते पश्चिम के मीडिया ने पाकिस्तान प्रोपेगंडा मशीनरी से उत्पादित कपोल को प्राथमिकता व् तत्परता से छापा है, दिखाया है | सनद रहे कमजोरी से शक्ति की तरफ बढ़ने का सफर अकेले ही तय करना होता है | स्थापित होने के बाद साथी आएंगे लेकिन इस दरमियान का सफर परीक्षा लेता रहेगा | सवाल खड़े किये जायेंगे , शंकाएं पैदा की जाएंगी राष्ट्र को चाहिए कि इस परीक्षा में अडिग रहे - सत्य , संयम और संकल्प के साथ आगे बढ़ता रहे |
सचिन कुमार गुर्जर
शुक्रवार, 16 मई 2025
नोमैड जंगल कैफे
ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं
"ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं? इसलिए... क्योंकि तरक्की की सीढ़ी के पायदान लकड़ी के नहीं होते, ज़िंदा आदमियों के...
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I must thank to my frined Ajeet who persuaded me to go for this memorable trip to Langkawi. Langkawi is definitely among best and most sp...
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बक्सा , बाल्टी, एक अदद मग्गा , कुछ जोड़ी कपडे , बिस्कुट , दालमोठ और पंजीरी | इंतज़ाम तो कुछ ऐसा था जैसे कोई फौजी पल्टन को जाता हो | ऐसे जैसे ...
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Phuket is the largest island in Thailand. At 540 km sq, it's about the same size as Singapore. Just about one and half hour from Sin...