संवाद
Simple and short Hindi stories from day to day life
मंगलवार, 3 नवंबर 2026
महज परिवार की लड़कियां
शनिवार, 31 अक्टूबर 2026
मुआवजा
वक्त के साथ इंसान ही नहीं बदलते | कई बार शब्दों के मायने भी बदल जाते हैं | ऐसा ही एक शब्द है 'मुआवजा '
मुआवजा का शाब्दिक अर्थ नुक्सान की भरपाई की कोशिश में दी गयी राशि या मदद होता है | गौर कीजियेगा यहाँ नुकसान बड़ी घटना है और भरपाई की कोशिश छोटी |
लेकिन जब बसे ये इधर उधर के हाईवे प्रोजेक्ट , sez , इंडस्ट्रियल प्लॉटिंग जैसे प्रोजेक्ट्स में तेज़ी आयी है और शहरों के पेट बड़े होने लगे है , मैं पाता हूँ कि मुआवजे का मतलब 'बल्ले बल्ले ' हो गया है |
मुआवजे की रकम इतनी मोटी हो गयी है कि काश्तकार खुद सोमवार के रोज बंदरो को चना चनौरी खिला रहे कि हे वानरराज प्रभु तक अर्ज़ी पंहुचा दो कि कोई हाईवे आये और मेरी पुश्तैनी जमीन को चीर फाड़ कर जाए |
और ऐसा होने से वो जमीन बेचने के दाग से भी बच जाए , अपने लोन निपटा दे , बच्चो को धूमधाम से बिहा दे और अमीर हो जाए |
इसमें किसान का उतना दोष है भी नहीं | दरअसल खेती मायूसी की इंतिहा है और मायूस आदमी का चमत्कारों में भरोसा बढ़ जाता है |
मुआवजा चमत्कार ही है | मैंने खुद देखा है कि ऐसे ऐसे इलाके जहाँ कीकर के सिवा कुछ न उगता था , रेह यानि महीन धूल उड़ती रहती थी वहां दिल्ली नॉएडा जैसी समृद्धि आ गयी है | कितने ही लोगो ने दूर के खादर बांगरों में जायदादें खरीद ली हैं | ट्रांसपोर्ट कम्पनिया खोल ली हैं | गांव में चौमंजिला महल खड़े कर लिए है जिनमे लिफ्ट लगी हैं | मकान किराये पर चढ़ा दिए है जिनसे अच्छा भाड़ा आता है |
लेकिन मुआवजे को कमाऊ बैल समझना , जो बस तुम्हारे लिए काम करेगा और चुपचाप चर पर आ खड़ा होगा , गलतफहमी है | ये दरअसल एक खुला सांड है जिसे काबू न किया गया तो ये तबाही लाता है |
पिछवाड़े जो ताउम्र लकड़ी के तख्त के आदि रहे अचानक से थार और फॉर्चूनर मांगने लगते है | ऊलजलूल के बिजनस आईडिया आने लगते है जिनसे आदमी का दिमाग भन्ना जाता है | लड़के गाड़ियां , ट्रेक्टर , बाइक मॉडिफाई कराने लग जाते है जिन पर गोली मारु बीच सड़क पर जैसे भोंडे गाने फुल वॉल्यूम में बजते है |
पैसा जब धीरे धीरे आता है तो आदमी में उसे सँभालने की सलाइयत भी आती है | वो सीखता है कहा नफा है कहा नुक्सान |
अचानक से आयी बाढ़ का आदमी क्या करे ? इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि कितने ही ऐसे लोग हैं जो मुआवजे की रकम कुछ सालो में ही खा पी बैठे और अब उन प्रॉपर्टीज में ही रात के गार्ड की नौकरी कर रहे जो कभी उनकी मिलकियत हुआ करती थीं |
इस अंधाधुंध बहने वाले मुआवजे का सही सही सोशल इम्पैक्ट पकड़ने में अभी वक्त लगेगा लेकिन २ बाते है जो मैं साफ़ पाता हूँ |
पहली कि बड़े शहर नॉएडा दिल्ली की चौतरफा हाईवे पर 100 100 किलोमीटर के फासले तक हाईवे पर चिपके गाँवों के किसान अब बेजमीन हो चुके है | उन्होंने जो भी किया हो पैसे का , जमीन की खसरा खतौनी से उनका नाम जा चूका है |
दूसरा ये कि हाईवे से नीचे बैठे गाँवो के लोगों की कूबत नहीं रही कि वे अपनी नौकरी या नकदी फसल की आमद की बदौलत बीघा दो बीघा जमीन इजाफा कर लें | उनके लिए अपनी मौजूदा जमीन को बचाना ही अपने आप में एक मिशन हो गया है |
मुआवजा बह रहा है | कुछ तर जा रहे है तो बहुत से डूब रहे है |
अच्छे आदमी के पास कोई फ्री विल नहीं होती कि वो बुरा हो जाए
अगर तुम अच्छे आदमी हो न | और अच्छे से मेरे मायने दिल के अच्छे , जेनुइन |
तो तुम लाइलाज हो , सुधार की तुममे कोई गुंजाईश ही नहीं है | क्योकि एक आदमी जो बुरा है वो चाहे तो अच्छा हो सकता है अच्छा कर सकता है
जो अच्छा आदमी है वो चाह के बुरा नहीं हो सकता |
जैसे के मान लो अगर तुम फ़र्ज़ करो कि तुम वाकई दिल के अच्छे हो और तुम्हारा भाई तुम्हे फ़ोन करता है पैसो के लिए | अब कमा वो भी रहा है तुम भी कमा रहे हो | तुम थोड़ा ज्यादा कमा रहे हो या उतना ही कमा रहे हो जितना वो कमा रहा है |
तो तुम उसे मना कर पाओगे ? नहीं कर पाओगे ! तुम्हे नींद ही नहीं आएगी |
या फिर मान लो कि माँ है तुम्हारी , साझे की माँ | साझे की इसलिए क्योकि भाई बहिन दुसरे भी है | और उसकी सर्जरी होनी है लेकिन कोई तबज्जो नहीं दे रहा है इस बात पे |
अब तुम्हारे जो रिसोर्सेज है वो भी लिमिटेड है तो तुम रोक पाओगे अपने आप को कि तुम खर्च न उठाओ | नहीं रोक पाओगे | तुम्हारी आत्मा तुम्हे खा जाएगी | तुम्हारे पास कोई विकल्प ही नहीं है |
अच्छे आदमी के पास कोई फ्री विल नहीं होती कि वो बुरा हो जाए | बुरा आदमी अच्छा हो सकता है |
अच्छे आदमी को कोई दवा नहीं सही कर सकती | बस उसे दुआ की ही जरूरत होती है कि सब कुछ अच्छा चले , लोग बाग़ उसका इस्तेमाल करके न निकल जाए |
गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
दादा का दौर
दादा को हम बाबा कहते थे | माँ पर्दा करती थी बाबा से | बाबा जब दालान से घर की दहलीज पर आते तो झूठमूठ का खाँसते | अहम अहम | कुछ ऐसे |
माँ जहाँ भी होती लम्बा पल्लू कर देती | और मैंने भाप लिया था कि कुछ ताकत है खांसने में | मैं खांसता कई बार दूकड़ी में | महसूस करना चाहता वो ताकत |
बाबा अँधेरा होने से पहले खा लेते थे | बैठ जाते दूकड़ी में | मैं परोसता | उसारा था हमारा कच्चा जिसका छप्पर जब चौमासे में चूअता तो माँ झींकती | और अगले पीर की हाट से बरसाती ले आते बाबा | बाँध देते |
मैं चक्कर लगाता ओसारे से दोकड़ी , दोकड़ी से ओसारा | गरमागरम फुल्के ढोता | पानी का गिलास भरता | जी से खिलाता बाबा को |
खाने के बाद मैं हुक्का भरता | चिलम की तली में तम्बाखू जमाता और गुलाबी रंग के बड़े बड़े अंगारो से चिलम में कुतुबमीनार सी देता | फिर हुक्के की नाली को ठंडा करता | पानी की सही मात्रा को भांपने को हुक्का गुड़गुड़ाता | और तसल्ली होने पर ही बाबा के आगे रखता | फिर खाट की पायत पर झूलता रहता | घंटो |
बाबा का कोई मिलनियाँ आता तो बाबा कहते मैं बाजी लगाऊँ हूँ जो ढूढ़ के दिखा दो कोई मुन्नू से अच्छा हुक्का भरावा !
अपनी बढ़ाई सुन मैं झेप जाता |
और बाबा रख देते मेरे हाथ में कभी जंगल से चुने झड़बेरिओं के बेर तो कभी तोता कुतरा अमरुद |
दर्जनों गायें होतीं , उनमे से जो भी सबसे सजीली होती उसका निपानिया दूध पिलाते मुझे | एक ही साँस में एक लोटा | दूध इतना होता था कि तीन तीन मिट्टी के मलसों में खोलता | सेर दो सेर छाछ तो लोग ऐसे ही ले जाते मुफ्त में |
ऐसा अमीर बचपन था मेरा |
हाँ , ये बात अलग है कि रिश्तेदार गरीब समझते थे हमे | उनके मुकाबिल जोत की जमीन काफी कम थी हमारे पास |
पर जब दादा का दौर था मैं राजकुमार था | आज मजदूर हूँ मैं अपने दौर में |
कद्र करो इसकी ये जो पल्लू वाली है तुम्हारी किस्मत में |
कद्र करो इसकी ये जो पल्लू वाली है तुम्हारी किस्मत में |
क्योंकि बीवी लाजबाब हो या न हो , ढक्कन है तुम्हारी जिंदगी का , जो ढाँप लेती है तुम्हारे सारे ऐब , तुम्हारे सारे पागलपन !
और ये दीर्घायु के व्रत रखे जाए या न रखे जाए , बीवी की मौजूदगी में मर्द लम्बा जीता है |
बिना औरत के मर्द सुनी हवेलियों जैसे होते है , जो जहाँ से टूट गए सो टूट गए | उनकी मरम्मत करने वाला कोई नहीं होता |
आई लव यू कहने की आदत न हो तो कोई बात नहीं , हाथ पे हाथ रख के मुस्कुरा दिया करो कभी बिना किसी बात |
बुधवार, 28 अक्टूबर 2026
बाप घिस जाते है वक़्त से पहले ही
बाप घिस जाते है वक़्त से पहले ही
जल्दी करना नौजवान , पहुंचने में , जहाँ भी कही तेरी मंजिल हो |
क्योंकि मायें तो साबुत रह जाती है कई बार | बाप घिस जाते है वक़्त से पहले ही |
और कोई बड़ा मलाल नहीं है मलाल से जब मेहनत का अपॉइंटमेंट लेटर आता है बाप के चले जाने के बाद |
सब खुशिया आ सकती है तुम्हारी मेहनत से , चौधराहट तभी आ सकती है जब तुम काम पे हो और बाप चबूतरे पर सरकंडो के मोढ़े पर बैठा हुक्का पीता हो
सोमवार, 26 अक्टूबर 2026
सरल बनो |
सरल बनो |
सरल बनो तुम उस दुनिया में , जहाँ हर कोई होना चाहता है सोफिस्टिकेटेड !
जहाँ लोग छींकने के बाद कहते है एक्सक्यूज़ मी |
तुम कहना सीखो - हे राम !
दुनिया में जहाँ लोग मानते है , सभ्यता टीसू से पोंछने में ,
खाने में फोर्क से , ऐसे ऐसे खाने जिनके नाम लेने में भी जीभ खाती है मरोड़ा |
तुम लो रात के दूध की मलाई , जमाओ उसे बासी रोटी पर
बुरको उस पर थोड़ी चीनी
और बीड़ा बनाकर ऐसे खाओ जैसे कोई ना देखता हो |
स्वैग है आजकल सरल होने में ही |
शर्माते हो ? तो क्या याद दिलाऊ |
याद दिलाऊ कि उस दादा की वंशबेल पर उगी हुई पत्ती हो तुम ,
दादा जो भरी सभा में छोड़ देते थे वायु ,
बिना दबाये , बिना लजाये
और कह देते थे बस इतना कि हरिओम , हरिओम !
सरल बनो |
सरल बनो तुम उस दुनिया में , जहाँ हर कोई होना चाहता है सोफिस्टिकेटेड !
महज परिवार की लड़कियां
शहर की बड़ी डॉक्टरनी ने कह दिया कि थोड़ा फांसला लेलो , तीसरे बच्चे के बाद कोई बच्चा नहीं हो पायेगा | चिंता की बात थी , जमीन जायदाद , इतना बड़ा...
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