कोई गुनाह है क्या , औसत होना
दोयम होना किताबो में , खेलों में
नहीं तो !
तो फिर गुनाह है क्या ,
एक इज्जत की नौकरी का हक़दार होना ?
नहीं बुनियादी हक़ है ये तो !
तो गुनाह होगा एक जवान आदमी का ,
पड जाना प्रेम में , उम्र के गुलाबी सालों में !
नहीं , कुदरती है ये भी !
तो फिर स्वार्थी होगा वो आदमी
जो कहता है कि जीवन उसका छोटा है और जीना चाहता है वो अपनी शर्तो पर
नहीं , जीवन तो उसका है |
तो फिर ?
गुनाह ये है कि ये आदमी भीड़ में पैदा हुआ है !
जहाँ आदमी सब कुछ है गाजर , मूली , कद्दू , आवारा , नाकारा |
बस , आदमी नहीं है !
मेरे जंगल का आदमी, आदमी क्यों नहीं है ?