गुरुवार, 23 जुलाई 2026

भिंचाले में फंसा तकिया

आज सुबह उठा तो यकायक ख्याल आया कि एक लम्बे अरसे से मुझे सपने ही नहीं आते | 
काम से लौटता हूँ , कुछ खाता हूँ और बिस्तर पर गिर जैसे मर जाता हूँ | अगली सुबह तक के लिए |
तकिया , जिसे बाँहों में भर मैं तुम्हारी यादें लिए नींद में उतराता था , और जो महीनों से बिस्तर से गायब था  | पाया कि वो तकिया  बिस्तर और दीवार के भिंचाले में फँसा है | किसी यतीम सा | 
एक मकड़ी ने उस पर एक महीन सफ़ेद जाला बुन अपनी मिलकियत का दावा  ठोक दिया है |

दिन भर सोचता रहा क्या कुछ ऐसा  दूँ  कि  तुम लौट आओ | 
पूरी ना सही , इतनी भर कि सपने लौट आये | 
इतनी  भर कि भिंचाले में फंसा तकिया वापस बिस्तर लौट आये आए | 
सोचता रहा कि लिखू तुम्हे कि मेरा तकिया पूछता है कि तुम्हारा तकिया कैसा है !

शनिवार, 18 जुलाई 2026

और फिर एक दिन

कितने ही प्रेम निवेदन ठुकरा दिए मैंने | 

इस गुमान में कि कही कोई फ्यूचर में है जो सबसे बेहतर है और जो मेरे इंतज़ार में है | 

कितनी ही यात्राओं के प्रस्ताव जो मेरे दोस्तों ने रखे , मैंने नकार दिए , इस हुनक में कि अभी समय  नहीं है | 

कितने ही पहाड़ , समंदर , झरने जो मेरी जद में थे , मैंने नहीं घूमे , इस मकसद में कि पैसा बचाना है | 

कितने शगल , कितने शौक जो मुझे जिंदादिली  से जीने का एहसास दिला सकते थे , मैं सबको रौंधता चला गया | 

इस गलतफहमी में , कि एक दिन मेरा दौर आएगा , अभी उम्र पड़ी है | 

आँखो पर पड़े पर्दो से मैंने देखा कि मेरी जवानी का झरना सदानीरा है , जो बस बहता ही जायेगा | बहता ही जायेगा | हमेशा | 

और फिर एक दिन मैं बूढा हो गया | 

जिंदगी उतनी लम्बी नहीं है , जितना हम सोचते हैं !

Life is shorter than it appears . Live it.

          An original by Sachin Kumar Gurjar


कहना सीखो

कहना सीखो | वे बातें जो कहने की हैं | 

उनसे , जिनके होने से तुम हो | 

क्योंकि वक़्त ऐसा भी आता है कई बार | कि तुम जाते हुए आदमी को रोकना चाहते हो | 

चाहते हो कि अपनी जिन्दगी के बैलेंस से कुछ वक़्त उन्हें दे दो | इतना वक़्त कि वो बाते जो तुम उनसे कहना चाहते हो , कह पाओ | 

मलाल कभी उन बातों का नहीं होता जो कह दी जाती हैं | उन बातों का होता है जो तुम कह नहीं पाते |  इसलिए कहना सीखो |  उनसे जिनसे तुम कहना चाहते हो | 


मंगलवार, 7 जुलाई 2026

Takiya


दलील सुने जाने की रिवायत में जब मुझसे कहा गया कि पूछो अगर कुछ पूछना है ,तो
मैंने पूछा "सर,आप ये बताइयेगा कि एक तकिये का क्या इस्तेमाल है ?"
उन्होंने कीबोर्ड पीटना चालू रखा और कहा " तकिया,सिर के नीचे लगाया जाता है "
मैंने कहा " नहीं, तकिया सिर के नीचे भी लगाया जाता है !"
"गुस्ताखी माफ़ पर गत वर्ष में मुझे मेरे दिए रोल के अलावा जहाँ भी फ़िट किया गया ,जब भी किया गया ,मैंने अपनी शिद्दत से काम किया है। बिना इस प्रतिरोध कि यह या वह मेरा काम नहीं है "
उन्होंने हमारे बीच पाले में रखा लैपटॉप एक तरफ़ खिसका दिया और कहा "पता है,तुम्हारा और तकिये का प्रॉब्लम क्या है ? तुम दोनों ही लचर पचर हो l कहीं भी फ़िट हो जाना कोई स्किल नहीं है l
कुछ तो ऐसा हो कंक्रीट,सॉलिड जिसे शोकेस किया जा सके l बोलो "
"आप चाहेंगे कभी,ऐसा तकिया इस्तेमाल करना ,जिसमे कंक्रीट हो !" मैंने कहा l
जबाब में उन्होंने एक गहरी साँस ली बस l
और इस तरह,साल में एक बार होने वाली मेरी अप्रैसल मीटिंग बिना किसी वेतनवृद्धि, बिना किसी शाबाशी ख़त्म हो गई l
                 :सचिन कुमार गुर्जर
             


शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

toxicity

 सभी इंसान अच्छे होते हैं , तब जबतक सब कुछ अच्छा चल रहा होता है | 

अधिकतर इंसान ख़राब होते जाते है , तब जब सब कुछ एक है नहीं चल रहा होता | 

और ये ख़राब इंसान खुद तक ही ख़राब नहीं रहते | किसी टोकरे में रखे आमों में फैली सड़न के माफिक ये सड़न फैलती है | अच्छे आदमी भी इस सड़न की जद में आते जाते हैं | 

ये जो आसमान में छेद करती बुलंद इमारतें हैं ना इन्हे आप किसी गोदाम के सफों पे सजी आम की पेटियों जैसा समझिये और इनमे काम करने वालों को आम | 

आम , जो कुछ सड़े हुए हैं | कुछ सड़न की कगार पे हैं | कुछ ऐसे हैं जो कैसे भी कर इस सड़न से छूट जाना चाहते हैं | 

आज , दस में से आठ आदमी इस सवाल से रूबरू है कि इस माहौल में उसका मुस्तकबिल क्या है | 

क्या उसमे कुछ ऐसा है , कोई भी थोड़ा बहुत हुनर , या कोई भी ऐसा काम करने का बूता जो उसे इस सड़न से मुक्ति दिला सके | 

कुछ क्रिएटिव आर्ट , प्रॉपर्टी , शॉप , कोई ऑनलाइन बिज़नेस , फार्मिंग , कोई फ्रैंचाइज़ी , कोई पीसफुल रिमोट जॉब , कोई अपनी खुद की गुमटी | 

कुछ भी ऐसा है जो उसका खुद का हो ऐसा हो जो सुकून से कुछ कम भी कमा जीवन यापन का झरोखा खोल दे | 

लेकिन क्या सालों की जॉब कंडीशनिंग , फॅमिली की जिम्मेदारी , जकड़े आदमी के पास इतना गूदा बचता है कि वो नए काम की uncertainity में कूदे ? 

ये डर है और ये वाजिब डर है | और ये डर उसे बर्दाश्त करते चले जाने की सलाह देता है | वो सिकुड़ता जाता है | जमीन छोड़ता जाता है | 

और उसका ये जमीन छोड़ना , अपने पाले में पीछे हटते जाना टॉक्सिसिटी की जमीन तैयार करता है | जमीन जिसमे फूल मुरझाते जाते है और कैक्टस फलते फूलते हैं | 

सवाल ये है कि कॉर्पोरेट में क्या वाकई हालात इस कदर ख़राब है कि हर दूसरा आदमी  ड्रैकुला जैसे लम्बे दाँत लिए खून पीने को आतुर हैं  | या खुद की इन्सेक्युरिटीज़ से जूझते लोग अपने साथ काम करने वालो , अपने नीचे काम करने वालों की जिंदगी जहन्नुम बनाते जा रहे हैं | 

आप क्या सोचते हैं ? 


रविवार, 28 जून 2026

सोचो

 सोचो , कितने बंधनों में बँधी रही होगी वह स्त्री , जिसने नौकरी में अपनी आज़ादी ढूंढी | 


मत कहो उनसे


 मत कहो उनसे  कि उन्होंने तुम्हारे लिए किया ही क्या है ! 

उन्होंने जिन्होंने , जेठ की दुपहरी में कमाकर , अपना पेट काटकर तुम्हे अच्छे से अच्छे स्कूलों तक भेजा है | 

: मेहनतकश माता पिताओं को समर्पित 

भिंचाले में फंसा तकिया

आज सुबह उठा तो यकायक ख्याल आया कि एक लम्बे अरसे से मुझे सपने ही नहीं आते |  काम से लौटता हूँ , कुछ खाता हूँ और बिस्तर पर गिर जैसे मर जाता हू...