पता नहीं क्यों , मुझे घबराहट होती है अच्छे लोगो के साथ | लोग जो जेनुइनली अच्छे होते है | लोग जो बिना मतलब हाथ बढ़ा देते है मेरी मदद को | अजीब सी बैचनी होती है मुझे |
लगता है की कुछ तो गड़बड़ है | कुछ ऐसा जो बस अब टूट जायेगा |
और ये बार बार होता है मेरे साथ | मेरा मन होता है भाग जाने का ऐसे लोगो से दूर | या फिर मैं सूँघता रहता हूँ हर वक़्त जब तक वे मौजूद होते है कि कुछ तो ऐसा सुराग मिले जिससे मुझे पता चले कि क्या चाल है इस आदमी की |
पूरे वक़्त जब वे बतला रहे होते है मुझसे मैं गौर से देख रहा होता हूँ उनकी आँखे कि दिख जाए कोई सुअर का बाल |
जिससे पता चले कि हाँ ये आदमी आदमजात ही है |
कभी कभार कोई दोस्त फ़ोन कर देता है मुझे और कोई भी मतलब जाहिर नहीं करता तो बैचेन हो जाता हूँ मैं |
क्या पेसिमिस्टिक हूँ मैं और ये दुनिया अच्छी ही है हमेशा से |
तो बताओ मुझे इतने जख्म क्यों है मेरी पीठ पर |
क्यों लूटा गया है मुझे बार बार , उन्ही के द्वारा जो हमराह रहे मेरे |
क्यों छोड़ा गया मुझे अपनाकर | क्यों बिठाया गया मुझे पलकों पर और फिर फेंक दिया ये कहकर कि मैं कुछ भी डिज़र्व नहीं करता |
और कितनी बार कितने हो लोगो के द्वारा हुआ ये सुलुक मेरे साथ कि नकली लगते है मुझे अच्छे लोग |
तुम कभी मिलो न मुझसे तो मत कहना कि लोग अच्छे होते है और अच्छे लोगो को अच्छे लोग मिलते है |
क्योकि मैं फट पडूंगा और तुम्हे भी अच्छा नहीं लगेगा |
कि मिले मुझे कोई ऐसा सुराग कुछ तो आँखों में मुझे परेशां से ही