शुक्रवार, 10 मई 2024

शुक्रवार की शाम

 


शुक्रवार की शाम का अपना एक दबाव  होता है | दबाव यह कि शाम जाया नहीं होनी चाहिये | और इसी के मद्देनज़र मैंने दो तीन दोस्तों को संदेशा भेजा है कि शाम को मिला जाए | ऑफिस की सीढियाँ उतरते हुए सोच रहा हूँ कि पी जाए या न पी जाये | 

अकेले पीने का कोई मूड नहीं है | बिना संगत पीना भी कोई पीना है  |फिर अभी पिछले हफ्ते अपने गृह प्रवास के दौरान मैंने ठीक ठाक मात्रा में 'ब्लैक डॉग' और  '१०० पाइपर्स' धकेली है |  हाँ या ना , बस इसी ऊहापोह  में रिवर फ्रंट की तरफ बढ़ा चला जा रहा हूँ | 

रैफल्स पैलेस जनपथ के साईडवॉक  पर एक गोरा खड़ा है , उम्र के गुलाबी सालों में है  | दो बीगल्स लिए है  | सफ़ेद , लाल , काले चक्क्ते वाले बीगल्स | उनके कान उनके मुँह से बालिश भर नीचे तक लटके है | 

मुझे बीगल्स औसत ही लगते है | लेकिन ट्रैन स्टेशन से रिवर फ्रंट को आती दो चीनी बालाओ से रहा नहीं जा रहा | "ओह्ह सो क्यूट सो क्यूट !" वे  ख़ुशी से उछल रहीं हैं | उनके दूधिया हाथ तालियाँ बजा रहे है | वैसे ही जैसे छोटे बच्चे अति उत्साह में बजाते हैं  | उनमे से एक गोरे से पूछती है कि क्या वो उन्हें छू ले |  'यस , स्योर ' गोरा इज़ाज़त दे देता है | 

यहाँ मुझमे थोड़ा बहुत कॉग्निटिव बायस हो सकता है  , पर आप शुक्रवार की शाम को, सिंगापुर के रिवरसाइड वाक  पर , कुत्तों के टहलाते जवान गोरे को कामदेव ही समझिये | जहाँ निशाना लगा तीर चला दे ,  बड़ी आसानी से खींच लेगा | सीमलेस , एफर्टलेस    ! 

सोच रहा हूँ , आदमी अगर सही जगह, सही जीन पूल में  पैदा हो जाये तो सब कुछ कितना सहज हो जाता है | कम से कम भौतिक स्तर पर तो हो ही जाता है |इसके इतर मेरे जंगल के आदमी को सब कुछ कमाना  होता है| नौकरी,  घर , गृहस्थ , बच्चो की पढाई , हेल्थ इंसोरेंस , माँ बाप का बुढ़ापा , गाढ़े दिनों के लिए कोई जमीन का एक्स्ट्रा प्लाट , बीवी के गहने और किस्मत हुई तो थोड़ा बहुत प्यार | सब कुछ परिश्रम से ही है | लाइफ अपहिल टास्क मोड में ही रहती है |  

उन कुत्तों से मुझे याद पड़ा है कि कॉर्पोरेट ऑफिस का पट्टा अभी तक मेरे गले में लटका हुआ है | मैं झुंझला कर उसे लैपटॉप बैग की साइड पॉकेट में सहेज रहा हूँ | मुझे कुत्ता होना मंजूर नहीं  | 

सच्ची? नहीं, मेरा मतलब है , ऐसा कुत्ता होना मंजूर नहीं जिसे घडी घडी दुत्कारा जाए | ऐसा नहीं, जिसकी दुम हमेशा मारे डर पिछवाड़ा ही ढाँपती  रहे | 

हाँ , ऐसा कुत्ता होने में मुझे कोई गुरेज नहीं जिसके गालों पर कोई हलकी सी थपकी देकर कहे "सो क्यूट !"

उम्र के साथ मुझमे सब कुछ सिकुड़ रहा है  | सिवाय मेरी नाक के | एक नाक है जो दिन प्रतिदिन , इंच दर इंच बढ़ती जा रही है | 

 फिलहाल ये नाक नदी किनारे कतारबद्ध बने रेस्टोरेंट्स के किचनस  तक जा रही है  | चिकन  विंग्स , चिकेन ब्रैस्ट स्ट्राइप्स विथ सोया सॉस, ग्रिल्ड सैमन , डीप फ्राइड प्रॉन , टर्टल सूप , रोस्टेड गूस , पैन स्टिर लॉबस्टर , ग्रेवी क्रैब | एक से एक एक्सोटिक फ़ूड आइटम्स | मेरे नथुने फूल रहे है | गला जेठ की दुपहरी में दरकी जमीन सा बिलबिला रहा है | पेट में ऐठन हैं | कॉर्टिलेस  की कमी से हर कदम के साथ घुटनों से टक टक की आवाज़ आ रही है | 

एक,  दो,  तीन,  चार, और  पांच | पाँचवे ओपन एरिया रेस्टोरेंट तक पहुंचते पहुंचते मेरे घुटने जबाब दे गए है |    

और सूखे गले से , नवयौवना वियतनामी वेट्रेस से मैं बमुश्किल इतना भर कह पाया हूँ  " वन कार्ल्सबर्ग प्लीज !" 


शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

श्रद्धा भाव


 

सिंगापुर सुविधाओं , व्यवस्थाओं का शहर है | सरकार आमजन की छोटी छोटी जरूरतों का ख्याल रखती है | फेरिस्त लम्बी है , हम और आप महीनो जिक्र कर सकते हैं | एक छोटी सी पर हर कम्युनिटी पार्क में दिखने वाली  व्यवस्था है , एक्यूप्रेशर बेल्ट | 

फ्लॉवर बेड के सहारे या ग्रास लॉन के किनारे आठ दस  मीटर की संकरी कंक्रीट फ्लोर होती है | जिस पर नुकीले पैबल्स को बड़ी सघन बसाबट में जमा दिया जाता है | किनारे से , चलते हुए सहारा लेने के लिए  पॉलिशड स्टील की रेलिंग गाढ़ दी जाती है | मान्यता ही है या विज्ञान भी , मुझे नहीं पता , पर ऐसा बोला जाता है कि इस तरह की एक्यूप्रेशर बेल्ट पर सुबह सुबह नंगे पैर चलने से रक्तचाप नियंत्रित होता है | 

मैं सोमवार से शुक्रवार साढ़े आठ बजे उठने को शरीर घसीटता हूँ , लेकिन शनिवार को सात बजे आँख खुल जाती है  | झुंझलाहट होती है , देर  तक सोना चाहता हूँ ,पर ये मेरे बुढ़ाते शरीर की व्यवस्था है | जो है सो है , मॉड में रहकर स्वीकार करता हूँ | 

सुबह मैं कम्युनिटी पार्क के चक्कर काट रहा था तो पाया कि एक अधेड़ भारतीय स्त्री एक्यूप्रेशर बेल्ट के मुहाने पर नंगे पाँव खड़ी है | एक हाथ में ताँवे का लोटा, लोटा जिसकी गर्दन पर मोटा गेरुआ सूती धागा लिपटा था | 

उसने दाए हाथ में लोटा उठाए , एक्यूप्रेशर बेल्ट का एक चक्कर पूरा किया | नुकीले पेवल्स की चुभन से चेहरे पर दर्द उभर आया था | दूसरे सिरे पर पहुंची तो कुछ देर ठिठकी | वापस मुड़ी और फिर उसी दृढ़ता से दूसरा चक्कर पूरा किया | फिर तीसरा और चौथा | 

फिर एक लैम्पपोस्ट के सिरहाने खड़ी हो गयी | चांगी राइज अपार्टमेंट बिल्डिंग के ऊपर सूरज बस ऊगा ही था | उँगलियों के गुलदस्ते में फँसे लौटें को उसने सूरज की ओर उठा दिया | काँपते होठों से कुछ बुबुदाते हुए , उसने लोटे में जमा जल की आखिरी बूंद तक सूर्य को अर्पित की और बड़े तेज कदमों से अपने अपार्टमेंट में लौट गयी | 


दूसरे सिरे पर बनी बेंच पर जम चुका मैं मुस्कुराया तो मेरा दायाँ हाथ अकस्मात आशीर्वाद की मुद्रा में खड़ा हो गया | सूर्य देवता अगर अपने भक्तो पर तबज्जो देते होंगे तो मुस्कुराये वे भी होंगे | अजी ,सुबह उठकर जल चढाने वाले बहुत है | लेकिन पार्क में बनी एक्यूप्रेशर बेल्ट के चार कष्टप्रद  चक्कर काट अर्घ चढाने वाला शायद कोई विरला भी ना हो | 

उस स्त्री के  १० में से १० नंबर बनते है !

                          सचिन कुमार गुर्जर 

                           मेलविल पार्क , सिंगापुर 

                           १६ सितम्बर , २०२३ 

                      

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2022

मलाल


 

अभी पिछले कुछ दिन पहले मैं एक 'मलाल' से टकरा गया | लंच के बाद कॉर्पोरेट दफ्तरों की कतार के गलियारे में चहलकदमी करते हुए वो टकरा गयी | 

"अरे तुम , तुम यहाँ कैसे ?" उसने कहा | 

"मैं तो इधर ही जॉब करता हूँ , तुम यहाँ कैसे ? " सवाल के जबाब में सवाल ही था मेरे पास भी | 

कॉर्पोरट की छोटी दुनिया | पुराने लोग टकराते रहते है  | शायद पास के किसी ऑफिस में क्लाइंट मीटिंग के लिए आयी थी | 

"कितना टाइम हो गया है ना ? याद है तुम्हे ? " उसके शब्दों में गर्माहट कुछ ऐसे थी जैसे हम किसी जमाने में बहुत ही घनिष्ठ रहें हो |  

"शायद दस साल | " एक मोटा अनुमान लगा कर मैंने बोला |  

"दस नहीं बारह साल | "  

हमने पुराने ऑफिस के दो चार साथियों को याद किया | कौन किधर जॉब करता है ये बताया, सुनाया | 

"चलो चाय के लिए मिलते है | तुम हो न अभी इधर?  " मैंने पूछा | 

उसके मिल जाने से दिमाग की तहो में दफ़न ना जाने कितनी बातें बुलबुलों की तरह फूट फूट कर ऊपर आने लगीं | 

यही कोई चौदह साल पहले जब मैं कामगारों के जहाज में सवार हो सिंगापुर आया था , तभी पहल पहल उसका दर्शन हुआ था | और दर्शन ऐसा दर्शनीय कि आदमी भूल नहीं सकता !  शादीशुदा थी | शायद कोई बच्चा नहीं था तब तक | कद औसत भारतीय स्त्री कद से थोड़ा ऊँचा | शरीर भरा हुआ था | डॉयटिंग वाइटिंग के चोचलों से परे थी | रंग दूधिया उजला | हँसती या थोड़ा लजाती तो एक दम से खून के दौर से गाल लाल हो जाते | अनार दाने की तरह बारीक दांतो की कतारें थोड़ी ही खुलती थीं | नाक खड़ी , सुतवा | पर नासिका छिद्र इतने छोटे थे कि देख के अचम्भा होता कि इतने महीन छिद्रो से जीने भर लायक हवा भी कैसे अंदर जाती होगी | पपीहे की तरह छोटी और मीठी आवाज़ वाली , हर बात बेबात पर मोटे बटन सी गोल आँखे घुमा घुमा कर हॅसने वाली| अपने क्यूबिकल और  आस पास के चार पांच क्यूबिकल की ख़ुशनुमाई की अहम् किरदार थी |  

मलाल? मैंने कहा ना वो शादीशुदा थी ! खूबसूरत पर शादीशुदा स्त्री हर दूसरे पुरुष के मन में मलाल ही होती है | मीठा पीठ दर्द होता है ना | दर्द जिसका दिन की आपाधापी  में ना ध्यान होता है ना इलाज | पर फुर्सत में आदमी जब चित्त हो लेटता है , तब वो एहसास देता है |  बर्दाश्त के बाहर नहीं जायेगा , पर आपको चैन से सोने नहीं देगा  | बस वैसा ही कुछ होता है ये मलाल | 

खैर, हम चाय पर मिले | उसने नेवी ब्लू कलर का मॉक नैक ,  ट्रम्पेट स्लीव्स फ्रॉक पहना था | नी लेंथ | ब्राउन कलर , फ्लैट लोफ़र्स डाले हुए थे | और हाथ में एप्पल वाच , जिसका रिस्ट बैंड ऑफ वाइट कलर का था | 

"सुनाओ कुछ।, कैसी चल रही है लाइफ ? " चाय की एक चुस्की भर ले उसने कप किनारे खिसका दिया | 

"बस जी | चलना रुकना अपने हाथ में कहाँ  | बस जिंदगी की नदी बही जा रही है | उसमे हम भी बह रहें हैं | "

"तुम बाबाओ जैसे बातें करने लगे  हो | " वो खिलखिला पड़ी | उसके अनारदाने जैसे दाँतो को पंक्तियाँ अभी वैसी ही थी |  

"तुम बूढ़े हो रहे हो , मोटे भी हो गए हो | "उसने कहा | 

"हाँ जी , देखो ना , मेरे बाल इतना ऊपर तक खिसक गए हैं |" मैंने हामी भरी | 

 वो गुस्सा हो गयी | झूठ मूठ का गुस्सा | नाक चढ़ा कर बोली " तो क्या , इस उम्र में भी कोई अफेयर करना चाहते हो ?हुह ?  हो गया ना बस | "

वो जो महसूस कर रही थी , कह रही थी | कुछ ऐसे जैसे हम बारह साल बाद नहीं बल्कि हफ्ते दो हफ्ते बाद ही मिल रहें हों | 

और मैं ? मैं अपने अंदर एक  बबंडर को दबाये बैठा था | कितना बदल गयी थी वो | उसके बदलाव देख मेरा कलेजा  बैठ गया था | उसके गाल अब हँसते हुए लाल नहीं होते | चेहरा बड़ा हो गया था | रंग फीका था | सिन्दूर लगाने की सीध में फटने वाली बालों की मांग चौड़ी हो गयी थी | वो निश्चित रूप से घर का कोई भारी काम नहीं करती होगी | नौकरानी होगी घर पर | पर उसके हाथ कितने बड़े लगने लगे थे  | आँखे जो बात बात पर नाचतीं थी वो अब इस भाव से देखतीं थी जैसे कहतीं हों सब कुछ देख तो लिया , जी तो लिया ,अब क्या बचा है  | वो अब कितनी सहज हो गयी थी , कोई भी बात उसे अचंभित नहीं करती थी | उसके चेहरे पर दुःख और सुख के भाव ठहर गए थे |शरीर वैसे ही भारी जैसा कि किसी भी आम अधेड़ ग्रहणी का होता है |   

वो जब कोई दुनियादारी की बात कह रही थी तब मैं सोच रहा था कि क्या ये वही थी जिसे सहज हो मैंने एक दिन बोला था " सुनो , तुम्हे शादी की इतनी जल्दी भी क्या थी " और जबाब मे उसने बिना कुछ  बोले मुँह तिरछा किया था बस , कुछ ऐसे जैसे कहती हो " न भी की होती तो क्या एक तुम ही थे !"

मल्लका की खाड़ी से उठा घना बादल अब टपकने लगा था |  टी हाउस की  शीशे की दीवारों के ऊपरी सिरे पर बारिश की  बूंदे आ चिपकती | धीरे धीरे नीचे की ओर खिसकती | अध्-बीच तक आते आते बूंदे भारी होने लगतीं और फिर बढे  भार के चलते  बड़ी तेज गति से नीचे जमीन की ओर को भागती |  वैसे ही जैसे जिंदगी भागती है | 

हमने कोई चालीस पैतालीस मिनट बात की | शायद इससे ज्यादा बात करने के लिए हमारे पास कुछ था भी नहीं | 

उसने बताया कि उसका बड़ा बेटा  सज्जन है | संवेदनशील , हर बात को मानने वाला | और छोटा उसका उलट | वो अब कोई आराम की नौकरी देखना चाहती है | ज्यादा ग्रोथ हो न हो सुकून हो बस | उसके पति कहते  है कि चाहे तो वो नौकरी छोड़ दे , पर उसे लगता है कि घर में बंध कर ही रह न जाए | 

मैंने उसे बताया कि किस तरह से बेटी का बाप बन जाने से आदमी की भावनाओं  के , सोच के नए आयाम खुल जाते है | किस तरह बच्चों के  आ जाने से बाकी सब बातें  गौढ़ हो जाती हैं | सब कुछ उनका और उन्ही के लिए हो जाता है |  

फिर हमने एंग्जायटी , नींद कम आने , कोलेस्ट्रॉल , थाइरोइड  , हैल्थी लाइफ स्टाइल से जुडी बातें की |  

शाम को ऑफिस से ट्रैन से वापस आते हुए मेरा मूड उखड़ा हुआ था | बारह साल , बारह साल | बारह साल में इतना कुछ गुजर जाता है , इल्म ही नहीं था | सोचता  रहा कि कुदरत इतनी बेरहम क्यों है ? सब कुछ पहले बनाना और बिगाड़ना क्यों होता है ?शीत में खिले गेंदे के फूल , बसंत की नयी पत्तियां , और दिलों में हूँक देने वाले खूबसूरत चेहरे | कुछ तो यूँ ही छोड़ देती | 

और उस रात मैंने हाथ मुँह धोने के बाद आईना नहीं देखा |  

रविवार, 2 अक्तूबर 2022

निस्वार्थ भाव



विचार , महज एक विचार आदमी को बौरा सकता है | फिर चाहे आदमी स्वर्ग में ही क्यों न बैठा हो | आप ही बताएं , पुरुष की इच्छाएँ कितनी सी होती हैं ? कुछ अदद सामान ही तो लगता है | मेज पर यार-चौकड़ी  की गिनती भर  के कांच के गिलास , आइस क्यूब्स , सस्ती महंगी कैसी भी व्हिस्की , भुनी हुई  मुर्गी , शाम की ठंडी हवा ,हल्का म्यूजिक और ऊँगली के इशारे भर पर लपक कर गिलास भर देने को तैयार  युवतियाँ |  बस इतना भर ही न | 

बाबजूद इस सबके , छब्बीस सत्ताईस साल का वो युवक कुलबुलाए जा रहा था | घूट दो घूट  लेता फिर किसी बोडम की तरह मन ही मन बुदबुदाता, इधर उधर घूरता  | उसका प्रौढ़ साथी उसे समझाता | 

'क्लार्क की' से गुजरती सिंगापुर नदी का वेग बेहद धीमा था उस दिन | ऐसा जैसे मानो नदी का अपना प्राण हो जो कहता हो : "आराम से | इत्मीनान से | हे सोमवार से शुक्रवार बैल की तरह जुतने वाले इंसान  , शुक्रवार की इस शाम को आराम से | खुल कर जी  और खींच इन लम्हों को , जितना खींच सकता  हो | "   

और लम्हे | क्या ही खूबसूरत | मलक्का की खाड़ी से उठने वाली धीमी हवा नदी के ऊपर यूरोपियन वास्तुकला में बने कैंटीलीवर के पुलों को बिना आवाज एक के बाद एक कर पार करती , फ़ुलर्टन होटल के आगे से वलय लेते हुए रिवरसाइड में बने दर्जनों मयखानो में हाजरी लगा रही थी | 'लिटिल सैगोन' , 'विंग्स बार' , 'टोमो इसाकाया' , 'हूटर्स' , 'हाई लैंडर' , 'लेवल अप' ऐसे दर्जनो, कुछ नामचीन  तो कुछ नए बार्स की कतार दूर तक जगमगा रही थी | नदी के उस पार शॉपिंग काम्प्लेक्स की बत्तियों का प्रतिबिम्ब नदी की सतह पर कुछ ऐसे बनता था जैसे किसी ने एक साथ सैकड़ो दिये तैरते छोड़ दिए हों | एक्का दुक्का टूरिस्ट बोट जब पानी को चीरती तो लहरों के साथ वो दिए भी किनारे की ओर भागते | 'यू ओ बी'  बैंक के ऊँचे टावर के कोने पर चाँद कुछ ऐसे निकला था जैसे मानो कोई बिजली का बड़ा गोल हाण्डा  बिल्डिंग की मुंडेर से टाँगा गया हो | 

नदी के उस पार कोई लोकल बैंड अंग्रेजी गाने गा रहा था | नदी के किनारों को बांधती सीढ़ियों पर कॉलेज के कम उम्र लड़के लड़कियाँ , एक दूसरे के हाथ थामे कसमें खा रहे थे  |कसमें ,जो तोड़ी जानी थी |  और इस पार | थाई , वियतनामी , चीनी , फिलिपीनो | जितनी विविधता लिए व्यंजन उतनी ही वैरायटी लिए बार गर्ल्स | बेहद कम उम्र | उनमे से अधिकांश ने बामुश्किल वर्क परमिट की वैध उम्र को छुआ होगा |  कद काठी, नैन नक्श , चाल ढाल, बोल चाल , इस सब मे  ऐसी जैसे उन्हें 'बार' नहीं  किसी इंटरनॅशनल एयरलाइन्स में एयरहोस्टेस होने को चुना गया हो | 

'ड्रमस्टिक्स' , 'चिकन विंग्स' , 'सीक कबाब' , 'बारबेकु चिकन' , 'टाइगर प्रॉन' , 'पड थाई' , 'टॉम यम सूप' , 'स्मोक्ड सैमन'  ये कुछ चंद डिशेस है | ऐसी न जाने कितनी एक्सोटिक रेसेपी की तस्तरियाँ लिए युवतियाँ दौड़ रहीं थी | व्हिस्की , वोदका , मोजिटो , शिर्ले , बियर , वाइन इन सबके ग्लास खाली होते और फिर से भर दिए जाते | 

अजी , शाम कुछ ऐसी कि आदमी शराब ना भी पिए तो माहौल ही चढ़ जाए ! 

 और इस सबके बीच वो छब्बीस सत्ताईस का बाँका मारे कुढ़ के जला भुना जा रहा था | कुढ़ ? हाँ , बात सिर्फ इतनी सी कि जिन हिरणी  जैसी चाल  के साथ उँगलियों पर तस्तरियाँ उठाये युवतियों को उसे बार बार 'एक्सक्यूज़ मी ' कहकर बुलाना होता था वे ही युवतियां रेलिंग के सहारे लगी मेज पर जमा चार पांच गोरों  पर इस कदर न्योछावर थीं जैसे किसी अमीर रियासतों के  वारिस  पधारे हों  | 

वे उनके हर नए पुराने , अच्छे घटिया हर जोक पर खिल उठती|  बोतल छूट न जाए इस लिए मेज पर रख देतीं |  उनके छोटे छोटे वक्षस्थल देर तक थरथराते  रहते   | गोरों की  फ़रमाहिशों को फेहरिस्त में सबसे ऊपर रखतीं |  दूसरे कस्टमर्स को निपटाती और  फुर्सत होते ही गोरों  की  मेज पर फूलदान सी झूल जातीं |  


प्रौढ़ साथी ने समझाया "ये व्हाइट प्रिविलेज है भाई | इनको हर जगह मिलता है | एक परसेप्शन है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चला आ रहा है | परसेप्शन ये कि गोरे ज्यादा खर्च करते है , रईस होते हैं | अच्छी टिप देतें है | पैदाइशी जेंटलमैन होते है | इज़्ज़त से पेश आते है | दिल से सॉरी , थैंक्स बोलते  हैं |बड़े ही सेंसिटिव होते है | अपने लोगो की इमेज कुछ इतर है |"

 "ये एक फसल है जो इनके पुरखे बो गए है जिसे ये आज काट रहे है | और फिर 'बार' में ही क्या | अपने वर्क एनवायरनमेंट में भी ये दिखता है की नहीं ?"

सोया सॉस में तर जूसी चिकन लेग को व्हिस्की से गले में उतारते हुए नवयुवक कुछ नरम तो हुआ, पर उसके अहम् पर लगे दाग का धुआँ देर तक उठता रहा  " ऐसा कुछ नहीं है , आज की दुनिया में कोई किसी से कम नहीं है | "

"हाँ , सही हैं | लेकिन जो पेसेप्शन है सो है | उसके बनने में और बिगड़ने में पीढ़ियां लगती है मेरे भाई , पीढ़ियाँ |  " प्रौढ़ ने कर्त्तव्य भाव से समझाया  |  

घडी का काँटा ग्यारह की तरफ जा रहा था | बिल चुकता करने के बाद बार की कुर्सियों से उठते हुए प्रौढ़ ने बार गर्ल की हथेली पर  दस दस डॉलर के दो नोट रख दिए " ये तुम्हारी मेहनत और सेवा भाव के लिए | शुक्रिया , दिल से शुक्रिया "| युवती ने थाई मुद्रा में झुककर अभिवादन किया |  एक मुस्कान से उसका चेहरा खिल उठा | मुस्कान जो उसकी नाक के नीचे से शुरू हो कान के सिरों तक जाती थी | ऐसी गहरी और आत्मा की गहराईयों से उठने वाली मुस्कान सिर्फ और सिर्फ पैसा ही पैदा कर सकता है !

ट्रैन स्टैशन के लिए कैंटीलीवर  पुल को पार करते हुए नवयुवक ने टिप को लेकर कहा " बड़े भाई इसकी जरूरत नहीं थी | कम से कम आज तो नहीं | " 

और  प्रौढ़ ने मुस्कुराते हुए इतना भर कहा " ये अपने लिए नहीं था छोटे | ये अपनी नस्ल के उन लोगों  के लिए था जो हमारे बाद इस बार में आएंगे !" 


                            --  सचिन कुमार गुर्जर      

सोमवार, 19 सितंबर 2022

पहली दफा



जो दूसरों के पास है , वही सब अपने बच्चों के लिए जुटाने की जद्दोजहद | अपनी ऊर्जा-सामर्थ्य  से  मिडिल क्लास आदमी यही  साधता है | पर एक मलाल है | मलाल ये कि नौकरी से समय मिलता तो मैं बच्चों को कुछ सिखाता | एक विचार , कि माँ , स्कूल टीचर्स, दादा दादी , ये सब समझाते तो होंगे |  अपनी कूबत अपनी इच्छा के हिसाब से | पर क्या वो सब , जो मैं बता पाता !

आप इसे गुमान कहिये  | पर  चम्पक , आविष्कार , मनोहर कहानियाँ , सुपर कमांडो ध्रुव , नागराज से होते हुए उपकार ,प्रतियोगिता दर्पण  ,इंडिया टुडे , दी हिन्दू ,  फिर  टेड टॉक्स , न्यूज़ डिबेट्स से निकल  दाँते ,लियो टॉलस्टॉय , मैक्सिम गोर्की  तक को छूने वाले आदमी को आप थोड़ी नरमाई से नापिये | उसे इस अहसास के साथ जीने की मोहलत दीजिये कि जिंदगी में तीर मारे हों या न मारे हों , विषयवस्तु की पकड़ उस अधेड़ को है | इतना कुछ तो उसके तरकश में है कि एक बच्चे की जीवन दिशा की प्रस्तावना तो बांध ही दे |  

और इसी अहसास से तरबतर वो  आदमी , दस साल के बच्चे का हाथ पकडे सिंगापुर के एक लोकल मार्किट से गुजरा जा रहा था   |बच्चा जो कि अभी अभी विलायत आया था  | पहली दफा , नयी आँखें  |  रविवार की अलसाई सुबह  | ताजा सब्जी , फल, दूध , अंडे ,ब्रेड यही सब रोजमर्रा की चीज़े उठाए कुछ अच्छे पति , वृद्ध  गृहणियां , कम उम्र काम वाली बाइयाँ ,  | नुकक्कड़ो पर , मुनिसिपलिटी की सीमैंट की बैंचों पर ,  कॉफी हाउस के बाहर बूढ़े जमा थे |  बूढ़े जो काफी बूढ़े थे | 


"अच्छा , तुमने ऑब्ज़र्व किया बेटा | सिंगापुर में अपने देश के मुकाबले कितने ज्यादा बूढ़े लोग दीखते है ? "

"सोचो , ऐसा क्यों हैं ?"

और फिर वो दिमाग में गढ़ने लगा कि बच्चे को कुछ समझायेगा   - विकसित देश , क्वालिटी ऑफ़ लाइफ , हेल्थ केयर , लोंगेटिविटी इसी सब के बारे में | 

बच्चे ने सोचा , एक दो दुकान के होर्डिंग पढ़े और  फिर बोला " हाँ , तो क्या पापा , सिंगापुर भी ब्लू जोन में आता है ?"

"ब्लू ज़ोन ?" 

"हाँ , ब्लू जोन , जिसमे जापान आता है , इटली आता है | "

"ओह , ये क्या होता है ?" आदमी  ने इतना कहा पर उसका दिमाग ब्लू जोन , जापान , दीर्घायु इन सबका युगुम बनाने में कामयाब रहा | धीरे से चलते चलते गूगल से कन्फर्म किया | 

"तुमने ये सब कहाँ से सीखा ?"

"पापा आप यू ट्यूब पर नास डेली को फॉलो नहीं करते क्या ? आपको करना चाहिए |  "


मार्किट के किनारे बबल टी की एक एक स्टाल की तरफ इशारा करते हुए बच्चे ने  कहा " पापा , वाओ , बबल टी मिलती है यहॉ !मैंने कभी पी नहीं | ट्राई करें ?" 

आदमी ने पूछा नहीं कि जब कभी पी ही नहीं , अपने शहर में मिलती भी नहीं तो ये 'वाओ !बबल टी ' कहाँ से आया |   रेमैन , किमची ये सब शब्द इसकी वोकैब में आये कहाँ से | 

 हाँ, बबल टी स्टाल की तरफ जाते हुए उसने सोचा कि उसकी दुनियादारी की समझ सिकुड़ रही है  | दुनिया बदल गयी है तरीके बदल गए है , इनफार्मेशन कई गुना तेज रफ़्तार से दौड़ रही है |  आप जो खाली छोड़ रहें हैं ,यू ट्यूब उसे भर रहा है | 

"पापा आपको अगर इंटरेस्टिंग फैक्ट्स चाहिए ना तो मैं  आपको कुछ चैनल्स बता दूंगा | सब्सक्राइब कर लेना | " 

"ठीक है बेटा|  अच्छा  सुनो , सिंगापुर ब्लू जोन में नहीं आता | वो कुछ दूसरी थ्योरी है | बाद में डिटेल में बताऊंगा | "बबल टी लगे स्ट्रा को घुमाते हुए आदमी ने कहा | 

 लेकिन पहली दफा , गुमान में तरबतर रहने वाले आदमी को  ऑउटडेटेड हो चलने ,और फिर  अप्रासंगिकता की ओर लुढ़क जाने का का डर सताने लगा है    | 


मंगलवार, 9 अगस्त 2022

अगले साल वापस

 


 

सिंगापुर  का  सिटी हॉल मेट्रो स्टेशन | शाम को ऑफिस छूटने की भीड़ है |   दिल्ली जैसी धक्का मुक्की तो नहीं पर डब्बा फुल है |  अंग्रेजी , केंटोनीज़ , होक्कैन , तमिल , मलय मिक्स  के ऊँचे डेसीबल के बीच  सामने की सीट पर दो पुरुष हिंदी में बतला रहे है | बोलचाल , मिजाज से दिल्ली के आसपास के लगते है | कॉर्पोरेट की चाकरी करते है | बड़ा चालीस जमा का है | छोटा शायद पैंतीस हो या उससे भी कम | खाता पीता है , शायद शरीर के भारीपन से उम्रदराज दीख पड़ता है |  

छोटा बड़े से मुखातिब हो कह रहा है " पता नहीं क्यों , ऑफिस में सब सरप्राइज क्यों होते है , जब मैं पेरेंट्स के लिए इंडिया वापस जाने की बात करता हूँ | "

और बड़ा आदमी कुछ ऐसी तबियत से सुन रहा है जैसे कोई साइको थेरेपिस्ट हो  | "हाँ ये तो है | " इतना भर कहता है बस | 

मैंने  लाइब्रेरी से उधार में ली शार्ट स्टोरीज की बुक खोली है पर उनका वार्तालाप मेरा ध्यान खींच रहा है | 

छोटा पुरुष " वो इंफ़्रा टीम का जतिन है न ? "

" हाँ | "

"उसका एक छोटा भाई भी है | पुणे में जॉब करता है | उसकी मदर इंदौर में रहती है | अकेले | कभी गाँव चली जाती है बेचारी | फिर वापस अकेले इंदौर के मकान में | "

वो झुंझुला रहा है | "यार हम अपने किड्स के लिए सब कुछ करते है | हर स्ट्रगल , हर सैक्रिफाइस | क्या हमारे पेरेंट्स ने हमारे लिए ये सब सैक्रिफाइस नहीं किया | किया है कि नहीं ?अपने टाइम के हिसाब से उनसे जो बन पड़ा , वो किया है | गलत बोल रहा हूँ ?"

"बिलकुल किया है | " बड़ा पुरुष हामी भरता है | 

"फिर हमारी कोई ड्यूटी बनती है कि  नहीं ? मैं तो अकेला नहीं छोड़ सकता | पैसा ही सब कुछ थोड़े ना है | "

"और आरती ? वो वापस जाना चाहती है ?" बड़े ने पहली बार सवाल दागा | 

"वो कभी हाँ नहीं करेगी | मुझे ही कदम लेना पड़ेगा | "

मेरे स्टेशन से पहले ही वे दोनों ट्रैन से उतर रहे है | और कोहलाहल के बीच मैं छोटे आदमी को घोषणा करते हुए सुनता हूँ " इस साल देखता हूँ बस | अगले साल वापस !"


पास की सीट खली होने से मैं  तिरछा हो बाहर देख मुस्कुरा रहा हूँ | ट्रैन की  रफ़्तार के साथ हाउसिंग बोर्ड की बिल्डिंग्स पीछे छूटती जा रही है | इन बिल्डिंगस पे अलग रंग की पट्टियां जरूर खिची हैं | कुछ की सपाट सतहों पर मुराल बने हैं | पर ये सब किस हद तक एक जैसी है | इनके खाके , इनका मैटेरियल ,  इनका इतिहास , इनका मुस्तकबिल | सब मिलता जुलता ही है | 

और ठीक वैसी ही मिलती जुलती है हम हिन्दुस्तानियों की कहानियाँ , हमारी जद्दोजहद , हमारे सपने , हमारे फ़र्ज़ | 

अगर वो पुरुष मेरा परिचित होता न | तो मैं  उसकी उद्धघोषणा के बाद उसके कंधे पर हाथ मारता और कहता " नहीं जा पायेगा भाई | अगले साल वापस नहीं जा पायेगा | शायद अगले दस साल भी नहीं !" 

"वो यूँ कि जिस  फ़र्ज़ की तराजू का एक पड़ला तुम्हे इंडिया जाने के लिए खींचता है | उसी फ़र्ज़ की तराजू का एक दूसरा पड़ला भी है | जो अमूमन पहले पडले से भारी होता है | "


                                                                                सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                                बेडोक मेट्रो स्टेशन , सिंगापुर 

                                                                                 5 अगस्त , 2022 

                                                                                 

 

सोमवार, 21 जून 2021

फ्लोरल मास्क



पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े छः बजने का इंतज़ार करता हूँ | साढ़े छः बजते ही मैं अपना मास्क अपनी कलाई में लपेट जॉगिंग के लिए झील के किनारे निकल लेता हूँ | इधर जॉगिंग करते हुए मास्क न लगाने की मोहलत है , पर वापसी में धीमी चाल लौटने पर मुझे मास्क चाहिए होता है | झील की परिधि पर लगभग साढ़े चार किलोमीटर का ग्रेवल ट्रैक है |  ट्रैक के आखिर में झील के ऊपर एक फ्लोटिंग वुडेन ब्रिज बना है ,जहाँ जिंदिगी के ढलते सूरज के बाबजूद कुछ जिंदादिल बूढी , चीनी मूल की महिलाएं मैंडरिन गानो पर नियमित रूप से  सालसा करती हैं | कुछ दंपत्ति अपने बच्चों के साथ कछुओं और मछलियों को  ब्रैड क्रम्स खिलाते रहते है | और वही कहीं खड़ा मैं पसीना सुखाता जिंदगी के तमाम फिलोसॉफिकल सवालों  के जबाब तलाशता रहता हूँ | 

मौसम अच्छा था आज | ना ज्यादा उमस , हलकी हवा थी | टीले पर लगे समन के पेड़ो के झुण्ड के पीछे डूबते सूरज का रंग सुरमई था | कुछ बादळ का टुकड़े यहाँ वहाँ रूई के फाहे से छितराये थे , कुछ ऐसे जैसे किसी मंझे हुए पेंटर ने तस्वीर पूरी करने के बाद ब्रश के दो चार स्ट्रोक यहाँ वहाँ मार दिए हों | एक एयर फाॅर्स का ट्रैनिग प्लेन झील के किनारे लगे पेड़ो की कैनोपी से काफी पीछे , धीमी गति से  उड़ रहा था | एयर फाॅर्स का प्रैक्टिस ग्राउंड है उधर | हर बार में एक के बाद एक आठ पैराट्रूपर्स प्लेन से कूदते | ब्रिज से उनकी बड़ी छतरी में लटके ट्रूपर्स   किसी आधी इस्तेंमाल की हुई पेंसिल से दीखते और महज मिनट भर में उनकी आकृतियाँ पेड़ो की कनोपी की आड़ में आ गायब हो जातीं | ट्रैक पर चलते, ब्रिज पर खड़े  लोग रुक रुक कभी सनसेट तो कभी पैराट्रूपर्स की काली आकृतिओं  को अपने फ़ोन्स में कैद कर रहे थे | 

सड़क  झील से थोड़ा ऊपर की तरफ  है | मास्क चढ़ाये मैं वापसी में सड़क की तरफ चढ़ रहा था |  एक युवक , कोई छब्बीस या सत्ताईस का रहा होगा , जॉगिंग करते से मेरे पास रुका और बोला : हेलो , हाऊ आर यू डूइंग  टुडे ?"

"फाइन फाइन वैरी फाइन , थैंक्स !"

खुशगवार मौसम में आदमी का मूड भी खिल जाता है , वरना आजकल कौन किसका हाल पूछता है , रेड लाइट पर खड़ा मैं यही सोच रहा था |  

दो अपार्टमेंट ब्लॉक्स पार करने के बाद एक पार्क कनेक्टर आता है | एक पतला ग्रीन कॉरिडोर , जहाँ काफी हरियाली है | कुछ झूले और एक्सरसाइज मशीन्स लगीं है | छोटे बच्चों  और उनके पेरेंट्स को ये जगह काफी मुफीद आती है | 

एक युवक , मेरा ख्याल है , तीस का रहा होगा , पार्क कनेक्टर से मेरी तरफ आया | काफी बड़ी मुस्कान लिए था | नस्ल का उल्लेख गैरजरूरी जानकारी है | स्वागत भरी मुस्कान | जैसे वो मेरा परिचित हो और मेरा इंतज़ार करता हो | आज मौसम वाकई खुशगवार था !

ग्रेन कॉरिडोर के बाद एक हाई वे आता है | हाईवे क्रॉस करने को एक फुट ब्रिज है | मैं चढ़ने को ही था | एक आदमी , जो थोड़ा उम्रदराज था , पर काफी वेल ग्रूम्ड , स्लिम ड्रिम , स्पोर्ट्स वियर डाले , वाइट स्नीकर्स में , मुझे देख कर वो ठिठक गया | उसका देखने का तरीक थोड़ा अजीब था | उसकी आँखे किसी जंगली बिल्लौटे जैसी थीं | घूरने की मुद्रा थी उसकी | जैसे पूछ रहा हो तू इधर कैसे ? मुझे समझ नहीं आया | मैं चलता गया | शायद कुछ गलतफहमी हुई हो |  या मेरी शक्ल किसी से मेल  खाती हो | आखिर उसके पास मुझे नफरत करने की कोई वजह तो थी नहीं | मैंने उसका रास्ता तो काटा नहीं | पूरा मास्क चढ़ाये एक दरमियाने से प्राणी से उसकी क्या नफरत | 

फुट ब्रिज सुनसान था | दूसरे कोने से भी कोई आदमी नहीं दीखता था | स्थिति का फायदा उठा मैंने मास्क उतार लिया | 

और मास्क उतारते ही मेरे  दिमाग में जैसे बिजली दौड़ गयी " ओह्ह , ये मास्क "

"ओह्ह्ह , ये मास्क! " 

मैं रुक गया | ये मास्क मैंने अभी दो दिन पहले ही एक माल से खरीदा था | मेरे पास कई सारे काले, नीले मास्क है |  जब मैंने इसे शॉप कार्ट से उठा देखा तो मुझे लगा कि थोड़ा फ्लोरल है , थोड़ा फेमिनिन लगता है | पर काले बेस पर डर्टी वाइट में बने जैस्मीन के फूल के छापे वाला मास्क , मुझे लगा ठीक ही है | कभी कभी लगाया जा सकता है | इसका फ्लैप नाक के जोड़ तक जाता है | कपडा सूती है | कानों के पीछे जाने वाली तनियाँ कानों की नसों को नहीं दबातीं | आरामदायक है | 

पर कहीं ये ही तो कारण नहीं | 'हेलो' , फिर  स्माइल और और वो वो  पैंथर की आँखे लिए वो आदमी | अहह , ये जैस्मीन का फ्लावर मास्क | कुछ रॉंग सिग्नल हो गया क्या ? गलत दुनिया में कदम रख दिया शायद | 

मैंने पैर जमीन पर मारा | धत्त्त | फिर खुद को ही दुत्कारा "सचिन , टू मच फिक्शन , हुह्ह। .. " एक इंडियन शॉप पर रुका , कुछ रस्क के पैकेट लिए , एक सेवई का पैकेट भी | खुश हुआ , काफी अरसे से सेवई खाने का मन था | 

पर मेरा दिमाग अब भागने लगा था | मैट्रिक्स मूवी , जोमंविज जो रात को निकलते हैं , दूसरे गृह के प्राणी जो इंसान बनके हमारे बीच में रहते है और हम उन्हें परख नहीं पाते | ये दुनिया कई सारे आयामों में  चल रही होती है | हम जिस घेरे में रहते है, सोचते है बस उतने में ही सब कुछ है | ये वाइट स्नीकर्स पहने , स्लिम ड्रिम , वेल ग्रूम्ड , लगभग परफेक्ट बॉडी लिए , ऐसे जिन्हे देख मेरे जैसे लोग हीन भावना से भर उठते है, ये सब शायद  अलग घेरे में  रहने वाले लोग हैं | क्या सुन्दर, फैशनअबल  दिखने वाले सभी पुरुष ? नहीं नहीं | 

महज इत्तेफाक भी तो हो सकता है | घर के नजदीक आते आते मैं  सोच रहा था | आखिर किसी ने ऐसा कुछ नहीं कहा जो वाकई कुछ ठोस साबित करे | 

हाँ ये महज संयोग भी हो सकता है | देखो न , फिर आज मौसम भी कितना अच्छा है | 

घर से ठीक पहले बस स्टॉप पर , मेरे पीछे पीछे एक युवक चल रहा था | काफी सुडोल , जिम का शौक़ीन | 

"हेलो ब्रदर " पीछे से आवाज आयी | वो शायद फ़ोन पर था |  

कुछ देर बाद उसने फिर कहा "हेलो ब्रदर "

अब वो बिलकुल मेरे बगल में आ गया | 

"नाइस मास्क ब्रदर " बड़ी चौड़ी मुस्कान लिए उसने कहा | 

"कहाँ से लिया ?" उसने पूछा | 

अचानक से मुझे याद भी नहीं पड़ा | "यहीं से किसी दुकान से "

फिर मुझे याद आया और मैंने कहा " बेडोक मॉल से |"

"वैरी नाइस ब्रो , वैरी नॉइस "

फिर वो मेरे घर की ओर मुड़ने वाली स्ट्रीट तक  साथ साथ चलता रहा | 

होता है कई बार | इत्तेफाक में इत्तेफाक जुड़ते चले जाते है | आखिर आज मौसम भी तो बड़ा प्यारा है | 

लेकिन ये मास्क ? मुझे लगता है इसे उठा कर रख देना ही मुनासिब रहेगा  !


                                     - सचिन कुमार गुर्जर 

                                      २१ जून २०२१ 

शुक्रवार की शाम

  शुक्रवार की शाम का अपना एक दबाव  होता है | दबाव यह कि शाम जाया नहीं होनी चाहिये | और इसी के मद्देनज़र मैंने दो तीन दोस्तों को संदेशा भेजा ह...