गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

इत्ता सा सफर

गाँव के फार्म से शहर को निकला आदमी अपनी पूरी जवानी इस प्रयोजन में काट देता है कि वो बुढ़ापे में अपने फार्महाउस में आराम से रहेगा | 

यानि कि उसकी जिंदगी की तमाम भागदौड़ का हासिल फार्म से फार्महाउस तक का सफर ही है | 

विडंबना ये कि ये सफर भी विरले ही हासिल हो पाता है ! 

काम हमेशा रहेगा



ये जो दुनिया भाग भाग कर काम कर रही है 

काम को खत्म कर देना चाहती है 

क्या इसे नहीं पता 

काम कभी खत्म नहीं होता 

इंसान खत्म हो जाता है | 

काम शाश्वत होता है 

तुम्हारी व्यस्तताएँ फ़र्ज़ी हैं | तुम्हारे 'जरूरी' काम , दुनिया के लिए इतने जरूरी नहीं है, जितने तुम्हे लगते हैं | 


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

वह हीरो नहीं है

अपनी निजी जिंदगी खूंटी पे टाँगकर ऑफिस में दूसरों से ज्यादा और तय घंटों से देर तक काम करने वाला आदमी कोई हीरो नहीं होता | 

इसके बरक्स , ऐसा आदमी , अनजाने में ही अपने साथियों के लिए एक ऐसा बेंचमार्क खड़ा कर रहा होता है , जो असाध्य भी है और गैरजरूरी भी | 

और इसके बदले में वो खुद क्या पाता है ? परसेंट दो परसेंट ज्यादा सैलरी  , थोड़ा सा ज्यादा बोनस , जिससे वो पास के मॉल में जाकर या ऑनलाइन ही , गैरजरूरी सामान खरीदता है | खुद को पैंपर करने के नाम पर | 

यानी कि ये आदमी अपने कलीग्स के लिए तो नुकसानदायक होता ही है , ये ब्लाइंड consumerism की लालची मशीन में ईंधन झोंक धरती को भी नुक्सान पंहुचा रहा होता है | 


क्या आपके आस पास है कोई ऐसा आदमी ? 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं

 "ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं? इसलिए... क्योंकि तरक्की की सीढ़ी के पायदान लकड़ी के नहीं होते, ज़िंदा आदमियों के सिर के ऊपर पैर रखकर ऊपर चढ़ना होता है। शरीफ़ दिल का भोला आदमी या तो ऊपर चढ़ ही नहीं पाता, या भूले से चढ़ भी गया... तो वहां उसका कोई वक़ार, कोई रुतबा नहीं होता।"

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

असली स्त्रियों के मूछें भी होती हैं |

सारी उम्र बाहरी रूप और रोमांच के पीछे भागने वाले पुरुष ये स्वीकार ही नहीं कर पाते कि असली स्त्रियों के मूछें भी होती हैं | 

और ये स्वीकार न कर पाना , उनके भीतर एक नासूर की तरह रिसता है | जिसके चलते वे एक चमक से दूसरी चमक , एक शरीर से दुसरे शरीर के पीछे भागते रहते है | पर सुकून कही भी नहीं आता | 

असलीप्रेम  असली लोगों से ही मिल सकता है , मोम के पुतलो से नहीं | 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

बजरबानी

बजरबानी 


बजरबानी नहीं जानती, क्या होता है फेमिनिज्म !

उसका मर्द जब शराब में धुत्त , किसी के चबूतरे पे पड़ा होता है ,तो वो उठाती है उसे उसकी गुदधी से पकड़ | 

ला पटकती गई भूसे के कोठड़े में , जहाँ सूख जाता है आदमी का नशा और गुरूर , दोनों ही | 

बजरबानी , नहीं जानती क्या होते है वीमन राइट्स के शिगूफे | 

हाँ , वो जब देखती है कि  विष्ठा खाने निकला है  उसका आदमी ,तो वो अपने घुटने के सटीक वार  से चटका देती है उसकी मरदी !

और उतार देती है इश्क़ का बुखार | बजरबानी को क्या पता , क्या होते है गुड पेरेंटिंग के चोचले | वो जब पाती है कि स्कूल को निकला उसका जाया , बस्ता छुपा 

खदाने में गेंद बल्ला नचा रहा है | तो वो आग फूखने की फुकनी से तोड़ देती है अपनी कोख से जने जाए का मंघर | 

और जोड़ देती है बिगड़ा हुआ अनुशासन | ठोकती , बजाती , दनदनाती , सबको सही रास्तों पे लाती |पालनकर्ता, मुखिया ,करताधर्ता ,  सब कुछ होती है बजरबानी | 

  बस गिड़गिड़ाती बेचारी अबला नहीं होती ! 

                                                     सचिन कुमार गुर्जर 

रविवार, 10 अगस्त 2025

नवोदय के दिन

बक्सा , बाल्टी, एक अदद मग्गा , कुछ जोड़ी कपडे , बिस्कुट , दालमोठ और पंजीरी |

इंतज़ाम तो कुछ ऐसा था जैसे कोई फौजी पल्टन को जाता हो |

ऐसे जैसे  सयाना हो कोई , रुजगार कमाने  को जाता  हो | 


पिता जी जब संदूक उठा चले तो माँ रोई नहीं ,

 वो यूँ के उसकी हिड़की में हमारी हिम्मत टूट जाने का खर्चा था | 

दूर रहेगा,  पर मुन्ना कुछ बन निकलेगा ,ऐसा घरवालों में चर्चा था | 


स्कूल ईमारत , जेल सलाखें  ,कुछ ऐसी ही लगती थी | 

तोड़ भगेंगे किसी तरह भी, इच्छा ऐसी सी जगती थी | 

हम रोये और कितना ही रोये |  


फिर देखा यार , बगल के बंकर बैड का साथी अपने से भी ज्यादा रोता है | 

कितना प्यारा है आडी  अपना  , ये भीं तो बचपन खोता है | 


फिर दोस्तियाँ चल निकली | चल क्या निकली , दौड़ पड़ी | 

क्या डोरमेट्री ,क्या क्लासरूम ,नलके पर बाल्टियों की कतारें , गप्पें शप्पे, तक़रारे   | 

बातें ,बातें , बातें ,इतनी सारी , इतनी जैसी ,जैसे सड़कों पर मोटर कारें | 


सपने साझे हो गए अपने , साँझे हीरो , नागराज , ध्रुव , डोगा का तिलिस्मी संसार |

वो एकलौता रंगीन टीवी , चद्रकांता , संडे शाम की मूवी  और चित्रहार |  

मिडनाइट मैगी , मोमबत्ती पे ट्राई पोड लगा बनाई हुई ऑमलेट | 

बैड पर अखबार लगा सजी वो खांचेदार थाली , बजती चम्मचे , इक्का दुक्का चॉक्लेट |  


चेरी  ब्लॉसम किये हुए जूते , जेब में रेनॉल्ड्स संभाले सफ़ेद बुशर्ट ,निक्कर ग्रे | 

 हम नवयुग की नयी भारती नयी आरती , हर दिन नया थॉट ऑफ़ दा डे | 


सदन शिवाजी , गाँधी , सुभाष, अपनी पहचान अपने निशान , अब मन रमने लगा था | 

क्लस्टर की तैयारी , खोखो, कबड्ड़ी से स्कूल ग्राउंड सजने लगा था | 

जमने लगी थीं यारियाँ , वो पारियाँ ,  जमने लगा था गेंद बल्ला | 

क्लास रूम में जो गुरु हमारे , मैदान में सखा थे ,मचता था हल्ला  | 


पेरेंट्स डे के दिन अब घर वाले  आते , कभी न भी आते | 

हाँ ,जिसके भी  आते , जो भी लाते , सब बँटता ,सब प्यार पाते | 


लड़कियाँ खरगोश सी , वे चश्मिशे  जो नाक संभालती थी कभी, अब कितना जंचने लगी थी |

स्कूल कैम्पस के खड़ंजों में लगे लाल गुलमोहर , चंपा ,कनेर डाली डाली लचने लगी थी | 

कुछ बातें जो कह दी गयी , कुछ बातें जो कभी नहीं कहीं  |

कुछ मुलाकाते जो हुई कुछ मुलाकातें जो कभी नहीं हुई |  

 बस कुछ ऐसी दुनिया में हम डूबते उतराते न जाने कब  सीनियर हो गये  | 

कुछ हो गए अफसर , कुछ  टीचर , डॉक्टर , कुछ इंजीनियर हो गए  | 


स्कूल की दुनिया छोड़े थे तो दिल से रोये थे  

कुछ ऐसे ही जैसे संसार छिना जाता है | 

नवोदय  तू बहुत याद आता  है | 

विद्या कसम  , अभी तलक  बहुत याद आता है| 

                                            सचिन कुमार 

                                            नवोदय विद्यालय , सैंधवार , बिजनौर , 1st बैच 



इत्ता सा सफर

गाँव के फार्म से शहर को निकला आदमी अपनी पूरी जवानी इस प्रयोजन में काट देता है कि वो बुढ़ापे में अपने फार्महाउस में आराम से रहेगा |  यानि कि उ...