जालिम हूँ मैं !
मार देता हूँ अपनी खुशियाँ कुछ ऐसे भी |
गुजरता हूँ अकेले कई बार , खूबसूरत नज़ारो से |
होना चाहता हूँ खुश |
और फिर सोच देता हूँ कि कोई होता साथ , जो देखता मुझे खुश होते हुए !
Simple and short Hindi stories from day to day life
जालिम हूँ मैं !
मार देता हूँ अपनी खुशियाँ कुछ ऐसे भी |
गुजरता हूँ अकेले कई बार , खूबसूरत नज़ारो से |
होना चाहता हूँ खुश |
और फिर सोच देता हूँ कि कोई होता साथ , जो देखता मुझे खुश होते हुए !
कोई गुनाह है क्या , औसत होना
दोयम होना किताबो में , खेलों में
नहीं तो !
तो फिर गुनाह है क्या ,
एक इज्जत की नौकरी का हक़दार होना ?
नहीं बुनियादी हक़ है ये तो !
तो गुनाह होगा एक जवान आदमी का ,
पड जाना प्रेम में , उम्र के गुलाबी सालों में !
नहीं , कुदरती है ये भी !
तो फिर स्वार्थी होगा वो आदमी
जो कहता है कि जीवन उसका छोटा है और जीना चाहता है वो अपनी शर्तो पर
नहीं , जीवन तो उसका है |
तो फिर ?
गुनाह ये है कि ये आदमी भीड़ में पैदा हुआ है !
जहाँ आदमी सब कुछ है गाजर , मूली , कद्दू , आवारा , नाकारा |
बस , आदमी नहीं है !
मेरे जंगल का आदमी, आदमी क्यों नहीं है ?
तुम तोड़ तो दोगे गरीबी का चक्र , अपनी मेहनत से |
लेकिन तुम नहीं तोड़ पाओगे उसका खौफ !
खौफ, जो दो पीढ़ियों तक चलता है |
जब भी तुम कहोगे कि तुम लौट जाना चाहते हो |
तो तुम्हारे अपने ही कहेंगे तुमसे , कि लौट तो आओ ,पर वापस आकर करोगे क्या ?
और उनके चेहरों की फ़िक्र मजबूर करेगी तुम्हे कि तुम बदस्तूर जारी रहो अपने हालातो में |
क्योंकि हालात तुम्हारे जो भी हों , इन्ही हालातों की वजह से घर के हालात बदले हैं |
तुम तोड़ तो दोगे गरीबी का चक्र , अपनी मेहनत से |
लेकिन तोड़ नहीं पाओगे उसका खौफ |
मैंने समझाया उसे कि मत देखा करो ये रील्स !
मेरे लिए , अपने लिए , अपने रिश्ते के लिए !
क्योकि खौफ है मुझे कि एक दिन तुम ऊब जाओगी मुझसे
और ये रील्स की आदत , सहने ना देगी तुम्हे ऊब |
बैठी रहा करो कभी मेरे पास उबासियाँ लेते हुए
तब भी जब कि मेरा हाथ ठंडा हो या खुश्क हो |
वो यूँ के खरसाह जरूरी है , पहले बारिश के तभी फुलबारी सजती है |
रोज रोज बारिश होने में केवल घास ही उगती है |
दीर्घायु भव:
बहुत जरूरी है ऊब के बाबजूद बने रहना रिश्ते में , बदकिस्मती से इंसान की ऊब बर्दाश्त करने की कूबत कम हो रही है |
वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है |
मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने
उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला है |
लोग करते है फक्र सीनो को सजा भरी भरकम तमगों से
मैं कहता हूँ उतार देना बोझ थोड़ा किसी के सीने से असली कला है
दुनिया करती है प्यार उन्हें
वे जो मासूम हैं , हसीं हैं , जवां हैं |
प्यार करना उन्हें जिन्हे देखकर किसी को प्यार नहीं आता
असली कला है |
और ये दुनिया लगी है तमाम
देवता हो जाने की होड़ में
मैं कहता हूँ कि इंसानो की इस भीड़ में
एक फकत इंसान हो पाना
असली कला है
जालिम हूँ मैं ! मार देता हूँ अपनी खुशियाँ कुछ ऐसे भी | गुजरता हूँ अकेले कई बार , खूबसूरत नज़ारो से | होना चाहता हूँ खुश | और फिर सोच देता...