शनिवार, 15 अगस्त 2026

उत्सव

जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ? 

शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं | 

रोज रोज कहाँ टांगी जाती है ऐसी रंगीन कंदीले | 

और ये सोचकर मैं सुकून पाता हूँ कि शायद तुम अब भी उत्सव सा मानती होंगी अपने मिलन का 

जो उत्सव की ही तरह लघु था , दुर्लभ था | 

असहज

 असहज 

यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं | 

कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ | 

सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली  मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ | 

और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर  , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी | 

कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो  पति होने से पहले मर्द  हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद |  मरद जो घोड़े की गर्दनों  पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद  आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे  मरद आपने पाषाण पर | 

सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे  परिवार जहाँ  मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !



गुरुवार, 13 अगस्त 2026

ये जो अपने होते है न अपने

अच्छी खासी पढ़ती लड़की | 

सपने ऊँचे गढ़ती लड़की | 

फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है 

और पढाई छुड़ा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा | 

गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी | 

फिर प्रलोभन में बिहा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे 

आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे | 

भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर 

मनबल सकल गिरा देते हैं | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी | 

दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी | 

फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

Order Number 22

जानते हो मुझे ऐसे कैफे  में बैठ कर चाय पीना क्यों पसंद है | वो यूँ के ऐसे ही चाय के साथ बैठ मैंने न जाने कितने ही लोगो को खोला है |  ऐसे लोग जो खुशहाल शादियों में है पर जिन्होंने सालों से अपने पार्टनर का हाथ तक नहीं थामा | लोग जो ऊँचे ओहदो पर है पर उनका बस चले तो सब कुछ छोड़छाड़  कर पहाड़ भाग जाए ,अकेले।

लोग जिनकी अपने भाई बहनो से बात तक नहीं होती , प्रॉपर्टी के चक्कर में | 

चाय की चुस्कियों के साथ पीना सीख रहा हूँ मैं उनका अकेलापन , उनका गिल्ट , उनकी बेबसी , उनका ट्रामा | 

हर इंसान भरा बैठा है | मैं सीख रहा हूँ उसे खोलना , हर एक कप चाय के साथ | 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

मेरी पीढ़ी के लोग



लोग , मेरी पीढ़ी के लोग 

जो मानते रहे और जीते रहे इस फलसफे को कि रहा जा सकता है  एक ही घर में बिना प्यार क्योकि खुद के वजूद से कही बड़ा होता है परिवार 

पीढ़ी आखिरी पीढ़ी जिसके नितम्बों पर आज भी छपे है बचपन में अनुशासन में बाँधने को बरसी कमचियों के निशान 

पीढ़ी  जिसने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था अपना पहला फ़ोन  

पीढ़ी जो छिपाती रही माँ की बात बीवी से , बीवी की बात माँ से इस उम्मीद कि क्या हर्ज़ है जो जुड़ा रहे परिवार रहकर थोड़ा मौन 

लोग  जिन्होंने अपने शौक अपनी इच्छाएं अपनी पसंद सब बाँध दिया खूंटी पर 

जुट गए ऐसे कामों में जहाँ रोज पीना होता है खून का एक घूँट 

देखता हूँ क्षितिज में कैसे नए आत्ममुग्ध लोग उतरे आ रहे हैं 

सब कुछ सहकर जीने वाली मेरी पीढ़ी के लोग अब बुढ़ा रहें हैं 



बुधवार, 5 अगस्त 2026

असली खेल

​भ्रम में जी रहे हो तुम ,अगर तुम्हें लगता है कि AI, या कोई भी कटिंग एज टेक्नोलॉजी सीख लेने से तुम्हारा करियर उड़ान भर देगा l

हो सकता है ये चंद साल तुम्हारी जॉब बचा ले जाये l सर्वाइवल लेवल पे ही l 

असली स्किल कुछ और है l 

असली स्किल है अपने ऑर्गेनाइजेशन में अपने से ऊपर बैठे ऐसे आदमी तक पहुँच पाना जिसके पास तुम्हे पोडियम पे खड़ा करने की अथॉरिटी है l 

ना सिर्फ़ पहुँच पाना बल्कि उस आदमी को ये एहसास दिला पाना कि तुम उसके बड़े काम के आदमी हो l हर बड़े आदमी को बहुत सारे दाये हाथ बाये हाथ की दरकार होती है जो उसकी ख़ुद तरक्की  झंडा उठा कर चलें lजिस दिन आप ने ये परसेप्शन बना लिया , समझ लो तरक्की की सीढ़ी पे तुम्हारा पाव पड़ गया l बाक़ी सब टेक्नोलॉजी आनी जानी है ल

सोमवार, 3 अगस्त 2026

रविवार भी बदल गया है |

सोचता हूँ मैं , कोई समाजविद क्यों नहीं ढूढ़ता इस बात का जबाब , कि अब अमूमन हर कामकाजी आदमी की जिंदगी में रविवार ऐसे क्यों नहीं आता , जैसे पहले ज़माने में आता था | लापरवाह सा , किसी त्यौहार सा |   अब ऐसे आता है जैसे अगली सुबह जंग पर जाना है और आज ही अपनी रसद जुटाना है | अजीब सा चिड़चिड़ा , feel low day हो गया है रविवार | क्यों हो गया है ऐसा ?   

दुनिया बदल गयी है | रविवार भी बदल गया है | 




उत्सव

जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ?  शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं |  रोज रोज कहाँ टांगी...