शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

दिल तोड़ने वाली बात



शुक्रवार का दिन था | और जैसा मेरे और मेरे ऑफिस के तीन दोस्तों के बीच तय हुआ था , घडी के काँटे  ने जैसे ही छह को छुआ , अपने अपने लैपटॉप पिट्टू बैग्स  में घुसेड़  हम 'बीच' की ओर जाने वाली बस में सवार हो गए | 'चांगी बीच' सिंगापुर सिटी से काफी बाहर की ओर स्थित है | सिटी मेट्रो ट्रैन अभी यहां नहीं पहुंची है | आबादी कम है | जोहर की खाड़ी यहाँ पर एक महीन लकीर जैसी पतली है | 'पुलाओ उबीन ' द्वीप खाड़ी के फांट के बीचोबीच में कुछ यूँ जमा दीखता है जैसे कोई बड़ी व्हेल पानी से आधी अधूरी बाहर आ आसमान की टोह  लेती हो |  घनछत हरियाली का लबादा ओढ़े द्वीप पर सैलानियों को लाने ले जाने के लिए मोटरबोट मिलती हैं  | मोटरबोट जेटी के सहारे सहारे दर्जनों छोटे बड़े  'सी फ़ूड' रेस्टोरेंट है |  एक तो जगह हर तरफ से खुली हुई है , खाड़ी के उस पार मलेशिया तक का नज़ारा दिखता है | दूसरा, यहाँ मिलने वाले  टमाटर और मिर्च की गाढ़ी ग्रेवी में लिपटे , मसालेदार सुर्ख लाल केकड़े, बेहद लजीज होते हैं  | शायद ही पूरे सिंगापुर में इससे बेहतर केकड़े कही मिलते हों  | 

कार्ल्सबर्ग बियर की बाल्टी  और एक बड़ा केकड़ा आर्डर कर हम बड़े इत्मीनान से बैठे थे  | शाम को जो हवा धीमी थी, रात होने के साथ साथ रफ़्तार पकड़ने लगी थी | जेटी के किनारे बंधी दर्जन भर मोटरबॉट्स  हर छोटी बड़ी लहर के साथ ऊपर नीचे उभरती उतरती जा रही थी | खाड़ी में उठने वाले ज्वर से जमीन के किनारों  को महफूज रखने के लिए  बड़े बड़े लाल और सफ़ेद पत्थरों को सीमेंट से जोड़ ढालू तटबंद बना हुआ  था |  तेज लहरों से  रोज रोज पीटे जाने के चलते  तटबंद कई जगह से उधड़ गया था | यहाँ वहाँ  मोखले खुल  गए थे | लहरों  का पानी उन मोखलों  में घुसता और फिर पिचकारी की तरह आवाज करता थोड़े ऊपर खुले छेदो से दबाब के साथ निकलता | संकरे 'बीच' के किनारे किनारे जहाँ तक नज़र जाए वहाँ तक लैंपपोस्ट  लगे थे जिनकी दूधिया  रौशनी में नहाये नारियल,छत्तेदार समन ,पीले गुलमोहर के पेड़ , हवा और समंदर की लहरों के ऑर्केस्ट्रा की धुनों पे झूमते जाते थे |हरियाली और समंदर इस कदर दिलकश कि रेस्टोरेंट्स में बैठे आदमी बीयर कम, नज़ारे ज्यादा पीते थे | 

'चियर्स फॉर हेल्थ एंड हैप्पीनेस ' के साथ हमने एक घूट ले बोतले रखीं  तो मैंने पूछा " आज भीड़ कम क्यों है ? "अभी पिछले हफ्ते चीनी नए साल की छुट्टी गयी है , अभी जनता आराम कर रही है| शायद इसीलिए  " दोस्त ने बताया |  

"तो ये क्या आराम नहीं है ?"  दूसरे दोस्त ने कुर्सी पीछे खिसका , दोनों हाथ सिर  के ऊपर बाँध तंज कसा  | 

हम चारो वाकई आराम में थे लेकिन हमारी बगल की कुर्सियों पर जमे दो चीनी मूल के लोग गैरआऱाम  मालूम होते  थे | उनके आर्डर में देरी  हुई थी शायद |  वेट्रेस ने एक दो बार 'सॉरी सर',  'यस सर' जैसे रटे रटाये जबाब दिए तो उनका पारा चढ़ गया | मैंडरिन में बोलते थे कुछ समझ तो नहीं आया लेकिन उस कमउम्र , सरकंडे  सी पतली चीनी युवती का चेहरा देख ऐसा लगा जैसे उसे अच्छी खासी डाँट पिलाई गयी थी  | मैनेजर आ गया और काफी देर उन्हें समझाता रहा | आर्डर  आने के काफी देर तक भी उनमे से एक  रुक रुक वेट्रेस को सुनाता रहा  | 

"क्या जरूरत थी ? दिल तोड़  दिया बेचारी का |"  एक दोस्त ने कहा , जो थोड़ा संवेदनशील स्वभाव का आदमी है | 

"तेरा दिल तो नहीं तोडा किसी ने,  भाई ?" दूसरा बोला | 

"टूटता ही रहता है | अब ठीठ हो गया हूँ  |आदमी ठीठ  न हो तो दुनिया सुसाइड ही करवा दे |" 

केकड़ा आ गया था | केकड़े की टांग चटका,  गूदा  निकाल , लाल चटनी में डुबो,एक  दोस्त ने कहना शुरू किया |  

" दिल तोड़ने की बात चल रही  है ,और फरवरी प्यार का महीना चल रहा है ,  तो सुनो :

तब मैं पहली बार सिंगापुर आया था | सिंगापुर छोटी जगह है | शुरू के दो चार महीने  मैं खाली समय  में यहाँ वहाँ  घूमता रहा | बर्ड पार्क , बोटैनिकल गार्डन , मरीना बे सैंड्स  ,  यूनिवर्सल स्टूडियो , ये आइलैंड वो आइलैंड  | लेकिन उसके बाद सप्ताहांत में अकेले रह ऐसे विचार आने लगे जो सेहत के लिए अच्छे नहीं होते |  जैसे 'जिंदगी क्या है| ' , 'मैं  इस दुनिया में क्यों हूँ |' मुझे ऊपर वाले ने  कोई भी हुनर  क्यों नहीं दिया | ' वगैरह वैगरह | मुझे इस तरह के विचार हमेशा से ही डराते है | मुझे एक अदद साथी की तलाश थी | ऑफिस के कुछ पुरुष मित्र थे ,लेकिन उनमे  से ज्यादातर की कल्पनाशीलता 'इंडियन पॉलिटिक्स', क्रिकेट   या फिर दूसरे सहकर्मियों की खिचाई  तक ही सीमित होती | फिर मैं पच्चीस  साल का नया लड़का था | मुझे एक प्रेयसी की दरकार  थी | 

एक लड़की थी ऑफिस  में | फ्लोर के दूसरे सिरे पर बैठती , ज्यादातर अकेली तो कभी अपनी टीम के साथ | ज्यादा खूबसूरत तो नहीं लेकिन साफ़ , सुथरी | लम्बी और सुतवा, गेहुँआ रंग लिए  | शरीर खिंचा हुआ, एकदम चौकस, वैसे ही जैसे शावक अवस्था को पार करती नयी जवान बाघिन  | जैसा कि  अब आप लोग जानते ही हैं  मुझे  'एथेलेटिक्'  बनावट  वाली स्त्रियाँ  पसंद आती हैं  | फ्लोरल टॉप और स्किन फिट जीन्स को वो मैचिंग स्नीकर्स  के साथ पहनती थी | स्लीवलेस  में उसके हाथ गन्ने की पोरी  जैसे दीखते थे, एक में वो लेथर स्ट्रैप की चौकोर डायल वाली घडी  बांधती , तो दूसरें में ड्रेस से मैचिंग कोई रिस्ट बैंड  | गले में तीन बारीक लकीरे थी ,वैसी जैसी कम उम्र बच्चो के नरम गलों में होती है |  स्तन या तो थे ही नहीं या फिर बेमालूम से थे | उस तरफ मेरा कभी गौर गया भी नहीं | बाल लेयर्स में कटे हुए, बॉब काट ,कंधों से ऊपर ही खत्म हो जाते थे  | नैन नक्श ठीक  थे किसी दिन अच्छे मूड से थोड़ा मेकअप कर आती तो काफी खिंचाव पैदा करती |  मैं  उसे एलेवेटर  में या कभी पैंट्री हाउस में कॉफ़ी बेन्डिंग मशीन के सामने खड़े देखता तो सोचता " बात बन जाए तो अच्छा रहेगा ! " 

एलेवेटर रोक के रखने , गुड मॉर्निंग बोलने  से शुरुआत हुई | एक दिन मैंने पैंट्री से बाहर  आते हुए उससे शिकायती  लहजे में कहा  "  इस वेंडिंग मशीन की कॉफ़ी  कितनी बाहियात  है न | " उसने कहा "बेशक , बेहद घटिया है |" और उसके बाद हम बाहर की कॉफ़ी  के लिए  साथ जाने लगे |

हमारे आहार विहार , सोच विचार में बहुत कुछ मेल खाता था | सो हमारी दोस्ती बहुत तेजी से परवान चढ़ी | साथ में लंच , ऑफिस से साथ में छूटना | मैंने उससे कहा "मुझे हरियाली में घूमना काफी पसंद है "| और उसके बाद लगभग हर शनिवार हम किसी पार्क में हरियाली के बीच होते | फिलॉसॉपी , भारतीय समाज और नारी , मानव जीवन का धेय क्या है , ऐसे तमाम मुद्दों से हम घंटो जूझते | विकिपीडिया पर पढ़े आधे अधूरे ज्ञान से मैं तर्क में तर्क जोड़ता जाता तो वो आँखो को आँखो से बंध जाने देती और कहती " वाओ , आई ऍम इम्प्रेस्सेड !"वो इस कदर सहज हो गयी थी कि बातचीत करते करते बिलकुल सट कर बैठ जाती | कुछ ऐसे ही भाव से जैसे दो लड़के बैठ जाया करते है | उसकी चिकनी बाजुएँ जब मेरी बाजुओं के संपर्क में आती तो मेरे अंदर एक ज्वर सा उठता | पुरुष मन लालची हो उठता | पर अगले ही पल मुझे उस किसान की याद आती जिसने लालच में आ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को काट डाला था |   

हमने कई फ़िल्में साथ देखीं  | कैरेमल चॉकलेट में सने  पॉपकॉर्न को उठाने जब पैकेट में हाथ एक साथ जाते तो मन तलबगार हो उठता  |  पर अरमानों को मैं ऐसे ही दाब लेता बड़ी परात के नीचे मुर्गी के चूजे | 

ये सब काफी लम्बा चल रहा था | मुझे एक अदद बोल्ड चाल की जरूरत  थी | 'वीर भोगे वसुंधरा ' के रस  में तर मैं साहस बटोर रहा था |  

फिर वो रात आयी | 'दी टवीलाइट सागा - भाग २ ' का लेट नाइट शो देख हम निकल रहे थे | मैंने प्रस्ताव दिया कि थिएटर से हमारे घर कोई महज दो किलोमीटर के दायरे में ही तो है | क्यों ना , पैदल चला जाए | और फिर हम चल दिए | 

अहह , वो रात क्या रात थी | उससे ज्यादा खूबसूरत रात मैंने अपने पूरे जीवन में कभी नहीं देखी  | एलिवेटेड रेलवे ट्रैक  के किनारे किनारे सुन्दर पुटपाथ बना था , जो किसी ड्राइंग बोर्ड पर खींची लकीर की तरह सीधा और मील भर लम्बा था | कोई इक्का दुक्का आदमी ही दीख पड़ता था | दोनों तरफ कतार में बंधे  अपार्टमेंट्स थे , जो काफी जगह छोड़ गहराई में उतर कर थे |  हर कुछ दूरी पर छोटे छोटे पार्क बने थे | 

रेलवे ट्रैक के पिलर्स के बीच बीच में बोगेनविल्या , जिंजर लिली और जैस्मीन के पौधे फूलो के गुच्छो से लधपध  भरे पड़े थे | चाँद पूरा था |  अपार्टमेंट्स के बीच के फासलों से आती चांदनी में जिंजर लिली के फूल इतने सुर्ख लग रहे थे जैसे किसी में उनपर खून छिड़का हो | खाड़ी से उठने वाली हवा हलकी सर्द थी , वैसी जैसी कि  बारिश के बाद  होती है | और इस सबके बीच वो मेरे साथ थी !

माय फ्रेंड्स ! चाँद और चांदनी की कितनी ही कवितायें हमने सुनी है| सचमुच ,  कुछ जादू सा होता है | रात की दूधिया रोशनी में नहाया उसका चेहरा मुझे ऐसा लगा जैसे वो कोई अजनबी है , पहली बार मुझे मिल रही है | बला सी खूबसूरत |  लगा किस्मत मुझ पर मेहरबानियां बरसाने को थी  | मैं नशे में था | 

हाँ , जब उस प्रोटेस्टैंट चर्च के सामने से हम गुजरे तो उसने मुझे बाजू के ऊपर खींच  रोक लिया | पूरा का पूरा साबुत चाँद , चर्च के ऊँचे सलीब पर लटका हुआ था | ऐसा लगता था जैसे पारदर्शी गोल हांडे में कोई बिजली का बल्ब लगा है और उसे सलीब के किनारे से लटका छोड़ा गया है  | 

हम वहाँ कुछ देर खड़े रहे |  उसने पूछा " ये प्रोटेस्टेंट  क्या होता है ?" मैं अपने खुमार से बाहर नहीं आना चाहता था पर मैंने उसे ईसाइयत के भिन्न भिन्न मतों की थोड़ी बहुत जानकरी दी | उसने एक एक लफ्ज  को ऐसे सुना जैसे कोई  दिव्यज्ञान चूसती हो और फिर उसने कहा " तुम्हे इतना सब कैसे आता है , आई ऍम इम्प्रेस्ड !!"  |  वो दिन किस्मत वाला दिन था !

फुटपाथ के आखिरी सिरे पर , जहाँ से हमे अपने अपने घरो के लिए मुड़  जाना था , एक छोटा सा गार्डन था | चार पांच आम के पेड़ थे जो बड़े सठा के रोपे गए थे | कुछ छोटे सजावटी पौधे थे | इन सबके झुरमुट  में दो लोहे की बैंच जमी  हुई थी , जिन पर गाढ़ा मोटा नीला  इनेमल चढ़ा हुआ था | 

"क्यों ना हम थोड़ी देर यहाँ बैठे " मैंने प्रस्ताव दिया और हम एक बैंच पर जा बैठे | वो कुछ कुछ ऐसी बाते कह रही थी जैसी हम रोज सुनते है और जिन बातों के आखिरी सिरे हमें  पहले से ही पता होते है |  

अचानक मैं उसकी ओर मुड़ा और लैंप पोस्ट  की रौशनी में चमकती उसकी पेशानी को  निगाह भर देख  बोला " सुनो , क्या मैं तुम्हे ' किस ' कर सकता हूँ ?"

"क्या ?" उसने ऐसे  कहा ,जैसे उसे बात समझ ना आयी हो |  लेकिन उसके चेहरे के बदलते भाव को मैं पकड़ गया | 

" क्या मैं तुम्हे 'किस '  कर सकता हूँ ?

उसका चेहरा ,जो अभी तक चांदनी में नहाया दूधिया सफ़ेद था , अचानक से लाल हो गया | 

वो झटके से खड़ी हुई , दो कदम चली और रुक गयी " तुमने  सोच भी कैसे लिया ? मैं और वो भी तुम ? हुह "

मैंने उसे खलील जिब्रान की 'दी प्रोफेट ' किताब दिन में गिफ्ट की थी | उसने बैग से किताब निकाल हवा में उछाल दी, जो बैंच से करीब चार कदम दूर जा गिरी | 

"तुम्हे लगता है कि तुम्हारा वो लेवल है कि मैं तुम्हारे लिए हाँ करुँगी " बोलती हुई वो लम्बे पैरो से पार्क से निकलती , अपार्टमेंट्स के गुच्छे में लापता हो गयी | 

और आत्मग्लानि में गले  तक डूबा मैं अपने बिस्तर में आ सोया | 

दो तीन दिन बाद जब मुझे लगा कि उसका  गुस्सा कम हुआ  होगा तो मैंने ऑफिस मेस्सेंजर पर उससे कहा "देखो , जो भी हुआ एक निवेदन ही तो था  , इस उम्र में इस तरह की गुजारिशों को  अपराध माना जाए तो फिर पुरुष स्त्रिओं को अलग अलग ग्रहों पर बसना होगा | कुछ माहौल था ,मैं बोल गया |  "

और उसने जबाब में इतना भर कहा " सब कुछ ठीक था | पर तुम्हे क्या लगता है कि तुम्हारा वो लेवल है कि मैं तुम्हारे लिए हाँ करुँगी !!"


हमने कॉर्न चिप्स आर्डर किये थे | गाढ़ी क्रीम में चिप्स का कोना डुबो , खाने को मित्र रुका तो दूसरे मित्र ने कहा :" तुम गलत थे मेरे दोस्त | लेवल वेवल कुछ नहीं | 'किस' कभी बोलकर, मांगकर नहीं किया जाता |  एक मूड होता है , एक माहौल होता है | तुम्हे भांपना आना चाहिए कि लोहा गरम है की नही? "

और इस बात से तीसरे दोस्त को ऐसा जोश सा चढ़ा कि उसने  मुठियाँ भींच मेज पर दे मारीं  | बीयर की बोतलें , कॉर्न चिप्स , केकड़े की खाली हो चुकी डेकची, सब खडख़ड़ा उठा , वो बोला "लोहा गरम होता है और चोट कर दी जाती है | बस ! "


कितनी बीयर बची है, ये भांपने के लिए आपबीती सुनाने वाले दोस्त ने बोतल को हवा में उठाया।, एक घूट लिया और फिर बोला

 "हाँ मेरे दोस्त , मैंने कहा ना , तबं मैं महज पच्चीस का था | 

आज मैं बीयर की चुस्की के साथ हंसकर सब बता सकता हूँ | लेकिन उस समय  मैं महीनो अवसादग्रस्त रहा था | उसकी लेवल वाली बात मुझे कुछ ऐसे चुभती थी जैसे कांच की टूटी बोतल से कोई हलक में चीरा  लगा जाए  | ये सब ऐसे हुआ था जैसे सपाट खाली सड़क पर दो कारें  समान रफ्त्तार से एक दूसरे  के समान्तर भागती जा रही हो और फिर एक अचानक से दूसरे के किनारे से रगड़ती हुई एक लम्बी गहरी खरोंच खींच  रास्ता बदल निकल जाए | 

"तो फिर उसके बाद  तुम दोनों नहीं मिले " मैंने पूछा | 

"नहीं, कभी नहीं | मैंने ऑफिस ही बदल लिया |  " गहरी साँस के साथ दोस्त ने अपनी बात ख़त्म की | 

साढ़े ग्यारह बज चुके थे | शहर को जाने वाली आखिरी रुट नंबर २ की बस यार्ड से निकल बस स्टैंड पर आ लगी थी | हम सब उठ चले | रोड पर उतरने को सीढ़ियों से पहले मैं ठिठका | मेज से क्रॉकरी समेटती वेट्रेस के हाथ में दस  दस डॉलर के दो कड़े नोट थमा मैं वापस  मुड़  गया  |  सीढ़ियों के नीचे खड़े  मेरे दोस्त मुस्कुराये तो मैंने एक पैर ऊपर की सीढ़ी तो दूसरा निचली सीढी पर रख राजसी भाव से हथेलियाँ फैला कहा" क्या रखा है जिंदगानी में , खाओ, पीयो और प्यार बाँटते  चलो !"

उन तीनो ने एक आवाज़ में कहा " सही बात दोस्त ,सही बात ! "

और फिर हम भागते हुए शहर की ओर जाती आखिरी बस में सवार हो लिए | 

       

                                                                               - सचिन कुमार गुर्जर 




शनिवार, 13 फ़रवरी 2021

बदलाव




तकनीक ने दुनिया को सिकोड़ दिया है |  दुर्गम सुगम्य हो  गया है| घंटे मिनटों  में सिमट आये है | जहान भर  की जानकारी  आदमी के अंगूठे के नीचे दबी पड़ी है |  तब्दीली आयी है | और कुछ  इस रफ़्तार से आयी है कि जिन घरों  में एक पीढ़ी पीछे आदमी दिल्ली तक जाने में डरता था , चौपड़ की लकीरो जैसे एक दूसरे को काटती दिल्ली की सड़कों  को  याद रखना 'तेरह के पहाड़े'  को याद  रखने से भी कठिन जान पड़ता  था ,वहाँ  आज लंदन , टोरंटो , दुबई , सिंगापुर , मेलबर्न से होते हुए  होनोलूलू और टिमबकटू तक की बातें होती हैं | कुछ ऐसे  जैसे ये सब घर के पिछवाड़े ही बसे हों  !  लेकिन ज्यों ज्यों दूरियां सिमटी हैं  , जमे जमाये  परिवार कुछ ऐसे बिखरे हैं  जैसे ज्यादा दबाब में मूंगफली के खोल से छिटके छोटे बड़े दाने |  बीवी बच्चे इस पार  तो अकेला आदमी  दूर कही विलायत , शीशे की इमारत में कैद | 'बस ये हो जाए' , 'उतना भर जुट जाए' ,'उसके बाद आराम से इकठ्ठा  जियेंगे' |'देखो, बेटे के लिए मकान हो  गया है , एक जमीन का टुकड़ा बेटी के नाम  हो जाए तो बच्चो की चिंता खत्म' | आगे  , 'कुछ अपने लिए जुट जाए , अपना खुद का कारोबार , बुढ़ापे का कुछ साधन जुट जाये ' | बस , बहुत ज्यादा नहीं | कुछ इसी तरह की आकांक्षाओं की सीढ़ियाँ  चढ़ते, आशा-निराशा  की लहरों में डूबते उतरते  , वीडियो कॉल्स में एक दूसरे  की पेशानियों की सलवटें  पढ़ते  , प्रवासियों के परिवार चलते चले जाते हैं  | डॉलर , डॉलर, डॉलर ! खुशनसीबी , मुकद्दर ! कुछ इस तरह की  खुशामंदे  करते अडोसी-पडोसी , यार-रिश्तेदार , और उस सबके बीच अकेलेपन से जूझते परिवार  तारीखों के कलेण्डर पलटाते जाते हैं  |  
कोरोना का आना कुछ ऐसे हुआ जैसे सुई धागे से रफू किये जख्म हों  और उन्हें नश्तर से खोला दिया जाए  | न इंसानो के कुछ समझ आया न उनके भगवानो को | और सरकारें  ? सरकारों के मथ्थे  नयी शब्दावलियाँ हत्थे चढ़ गयी | 'लॉक डाउन' , 'बायो बबल' , 'ग्रिडलॉक' , 'क्वारंटीन' , 'नो फ्लाई', 'ग्रीन लेन ' ,'आइसोलेशन'  वगैरह वगैरह | जब तक दवाई नहीं , तब तक ढिलाई नहीं !जो जहाँ था वही फंस गया | 

फिल्मो में जिस तरह निष्ठुर बाप घर से बाहर कदम रखते बेटे से कहता रहा है : जा तो रहे हो पर वापस देहलीज पर कदम मत रखना | सरकारों ने  कुछ वैसा ही रूप धर लिया | निशाने पर आये प्रवासी(NRI पढियेगा ) | जाना है तो जाओ वापसी नहीं | अभी तो नहीं | कब तक नहीं ये भी पता नहीं !  

सिंगापुर  के स्पेशल इकनोमिक जोन में बनी दर्जनों ऊँची , काले , नीले शीशे  की इमारतों में से एक में बैठे, मोटे चश्मे में शक्ल दबाये  दीपांकर को कोरोना वोरोना का कोई  डर नहीं  था |  अपने काम की धुन में कंप्यूटर स्क्रीन को वो किसी निशाचर पक्षी की तरह ताकते रहता ,कभी  कीबोर्ड को किसी तबला वादक  की मानिद पीटता जाता | उसकी तबियत वैसी ही थी जैसी सदा से थी |  

दुनिया भर के अखबार पोर्टल कोविड के शिकार लोगों की गिनती क्रिकेट के स्कोर बोर्ड की तरह दिखा रहे थे | चूजे से कमजोर दिल लिए लोगो की पेशानियाँ  मारे डर के भीगी रहतीं  |  शेर सा जबर कलेजा लिए लोगों  के चेहरे भी सिकुड़े रहते| वो देखता कि कैसे मारे भय लोगों  के गलों  के कौए सूखे चले  जा रहे हैं  |  दीपांकर (घर का नाम दीपू ) थोड़ा झुंझलाता , थोड़ा हँसता,  फिर बगल के केबिन  में बैठे अपने सहकर्मी से कहता " कुछ नहीं है ये , एक तरह का सर्दी जुकाम  है बस | गरम पानी पियो , तीन दिन में आदमी चंगा !" फेसमास्क की तंग डोरियों से खिचे  उसके कान रडार उपकरण की भॉंति आगे की ओर झूल आये थे | छोटा  कद , अधेड़ उम्र , गेहुए वर्ण का वो आदमी , मीटर भर दूरी बनाकर बैठे सहकर्मी के  सही गलत हर तर्क को बिना पूरा सुने काट अपनी बात रखता " ये न्यू ऐज वारफेयर है दोस्त , इसे समझो |  चीन ने इसे दुनिया की इकॉनमी डुबोने को फैलाया है | ये इतना खतरनाक है नहीं जितना बड़ा हब्बा मीडिया ने खड़ा कर रखा है !"

 चर्चाएं चलती रहतीं  |  फिक्रमंद लोग अपने ही हाथों  से नफरत करते जाते |  एक हलकी छींक से ट्रेन के कैरिज खाली  हो जाते | इस सबके बीच  दीपू खुद इत्मीनान में  रहता | पुर अमन  , वैसे ही जैसे बिना लहर कोई गहरा सागर | कुछ नहीं है ये !
लेकिन जिस तरह शांत सागर की तलहटी में कोई  केकड़ा विचरता  है  , वैसे ही सुकून में डूबे  दीपू को एक विचार ततैया के  डंक सा छू  जाता  " गया तो वापस नहीं आ पाउँगा !" सख्त पंडेमिक मैनेजमेंट कोड को लागू करती सिंगापुर सरकार ने साफ़ साफ़ कह दिया :अगर आप डॉक्टर हैं  तभी  वापस आइयेगा   , वरना जहां जाते हैं  वही आराम फरमाइयेगा ! " विदेश की नौकरी छोड़ कर जाना , वो भी इस दौर में | उसकी रीड की हड्डी के सिरे से एक सिरहन सी उठती |  बस चंद बरस और | दीपू उतना भर रुकना चाहता था | बीवी लड़ती थी | देश में ,बड़े शहर में रहती थी |सास ससुर से दूर |  इतना दूर  कि वो बेचारे तीज -त्यौहार भी पोता पोती को गोद में उठाने को तरसते | इस लक्ज़री के बाबजूद वो दीपू से लड़ती ! कहती " तुमने मेरी जवानी बर्बाद कर दी | बदकिस्मत हूँ मैं|  बहुत हुआ ,इधर आकर रहो |  " और फिर दोनों फ़ोन की स्क्रीन में  घुस लड़ते जाते ,  लड़ते ही जाते  | जब खरी खोटी सुनते सुनाते दोनों के सिर फटने को होते तो दोनों  तय करते कि बॉर्डर  खुलते ही बच्चे सिंगापुर  आएंगे  | और आगे की व्यवस्था ये रहेगी कि टिकट महंगा हो या सस्ता, हर तीन महीने के अंतराल पर दीपू देश आएगा | 

पत्नी ज्यादा बात बढाती भी तो क्योंकर | हालात से वाकिफ तो वह भी थी , उसके पास बच्चे तो थे , दीपू के पास वो सुकून भी कहाँ |  फिर पूरी जिंदगी रोटी, कपडा और मकान की जुगत में धुंनने से अच्छा है कि चंद साल बाहर कमा लिया जाए | |इधर आदमी की  जिंदगी यूँ ही खर्च हो जाती है | प्रदूषण , ट्रैफिक , 'आमदनी अठन्नी खर्चा रुपय्या' , भीड़भाड़ , धक्का मुक्की , छल कपट और इस सबके बीच साधारण से सपने | मकान , बच्चो की पढाई , माँ बाप की देखभाल , गाढ़े वक्त में काम आ जाये उसके लिए कुछ जमा | ये सब जुटाने में भी आदमी का पसीना चोटी से छूटता है और  शरीर के पूरे भूगोल को नापता ऐड़ी  से निकलता है |  लक्ष्य साधे नहीं सधता | प्रवासियों के सपने कुछ अलग नहीं होते | बस फर्क  इतना है कि विदेश  की चौड़ी सड़कों पर अतिक्रमण नहीं है , हर कोई नियम से चलता है ,  मील के पत्थर  जल्दी जल्दी आते हैं  | 

दीपू के ऑफिस में ही कोई मित्र था , एकलौता था |माँ बाप देश में थे , खुद बीवी बच्चो समेत सिंगापुर  में रहता |  एक दिन शाम को पता चला कि उस मित्र के पिता जी चल बसे| ढांढस देने , जरूरी सहयोग देने मित्र लोग जुटे | पता चला वो इंसान गत चार बरसों  से देश गया ही नहीं ! बाप कहता रहा | देख जाओ , मन है | उसे फुरसत नहीं हुई | 
फिर जब खबर आयी तो वो अपना लेपटॉप बैग पटक  बदहवास हो भागा | इस कांउटर से उस काउंटर | एयरलाइन्स  वालो ने कहा, एम्बेसी | एम्बेसी वालो ने कहा , कोरोना  जांच कराओ |  जांच वालो ने कहा कतार में आओ | वो भागा ,दोस्त भी भागे | लेकिन. उस भागदौड़ का फायदा क्या ?  जाने वाला चला गया , प्यासा मन लिए , डूबती उबरती आस में मिटटी के तेल की ढिबरी सा जलता बुझता , एकलौते सपूत  को देखे बिना चला  गया|  उफ्फ ये डॉलर |  अब वो इंसान 'बी ऍम डब्लू' में घूमे , रियल एस्टेट खड़ा करे  | पिता जी तो नहीं  आने वाले  | जियेगा  , मरने वाले के साथ मरता कौन है | लेकिन उसके  ही वजूद का एक हिस्सा उसे  हमेशा खाता रहेगा | जीवनपर्यन्त  | 

दीपू फिक्रमंद था, उसके दिल में अभी माँ बाप के  लिए जगह बरक़रार थी  | सप्ताहांत में माँ पिता जी को फ़ोन करता तो तमाम आसन, योग की जानकारी देता | अपने चचेरे भाई को कुछ पैसे भेजता | उससे उनकी देखभाल करने की गुजारिश करता |विटामिन सी  , जिंक , मिनरल्स की डिब्बियाँ  भिजवाता | पिता जी से कहता "देखिये , कब तक खुलती है फ्लाइट | "
पिता जी समझदार आदमी थे , कहते " फ़िक्र ना करो , यहाँ सब मजे में है | सब कुसल मंगल "

मौसम बदलता था और जैसा हर बदलते मौसम में होता है , दीपू के पिता जी को हल्का बुखार हो आया | दीपू ने समझाया "तीन दिन ना उतरे तो अस्पताल चले जाना , जांच करा आना |" पिता जी हामी भरते हुए बोले " गंभीर कुछ नहीं , तनिक चिंता ना करो | "
चौथे दिन भाई का फ़ोन आया कि चाचा जी तो आई सी यू में है | कोरोना की पुष्टि हुई है | 
और पांचवे दिन दीपू के पिता जी चले गए | ये सब कुछ इतनी तेजी से हुआ कि खबर सुन उसे यकीन ही नहीं हुआ| दो चार जो घनिष्ठ सहकर्मी थे , वो साथ में निकले | वे सब भागे |  इस काउंटर से उस काउंटर| एयरलाइन्स से एम्बेसी , एम्बेसी से कोरोना जांच केंद्र |  प्रबंध हो गया|   दीपू चला गया | जिन्दा रहते ना  सही , बाप की मिट्टी के आखिरी दर्शन उसे मुयस्सर हो ही गए |  
  
समय के पंख  होते है | तारीखे आगे बढ़ चली | उत्तरी भारत के मैदानों में जाड़ों के दिन बेहद छोटे , सुबह शाम कोहरे की चादर ओढ़े , एक दूसरे को धकेलते हुए निकलते जाने लगे | संस्कार , पितृशोक  और  मलालो के ज्वर से उबरने में दीपू को महीना भर लग गया | और तब जाकर उसकी तबज्जो अपनी नौकरी की तरफ हुई |  वापसी कैसे  हो , सब रास्ते बंद ।पूंजीवाद में सब सम्बन्ध नफे नुकसान पर ही टिके होते  है | काम नहीं तो वेतन नहीं | वापसी नहीं तो नौकरी नहीं | पिता मृत्यु  का दुःख अब झुँझलाहट में तब्दील होने लगा | तमाम दलीले , गुजारिशों के मुलम्मे चढ़ा स्पेशल एंट्री परमिट को अर्जी  दी पर ख़ारिज | एक बार नहीं दर्जनों बार ख़ारिज |
हाय री किस्मत ! एक विपदा से उबरे तो दूसरी आन पड़ी | वह  छटपटाने लगा | कुछ ऐसे ही जैसे किसी खरगोश को बाहर धकेल उसका बिल मूँद दिया जाए | उम्मीदें , सपने , वादे सब कुछ विदेश की नौकरी से ही तो था | 
ऑफिस के मित्र का  फ़ोन आया तो दीपू से रहा नहीं गया " यार मुझे लगता है मैंने इधर आकर सही  नहीं किया|  तूने मुझे क्यों नहीं रोका ? "
मित्र ने समझाया " कैसी बाते करते हो , आ जाओगे वापस | ऐसा सोचा भी कैसे ?"
"नहीं यार , आने का निर्णय प्रैक्टिकल नहीं था !"
"तुम्हे मुझे रोकना चाहिए था | पिता जी तो चले ही गए थे | मैने आकर  क्या किया !"
"अरे यार,शर्म करो ,इतने खुदगर्ज़ मत बनो | एकलौते हो , पिता की अंत्येष्टि  में भी ना जाते तो कब जाते | "
"खुदगर्ज़ ? हुँह ?"
अब वो गुस्से में फड़फड़ाने लगा "पिता जी  कम थे क्या | हर हफ्ते के हफ्ते मैं  तोते सा रट्टा लगाता रहा | घर बैठो, घर बैठो  | 
भाई साब , रिश्तेदारों के रिश्तेदार  तक की दावतों में शामिल हुए ये | हर हफ्ते , कभी ये शहर, कभी वो शहर  | यार दोस्त | दारु पार्टी |  अपनी लापरवाही की वजह से गए है पिता जी | 
और खुदगर्ज़ मैं ??"
अब वो अच्छी जगह हैं , क्या बोलू | यहां सामने होते तो..... "

दोस्त हक्का बक्का रह गया | दीपू ऐसा कुछ भी बोल सकता है , ये उम्मीद  ना थी | इंसान के चरित्र में भी कितनी परतें होती है "कुछ शर्म करो यार , नौकरी आती जाती रहती है | कुछ कम कमाओगे | नौकरियां तो देश में भी है | किसी और से मत कहना | कोई सुने ना | दुनिया क्या कहेगी | "

पर दीपू भांग खाये भंगड़ी जैसा बकता चला जा रहा था " भाड़ में जाए दुनिया 
 क्यों ? सुनने वाला भरेगा मेरी किस्ते , वो देगा मुझे ऐसी नौकरी| 
बोलो | निर्णय  गलत था यार | काश तुमने मुझे रोका होता "

" पिता जी थे यार तुम्हारे "

"तुम नहीं समझोगे  यार "और उसने फ़ोन काट दिया | 
फिर उसके बाद उसने फ़ोन उठाया ही नहीं | कई दोस्तों ने कोशिश की | 
अगले महीने से कंपनी ने उसकी  तनख्वाह रोक दी | 
 

कुदरत की व्यवस्था ऐसी है  कि वक्त बदलता जरूर है | सूखे के बाद सावन , उजड़ के बाद बहार , सब एक चक्र से घुमते जाते है | 
समय लगा ,दीपू का एंट्री पास क्लियर  हो गया | और महीनो बाद वो अपने काम , अपने ऑफिससिंगापुर  लौट आया | रुपयों  में टूटते डॉलर लौट आये | 'बस ये हो जाए' , 'उतना भर और जुट जाए' , दिमाग ने ख्वाबों  की बुनाई जहाँ छोड़ी थी ,वही से फिर से शुरू कर दी |  


 सिंगापुर में सुंगई नदी के किनारे 'क्लार्क की ' में  दर्जनों ओपन एयर रेस्टोरेंट है | 'बार' है , जहाँ कम उम्र वियतनामी , फिलिपिनो लड़कियाँ बेहद कम कपड़ो  में शराब परोसती है | रोस्टेड चिकन , सी फ़ूड से भरी तस्तरियाँ ले सुंदरियाँ ग्राहकों की खातिर में भागी जा रही होती हैं  | नीचे नदी में धीमी गति से लाल पीली बत्त्ती लगी बोटस  पर्यटकों को ढोती जाती हैं  |                                                                       कई मित्र जमा थे | जूसी चिकन विंग्स  और  उम्दा स्कॉच  के असर में तर दीपू का गला भर आया | " पिता जी  देवता थे यार | मन में फांस की तरह चुभन है मेरे | मुझे उन्हें टाइम देना चाहिए था | "
एल्कोहल के  उफान ने दिमाग को जकड़ा  तो उसकी हिड़की बध गयी| चश्मे के मोटे किनारे तोड़ते आंसू बह चले  | " पैसा क्या है यार | हाथ का मैल ही  तो है | कोई  मेरी उम्र भर की  कमाई भी ले ले ना यार , पिता जी  को वापस कर दे | मैं  सोचूंगा तक नहीं ! सच कहता हू ,  सोचूंगा तक नहीं !
"
फ़ोन  वाल पर लगी उसके पिता की तस्वीर  स्क्रीन के बुझते ही गायब हो गयी |और  शोक में डूबे बेटे ने ग्लेंफिडिक  सिंगल माल्ट  का गिलास कुछ इस भाव से हलक में उड़ेल लिया जैसे जहर पीता हो | 


                                                                          -सचिन कुमार गुर्जर 






 

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

दिमाग का कीड़ा



मेरे कॉलेज में एक सहपाठी था | पहलवान टाइप , गंवई लहजा , दिमागी कसरत कम , बदनी कसरत ज्यादा करने वाला | वो अक्सर अपने खांटी देहाती लहजे में कहा करता  " यो आदमी के दिमाग में कीड़ा होया करै है , जो लपालप किया करे है !" बस इस बात का कहना होता था , वहाँ हॉस्टल की सीढ़ियों पर देर तक ठहाके गूंझते  |अजी ,हँसते हॅसते बूके तन जाया  करती |  बताओ भी , 'डाटा स्ट्रक्चर' , 'कंप्यूटर ऑपरेटिंग सिस्टम' ,  'डाटा बेस मैनेजमेंट सिस्टम' , 'डाटा कम्युनिकेशन एंड नेटवर्किंग' ऐसी तमाम भारी भरकम तकनीकी विषयवस्तु से कुश्तमकुश्त  करने वाला नौजवान  ऐसी बाते करता था ! एक तो बात ऐसी बेसिरपैर , ऊपर से उसकी चौड़ी गुद्दी के बीच में फंसे हलक में से  बोल कुछ यूँ फड़फड़ाते हुए फूटते थे जैसे  किसी सस्ती नाटकमंडली का नक्कारची कच्ची बसंती का पाऊच पेट में डाल बेताल नगाड़ा पीटता हो | मजमा सा लग जाता | वो मित्र साथ में हँसता , सोचता कि ठिठोली में खिचाई का नंबर सभी का तो आता है | आज उसका , कल किसी और का | लेकिन कई बार जब मजाक का दौर लम्बा खिचता तो उसकी बर्दाशत के घोड़े बिदकने लगते | अब वो किसी एक को निशाने पे लेता , गिद्ध के डैनो के माफिक अपने हाथ फैलाता  और गुस्से में हुंकारता " ना मानेगा तू ?" बात आई गई हो जाया करती | 

डेढ़ दशक बीत गया | आज सोचता हूँ कि वो दोस्त ठीक ही तो कहता था | आदमी के दिमाग में कीडा होता तो है, जो कुलबुलाए या न कुलबुलाए लेकिन दिमाग के छोटे छोटे खाँचो में घुस वहाँ तह लगी तमाम यादो से छेड़खानी जरूर करता है | सही का गलत , गलत का सही कर देता है | कुछ नीरस था , उसे रोचक बना देता है |और जो वाकई रोचक था ,उसे अलौकिक बना देता है | आदमी के दिमाग और कंप्यूटर में यही फर्क है | कंप्यूटर में जो संग्रहित हुआ सो हुआ , आदमी के दिमाग का कीड़ा यादो से खेलता रहता है , पुनर्लेखन का काम करता रहता है | 

मैं बड़ी छोटी सी उम्र से बोर्डिंग स्कूल में रहा | नवोदय विद्यालय में | शौक से नहीं ,बड़ा ही भारी मन लिए | सच कहूं तो उन दिनों अगर छुट्टियों से स्कूल लौटते , परिवहन निगम की बस की खड़खड़ाती खिड़की की मंजीरी की ताल के साथ भगवान् ने मेरी अरज सुनी होती तो मेरे स्कूल की बिल्डिंग कई बार भूंकप से जमींदोज होती | बिना नदी आयी बाढ़ में स्कूल की एक एक ईंट घुल, गायब हो गई होती   | सिरफिरी सरकार ने स्कूल बंदी का ऐलानिया नोटिस स्कूल के गेट पे चस्पा दिया होता  | गुनाह माफ़ हों, पर बेचारे कई प्रिंसिपल हार्ट अटैक से मरते ! अगर मेरी अरज सुनी गयी होती !

मुझे क्या चीज़ बाँध लेती थी ? एक तो ये कि हर छुट्टी के आखिरी दिन  पिता जी ब्रीफिंग करते थे | दालान के आगे धूल में वे शहतूत की कमची से लम्बी लकीर खींच देते और कहते " देख , ये क्या है ?"

मैं शून्य में ताकता तो वो कहते "देख , ये है रेल की पटरी | "

"और तू है रेलगाड़ी का इंजन |  "

"समझा ?"

"अब ये सोच कि इंजन अगर पटरी पे सीधा न चले तो क्या होगा  ?"

मन होता कि मौनी बाबा बन जाऊ  ,पर शहतूत की पतली कमची हलक में से ना चाहते हुए भी बोल खींच लाती " पलट जायेगा "

"और अगर इंजन पलटा तो डिब्बों का क्या होगा ?" ऐसा कहते हुए वो छोटे भाइयो को मेरे पीछे से, जो अभी तक कतारबद्ध खड़े होते , एक तरफ खींच लेते | कुछ ऐसे ही ,जैसे सचमुच रेलगाड़ी पलटा के दिखाते हों | मामले की गंभीरता को भांपते छोटे भाइयो  के हाथों  से अधखाये कच्चे अमरूदों की कलियाँ , सड़क से खुरेचे कोलतार से अकड़ी बुशर्टों की जेबों में जा दुबकती | माहौल संगीन हो जाया करता | एक तो ये बात | 

दूसरी बात ये कि , कुटुंबदार  और कुछ गैर कुटुंब भी , दो चार काका लोग ऐसे थे जो राह चलते आदमी को रोक देते | थोड़ी  शेखी और कुछ मंगल कामना लिए कहते " यो लौड़ा हमारा ऐसे सरकारी स्कूल में पढ़े है कि वहाँ जो पहुंच गया ,कामयाब होके ही वापस आया करे है !!" ऐसा कह वो तो बीड़ी के कस के साथ जिंदगी धुआँ धुआँ करने निकल पड़ते ,मेरे कंधे उम्मीदों के बोझ तले दब  जाते| 

हुआ क्या ? गिल्ली कभी पूरी तरह मेरी आट पर नहीं आयी | कभी भी मेरे कंचे दौगने नहीं हुए | ऊँची भूड़ की बेरियो के बेर , जिनके बारे में दोस्त कहते थे कि उन पर इत्ते मोटे  मोटे  (अमरुद के बराबर मोटे ) बेर आते थे , मैंने नहीं खाये ! कानपत्ता का बल्ला चूमने को मैं पेड़ से छलांग लगाने की  हिम्मत कभी नहीं जुटा  पाया |  

स्कूल के कुछ दोस्त थे | मुझसे कही  ज्यादा बोल्ड थे| कई  हॉस्टल की दीवार फांद कर भागे | अभिभावक दिवस में माँ की साडी पकड़ दूर तक घिसटते गए | उन्हें भूत आये | पेट में महीनो दर्द के मरोड़ उमड़ते रहे | जिसकी जैसी कल्पनाशीलता उसके वैसे जतन रहे | उनमे से आज कई नोस्टालजिक हो पोस्ट  करते है "अपना स्कूल  हेवन था  यार !!, है ना ?"  

और मैं कहता हूँ "यस इनडीड!! "

 ये मैं वाकई मह्सूस कर कहता हूँ | बाय गॉड | विद्या रानी की कसम ! उन दोस्तों की शिद्दत मेरे से भी भारी होती होगी | 


तो बताइये , यो जो आदमी हुआ करे है , इसके दिमाग में कीड़ा होया करे है , है कि नहीं ? कीड़ा जो लपालप किया करे है ! 

                                                                            - सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                             सिंगापूर द्वीप , ३ फरबरी २०२१  

                                                          


  

 

    

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...