शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

दिल तोड़ने वाली बात



शुक्रवार का दिन था | और जैसा मेरे और मेरे ऑफिस के तीन दोस्तों के बीच तय हुआ था , घडी के काँटे  ने जैसे ही छह को छुआ , अपने अपने लैपटॉप पिट्टू बैग्स  में घुसेड़  हम 'बीच' की ओर जाने वाली बस में सवार हो गए | 'चांगी बीच' सिंगापुर सिटी से काफी बाहर की ओर स्थित है | सिटी मेट्रो ट्रैन अभी यहां नहीं पहुंची है | आबादी कम है | जोहर की खाड़ी यहाँ पर एक महीन लकीर जैसी पतली है | 'पुलाओ उबीन ' द्वीप खाड़ी के फांट के बीचोबीच में कुछ यूँ जमा दीखता है जैसे कोई बड़ी व्हेल पानी से आधी अधूरी बाहर आ आसमान की टोह  लेती हो |  घनछत हरियाली का लबादा ओढ़े द्वीप पर सैलानियों को लाने ले जाने के लिए मोटरबोट मिलती हैं  | मोटरबोट जेटी के सहारे सहारे दर्जनों छोटे बड़े  'सी फ़ूड' रेस्टोरेंट है |  एक तो जगह हर तरफ से खुली हुई है , खाड़ी के उस पार मलेशिया तक का नज़ारा दिखता है | दूसरा, यहाँ मिलने वाले  टमाटर और मिर्च की गाढ़ी ग्रेवी में लिपटे , मसालेदार सुर्ख लाल केकड़े, बेहद लजीज होते हैं  | शायद ही पूरे सिंगापुर में इससे बेहतर केकड़े कही मिलते हों  | 

कार्ल्सबर्ग बियर की बाल्टी  और एक बड़ा केकड़ा आर्डर कर हम बड़े इत्मीनान से बैठे थे  | शाम को जो हवा धीमी थी, रात होने के साथ साथ रफ़्तार पकड़ने लगी थी | जेटी के किनारे बंधी दर्जन भर मोटरबॉट्स  हर छोटी बड़ी लहर के साथ ऊपर नीचे उभरती उतरती जा रही थी | खाड़ी में उठने वाले ज्वर से जमीन के किनारों  को महफूज रखने के लिए  बड़े बड़े लाल और सफ़ेद पत्थरों को सीमेंट से जोड़ ढालू तटबंद बना हुआ  था |  तेज लहरों से  रोज रोज पीटे जाने के चलते  तटबंद कई जगह से उधड़ गया था | यहाँ वहाँ  मोखले खुल  गए थे | लहरों  का पानी उन मोखलों  में घुसता और फिर पिचकारी की तरह आवाज करता थोड़े ऊपर खुले छेदो से दबाब के साथ निकलता | संकरे 'बीच' के किनारे किनारे जहाँ तक नज़र जाए वहाँ तक लैंपपोस्ट  लगे थे जिनकी दूधिया  रौशनी में नहाये नारियल,छत्तेदार समन ,पीले गुलमोहर के पेड़ , हवा और समंदर की लहरों के ऑर्केस्ट्रा की धुनों पे झूमते जाते थे |हरियाली और समंदर इस कदर दिलकश कि रेस्टोरेंट्स में बैठे आदमी बीयर कम, नज़ारे ज्यादा पीते थे | 

'चियर्स फॉर हेल्थ एंड हैप्पीनेस ' के साथ हमने एक घूट ले बोतले रखीं  तो मैंने पूछा " आज भीड़ कम क्यों है ? "अभी पिछले हफ्ते चीनी नए साल की छुट्टी गयी है , अभी जनता आराम कर रही है| शायद इसीलिए  " दोस्त ने बताया |  

"तो ये क्या आराम नहीं है ?"  दूसरे दोस्त ने कुर्सी पीछे खिसका , दोनों हाथ सिर  के ऊपर बाँध तंज कसा  | 

हम चारो वाकई आराम में थे लेकिन हमारी बगल की कुर्सियों पर जमे दो चीनी मूल के लोग गैरआऱाम  मालूम होते  थे | उनके आर्डर में देरी  हुई थी शायद |  वेट्रेस ने एक दो बार 'सॉरी सर',  'यस सर' जैसे रटे रटाये जबाब दिए तो उनका पारा चढ़ गया | मैंडरिन में बोलते थे कुछ समझ तो नहीं आया लेकिन उस कमउम्र , सरकंडे  सी पतली चीनी युवती का चेहरा देख ऐसा लगा जैसे उसे अच्छी खासी डाँट पिलाई गयी थी  | मैनेजर आ गया और काफी देर उन्हें समझाता रहा | आर्डर  आने के काफी देर तक भी उनमे से एक  रुक रुक वेट्रेस को सुनाता रहा  | 

"क्या जरूरत थी ? दिल तोड़  दिया बेचारी का |"  एक दोस्त ने कहा , जो थोड़ा संवेदनशील स्वभाव का आदमी है | 

"तेरा दिल तो नहीं तोडा किसी ने,  भाई ?" दूसरा बोला | 

"टूटता ही रहता है | अब ठीठ हो गया हूँ  |आदमी ठीठ  न हो तो दुनिया सुसाइड ही करवा दे |" 

केकड़ा आ गया था | केकड़े की टांग चटका,  गूदा  निकाल , लाल चटनी में डुबो,एक  दोस्त ने कहना शुरू किया |  

" दिल तोड़ने की बात चल रही  है ,और फरवरी प्यार का महीना चल रहा है ,  तो सुनो :

तब मैं पहली बार सिंगापुर आया था | सिंगापुर छोटी जगह है | शुरू के दो चार महीने  मैं खाली समय  में यहाँ वहाँ  घूमता रहा | बर्ड पार्क , बोटैनिकल गार्डन , मरीना बे सैंड्स  ,  यूनिवर्सल स्टूडियो , ये आइलैंड वो आइलैंड  | लेकिन उसके बाद सप्ताहांत में अकेले रह ऐसे विचार आने लगे जो सेहत के लिए अच्छे नहीं होते |  जैसे 'जिंदगी क्या है| ' , 'मैं  इस दुनिया में क्यों हूँ |' मुझे ऊपर वाले ने  कोई भी हुनर  क्यों नहीं दिया | ' वगैरह वैगरह | मुझे इस तरह के विचार हमेशा से ही डराते है | मुझे एक अदद साथी की तलाश थी | ऑफिस के कुछ पुरुष मित्र थे ,लेकिन उनमे  से ज्यादातर की कल्पनाशीलता 'इंडियन पॉलिटिक्स', क्रिकेट   या फिर दूसरे सहकर्मियों की खिचाई  तक ही सीमित होती | फिर मैं पच्चीस  साल का नया लड़का था | मुझे एक प्रेयसी की दरकार  थी | 

एक लड़की थी ऑफिस  में | फ्लोर के दूसरे सिरे पर बैठती , ज्यादातर अकेली तो कभी अपनी टीम के साथ | ज्यादा खूबसूरत तो नहीं लेकिन साफ़ , सुथरी | लम्बी और सुतवा, गेहुँआ रंग लिए  | शरीर खिंचा हुआ, एकदम चौकस, वैसे ही जैसे शावक अवस्था को पार करती नयी जवान बाघिन  | जैसा कि  अब आप लोग जानते ही हैं  मुझे  'एथेलेटिक्'  बनावट  वाली स्त्रियाँ  पसंद आती हैं  | फ्लोरल टॉप और स्किन फिट जीन्स को वो मैचिंग स्नीकर्स  के साथ पहनती थी | स्लीवलेस  में उसके हाथ गन्ने की पोरी  जैसे दीखते थे, एक में वो लेथर स्ट्रैप की चौकोर डायल वाली घडी  बांधती , तो दूसरें में ड्रेस से मैचिंग कोई रिस्ट बैंड  | गले में तीन बारीक लकीरे थी ,वैसी जैसी कम उम्र बच्चो के नरम गलों में होती है |  स्तन या तो थे ही नहीं या फिर बेमालूम से थे | उस तरफ मेरा कभी गौर गया भी नहीं | बाल लेयर्स में कटे हुए, बॉब काट ,कंधों से ऊपर ही खत्म हो जाते थे  | नैन नक्श ठीक  थे किसी दिन अच्छे मूड से थोड़ा मेकअप कर आती तो काफी खिंचाव पैदा करती |  मैं  उसे एलेवेटर  में या कभी पैंट्री हाउस में कॉफ़ी बेन्डिंग मशीन के सामने खड़े देखता तो सोचता " बात बन जाए तो अच्छा रहेगा ! " 

एलेवेटर रोक के रखने , गुड मॉर्निंग बोलने  से शुरुआत हुई | एक दिन मैंने पैंट्री से बाहर  आते हुए उससे शिकायती  लहजे में कहा  "  इस वेंडिंग मशीन की कॉफ़ी  कितनी बाहियात  है न | " उसने कहा "बेशक , बेहद घटिया है |" और उसके बाद हम बाहर की कॉफ़ी  के लिए  साथ जाने लगे |

हमारे आहार विहार , सोच विचार में बहुत कुछ मेल खाता था | सो हमारी दोस्ती बहुत तेजी से परवान चढ़ी | साथ में लंच , ऑफिस से साथ में छूटना | मैंने उससे कहा "मुझे हरियाली में घूमना काफी पसंद है "| और उसके बाद लगभग हर शनिवार हम किसी पार्क में हरियाली के बीच होते | फिलॉसॉपी , भारतीय समाज और नारी , मानव जीवन का धेय क्या है , ऐसे तमाम मुद्दों से हम घंटो जूझते | विकिपीडिया पर पढ़े आधे अधूरे ज्ञान से मैं तर्क में तर्क जोड़ता जाता तो वो आँखो को आँखो से बंध जाने देती और कहती " वाओ , आई ऍम इम्प्रेस्सेड !"वो इस कदर सहज हो गयी थी कि बातचीत करते करते बिलकुल सट कर बैठ जाती | कुछ ऐसे ही भाव से जैसे दो लड़के बैठ जाया करते है | उसकी चिकनी बाजुएँ जब मेरी बाजुओं के संपर्क में आती तो मेरे अंदर एक ज्वर सा उठता | पुरुष मन लालची हो उठता | पर अगले ही पल मुझे उस किसान की याद आती जिसने लालच में आ सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को काट डाला था |   

हमने कई फ़िल्में साथ देखीं  | कैरेमल चॉकलेट में सने  पॉपकॉर्न को उठाने जब पैकेट में हाथ एक साथ जाते तो मन तलबगार हो उठता  |  पर अरमानों को मैं ऐसे ही दाब लेता बड़ी परात के नीचे मुर्गी के चूजे | 

ये सब काफी लम्बा चल रहा था | मुझे एक अदद बोल्ड चाल की जरूरत  थी | 'वीर भोगे वसुंधरा ' के रस  में तर मैं साहस बटोर रहा था |  

फिर वो रात आयी | 'दी टवीलाइट सागा - भाग २ ' का लेट नाइट शो देख हम निकल रहे थे | मैंने प्रस्ताव दिया कि थिएटर से हमारे घर कोई महज दो किलोमीटर के दायरे में ही तो है | क्यों ना , पैदल चला जाए | और फिर हम चल दिए | 

अहह , वो रात क्या रात थी | उससे ज्यादा खूबसूरत रात मैंने अपने पूरे जीवन में कभी नहीं देखी  | एलिवेटेड रेलवे ट्रैक  के किनारे किनारे सुन्दर पुटपाथ बना था , जो किसी ड्राइंग बोर्ड पर खींची लकीर की तरह सीधा और मील भर लम्बा था | कोई इक्का दुक्का आदमी ही दीख पड़ता था | दोनों तरफ कतार में बंधे  अपार्टमेंट्स थे , जो काफी जगह छोड़ गहराई में उतर कर थे |  हर कुछ दूरी पर छोटे छोटे पार्क बने थे | 

रेलवे ट्रैक के पिलर्स के बीच बीच में बोगेनविल्या , जिंजर लिली और जैस्मीन के पौधे फूलो के गुच्छो से लधपध  भरे पड़े थे | चाँद पूरा था |  अपार्टमेंट्स के बीच के फासलों से आती चांदनी में जिंजर लिली के फूल इतने सुर्ख लग रहे थे जैसे किसी में उनपर खून छिड़का हो | खाड़ी से उठने वाली हवा हलकी सर्द थी , वैसी जैसी कि  बारिश के बाद  होती है | और इस सबके बीच वो मेरे साथ थी !

माय फ्रेंड्स ! चाँद और चांदनी की कितनी ही कवितायें हमने सुनी है| सचमुच ,  कुछ जादू सा होता है | रात की दूधिया रोशनी में नहाया उसका चेहरा मुझे ऐसा लगा जैसे वो कोई अजनबी है , पहली बार मुझे मिल रही है | बला सी खूबसूरत |  लगा किस्मत मुझ पर मेहरबानियां बरसाने को थी  | मैं नशे में था | 

हाँ , जब उस प्रोटेस्टैंट चर्च के सामने से हम गुजरे तो उसने मुझे बाजू के ऊपर खींच  रोक लिया | पूरा का पूरा साबुत चाँद , चर्च के ऊँचे सलीब पर लटका हुआ था | ऐसा लगता था जैसे पारदर्शी गोल हांडे में कोई बिजली का बल्ब लगा है और उसे सलीब के किनारे से लटका छोड़ा गया है  | 

हम वहाँ कुछ देर खड़े रहे |  उसने पूछा " ये प्रोटेस्टेंट  क्या होता है ?" मैं अपने खुमार से बाहर नहीं आना चाहता था पर मैंने उसे ईसाइयत के भिन्न भिन्न मतों की थोड़ी बहुत जानकरी दी | उसने एक एक लफ्ज  को ऐसे सुना जैसे कोई  दिव्यज्ञान चूसती हो और फिर उसने कहा " तुम्हे इतना सब कैसे आता है , आई ऍम इम्प्रेस्ड !!"  |  वो दिन किस्मत वाला दिन था !

फुटपाथ के आखिरी सिरे पर , जहाँ से हमे अपने अपने घरो के लिए मुड़  जाना था , एक छोटा सा गार्डन था | चार पांच आम के पेड़ थे जो बड़े सठा के रोपे गए थे | कुछ छोटे सजावटी पौधे थे | इन सबके झुरमुट  में दो लोहे की बैंच जमी  हुई थी , जिन पर गाढ़ा मोटा नीला  इनेमल चढ़ा हुआ था | 

"क्यों ना हम थोड़ी देर यहाँ बैठे " मैंने प्रस्ताव दिया और हम एक बैंच पर जा बैठे | वो कुछ कुछ ऐसी बाते कह रही थी जैसी हम रोज सुनते है और जिन बातों के आखिरी सिरे हमें  पहले से ही पता होते है |  

अचानक मैं उसकी ओर मुड़ा और लैंप पोस्ट  की रौशनी में चमकती उसकी पेशानी को  निगाह भर देख  बोला " सुनो , क्या मैं तुम्हे ' किस ' कर सकता हूँ ?"

"क्या ?" उसने ऐसे  कहा ,जैसे उसे बात समझ ना आयी हो |  लेकिन उसके चेहरे के बदलते भाव को मैं पकड़ गया | 

" क्या मैं तुम्हे 'किस '  कर सकता हूँ ?

उसका चेहरा ,जो अभी तक चांदनी में नहाया दूधिया सफ़ेद था , अचानक से लाल हो गया | 

वो झटके से खड़ी हुई , दो कदम चली और रुक गयी " तुमने  सोच भी कैसे लिया ? मैं और वो भी तुम ? हुह "

मैंने उसे खलील जिब्रान की 'दी प्रोफेट ' किताब दिन में गिफ्ट की थी | उसने बैग से किताब निकाल हवा में उछाल दी, जो बैंच से करीब चार कदम दूर जा गिरी | 

"तुम्हे लगता है कि तुम्हारा वो लेवल है कि मैं तुम्हारे लिए हाँ करुँगी " बोलती हुई वो लम्बे पैरो से पार्क से निकलती , अपार्टमेंट्स के गुच्छे में लापता हो गयी | 

और आत्मग्लानि में गले  तक डूबा मैं अपने बिस्तर में आ सोया | 

दो तीन दिन बाद जब मुझे लगा कि उसका  गुस्सा कम हुआ  होगा तो मैंने ऑफिस मेस्सेंजर पर उससे कहा "देखो , जो भी हुआ एक निवेदन ही तो था  , इस उम्र में इस तरह की गुजारिशों को  अपराध माना जाए तो फिर पुरुष स्त्रिओं को अलग अलग ग्रहों पर बसना होगा | कुछ माहौल था ,मैं बोल गया |  "

और उसने जबाब में इतना भर कहा " सब कुछ ठीक था | पर तुम्हे क्या लगता है कि तुम्हारा वो लेवल है कि मैं तुम्हारे लिए हाँ करुँगी !!"


हमने कॉर्न चिप्स आर्डर किये थे | गाढ़ी क्रीम में चिप्स का कोना डुबो , खाने को मित्र रुका तो दूसरे मित्र ने कहा :" तुम गलत थे मेरे दोस्त | लेवल वेवल कुछ नहीं | 'किस' कभी बोलकर, मांगकर नहीं किया जाता |  एक मूड होता है , एक माहौल होता है | तुम्हे भांपना आना चाहिए कि लोहा गरम है की नही? "

और इस बात से तीसरे दोस्त को ऐसा जोश सा चढ़ा कि उसने  मुठियाँ भींच मेज पर दे मारीं  | बीयर की बोतलें , कॉर्न चिप्स , केकड़े की खाली हो चुकी डेकची, सब खडख़ड़ा उठा , वो बोला "लोहा गरम होता है और चोट कर दी जाती है | बस ! "


कितनी बीयर बची है, ये भांपने के लिए आपबीती सुनाने वाले दोस्त ने बोतल को हवा में उठाया।, एक घूट लिया और फिर बोला

 "हाँ मेरे दोस्त , मैंने कहा ना , तबं मैं महज पच्चीस का था | 

आज मैं बीयर की चुस्की के साथ हंसकर सब बता सकता हूँ | लेकिन उस समय  मैं महीनो अवसादग्रस्त रहा था | उसकी लेवल वाली बात मुझे कुछ ऐसे चुभती थी जैसे कांच की टूटी बोतल से कोई हलक में चीरा  लगा जाए  | ये सब ऐसे हुआ था जैसे सपाट खाली सड़क पर दो कारें  समान रफ्त्तार से एक दूसरे  के समान्तर भागती जा रही हो और फिर एक अचानक से दूसरे के किनारे से रगड़ती हुई एक लम्बी गहरी खरोंच खींच  रास्ता बदल निकल जाए | 

"तो फिर उसके बाद  तुम दोनों नहीं मिले " मैंने पूछा | 

"नहीं, कभी नहीं | मैंने ऑफिस ही बदल लिया |  " गहरी साँस के साथ दोस्त ने अपनी बात ख़त्म की | 

साढ़े ग्यारह बज चुके थे | शहर को जाने वाली आखिरी रुट नंबर २ की बस यार्ड से निकल बस स्टैंड पर आ लगी थी | हम सब उठ चले | रोड पर उतरने को सीढ़ियों से पहले मैं ठिठका | मेज से क्रॉकरी समेटती वेट्रेस के हाथ में दस  दस डॉलर के दो कड़े नोट थमा मैं वापस  मुड़  गया  |  सीढ़ियों के नीचे खड़े  मेरे दोस्त मुस्कुराये तो मैंने एक पैर ऊपर की सीढ़ी तो दूसरा निचली सीढी पर रख राजसी भाव से हथेलियाँ फैला कहा" क्या रखा है जिंदगानी में , खाओ, पीयो और प्यार बाँटते  चलो !"

उन तीनो ने एक आवाज़ में कहा " सही बात दोस्त ,सही बात ! "

और फिर हम भागते हुए शहर की ओर जाती आखिरी बस में सवार हो लिए | 

       

                                                                               - सचिन कुमार गुर्जर 




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी करें -

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...