शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

क्रांति बनाम मी टू


पौ फटी ही थी कि कंसा  कुम्हार के लड़को ने लड़ाई का बिगुल बजा दिया |
"अबे ओये  कोडिया , जो एक लगा दिया तेरे थूथ पे , तो धूल चाटता नज़र आएगा अभी "  बड़ा लड़का बोला | लम्बा , सींक सा पतला, सामने के दो दांत बाहर की ओर ,  हवा का झोखा भी आये तो उसे झंकझोर जाए !
अपनी हर धमकी के साथ वो अपना दायाँ हाथ सीने पे मारता | दूसरा हाथ उसने अपने ढीले तहमद में, अपने पिछवाड़े में डाला होता |

"अच्छा , हाथ लगा तो जरा, न अभी तेरा भूत उतार दूँ | " मंझला कम बोलता था पर कब तक | कद का छोटा था पर बदन गंठा हुआ था | जवानी में था , उसके हाथ बड़े बड़े थे , किसी हथियार जैसे | सच में दोनों भिड़ते तो मंझला भारी पड़ता |

दोनों अपने सांझे घर के चबूतरे पर बमुश्किल चार कदम पे खड़े थे , न पीछे हटते न आगे बढ़ते |
गाँव का बच्चा हो , बूढा हो या जवान , हर कोई सामने के रास्ते से ऐसे निकल जाता जैसे सब बहरे हों | एक चिड़िया का बच्चा भी उनकी लड़ाई का गवाह नहीं बनना चाहता था |

आप स्थिति की विडंबना (आएरनी ऑफ सिचुएशन ) को इस बात से समझिये कि  ये सब उस गांव में हो रहा था जहाँ आज भी अगर किसी की भैंस बच्चा दे रही हो तो दस पाँच ठलुए ऐसे ही बिन बुलाये इकट्ठे हो जाया करते है और जब भैंस प्रसव कर चुकी होती है तो बच्चे की जांच पड़ताल कर कहते है " मुबारक हो लड़का हुआ है , कुछ मिठाई मंगा लो !"
उस गाँव में जहाँ  हर तरह से नाउम्मीद फिर भी मस्त जवान , अधेड़ लोगो का झुण्ड सड़क के किनारे वाले पाखड़ के  नीचे दिन भर ताश के पत्ते खेलता रहता है और दूर बस अड्डे से उतरने वाली हर सवारी का आंकलन हुआ करता है  कि कौन है और किसके घर जायेगा !
उस गाँव में कंसा  के लड़कों की इतनी गंभीर लड़ाई जो कभी भी सिर फुटब्बल की हद तक जा सकती थी ,  उसका गवाह बनने को कोई तैयार न था !


दूधिये ने रास्ते के किनारे अपने बर्तन जमा दिए थे , और एक एक कर मर्द , बजरवानी  गलियों से आकर दूध बेच रहे थे | वो अपना दूध का वजन करा के बड़े बर्तन में डालते और फिर चिड़ा सा मुँह बना कर दूधिया से कहते " हफ्ता हो लिया अब , पैसो का हिसाब कर दो अब तो  "|  यू पी के इस इलाके में किसान , खेतहर लोगो को  दूध बेचकर थोड़ा बहुत ताजा आमद हो जाया करती है , नमक मिर्च का जुगाड़ होता रहता है |
दूधिये के बर्तनो से सटे लकड़ी के बड़े तख्त पे टिकते हुए छंगा कराहता हुआ सा बोला " इन सालो का तो रोज का ड्रामा है ये , सुसरे चुपेंगे भी न और भिड़ेंगे भी ना | कौन करें इनका बीच बचाव "
"नट कंजरो सा स्वांग है ससुरों का , लो बीड़ी पीं लो !" तखत पे पहले से जमे कलुआ ने बात बढ़ाई |
छंगा ने थोड़ी न नुकुर की " अरे अभी पी मैंने बीड़ी "
" लो सुलगा ली मैंने अब " कलुआ ने बीड़ी आगे बढ़ा के छंगा के हाथ में थमा दी |

'क्रांति ' जात से गडरनी है , जमीन अच्छी है , कई गायें भैंसे पाल रखी है |  दूध की बाल्टी को वो हमेशा मोटे सूती गमछे से ढक कर लाती है |
ढककर क्यों? धूल , मच्छर ,मख्खियों से दूध बचाने को?? शायद नहीं |
शायद इसलिए कि उसके घर से दूधिये के अड्डे तक आने का रास्ता दुनिया की  सबसे ज्यादा जलकडवी, ईर्ष्यालु  लुगाई   'चंपा'  का  और  'कल्लो ' का घर पड़ा करता है  !
क्रांति की मानें तो  ये दोनों ही बड़ी ख़राब नज़र की बजरबानियाँ  हैं , दूध की भरी बाल्टी देख लेंगी  तो जल उठेंगी |
और ख़राब , बदनीयत  'नज़र ' वो होती है जो पथ्थर को भी फोड़ देती है | " समझे?
सो एहतियातन 'क्रांति ' द्वारा दूध की बड़ी बाल्टी को अच्छे से ढाँप के लाने का लॉजिक बनता है  |

क्रान्ति जब अपनी दूध की भरी बाल्टी का वजन करा दूधिए के बड़े बर्तन में डाल  रही थी , उसी वक़्त कंसा के बड़े लड़के की बहु की जोर जोर से रोने की आवाज़ आ रही थी |
ये रोज का था , जिस दिन भाइयो की लड़ाई में बड़ा कमतर पड़ता तो बड़े की औरत को खीज उतारने को मार खानी पड़ती | जिस दिन छोटा हार जाता उस दिन उसकी बीवी का नंबर होता !

क्रांति कुछ बोली नहीं पर  पास के घर से उठते रुदन से  उसके कोमल नारी हृदय में ठसक  जरूर हुई  |
चार फ़ीट दस इंच की लम्बाई लिए , सांबली , अधेड़ , गठा शरीर लिए क्रांति गाँव की सबसे कमेरी औरत है | बड़ी हंसोड़ भी , रास्ता चलते आदमी को छेड़ देती है |
पर उसका दिल,  एक दम मोती सा साफ़ |

उसे मैंने खुद कई बार कहते हुए सुना ," जिस दिन मेरा बिहा हुआ , मेरे बाबा बोले , देख क्रांति , राजी ख़ुशी कू आइये , दरवाजे खुले है , पर जो मैंने जरा भी ऊंच नीच व्यवहार की बात सुन ली , तो सुन लीजे , ठोर मार दूंगा "
और अपने बाबा की वो बात क्रांति ने  गांठ से बांध ली |
अब क्या है , अब तो उसका यौवन ढलान का रास्ता पकड़ चला , बड़े लड़के का बिहा भी कर लिया |  वो भरी जवानी में भी थी तब भी  कोई भी ऊंच नीच का उसका चर्चा न हुआ | एक खूंटे से बंधके रही !
हाँ, वो हंसोड़ हमेशा से रही |

हाँ तो , दूध नपा के क्रांति अपने घर को चली |
अचानक उसे पता नहीं क्या सूझा , उसने अपनी बाल्टी जमीन पे रखी और तखत पे जमा सात आठ ठलुओ की ओर  मुखातिब होकर बोली " एक बात बताओ , जु क्या बात है "

"कौन सी बात " ठलुओ में से किसी ने कहा |

" जुई , के जब दिन के वक़्त मरद लोग औरत के सिर पे सवार रहा करें है , फिर रात कू किस लाये औरत के घुटनो में बैठा करें है ? हुह? "

फिर वो अपना एक हाथ अपने कूल्हे पे रख के बड़े इत्मीनान से खड़ी हो गयी , जैसे जब तक उसे जबाब नहीं मिल जाता वो रास्ता रोक के रखने वाली हो !

कुछ ने समझा , कुछ ने नहीं समझा | पर जब बात क्रांति ने कही है तो कुछ मजेदार , मसालेदार ही होगी ,
बस इसी भाव से सारे ठलुए एक साथ ठहाका लगा के हंस पड़े |

थोड़ी देर बाद मोटी  तोंद लिए  कलुआ को अहसास हुआ कि चार फुट दस इंच की वो औरत मज़ाक नहीं पूरी मरद जात पे कटाक्ष कर रही थी |
उसका पौरुष जागा , वो जोर से खाँसा और अपनी कसैली ऊँची आवाज़ में शेर सा दहाड़ा " अरे ओ लुगाई , हम न बैठते औरत के घुटनो में , हम वो है जो औरत को अपने घुटनो में बिठाते है "
दो चार ठलुए पीछे से बोले "हुह हुह , हम्म हुम्म्म "

कलुआ के शरीर में जैसे कोई  फौलाद सा आ गया , उसने अपने हाथ चौड़े कर दिए और लगभग ललकारते हुए बोला " तू कहे , तो दिखा दे , बोल "
ऐसा बोल के वो बड़ी घिनौनी सी हंसी हँसा , इतनी जोर की कि बीड़ी के धुए से, और मंजन न करने से  पीले  दांतो के ऊपर के मसूड़े काफी देर तक नुमाया होते रहे |


" ओ हो , ओ हो , क्या कहने तुम्हारे , तम हो अनोखे सजन " , क्रांति चार कदम आगे ऐसे बढ़ आयी जैसे कलुआ को तमाचा जड़ देगी , पर उसने व्यंग को खोया नहीं | हंसती रही |

" तम मत ही बोलो , तुम्हारी लुगाई जब तक ज़माने भर की गालियाँ तुम्हे न दे दे , शाम की रोटी तुम्हे नसीब न होती  |"
"तुम दुनिया के सबसे न्यारे सजन , मक्कार कही के, कामचोर कही के  " वो आगे बढ़ती रही और साथ में मुस्कुराती भी रही |

ये मर्दो की जात भी न , माफ़ करना पर कुत्तो जैसी ही है !
क्रांति ने जैसे सी कलुआ को  ढंग से होंकना शुरू किया , अधिकतर उसके खेमे आ गए और 'कलुआ मर्द' की पतलून उतारने लगे |
हल्ले गुल्ले , हाहा हुल्ले  को बीच में छोड़ क्रांति अपने घर की ओर निकल चली |

उसके घर पहुंच कर अपनी बहु की दोपहर के खाने में क्या बनना है , ये सब समझाया और खुद हाथ में हंसिया ले जंगल की राह पकड़ ली |
नाटे से कद  की कर्मयोगिनी क्रांति, निडर , निपट अकेले  गन्ने के घने खेतो को चीरती , यूकेलिप्टीसो के झुरमुटों के भी पार, दूर अपने खेतो की ओर बढ़ चली |   खेत की सिचाई , पशुओ के चारे की कटाई , ईंधन की लकड़ी की छंटाई , दिन छोटा है , क्रांति के काम की फेहरिस्त लम्बी है | उसके पैरो में चपलता है , पोर पोर में ऊर्जा है और सब कुछ सही से , अपने बूते ही निपटा लेने  का विश्वास है |

इसी दौरान , ए सी की ठंडी हवा में आराम से सोफे पे पसरे , और  जीवन का सब ऐशो आराम भोगती किसी मोहतरमा ने सोशल मीडिया में लिख दिया " मुझे नौकरी की जरूरत थी , मैं चुप रही , मी टू , मी टू "
हल्ला हो गया , 'मी टू' सपोर्टर्स मैदान में उतर आये |  'गटसि' ,   'ब्रेवो ' , 'शेम शेम' 'आल मेन आर डॉग्स' , 'एक्सपोज़ एक्सपोज़' , 'वुमन एम्पावरमेंट' ऐसे नारे लगने लगे !

एक बड़े ऑनलाइन अखबार के यूजर कमेंट सेक्शन में किसी बेहूदे आदमी ने , संवेदनहीन  गंवार आदमी ने लिख दिया  "तेरे पास जो था , वो तूने दे दिया  ,  उसके पास जो था ,उसने तुझे दे दिया , हिसाब  बरोबर ,अब चिल्लाती काहे को ?"

हम्म , मुझे लगता है कि ऑनलाइन अखबारों की यूजर कमेंट्स का प्रॉपर मॉडरेशन होना चाहिए | शेमफुल !


                                                                                                          सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                                           3  नवंबर 2018 

















रविवार, 14 अक्तूबर 2018

कमीना सुख


"मुझे दिल्ली का पिन कोड चाहिए था यार बस्स और कुछ नहीं "  इतना सा बोल गुरु सिगरेट खींचने में मशगूल हो गया | 
और चेला  जो की अपनी औकात के हिसाब से गुरु की कुर्सी के बगल में, एक  नाटे से स्टूल पे बैठा था , अपनी  निगाह ऊपर कर गुरु  के अनमोल वचन डिकोड करने  की कोशिश में लगा रहा | 

शनिवार की सुबह थी , अभी घंटे भर पहले ही गुरु  का मैसेज आया था , " दिल्ली में हूँ, शाम तक | मिलना हो तो मदनगिरि आ जा | "
और चेला... चेला नंगे पाँव भागा चला आया था | 
 
जब से गुरु ने भगवान् ओशो की कर्मभूमि कोरेगांव में जाकर निवास का निर्णय लिया , उनके दर्शन ही दुर्लभ हो चले थे  |  कोरेगाँव के आस पास कुछ आई टी कम्पनियाँ खुल गयी है , घर बस गए है , आम लोग जगह को पुणे के नाम से जानते है ! 
बस इसी जगह पे, कही किसी नामचीन कंपनी में गुरु का प्रवचन होता है आजकल ! अच्छी तनख्वाह मिलती है , बड़े से रौबदार चेहरे में हमेशा गंभीरता का लबादा ओढ़े  , छह फ़ीट २ इंच की लम्बाई लिए गुरु जी को अज्ञानी , बेखबर  लोगबाग़  'डी बी ए'  कहते है ! 


पिछले दिनों कॉलेज के व्हाट्सप्प ग्रुप ' यारों का काफिला ' पे काफी जोरदार खबर चली थी कि गुरु ने दिल्ली में कही ३ बैडरूम वाला घर ले लिया था | बधाइयों का ताँता लगा रहा कई दिन | 
गुरु की रफ़्तार बाकि यारो से काफी तेज़ थी , कॉलेज से निकले 5 साल ही हुए थे और गुरु पूरी तरह सेट | 

चेले ने जितनी गर्मजोशी उड़ेली जा सकती थी वो उड़ेली और हाथ मिलाकर  गुरु को जोरदार बधाई दी | 
और गुरु ने बस इतना भर कहा " "मुझे दिल्ली का पिन कोड चाहिए था यार बस्स और कुछ नहीं !"

समझ नहीं आया तो चेले ने करबद्ध हो  आग्रह किया कि गुरु कुछ विस्तार से बताएँ  तो मेरे ज्ञान चक्षु खुले !
आग्रह हुआ तो गुरु ने जेहमत उठायी " दिल्ली का एड्रेस अच्छा होता है यार , कई बार काम आ जाता है | "
" रहना किसने है इधर , बस इसलिए ही ले डाला "
" और सुना " गुरु ने बातचीत की दिशा बदलने की इच्छा प्रकट की | 

ये जो गुरु ने 'ले डाला' बोला , समझ लो ,  ये बोल ही  चेले की आत्मा को चीरता चला गया , किसी नुकीले काँच सा गहरा लम्बा चीरा लगाता चला गया  | 
एक ऐसा सपना जिसे सोच सोच चेले की कई बार रात की नींद टूट जाती है | ऐसा सपना जिसे सोच चेले को लगता है भरपाई में जवानी क्या बुढ़ापा भी जाएगा , उसे गुरु ने बड़ी लापरवाही से 'ले डाला ' बता दिया था | 

आप कह सकते है कि ये शहर में अपना घर रखने का सपना तो सबका ही होता है, चेले का ही नहीं | 
इसमें ऐसा क्या है?

 रुकिए जनाब, भागिए मत | कल्पना कीजिये कि आपके एक साला है , जो हमउम्र है , आपकी ही तरह नौकरीपेशा , और उसने एक नहीं दो दो मकान ले डाले है नॉएडा या गाजिआबाद में कही | 
अब आप अपने ऊपर मकान लेने का दबाब महसूस कीजिए !
है ना ? समझ सकते है ना ? शब्बाश !

पर दुःख इस बड़े सपने को पाने में लगने वाली जवानी और मेहनत का नहीं था , बस गुरु के 'ले डाला ' ने दर्द दे दिया था | 
गुरु ने एक घाव खुला छोड़ दिया था | उसने चेले के बड़े सपने को ऐसा टुच्चा छोटा और तुच्छ बना दिया था कि चेला , गुरु के चरणों में बैठा बैठा अवसाद के रसातल में उतरता चला गया | 
आखिर गुरु नाम का ही तो गुरु था था तो बैचमेट ही | इंसान की फितरत होती है तोलने की , दूसरो से तुलना कर बैठता है |  
ये भगवान् भी न , इंसानो की क्षमताओं में इतना अंतर क्यों करता है | कोई उड़ान भरता है तो कोई बेचारा रेंगते हुए भी हाफ्ता है |  
चेला अवसाद के सागर में डुबकियाँ लगाता रहा | अपने आपको दुनिया का सबसे न्यूनतम स्तर का प्राणी घोषित करता रहा | किस्मत को कोस्टा रहा | 
इस पूरे घटनाक्रम में गुरु बस मूक रहा , सिगरेट का धुआँ उड़ाता चेले के चेहरे को देखता रहा | 
गुरु मंद मंद मुस्कुरा रहा था , चेहरे के भाव ऐसे थे मानो चेले के चेहरे से कुछ खींच रहा हो | 

काफी देर चुप रहने के बाद गुरु ने मुस्कुराते हुए चुप्पी तोड़ी और चेले के निढाल कंधे पर हाथ मार कहा " और सुना "




 मौसम विभाग ने कहा था कि औसत से ज्यादा बारिश होगी | 
जून के आखिरी हफ्ते में शुक्रवार का दिन था , सच में बारिश आ गयी थी ! 
लंच में राजमा चावल कुछ ज्यादा हो गया था शायद , गली  के किनारे के क्यूबिकल में चेला ऊंघ रहा था | उसका चेहरा सुस्त था , उनींदा | 
पता नहीं मौसम का असर था या वीकेंड आने का खुमार , गली से गुजरते हुए मैनेजर साब ने चेले के सामने ठिठक के पूछा " क्या हुआ भाई ,  बरसात आ गयी है ,मौसम मस्त हो गया है |  ऐसा उदास सा फेस लिए क्यों बैठे हो ?"

" बस सर , ऐसे ही , हमारे लिए क्या बारिश !" 
"अच्छा " मैनेजर साब ने इतना ही कहा | 

"घर की छत कच्ची है , बारिश होगी तो माँ भीग जाएगी "  अपनी पेशानी पे ऊँगली फिरा चेले ने कहा | 

मैनेजर ने वैसे ही देखा जैसे कोई भी इंसान अविश्वास भरा कुछ सुनने पर देखता है | 

" सर आप ३ महीने के लिए भी ऑनसाइट भेज देते तो छत पक्की हो जाती , लिंटर लगवा देता | " इससे पहले की पहले झटके का असर खत्म हो चेला बोलता चला गया था | 

मैनेजर साब का मुँह खुला रह गया और फिर वो एक कदम पीछे हट  गए | फिर वो इतनी जोर की , इतनी ऊँची हँसी हँसे की पूरा फ्लोर गूंझ उठा | 
फिर वो पेट से हाथ हटा सीधे खड़े हुए " तुझे ,मैं बड़ा सीधा बच्चा समझता था यार "

बातचीत में नाटकीय पटु इतना ज्यादा था कि चेला भी बिना ठहाका लगाए रह न सका | 

खैर , हँसी का दौर ख़तम हुआ तो मैनेजर साब ने बड़े ताल से टेबल पे अपनी उँगलियाँ बजा कर घोषणा की " चल , तू चला जा इस बार "

"पक्का न ?" जंग इतनी  आसानी से भी जीती जा सकती है क्या , चेले को  एक पल को यकीन ही नहीं हुआ |   

जंग ? हूह ? ऑनसाइट जाना भी जंग जैसा हो सकता है ?
रुकिए ! भागिए मत | 
हो सकता है आप विलक्षण प्रतिभा के धनि हो या जिंदगी में आगे बढ़ गए हो , दो चार कदम पीछे लीजिये, रिविसिट  कीजिये , दूसरो के जूतों में पाँव डाल देखिये | 

देखिये , कतारें होती हैं  | आपको दूसरो के सिरों के ऊपर पैर रख कर जाना होता है |  हार्ड वर्क , परफॉरमेंस ,   प्रपंच ,  इमोशनल प्ले, बटरिंग  सब तरह के तीर  चलते है | 


शेरा ठीक ठाक दोस्त था , जीनियस तो नहीं कह सकते , हाँ  एडवांस कहने में हिचक नहीं | 
एडवांस यूँ कि कॉलेज के दिनों में जब चेले चपाटे " जावा इस एन ऑब्जेक्ट ओरिएंटेड प्रोग्रामिंग लैंग्वेज " का जुमला रट रहे होते थे , शेरा बीन्स, स्ट्रटस , स्प्रिंग जैसे भारी भरकम लफ्ज़ो से कुश्तियाँ लड़ना शुरू कर चुका होता था | 
लम्बे कद का पतला लैंकी शेरा ने जीवन में बहुत कुछ पाया , गाड़ी , घर , बीवी।।
पर कुछ ख्वाइशें ऐसी थी जो उसे सोने नहीं देती थी | 
टॉप परफ़ॉर्मर होने के बाबजूद शेरा को एक अदद ऑनसाइट अपोरचुनिटी की दरकार थी | 
ऐसी अफवाह थी कि उस बेचारे को अगर ऑन साइट के नाम पे बांग्लादेश भी भेज दिया जाता , तो वो भंगड़ा पाता हुआ जाता !

ज्यादा नहीं हो गया कुछ ? ऐसा भी क्या है , आई मीन , फॉक्स अरे गेटिंग पेड हैंडसमली इन इंडिया अस वेल | 
पहले जैसा नहीं है अब | 

रुकिए , भागिये मत ! ज़रा सोचिये , आपका एक हम उम्र साला है , आप ही की तरह की जॉब में | और वो छोटे बड़े दर्जनों  ऑन साइट असाइनमेंट्स पे जा चुका है | उसका इंस्ट्राग्राम अकाउंट यूरोप की एक्सोटिक लोकेशंस के फोटोज से भरा पड़ा है |  समझ गए न शेरा का दर्द !


ऑन साइट लगने की खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गयी थी | 
पता नहीं क्यों चेले को हाजत हुई कि शेरा से मिलना चाहिए | 
उसने शेरा को मैसेज भेजा " शाम को नॉएडा के अट्टा मार्केट  में हूँ , मिलना हो तो आजा " 

शेरा आया ,  रीसीडिंग हेयर लाइन  और बढ़ते वजन में शेरा लड़का कम , पका हुआ आदमी सा लगने लगा था | 
उसने आते ही बड़ी गर्म जोशी से हाथ मिला बधाई दी , चेले के हाथ को उसने इस कदर दबाया कि उसकी उंगलियों में फंसी  ' किस्मत सही करने वाली ' अंगूठियाँ चेले की हथेली में गढ़ गई | 
" तो बाकि कहाँ हैं ? " उसने कैफे की कुर्सी पे तशरीफ़ रखते हुए बोला | 
"कोई नहीं , बुलाया किसे | तू इधर पास में रहता है सो सोचा तुझ से मिल लूँ , जाने से पहले| "

खैर , चाय की चुस्की लेते हुए शेरा खुलने लगा | 
" तू किस्मत का धनि है यार " ऐसा बोलते हुए उसने अपने हाथ की अंगूठियों को यूँ घुमाया जैसे मानों किस्मत के सिग्नल के लिए रिसेप्टर फाइन ट्यून कर रहा हो !

फिर अचानक से अति उत्साह में आता हुआ " यार सुना है ये गौरियां बड़ी आसानी से मान जाती है ! ऐश करेगा बेटा तू तो , वैसे भी तू तो छिछोरा टाइप का हुआ ठहरा ! "

चेले ने अपनी चाय का कप एक गोल चक्कर में घुमाया और बड़ी फीकी सी हंसी हंसा और बोला " तू साले अभी भी कॉलेज से निकले लड़को जैसी बात करता है "

फिर उसने कहना शुरू किया " यार अपनी लाइफ अब उस फेज में नहीं रही | 
मैनेजर को दो तीन बार टाल दिया मैंने | इस बार पीछे ही पड़ गया | कि कुछ भी हो जाना ही पड़ेगा | "

चाय की चुस्की ले चेले ने गाथा गान शुरू रखा " यार मैंने मैनेजर को बोला कि ऐसे बार बार जाने से मेरी पर्सनल लाइफ डिस्टर्ब होती है | किसी और को भेज दो | 
ये बात तो तू भी मानेगा न कि बाहर जाने की वो चसक का अपना दौर नहीं रहा | यार फॅमिली है , लाइफ का अपना सेटल्ड रुटीन है| शार्ट टर्म बाहर जाना मीनिंगलेस है | है की नहीं ? "

चेला ज्यों ज्यों अपनी गाथा गाता जाता , शेरा का चेहरा फक्क सफ़ेद सो होता जाता | 
वो सपना जिसके पीछे वो बरसो से भाग रहा था , हर तंत्र मन्त्र से जिसे पूरा करने की जुगत भिड़ा रहा था , वो सपना बिना पूरा  ऑउटडेटेड  हो चला था | 
इतने बड़े मकसद को चेला , वो चेला जिसका अपना कोई हुनर न था , बस किस्मत की खाता था , वो चेला उस बड़े गोल को तुच्छ , बासी , टुच्चा घोषित कर रहा था " 

उन पलों में शेरा की सही मानसिक तरंगो को पढ़ना तो मुश्किल काम होता , पर हाँ इतना जरूर था कि वो अवसाद के गहरे दलदल में उतरता जा रहा था | उसने बोलना बंद कर दिया था और बस बाहर सड़क पे भागते ट्रैफिक को ताक रहा था | 
चेले ने भी चाय एक तरफ खिसका दी थी | उसकी निगाह शेरा के चेहरे पे टिकी थी | 
ऐसा लग रहा था जैसे शेरा के अवसाद में उतरते चेहरे से वो कुछ खींच रहा हो | 
वो सुख में था उसके चेहरे पे धीमी मुस्कान थी | 
काफी देर के बाद चेले ने गहरी सांस भरी, मुस्कान गहरी की और शेरा के कंधे पे हाथ मारकर कहा " और सुना।........ " 
            
                                                                         सचिन कुमार गुर्जर 
                                                                          14  अक्टूबर 2018 
 


 
  


   

शनिवार, 18 अगस्त 2018

भरपाई की कोशिश


अरसे बाद ऐसा हुआ था कि छुटकी ,  बड़े राजकुमार से पहले सो गयी थी |
साहब मेरी  बगल में लेटे सोने की तैयारी में थे | 
लगा , ग़लतफहमी दूर करने का सही वक़्त है , लिहाजा  मेरी तरफ से कोशिश हुई !
बालों में हाथ फिराया  और जितना दुलार उड़ेल सकता था , सब उड़ेल कर  बोला " बेटा ध्रुव , भूमि छोटी है ना , अभी नासमझ है , इसीलिए हम  उस पर ज्यादा ध्यान देते है | 
ऐसा मत सोचा करो यार , कि पापा  तुम्हे कम प्यार करते है !"

 लगा , थोड़ा मक्खन लगा दिया जाए ! अति उत्साह में ये भी बोल बैठा  " देखो बेटा , सच तो  ये है कि पापा  तुम्हे 'भूमि ' की तुलना में  ज्यादा प्यार करते है !"

तपाक से जबाब मिला " पापा , मैं आपका बेटा हूँ ना और भूमि आपकी बेटी "
"हाँ , सही बात "
"फिर आपको  दोनों को बराबर प्यार करना चईये , किसी को  भी कम नइ "

स्तब्ध ! मुँह से हम्म्म ही निकला | 

खैर , बातचीत आगे बढ़ी तो साहब ने मोबाइल स्क्रीन से नजर हटा कर फ़रमाया " पापा आप मेरे लिए ऐसा रोबोट बना सकते हो??
मैं कुछ जबाब सोचता , उससे पहले ही रसोई से बैकअप आ गया " पापा  उस तरह के इंजीनियर नहीं है बेटा "

"अच्छा , लेकिन इन्होने प्रॉमिस किया था कि नया मोबाइल गेम खुद से बना  देंगे , जिसमें मैं हीरो होऊंगा ,वो भी तो नहीं बनाया !"
 फिर मेरी तरफ निगाह किये बिना , मोबाइल में ताकते ताकते ही "आप किस तरह के इंजिनीयर हैं , पापा ?"

हम खुली छत पर लेटे थे, अचानक से मुझे आसमान में खिले तारे बड़े प्यारे से लगने लगे , बड़े अरसे बाद देख रहा था !
तारों की पहली  परत को चीर मेरी नजर दूसरी परत पर पहुँच गयी ,  छटा सम्मोहित करने वाली थी , पर फिर भी मन में विचार आ ही गया " आखिर , मैं हूँ किस तरह का इंजिनीयर | अगर इंजिनीयर नहीं तो और क्या "

अचानक से नींद मुझ पर हावी हो रही थी और मैं बिना वक़्त ही नींद के आगोश में उतर रहा था !

                                                                                                    सचिन कुमार गुर्जर 
                                                                                                     18-Aug- 2018


रविवार, 3 जून 2018

भाड़ में जाए दुनिया


मेरे खेत के किनारे को छू के जाने वाली सड़क के किनारे एक होर्डिंग काफी दिनों से लगा है |
ये  बड़ा सा होर्डिंग समाजवादी के एक कद्दावर नेता का है जो पिछली बार की आंधी में इलेक्शन हार गए थे |
अभी पिछले दिनों उन्होंने आंबेडकर साहब के जन्मदिन पर अपने फार्म हाउस पर एक बड़े प्रीति भोज का आयोजन किया था | सुना है समाजवाद और बहुजनवाद  के कॉकटेल में काफी भीड़  जमा हुई थी | धूर्त कहलाने की हद तक स्वार्थी और अपने मतलब के लिए कुछ भी कर जाने को तैयार इन  नेता जी को अगले चुनाव के लिए काफी सशक्त माना जा रहा है |

हाँ , तो ठीक उसी होर्डिंग  के सामने , सड़क के बीचों बीच एक घोडा तांगा पलट गया |  घोडा कोयले के बड़े बोरो के  बीच बुरी तरह से  फंस गया  था |
दुपहरी का वक़्त था , जनता सड़क पर कम ही थी | आस पास के खेतो में जो भी नर नार थे, सहायता को भागे |
तांगे वाला, छरहरा नौजवान था , फुर्ती से सड़क किनारे के कच्चे पर छलांग लगा दी थी | जमीन पे औंधे  मुँह गिरा जरूर, पर सारा झटका अपने बलिष्ट हाथों पे झेल गया।  चोट नहीं आयी |

हाँ , बेचारे निरीह घोड़े की दुर्गति हो गयी थी | प्राणी बुरी तरह से जख्मी हुआ था |   उस लम्बे सफ़ेद घोड़े के नथुनों से  खून का फव्वारा छूट  रहा था | उसके अगले पैर  बुरी तरह से चोटिल हुए थे | ऊपर से जून की भीषण गर्मी में वो जीव चित्त सड़क पे चिपका पड़ा था |

हममे से किसी ने घोड़े वाले को पानी देना चाहा तो उसने बोला " पानी की प्यास नाय है  मोबाइल हो तो एक फून करवा  दीजो घर वालो कू बस |
उससे नंबर लेकर मैंने उसके घर वालो को फ़ोन लगा दिया |

तब तक इधर उधर से दर्जन भर  लोग इक्खट्टा हो गए थे |  सबने मिल मिलाकर कोयले के बोरो के बीच से घोड़े को निकाला और सड़क किनारे के यूकेलिप्टिसो की छाँव में खड़ा कर दिया |
किसी ने घोड़े वाले तो ताना मारा ,  " क्यू भैय्या , इत्ती दुपहरी में औकात से ज्यादा क्यू  भर लिया | "

घोड़े वाला अपने गमछे से पसीना साफ़ करके बोला  "बोझे की बात न है , पत्थर  आ गया सामने , ऊपर से ढलान पे था तांगा| इसी सै घोडा संभाला न ले पाया |  "

मैंने पाया कि  एक बड़ा सा  पत्थर  तांगे के बीचों बीच पड़ा था |   हादसे का जिम्मेवार वो  पत्थर ही था |
हो सकता है किसी ट्रक से गिरा हो या किसी ने यूँ ही फेक दिया हो | पत्थर कहाँ से आया , फिलहाल ये मुद्दा नहीं है |
भगवान् जाने , खैर हुई , वरना सड़क में जान जाने में क्या लगता है , गिरे , सिर डामर की सड़क से टकराया और बस  काम हो गया |  समझ लो कि ऊपर वाले की रहमत हो गयी , वरना...  |

थोड़ी देर में तांगे वाले के सम्बन्धी मोटर साइकिलों से  आ गए और हम लोग अपने अपंने खेतों में लौट गए |

मैं दूर से  यूकेलिप्टिस की कतार की ठण्ड में बैठा देख सकता था कि उन् तांगे वालों ने  एक एक कोयले के बोरे को बड़े ही करीने से तांगे में सजाया और घोडा तांगा ले चले गए | उनकी मोटर साइकलें भी फर्राटा भरती हुई आगे निकल गयी | मामले का पटाक्षेप हो गया |

करीब घंटे भर बाद मैं सड़क की ओर लौटा तो मैंने पाया कि वो पत्थर जो हादसे का कारण बना था अभी भी जस का तस सड़क के बीच पड़ा है | हाँ , उन नामुरादों ने दो तीन और पत्थर भी इधर उधर से लाके तांगे के पहिये रोकने को इस्तेमाल में लिए थे , वो भी बीच सड़क पर धर छोड़े थे |
मतलब , वो लोग पहले से भी बड़े हादसे का जखीरा उस तीव्र ढलान वाली चिकनी  सड़क पर छोड़ गए थे !

पिछली रात के तूफ़ान में सड़क के किनारे लगा समाजवादी नेता का होर्डिंग जगह जगह से फट गया था और उसकी हाथ जोड़ती तस्वीर हवा के साथ हिल रही थी | होर्डिंग के ऊपर से गुजरती हवा "समाजवाद जिंदाबाद , अम्बेडकरवाद जिंदाबाद "  को छू छू कर जा रही थी |

मतलब  ये कि हिंदुस्तान में तले से लेकर ऊपर तक आदमी एक ही भाव से जीता है , " अपना काम बनता ,भाड़ में जाए जनता "
 पीड़ित और बेचारा वो ही है जिसके पांसे सही नहीं पड़ते | मैटिरियल सेम ही है !

                                                                                 सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                  ३ जून 2018





बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

गिरा हुआ आदमी


 कुछ आदमी ऐसे होते है , समाज जिनकी  गिनती आदमियों में नहीं करता  | इस प्रजाति के आदमी को हर लिहाज से नाउम्मीद समझा जाता है |रिश्तेदारी , मिल्लतदारी से इनका सरोकार नहीं होता | क्या सही , क्या गलत , इससे इन्हे ज्यादा मतलब नहीं होता | 

मंझला कद ,मटैला  रंग , पुरानी झाड़ू की तरह कड़े और हर दिशा में छितराए बाल ,  ज्यादा पीने के कारण हमेशा चढ़ी रहने वाली आँखें , चपटी नाक , काली सफ़ेद खिचड़ी दाढ़ी | कुछ इस तरह की आकृति का आदमी है  ननुआ  | 
इस कदर बीडीबाज कि उसकी हरेक नयी पुरानी बुशर्ट  में बीड़ी के पतंगों से बने छेदो की जालियाँ बनी होती  हैं , जिनसे हवा के झोंके आरपार बिना रूकावट गुजरते हैं |  शराब , मुर्गा , मच्छी ,अंडा,  औरत, जुआ .. सब कर लेता है ननुआ | 
मैंने उसे बचपन से देखा है |  हमउम्र है , हम साथ खेले हैं | बचपन में सामने के दो बड़े खुरपे जैसे दांतो के बीच से थूक की लम्बी पिचकारी मारने के अलावा कोई और हुनर उसमे हमने कभी देखा नहीं | 

माँ बाप हैं नहीं | एक बहिन है जो अपने घर द्वार की है |  कच्ची दीवार के उस पार बसे चचेरे तहेरे भाइयों से उसका मेल कभी हुआ नहीं | दुनिया जो कहे समझे | ननुआ ने शुरू से ही अपनी जिंदगी का ताना बाना कुछ ऐसे बुना है कि भाड़ में जाए दुनिया और समाज | उसे जीना है और फुल जीना है |

पेशे से दूधिया ननुआ के दिन की शुरुआत गाँव से दूध इकठ्ठा करने से होती है | उसकी तराजू के बर्तन में दूध चढाती औरतें समय से दूध की कीमत ना भुगताने को लेकर उसे कोसती जातीं हैं | ज्यादा सुनता , कम बोलता वो अपनी साईकिल के पैडल मारता शहर की ओर निकल जाता है | शाम को लौटता है तो रास्ते में हट्टी से दारु का पौवा  खरीद अपने दूध के बर्तन में रख लाता है |  फिर आराम से अकेला खटिया पर पैर पसार ,प्याज या मूली की  नमक लगी कतलियों के साथ पीता है | उसकी औरत गाय भैंस, चूल्हा चौका , खेत क्यारी सब अकेले देखती है | साथ में उसके हुक्म की तामीर भी करती जाती है | 

 गाँव के बाहर नहर की पालट पर मैं सुबह की सैर पर था तो उसने मुझे रोक लिया। " कहाँ हो भैया आजकल। बड़े दिना  बाद दरसन  दिए।"
"बस इधर ही हूँ , तुम किधर हो आजकल | " मैंने पूछा |
  फुरसत में था ननुआ ।  बिना पिए वो शायद ही कभी  राम रहीम से आगे बढ़ा हो  | लेकिन पैग लगाने के बाद उसकी तबियत बदल जाती है |  

वो अपनी साईकिल से उतर पड़ा | सस्ती सिकुड़ी बुशर्ट की जेब से बीड़ी का बण्डल निकाल कर बोला" और सुनाओ।"
नहर की पालट से सठे खेत नीचान में है | मोहल्ले के ही एक काका नीचे खेत मे फावड़ा ले जम्मीन का कलेजा फोड़ रहे थे। इधर उधर की एक दो बात सुना ननुआ फिर बोला , " और सुनाओ | "
इससे पहले की मैं कुछ और सुनाता , काका फावड़ा छोड़ ऊँची आवाज़ में बोले ' अरे नेनुआ, दावत तो खिला दे बेसरम  | खुसी का मौका है | "
 ननुआ दिलफेंक आदमी है , तुरत बोला" दावत का क्या है काका , जब जी चाँएँ तब ले लो दावत ।"
मुझे जिज्ञासा हुई सो पूछा "खुश खबरी है क्या ननुआ । पापा बन गया क्या?"
जबाब में वो मुस्कुराया, बोला " अह, नई "

मैंने उसे कुरेदा "फिर किस बात दावत  मांग रहे काका।"

इससे पहले की ननुआ कुछ बोलता , काका से रहा नहीं गया ,  "नई बहू लाया है, बताया नई इसने !"
मुझे बैचेनी हुई , होनी भी थी ,मेरी नज़र में ननुआ पिछले दशक भर से गृहस्थ में जी रहा था |
मैंने उसकी आँखों में आँखे डाल पुछा  "सही बात  है क्या भई "
जबाब में वो अपने बड़े बड़े दांतो से जोर से हंस पड़ा |

ननुआ का बिहा तो कभी हुआ ही नहीं था , हाँ वो सालो पहले कही से औरत ले आया था | ख़ुशी ख़ुशी रह रहा था | वो औरत ही उसका सब कुछ थी |

"तो उसका क्या हुआ ?" मैंने पूछा |
"है गी वो भी।" ननुआ जल्दी से सब कुछ उगल देने के मूड में नहीं था |
"तो क्या , फिर २ २ औरतें " मेरी आँखें फैल गयी

 साईकल के हैंडल से हाथ हठा उसने मेरा हाथ पकड़ लिया , वैसे ही जैसे बचपन का आडी अरसे बाद मिलने पे थामता है |
"अरे यार , वो मैंने अपने मौसरे भाई को देदी। " ऐसा कहते हुए उसके चेहरे पे एक गर्व की मुस्कान बिखर गयी | बहुत ही चौड़ी मुस्कान | 
वैसे बात है भी गर्व की ! इतना बड़ा त्याग !
उस औरत को वो कही से भी लाया था पर उसके साथ उसने फेरे लिए थे | उसे अपनी औरत का दर्जा दिया था |
अपनी औरत अपने दूर के भाई को सौंप देने का जिगरा , वो हिम्मत | शायद दुनिया में अकेला ऐसा इंसान हो ननुआ !

मैं चुप ही रहा , वो खुद ही बोला "अरे ज्यादा चिक  चिक करने लगी थी। दिन रात का क्लेश। राड  से बाड़ अच्छी। है की नहीं ?"

" तो ये वाली कहाँ से ले आया "  मैंने पूछा |
" नेपाल  से "  ननुआ की आँखों में चमक थी |
फिर बड़े धीरे से फुसफुसाता हुआ बोला " गोरी हैं , सफ़ेद झक कतई " ऐसा कहते हुए उसने शरारतन मेरा हाथ दबा दिया |

"ये वाली अच्ची है यार ।जो मैं कह दु कि कोहरे में सिगरी रात बाहर खड़ी रह। चु भी न कहेगी , बात मानेगी सुसरी।"
" वो.. वो मुँहजोर हो गयी थी साली ।"

क्या सही क्या गलत ,मैं कुछ  बोला नहीं , बस खड़ा रहा |
पर काका से नहीं रहा गया |
"नरक में जायेगा ससुरा। बुढ़ापे में सड़ेगा ।औरत की खरीद बेच अच्छी बात है क्या। है जी । इसका आगम नही बिगड़ेगा  भूतनिया वाले का ।"

काका के आरोप से ननुआ गुस्सा खा गया , फन कुचले साँप सा फनफना के बोला "किससे लिए पैसे।
आंधी रात मरे वो कौड़िया जिसने एक पैसा भी लिया हो "
काका भरे बैठे थे " अपने मौसरे से न लिए तूने पैसे? फ्री में दे दी औरत ?"
"कसम खाने कु एक पैसा भी लिया  हो जो उससे  काका।" ननुआ गला फाड़ फाड़ चिल्ला रहा था |
फिर सीने पे हाथ मार के बोला " साबित कर दो , कि एक भी पैसा लिया है , जिसमे कुत्ता खावे है न काका , उसी में खिला दियो मुझे |  जाओ "

काका का सीना चौड़ा हो गया था , उनके हाथ उनकी कमर पर लगे थे , वो सामना करने के मूड में थे | " तो ऐसे ही देदी, अरे जा , तू और ऐसे ही देदे | सौ कमीने मरे होंगे जब तू पैदा हुआ होगा |"

मुझे लगा कि बस दोनों गुथ्थम गुथ्था न हो जाए |

मैने पाया  काका के मन में अजीब सी नफरत थी नेनुआ को लेकर। और वो अपनी इस कुढ़ को छिपा भी नही रहे थे।

मेरी ओर मुखातिब हो काका बोले "इस बात को लिख लो लल्ला । बुढापे में रोटी को तरसेगा ये । सड़ेगा ससुरा| नरक में जायेगा | "

ननुआ कहाँ पीछे हटने वाला था |उसने अपने सीने पे हाथ मार के कहा, "यारा तो ऐसे ही जियेगा काका।"
"और रही बात नरक की, तुम्हारी जिंदगी का स्वर्ग रोज देखु हु मैं।
यारा तो 4 पराठे और चाय ऐंठ के आया है बिस्तरमें बैठ के | "
"मुँह मत खुलवाओ। तीसरे दिन काकी तुम्हे रोटी देने से मना कर देती है। तुम्हारा चिंटू दिन भर दोस्तो में घूमने और  गेंद बल्ला खेलने के अलावा कोई काम नही करता। 60 की उम्र में तुम दिन रात हड्डे धुनते हो। फावड़ा पेलते हो।"
"कहने की जरूरत का है। तुम्हारी जिंदगी का स्वर्ग तो सिगरे गाँव को दिख ही रहा  ।"
ननुआ की बक छूट गयी थी |

लड़ाई टालने को मैंने ननुआ की साईकल का हैंडल पकड़ आगे खींच लिया  और उसे शांत रहने को आँख से इशारा किया |  उसने मेरी बात मानी और बिना कुछ और बोले अपने दूध के बर्तन खटकाता आगे बढ़ गया |

मैं पीछे मुड़ा तो काका भी खेत में उतर गए  और फावड़े की मूढ़ पकड़ ऊँची आवाज़ में मुझे सुनाते हुए बोले "
बिरादरी का कुत्ता भी न पूझता ऐसे आदमी को लल्ला| "
मैं पीछे मुड़ा तो मैंने पाया 'बिरादरी के कुत्ते' से भी गिरा हुआ वो  आदमी बड़े मजे से गाना गाता  हुआ साइकल के पैडल  मारता मस्त सांड सा चला जा रहा था और बिरादरी का लम्बरदार काका जल जल के कोयला हुआ जा रहा था |
मुझे लगा कि काका की जलन ख़ालिश ननुआ के गिरे हुए चरित्र को लेकर नहीं थी | कहीं न कही खुद की जिंदगी एक मोटी ,नकचढ़ी ,मुहफट औरत के साथ काटने का गम और ननुआ जैसे मलेच्छ के  नयी नयी जवान औरतें बदलते देखने से उनके मन में अजीब सी चिढ़ पैदा हो गयी थी | ननुआ जैसे लोग चिढ़ तो पैदा कर ही देते है!

मैं टहलता हुआ आगे निकल गया था पर काका अभी भी बहुत ऊँचा ऊँचा चिल्ला रहा था " तू सड़ेगा ननुआ , देखना तू सड़ सड़ के मरेगा | और देखना जब तू मरेगा तुझे बिरादरी का कुत्ता भी नहीं पूछेगा !"

                                                                                      - सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                           २२ फरबरी 2018

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...