बुधवार, 23 दिसंबर 2020

खट खट खट.. चॉप चॉप चॉप !



वो मुझे रोज ही मिलती है | यही कोई नौ साढ़े नौ बजे के आस पास | या जानकारी को ज्यादा सटीक बनाना है तो यूँ कहिये कि सप्ताहांत को छोड़कर बाकि सभी दिन , क्योकि उन दो दिनों में मैं देर दोपहर तक सोता हूँ | 'माय लाइफ माय चॉइस ' के खुमार में डूबा होता हूँ |  

सीधी सपाट चिनाई और पीले गेरुए रंग में पुती हाउसिंग बोर्ड की बिल्डिंग्स के झुरमुट से निकल , लाल बत्ती के पार , उन नौ  दुकानों की टुकड़ी  में , हाँ वो मुझे वही मिलती है | नौ दुकानें , जिनमे से पांच एक सीध में तो बाकि चार अंग्रेजी के 'एल' अक्षर की तरह नब्बे डिग्री का घुमाव लिए हुए है | ऊँचे बुलेवार्ड के तेज़ ढलान को रोकने के लिए दुकानों के सामने  पैरापेट बनी है | पैरापेट के सहारे कुछ 'रात की रानी ' के खुशबूदार पौधे लगे है | एक पैर जमीन पर तो एक पैर मोड़ कर पैरापेट पर टिकाये वो यूँ खड़ी होती है जैसे वादा कर समय पर ना पहुंचे प्रेमी के इंतज़ार में हो , बेचैन हो , राह तकती हो |  

मैं उसे दूर से देखता हूँ तो लगता है कि जैसे पास आने पर  वो मुझसे  कहेगी " वेंकट , माय डिअर वेंकट , अरे सोकर देर से उठे क्या ? " फिर थोड़ी फ़िक्र लिए और थोड़ी सलाह के भाव से कहेगी "ऑफिस टाइम से जाया करो ! लेट हो जाओ तो नॉश्ता ऑफिस कैंटीन में ही कर लिया करो | "  

वेंकट ?? आप कहेंगे 'कौन वेंकट ?'

देखिये , सिंगापुर प्रवासियो का शहर है | वैसे अमूमन सभी शहर प्रवासियों के हुजूम समेटे होते है | लेकिन यहाँ प्रवासियों की तादाद इस कदर ज्यादा है कि अड़ोस पड़ोस में रहते , रोज बगल की टेबल पर कॉफी पीते अजनबी चेहरे कोई जिज्ञासा पैदा नहीं करते | फिर 'स्टीरिओ टाइप ' के खांचे इतने  मजबूत है कि आदमी आदमी नहीं रहता , एक किरदार भर रह जाता है | 

सो, अगर  कोई भारतीय है जो पिट्टू बैग लाधे जाता है तो वो 'वेंकट' या 'राजू' है जो कि एक 'आय टी वर्कर' है  | किसी बैंक या टेक्नो फर्म में कंप्यूटर पे काम करता है |  तमिल बोलता है ,इडली डोसा या रोटी पराता खाता है | उसकी जिंदगी में कोई शगल नहीं है , सिवाय इसके कि उसे खूब सारा पैसा कमा , सब का सब इंडिया भेज देना है !कोई भारतीय जैसा ही , पर थोड़ा नाटा और सावला , सस्ते रबर या लेथर के बूट  डाले है , तो वो समसुल है ,बांग्लादेशी है , कंस्टक्शन वर्कर है , या ऐ सी मैकेनिक | कोई पीले रंग का , एशियाई नाक नक्श लिए , मरियल सा , लाल या पीली टीशर्ट डाले है जिस पर कुछ कुछ प्रिंटेड है , वो तेओ है , वियतनामी जो किसी फ़ूड कोर्ट में सर्विंग स्टाफ या क्लीनिंग स्टाफ है |  

किनारे की बेकरी की दुकान की युवतियाँ हर थोड़े अंतराल पर मध्यम स्वर में गाती जाती है "ओफा ओफा ओफा | " मतलब "ऑफर ऑफर ऑफर "|  'एप्पल पाई बन ', 'रेड बीन बन ' , 'चिकन टोस्ट ' , चॉकलेट कप केक।  ऐसे छत्तीस प्रकार के आइटम उन्होंने दुकान के बाहर स्टैंड पे बड़े करीने से सजाये होते है | सामान उठाने के चिमटे और ट्रे सेट एक किनारे पे चट्टा किये होते है | फिर एक इलेक्ट्रीशियन की शॉप, उसके बाद एक सब्जी फल की दूकान | 

चौथी दुकान के सामने , पैरापेट के पैर टिकाये वो मुझे मिलती है | 

दूधिया रंग | और इस कदर दूधिया कि लगे जैसे छूने से मैला हो जायेगा | चिकनी सफ़ेद , सपाट पेशानी  , नक्काशी की हुई भौहे ,कटीली मंगोल आँखे जिनके  किनारे उसने मस्कारे  से बांधे होते है | नाक रोमन तो नहीं लेकिन चमकीली , सुगढ़ | चीनी टँगेरीन के जैसे भरे हुए उसके होठ , ऐसे समरूप जैसे किसी चित्रकार ने पेन्सिल से बड़ी बारीकी से उकेरे हो |  सूरत पे एक धब्बा तक नहीं |  हाँ निचले होठ से गालिबन एक उंगल भर नीचे एक चोट का निशान है , जो उस पर जँचता है , रूप दबाने के बजाय निखारता है |  अपने घने बरगंडी कलर बालों को उसने चारों तरफ से समेट सिर के बीचोबीच एक जूड़े में बाधा होता है | ऐसा करने से उसकी दूधिया गर्दन पे बना टैटू निखर कर ऐसे सामने आता है जैसे बादलो के घने टुकड़ो से पार पा चाँद दौगनी कशिश  से चमकना चाहता हो |  उसके मोटे, भरे हुए गाल जब मुँह की तरफ आते है तो लाफिंग लाइन की एक घाटी सी बन जाती है | हाथ गूदेदार है , मुलायम डबल रोटी जैसे | इस कदर गूदे दार की उंगलियों के जोड़ बाहर उभरने की बजाय अंदर की ओर दबे हुए है | 

कोई ग्राहक आता है तो वो बड़ी तेज़ी से दुकान की तरफ बढ़ती है | छज्जे के नीचे कतार में जमे थर्मोकोल के बक्सों में , टूटी हुई बर्फ में जमी छोटी बड़ी मछलियों में से एक को वो यूँ उठाती है जैसे गुलाब की कोई टहनी | फिर फुर्ती से स्टेनलेस स्टील के गंडासे को उठा वो उस मछली के पर-पूंछ ऐसे कतरती है जैसे टहनी से पत्ते हटाती हो |  बहुत ज्यादा नहीं , थोड़े से प्रयास से ही वो उस 'समुद्रफल' का पेट दो फाँक कर देती है | "खट खट खट .. चोप चोप चोप "| और बस मिनट से पहले सामान पकने के लिए तैयार | 

कई बार जब मैं गुजर रहा होता हूँ तो कोई बॉडी बिल्डर आकर उससे बोलता है "वन चिकन ब्रैस्ट " | और वो दुकान में अंदर जमा फ्रोजेन चिकन को निकल कटान तख़्त पर ला रखती है | "खट खट खट  ...चोप चोप चोप " | इस बार गंडासा ऊँची आवाज़ करता है | लेकिन समय , मिनट भर ही |  काम को निपटा वो रबर के हौज़ में लगे जेट स्प्रे से कटान तख़्त को साफ़ कर देती है | पॉलिथीन को ग्राहक को थमा भुक्तान रकम को थाम आदर भाव से ऐसे झुकती है जैसे कोई बौद्ध  भिक्षु ! फिर बकाया लौटा वो धीमे स्वर में बोल उठती है "शे शे " | शुक्रिया , शुक्रिया | 

काम निपटा वो फिर से 'रात की  रानी' की झाड़ियों के नजदीक पैरापेट पर आ जाती है और बिना किसी साथी की बात जोहे सिगरेट सुलगा लेती है | उसने रबर के वाटरप्रूफ बूट पहने होते है जो बूचरी के काम में उसे भीगने से बचाते है | एक वाटरप्रूफ एप्रन डाला होता है जो काफी मोटा और चिकना है  और हमेशा भीगा रहता है | इस सबके बाबजूद आप उसे देखेंगे तो उसके मजबूत सीने को महसूस किये बिना नहीं रह सकते |  

कई बार जब वो झुक  कर सामान  उठा रही होती है और मैं गुजर रहा होता हू | या काम की तीव्रता में इधर उधर भागते उसे पीछे से अवलोकन का किस्मतगार होता हूँ  | तब मुझे उसके गदीले  , सही विस्तार लिए हुए  कटि  प्रदेश , बिलकुल वैसा जैसा कल्पनशीलता की चरम अवस्था में पुरष मन गढ़ता है , का अहसास होता है | कटि प्रदेश के ऊपर , ठीक लव हैंडल्स के ऊपर अचानक से कमर अंदर की ओर वलय ले लेती है | ऐसा लगता है जैसे मानो वो रेनेसांस के किसी मूर्तिकार की कृति हो , और मूर्तिकार ने  छैनी हथोड़े की चोट से कमर तरासी की  हो | 

अहह , वो सचमुच आज के समय की स्त्री नहीं है | ना ही वो  आजकल के सनकी  'जीरो फिगर', 'ऑवर ग्लास फिगर ' घुड़दौड़ का हिस्सा है| आहा  लापरवाह ,समय के साथ पकता उसका रूप | वैसे ही जैसे मानसून की बौछारों में  पकता आम | ऐसे गोल , सुडोल , मांसल स्त्रीत्व की तलाश में स्टालिन रूस के गाँवो तक चला जाता था , किसान औरतो में अपनी कल्पना का रूप ढूढ़ता था | 

मछली , मुर्गा काटने वाली उस सुकाया  को कोई भी पुरुष प्यार करेगा | खुशकिस्मती समझेगा |इतना अनुभव तो मेरा भी है कि पुरुष में लाख कमियाँ हो , लेकिन इस तरह के ढकोसले कि.. कि ' आई लुक फॉर समवन विथ ग्रेट सेंस ऑफ़ ह्यूमर ' 'समवन  वैरी केयरिंग ' 'समवन हु हैस  मिशन इन लाइफ '  'डॉग  लविंग ' 'एनवायरनमेंट लविंग ' अलाना फलाना !!!|  ये सब नहीं होता | जो पसंद आ जाये , जिसके नैन नक्श , मुखौटा, चाल ढाल , आकृति  भा जाए तो भा जाये | फिर उसके हाथ में कलम हो या गंडासा | हाँ दूसरी चीज़े मायने रखती है , लेकिन उन सबके भारांक कम ही रहते है | 


उस गंडासे वाली  कोई भीपुरुष  प्यार करेगा | हाँ कोई भी !

लेकिन उसका प्यार पा , उसके फूल से खेल कोई उसका दिल तोड़ भी सकता है क्या ?क्या कोई उसे दगा भी दे सकता है क्या ?

किनारे की दूकान से मुड मैं बस स्टॉप की तरफ बढ़ चुका  होता हूँ  | 

कोलाहल के बीच अभी तक गँड़ासे की आवाज़ आ रही होती  है "खट खट खट .. चॉप चॉप चॉप ! "


                                                                               -- सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                                    24th Dec 2020                         

                                                              

                                                                                  #singaporelife, #singaporegirl #shorthindistory 

                                                                                 

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...