शुक्रवार, 14 जून 2019

आखिरी दांव


I
काली अमावस से पिछली रात ,उस हवेली में सब बड़े आराम में थे | एक मै ही था जो उस तंग , बौने पायें  वाले खटोले में करवटें बदल रहा था | ठीक उसी दिन दोपहर में , गांव के बाहर खदाने में , जहाँ गांव के तमाम लोग कूड़ा फेंकते थे , एक काला नाग , ऊँचे दरखत पर चढ़ कऊओं के अंडे खा गया था |
खटोला , जिसे मैंने भाइयों से लड़-झगड़ कर कब्जाया था , उसमे फंसा मै किसी कोवे के अंडे जैसा महसूस कर रहा था |
जब रहा नहीं गया तो मै बोला " माँ , एक बात बताओ , जब सांप ऊँचे नीम पर चढ़ सके है , तो चारपाई के पाए तो बहुत छोटे होवे हैं !"
माँ बड़े आश्वस्त स्वर मे बोली " ना लल्ला , साँप खाट-खटोलो पे ना चढ़ा करते | "
"पर क्यों ?" जबाब से मै मुत्मइन नहीं था |
थोड़ा दूर पुराने कोठड़े के सामने, निवाड़ के पलंग पर लेटी दादी सब सुन रही थी , बोली " जिस दिंना, कोई सांप खाट खटोले पै चढ़ गया , ठीक उसी दिना सांपो का वंश ख़तम हो जावेगा | ऐसा किसी देवता का वचन है |"
फिर हवेली की सारी औरतों और बच्चो को चुनौती देती हुई दादी बोली " कही भी , किसी सांप के खाट पर चढ़ने की बात सुनी हो तो बताओ| "
सचमुच किसी ने नहीं सुनी थी |
यानी खटोले के किले मे मै सुरक्षित था !
गांव के बाहर जोहड़ के किनारे भंगियों के कच्ची भीत, पक्की खपरैलों के कुछ मकानों का छत्ता था | उन घरों मे शायद कुछ मेहमान थे उस रात | करीब आधे घंटे चिंघाड़ने के बाद सूअर अब चुप था | घरों  के बगल में टीकरी पर , लोहे के सरिये में धंसा साबुत जानवर आग की लपटों मे भुनता , अब गुलाबी हो चला था | कोई आधा फर्लांग की दूरी पर , रास्ते के किनारे, मोहल्ले  के कुछ शराबी-कबाबी खुसर-पुसर बतिया रहे थे | खुद को ऊँची जात मानने वाले उन आदमियों मे से कोई भंगियों से सूअर का गोश्त मांगने जाने वाला था |
ये पहली दफा नहीं था | ऐसा करते हुए ये चटोरे लोग पहले भी पकडे गए थे | जब किसी 'समझदार' ने इन्हे ऊँची जात का हवाला दे दुत्कारना चाहा तो इनमे से कोई बड़ा गुमान लिए बोला था " जिसने ना खाया सूरा , ऊ हिन्दू ना है पूरा !"
और मामला रफा दफा हो गया था |
एक बैल गाड़ी चली आ रही थी | हाँकिया बैल को धमकाता " चल भी ले , म्हारे ससुर के | कसाई कै कटवाऊ तुझे | "
बैल कुछ तेज चले पर हाँकिया हड़बड़ाया हुआ था | उसने बांस की पतली लकड़ी मे धंसी कील को एक बैल के पिछवाड़े मे ठोंक दिया | मारे दर्द खड़ंजे पर पैर पटकते बैल भाग निकले |
एक बूढी औरत की आवाज़ आयी " ले चलो रे , जल्दी ले चलो | मेरा लाल , मेरा जिगर का टुकड़ा | आहहह .. हाय रे .. हाय| "
बूढी दादी के पैरो मे जैसे इस्पात के स्प्रिंग लग गए हो " चौधरन चौधरन | "
चिल्लाती हुई दादी दरवाजा खोल गली मे आ गयी | उसके पीछे पीछे हमारी सारी पल्टन |
बैलगाड़ी आगे निकल गयी थी | दो तीन जनें  उसके पीछे रोते हुए लपकते चले जा रहे थे |
आगे जाकर शराबियों की टुकड़ी ने बैलगाड़ी को थाम लिया |
एक नौजवान गाड़ी मे चित्त पड़ा था | उसके मुँह पर एक पुराना, मैला गमछा लिपटा था जिससे बासी , खट्टे दूध की बू आ रही थी |
काका नरपत जो शराबियों की टोली के उस्ताद थे , उन्होंने नौजवान के मुँह से गमछा हटाया और अपने हाथ से उसका सिर डुलाके बोले " जगपाल ओ जगपाल , सुनै है ना | "
कोई प्रतिक्रिया नहीं | उस नौजवान का मुँह आधा खुला था | आँखे बंद थी पर पुतलियाँ  घूम रही थी |
एक हाथ गाडी से नीचे लटका हुआ था तो दूसरा छाती पर जमा था | मैला और सिकुड़ा हुआ घुटन्ना पहने , यूकेलिप्टिस के तने सी मांसल टाँगे ,गाडी के तखत से चिपटी पड़ी थीं  |
रुक रुक कर वो नौजावन ऐसे सांस लेता जैसे बरसात मे कोई भैंसा ज्यादा घास खा गया हो |
काका नरपत हांकिए से मुखातिब हो धीमे से बोले " गुंजायस दिखती हो तो ही ले जइयो भैया |
सुसरे डांग्दर (डॉक्टर) ठन्डे आदमी मे भी सुआ लगा देवे है पैसो के लालच में  | "
काका की बात सुनकर बूढ़ी चौधरन और भी ऊँचा कराहने लगी " ले चलो रे , ले चलो रे जल्दी | मेरा लाल , मेरा लख्ते जिगर | आअह्ह हाय, मुझै मरी कू ना आती रे , हाय..."
माँ का दिल , उसकी ममता |
जगपाल ने फांसी लगा ली थी | किसलिए ? उसकी विहाता ने अपने पीहर से वापस लौटने से मना कर दिया था , इसलिए !


अचानक कुछ नहीं होता , कुछ भी नहीं | भूकंप भी अचानक नहीं आता | धरती के नीचे फँसी चट्टाने एक दूसरे  को रगड़ रही होती है | एक दूसरे को नीचा दिखाने , हावी होने की परिणीति मे धरती डोलती है |
तीन तीन चंट, हर तरह के छल कपट करने वाली बहुओं  को बूढी चौधरन जैसे तैसे बांधती चली आ रही थी | घर का अनुशासन तो उसी दिन उड़न छू हो गया था जिस दिन चौधरी की जिंदगी का कबूतर उड़ा था |
तब से वो बेचारी बूढ़ी, झींकती रोती गाती, जैसे तैसे साझे मे परिवार को चलाती रही |
चौधरी कह गए थे "बेटे अलग हों  तो हवेली के चबूतरे से बाहर तक भी चर्चा न हो | बड़ा पहले अपना मकान बनाये और छोटे उसमें  सहयोग करें  | फिर मंझला | और तब तक खाना सांझे चूल्हे पर ही बने |"
अच्छी खासी जमीन थी | दोनों बड़े खेती मे कमाते |
और सबसे छोटा जगपाल ढोर-डंगरो का दाना पानी करता | दूध दूहता | दूधिये को दूध बेच माँ के हाथ पैसे धरता|
बहुओं  में  छटपटाहट तो बहुत थी पर चौधरी जो कह गए , उस लकीर को कौन लांघे |
पर जब से छोटी राजवती आई, बर्तन भांडे रोज खटकने लगे | इकहरे हाड की सांवली  राजवती बुरी औरत न थी | हाँ वो थोड़ा महत्वकांक्षी थी | बड़े चींटी की मानिंद रेंगे तो रेंगे , भला वह  क्यों उनके चक्कर मे पिछड़े ?
वह  खेत क्यारी अलग कर अपने हिसाब से काम चाहती थी |
फिर उसके जेठ सुबह शाम ही तो खेतो मे होते , दिन मे अपनी अपनी जनानियों संग कमरों मे पड़  सुस्ताते | और उसका हलंता सुबह से लेकर रात तक भैंसो के पिछवाड़े साफ़ करता ! उसके चौड़े  कंधे और उनसे जुड़े  किसी पेड़ के तने जैसे मजबूत हाथों  मे खली (मवेशियों का चारा) की भारी बाल्टियां लटकी ही रहतीं  |
जगमाल घर का ही काम न करता | असल में वह  एक ऐसे पालतू भैंसे जैसा था जिसे मुहल्ले  वाले भी गरज़ पड़ने पर अपने अपने काम मे जोत लेते |
पूरे गांव मे किसी का भी छप्पर छाया जाता तो जगपाल की ढुँढ़वार होती |
और वो गवरू मोटी सी टेक ले पूरी ताकत लगा एक सिरे से अकेला ही छप्पर उठा लेता |
उसके रूखे , झाड़ू जैसे बालो मे कूड़ा करकट घुस जाता | फूस की सूखी पत्तियों से हाथो मे चीरे लग जाते | और वो मुस्कुराता हुआ काम निपटा बदले मे एक गुड़ की डली खाता मस्त सांड सा लम्बी लम्बी डग भरता चला आता | उसकी छोटी आँखे चमकती और दरमियानी गोल नाक के नथुने फड़फड़ाते |
कौन औरत बर्दाश्त करेगी ये सब?
"अय्यो मति लिवाने , मै नाय  आउ अब " गेहूँ की फसल से निपट जब राजवती अपने पीहर गयी तो ये बोल कर गयी |
और जगपाल बाहर से नकली गुस्सा तो अंदर से बहुत सारा प्यार लिए बोला " मति आइये , इहा कौन भूखा है तेरा , मेरे ससुर की !"
पर राजवती मन पक्का करके गयी थी |
पंद्रह दिन पीछे जगपाल पहुंच गए लिबनहार | माँ और बेटी दोनों ने इतनी सुनाई, इतनी सुनाई कि कथा सुनते सुनते रात से भोर हो आई |
सुबह फिर गुजारिश की तो सास बोली " नाय भेजू , जब तक वो डंकनी (दोनों बड़ी जेठानी ) उस घर मे है , नाय भेजूँ  |" थका हारा नौजवान चला आया |
माँ से किस्सा सुनाया तो माँ बोली " अब तो चला गया , अब से आगे न जइयो | अरे , नाक रगड़ती हुई आवेगी | देखियो | चुप्पी चान पड़ा रह तू | रोटी खा , मौज कर | मै भी देखूं , कब तक ना आवेगी |पीहर मे भी भला किसी का गुजारा हुआ है आजतक | "
और भाभियाँ ? भाभियाँ के सुकून की तो खबर ही ना पूछो !
पर मरद की जिंदगी मे उसकी औरत की कमी कोई और पूरा कर सकता  है क्या ?
फिर अभी बिहा को डेढ़ साल ही तो हुआ था | कोई बच्चा भी न था |
पंद्रह दिन और बीते | पड़ोस की एक औरत  जो राजवती के ही गांव की थी , अपने पीहर को जाती थी | जगपाल ने रोक लिया " ओ भाभी , ओ भाभी , खादर कू जाओ हो क्या ?"
फिर कुछ दूर उस औरत के साथ साथ चल जगपाल धीमे से लालच देते बोला " छड़ी के मेले कू गाडी जोड़ूंगा मै भाभी | कह दीजो | उसकी बात सर माथे रखूँगा !"
और प्यारी भाभी ने बड़े भरोसे से कहा " धीरज रखो देवर , संगी लेती आऊंगी  "
जगमाल ने सड़क के किनारे कि पाखड़ तले खूब इंतज़ार किया | निठल्लो की चौकड़ी संग खूब ताश खेले | खूब चिलम धुआँ किया |
उसकी आँखे टकटकी बाँध सड़क पर जमी रहीं | राजवती नहीं आई |
जगमाल की छटपटाहट बढ़ती ही जा रही थी | घर मे उसकी औरत का जिक्र तक न होता था |
मर्द का दिल दिन रात रोता था |
उसने काका नरपत को तैयार किया | कहलवाया "पीर की हाट उजड़ने से पहले नहीं आयी तो मरा मुँह देखेगी | जिन्दे पे ही आ जा , नहीं तो मेरे सीने पे चूड़ी तोड़ने आएगी|  "
नतीजा ? राजवती नहीं आयी !
उस शाम जगमाल ने मोहल्ले के शराबियो के साथ कच्ची बसंती पी , आम के अचार और कच्ची प्याज़ की गोल कतरनों के साथ |
देर से घर पंहुचा तो माँ ने डाट दिया |
कमरे मे जा वो बेचारा नौजवान खटिया पर निढाल सा पड़ा रहा |
खटिया पर कुछ लत्ते बिखरे पड़े थे | एक साडी थी , पुरानी साडी जिसे राजवती घर के काम करते हुए पहनती थी | गुस्से मे जाते हुए नार लत्ते कपडे बिखरे छोड़ गयी थी |
उसने साडी किसी तकिये की भांति गुड़मुड़ कर सिर तले दबा ली | साडी में  राजवती की देह की खुशबु ने उसे पागल सा कर दिया | विरह की वेदना में  पड़ा वो नौजवान घंटो तडफता रहा | अचानक वो बिजली की फुर्ती सा उठा , किबाड़ की सांकल लगाई और फिर उसी साडी मे फंदा लगा, छत के कुंडे से लटक गया | घहघहघह ... किसी जानवर के घुटने जैसी आवाज हुई और हवेली मे हल्ला मच गया |
III
पुरानी पाखड़ तले ताश खेल खेल , निठल्ले शराबी उकता गए थे | दोपहर अभी लम्बी थी |
गजुआ ताऊ , जिनका निकम्मे और बिगडो की टोली मे काका नरपत जितना ही ओहदा था , उन्होंने बच्चों की टोली को बुलावा भेजा |
हम आठ दस लड़के अर्ध चंद्राकार गोले मे खड़े थे | गोले को पूरा करते एक तरफ गजुआ ताऊ बैठे थे | तोतई नाक के नीचे पतली और नीचे को लटकी मूछों  को उन्होंने इत्मीनान से खुजलाया |
फिर कमची से जमीन मे एक वलय खींच दिया | वलय के ऊपर तीन बिंदु बनाये |
फिर हंसी दबाते हुए बोले "बालको , चलो आज मजे करते है !"
"क्या ?" एक साथ कई बारीक स्वर गूंझे |
"चलो आज खरमहुआ पकड़ते है | "
खरमहुआ एक प्रकार की जँगली  चिड़िया जो मुर्गे से कुछ छोटी होती है | कुछ काले कुछ गाजरी रंग की ये चिड़िया बमुश्किल तीन उड़ान भर पाती है | इसका मांस मुर्गे जैसा , पर थोड़ा खट्टा होता है |
खेल खेल मे गजुआ ताऊ अपनी जीभ के चटान का सामान  जुटा रहे थे !
किसी सेनानायक की तरह हमें  समझाते हुए वे  बोले " देखो , खरमहुआ पहली उड़ान झील के खेतों  की तरफ से भरेगा | हम धावा देंगे | पहली बार पंछी गिरेगा दूधियों  के ट्यूबवेल के आस पास |
आराम न पकड़ने पाए | हम फिर धावा देंगे | दूसरी बार पंछी गिरेगा धर्मा के खेतो के आस पास |
हम दबाब बनाते रहेंगे | फिर तीसरी और आखिरी उड़ान मरघटियाई के आस पास ख़तम हो जाएगी |
बस , काम ख़तम !"
पल्टन की ब्रीफिंग ख़तम कर गजुआ ताऊ अपने तहमद की एन्टी से बीड़ी निकाल सुलगा रहे थे |
एक बुजुर्ग जिसने नील लगा कुरता और फेट की धोती बाँधी थी , पाखड़ के पास से गुजरे |
ताऊ की तरफ दायाँ हाथ उठा बुजुर्ग ने ऊँची आवाज़ मे बड़े जोर से कहा " राम राम साहब | "
बुजुर्ग के बाए हाथ मे एक पारदर्शी थैली थी , जिसमे दर्जन भर , अच्छे पके हुए , बड़े बड़े केले थे |
उन केलो को देख मुझे याद आया कि उन गर्मियों की  छुट्टियों मे एक भी रिश्तेदार हमारे घर नहीं आया था | वे  जगपाल के ससुर थे |
पीछे पीछे राजवती चली आ रही थी | जून की तपती दुपहरी मे उसने बड़ी भारी और चमकीली साडी पहनी हुई थी | लम्बा घूँघट काढ़ा था | उसके कंधे अपराध बोध में  झुके थे | ऐसा लगता था जैसे किसी रोग ने उसकी सारी जान खींच ली हो और वो बेचारी रोने का दम भी न रखती हो |
ससुर साब परिवार के किसी बच्चे के हाथ में केले की थैली थमा बाहर की तरह बने दालान की ओर मुड़ गए |
"आ गयी कुलटा , आ गयी मुँह दिखाने | बेशर्म | नीच जात | भंगी की औलाद | " जगपाल खाट पर चित पड़ा था , पड़े पड़े ही फड़फड़ाया |
उसका गला सूजा हुआ था औऱ उस पर बुझे हुए चूने औऱ शहद का लेप लपटा था | बाजु वाले सूती बनियान औऱ तहमद मे वो किसी चोट खाये सांड सा फनफना रहा था |
राजवती कुछ भी ना बोली | चुपचाप सासु के पाँव लगे |  जेठानियों से गले मिली औऱ अपने कमरे मे घुस गयी |
कपडे बदल बाहर निकली तो उसकी सासु ने उसका दुप्पटा पीछे से पकड़ लिया |
"अब क्यों आयी है यु हरामन, पूछ तो इससे | " जगपाल माँ की तरफ देख गुस्से मे फड़का |
राजवती सासु की तरफ मुड़ी तो चौधरन बोली " चिकना है , रपटना लगे है तेरा दुपट्टा| छापा अच्छा है औसे!! "
"नीलोफर दुपट्टा है माँ , बिलकुल भी रपटना ना है !" राजवती ने जबाब दिया था |
फिर उसने अपना बैग  खोल झमकीली ओढ़नी अपनी सासु की गोद मे लाकर रख दी |
घरवाले काम काज मे लग गए | राजवती कुछ सामान ढूँढ़ती  जगपाल की खाट के पास से गुजरी तो उसने उसकी बाँह पकड़ ली औऱ फिर बच्चे की तरह नखरे करते हुए बोला " अब भी तो आयी ससुरे  की .. मै तो तब मानता जो अब भी ना आती | "
राजवती का चेहरा सख्त था पर उसकी आँखे डबडबा आयी थी |
जगपाल ने हाथ छोड दिया था औऱ कोहनी से अपना मुँह ढाँप लिया |
कितना गुस्सा करता औऱ किससे गुस्सा करता ?
जिसे वापस लेन के लिए उसने 'दाँव' खेला था , आखिर वो वापस आ गयी थी |

-सचिन कुमार गुर्जर
14 जून 2019

शुक्रवार, 7 जून 2019

फ़िल्थी डॉग्स

उस लड़की में दो 'खामियाँ' थीं।
एक, वो खूबसूरत थी| मतलब काफी खूबसूरत।
दूसरा, वो हिंदी हार्टलैंड की किसी यूनिवर्सिटी ( कम प्रसिद्ध) की टॉपर थी।
अब आप सोचते होंगे , भला खूबियाँ, खामियाँ क्योंकर हुई?
देखिये, खूबसूरती का ऐसा है कि ये अगर सूरत में हो , तो सामने वाले की तबियत हरी करती है। और दिमाग मे घुस जाए तो गुमान पैदा करती है|  दिक्कत वही से शुरू होती है। ज्यादा खूबसूरत इंसान से आप व्यवहार में बराबरी की तबक्को नही कर सकते। क़द्रदान आप ही नहीं ,बहुते होते हैं ।

और पढ़ाई लिखाई में 'नंबर १' होने में दिक्कत ये है कि स्कूल-कॉलेज में जिन्हें आप कमतर आंकते रहे , वो अगर जिंदिगी के पोडियम पर आपके समकक्ष भी दिखें तो आप गैरआराम हो उठते है। 'अंडरएचीवर' होने की टीस आपको घुन की तरह खाती जाती है|
सनकी कहना तो ज्यादती होगी ,पर हाँ इन दो वजुआत के चलते वो लड़की थोड़ी तनुक-मिजाज तो थी ही।

बेबी फेस, दूधिया सफेद रंग,पढ़ाकू चश्मे में वो जब पहलम-पहल आफिस आयी थी तो कई बोले" अरे ,ये स्कूल की बच्ची कहाँ से आ गयी!"
लंबाई कम थी, सुतवा शरीर, कम विकसित स्तन। वो छौने से हिरनी होने की बीच की अवस्था मे थी।
हालांकि वो पोस्टग्रेजुएट करके आयी थी, पर उसका डील-डोल कम उम्र होने का भरम पैदा करता था।चटक रंग के फिटिंग वाले सूट, स्लीवलेस टॉप्स पहनने का उसे चाव था जो उसके निख्खर रंग पर खूब फबते। वो 'अपर क्लास' लगती थी|
अजी हमउम्र सहकर्मियों की बात छोड़िये। पत्थर जैसे चेहरे वाले अधेड़ मैनेजर्स, कम-उम्र ट्रेनी, कैफेटेरिया वर्कर्स, दरवाजे पर खड़े गार्ड्स , सबके टेटुए उसके दीदार को ऐसे घूमते जैसे उषा का टेबल फैन!
हर आंख उसकी ख्वाहिशमंद होती |
उसे काम मे थोड़ी भी अड़चन आती तो मदद करने वालो की कतारें लग जाती| 
पर तनु ये सब एन्जॉय करती ।इस तरह नज़रों में भरे रहकर भी बेपरवाह हो जीने का हुनर उसने सीख लिया था |  होनहार थी ,मन लगाके काम करती |

समय बीता, धीरे धीरे उसका व्यवहार निखरा |
एक दिन ऐसे ही हल्के फुल्के मूड में वो अपने वाइड स्क्रीन फ़ोन पर, जिस पर पर्पल रंग का कवर चढ़ा था, उंगली नचाती हुई बोली:" देखो सात्विक, ये लड़का मेरे घर तक पहुँच गया था, खुद ही शादी का प्रस्ताव लेकर| यहीं गुड़गांव में जॉब करता है।"
"और ये ,ये.." उमंग में वो सात्विक की तरफ झुक आयी थी।
" ये कॉलेज में था। बोलता था, नही मानोगी तो सुसाइड कर लूंगा। अभी तक जिंदा है। शादी भी कर गया!"
इसके बाद उसने करीब दर्जन भर , कुछ सजीले तो कुछ औसत, कुछ पढ़ाकू तो कुछ अफ़लातून टाइप, इस तरह के लड़कों की तस्वीरें दिखाई।
वो उन सबको सहेज कर अपनें मोबाइल में रखती थी।
उन लम्हों में उसके चेहरे की भाग-भंगिमा ऐसी थी जैसे सवाना के मैदान का कोई 'ट्रॉफी-हंटर' अपने द्वारा शिकार शेर, चीते, भालू, सियार, लोमड़ इन सबकी मुण्डियों की नुमाइश करता हो| 
पर उन सबमें एक भी तस्वीर ऐसी न थी जिस पर तनु की नज़र ठहरी हो।
वो एक 'दिल तोड़ने की मशीन' थी जो इन सबको और भी न जाने कितनों को रौंदती, नेस्तोनाबूत करती आगे बढ़ती जाती थी।
महत्वाकांक्षी थी , मानक काफी ऊँचे थे उसके |प्यार-व्यार , कसमो-वादों के लिए टाइम नहीं था उसके पास |

समय का चक्का घूमता रहा | ऑफिस में 'फ्रेश रिक्रूट्स' के दो तीन नए बैच आ गए थे इस बीच | पुरुष बेचारे , आदत के मारे , उनकी तबज्जो नवयौवनाओं की ओर मुड़ गयी थीं ।
तनु कभी फुर्सत में होती ,मूड अच्छा होता तो सात्विक की डेस्क पे आ जमती। अठखेलियां करती। काम नही करने देती। बिना वक्त चाय कॉफी के लिए ले जाती। फिर कभी ऐसा होता कि तनु का मूड उखड़ जाता । और ऐसा उखड़ता कि वो हफ़्तों बात ही न करती।
एक बात जो उसे हमेशा खाती रहती थी वो ये कि काबिलियत के लिहाज से वो काफी पिछड़ रही थी। वो घुटन महसूस करती।

सात्विक सीधा साधा , गवई | एकहरा हाड़, मंझले कद का वो पीला लड़का शांत स्वभाव था | 'नौकरी है ,आउर का चईये' इस भाव से उसकी आत्मा तर रहती | उसका मन बस प्यार की मुरादे मांगता , पर साल दर साल यूँ ही बीतते गए |
उफ्फ्फ , एक तरफ़ा चाहत का एक और किस्सा | 
साथ घूमे फिरे, 'सलीमा'  देखा, शहर के तमाम रेस्टोरेंट्स गुलज़ार किये , अनगिनत पार्को के फुटपाथ नापे। पर मजाल है कि गलती से भी हाथ की खाल हाथ से रगड़ी हो। प्यार 'शाकाहारी' ही रहा!
फिर एक दिन वो चली गयी। रास्ता बदल लिया |
ऊँचे  सितारों में खुद को स्थापित करने की उसकी तलब| उसे कौन बाँध पाता|

सरल दिमाग सात्विक उसे भूल नही पाया। बल्कि इस तरह से तनु के अचानक रास्ता काट चले जाने से उसका जुनून और भी बढ़ गया।
रात को खा पी सात्विक हल्की टीशर्ट और कैपरी डाल बिस्तर पर लेटता।
पुराने तकिये को दुहरा मोड़ सिर तले लगाया होता।बैड से सटी दीवार पर वो पैर थोड़ी ऊंचाई पर जमा देता।
उसकी आँखें छत को घूर रही होती और वो बिना किसी प्रयोजन उंगलिया चटकाता रहता।
तनु के चेहरे पर सजा हर छोटा-बड़ा तिल उसे याद आता ।
उसका ऊपरी होठ कैसे किनारे से पतला और बीच में आकर ऊपर की ओर उभरा हुआ था |
निचला होठ कमानीदार , किसी पान के पत्ते जैसा , ऊपर के होठ से काफी भारी , संतरे की फाख सा रसीला !
तनु का गला कितना पारदर्शी था। गोरी-मक्खन चमड़ी में गुंथी नीली नसे कैसे गालों के नीचे से निकल गले को नापती हुई उसके वक्षस्थल की ओर जाती थी।
वो सोचता कि नसों का ये जाल स्तनों की ओर जाता हुआ सिकुड़ता जाता होगा और अंत मे स्तनों के शिखर के ठीक नीचे पतली शिराएं आपस मे जुड़ जाती होंगी।इस तरह वे जिंदा , सांस लेते , अधखिले गैंदे के दो फूलों की शक्ल अख्तियार कर लेती होंगी!
सात्विक तनु की मैनीक्योर उँगलियाँ, अपनी उंगलियों में फंसी होने की कल्पना करता।
ख्याली पुलावो के लिए रात छोटी पड़ती!
हकीकत और सपने रेल की दो पटरियों से सपाट दौड़ते। हमेंशा साथ साथ, पर बिना मेल हुए।

कभी कभार तनु का फ़ोन आता।
उसकी भाभी एक दुष्ट डायन थी। जो उसकी माँ को जहर देकर या 'औघड़ बाबा' से कुछ टोटका करवा कर मरवाना चाहती थी।
उसका भाई कभी 'सोने का आदमी' हुआ करता था। पर 'डायन' के चक्कर मे पड़ बुजदिल हो गया था। हाँ ,उसके भाई के हाथ मे कोई ताबीज़ बंधा था जो उसकी भाभी मायके से लाई थी| 
नए आफिस में लोगबाग कितने 'मीन' थे। उसे वो पहचान नही मिल पा रही थी जिसकी वो हक़दार थी। उसे उम्मीद से काम 'सैलरी हाइक' मिला था |
बस इत्ता सुकून था  कि वो 'लेटेस्ट टेक्नोलॉजी' पर काम कर रही थी , ग्रोथ के चांस अच्छे थे | उसे आगे, बस आगे और बहुत आगे जाना था |
सात्विक उसे कुरेदता भी |मोहतरमा करियर , जॉब, अप्रैज़ल से अलग भी एक दुनिया है , प्यार की दुनिया |  पर लड़की के अंदर से महत्वाकांक्षा की परतों, और शिकायतों के अम्बार के अलावा कुछ न निकलता |
वो  छोटी  छोटी बातों पर रोती।मन हल्का करती, आगे बढ़ जाती।
सात्विक का किरदार नाक पोछने वाले रुमाल जैसा हो गया था।
धीरे धीरे राब्ते कम होते गए। कभी कभार तनु किसी चमकीले धूमकेतु सी नुमाया हो जाती और फिर लंबे घुप्प अंधकार में लापता।

जमना जी में बहुत पानी बह चुका था | सालों बाद उसका मैसेज आया | कई सालों बाद |
उसने इतना भर लिखा: "?"
" हाँ जी, क्या हाल? " सात्विक ने जबाब दिया |
"अरे , तू इधर ही है , दिल्ली में?"
"हाँ , मैं तो साल भर से इधर ही हूँ | "
फिर वो झूठमूठ का नाराज होने का नाटक कर बोली" बताना नहीं था , कब आया विदेश से वापस?"
"तूने  कभी पूछा नहीं | "
"चल छोड़ , यूँ कर , कल सैटरडे है , मिलते है | "

कैब से मॉल की तरफ जाता हुआ सात्विक उसे ही सोच रहा था |
तनु उससे अगर एक दो साल छोटी भी हुई , फिर भी उसकी उम्र तैंतीस-चौंतीस के बीच में कही झूलती होगी |
तैंतीस-चौंतीस साल की उम्र और कुँवारी ! ये स्थिति किसी आपातकाल जैसी होती है |  समाज द्वारा पैदा की गयी इमरजेंसी| 
सोच रहा था कि तनु से उन सब बातों का चर्चा तक नहीं करेगा जिनसे वो रोज कुश्तमकुश्त होती होगी : शादी की बातें , बच्चों और परिवार की बातें |

वो जानता था इस उम्र तक गैर-शादीशुदा होने की जद्दोजहद |
जानता था कि तनु की माँ ने अब लड़ना छोड़ दिया होगा | हाँ , वो अब सप्ताह में एक दिन की बजाय अब दो दिन व्रत रखती होगी |मंदिरो के चक्कर काटती होगी |
उसके रिश्तेदार कोई भी बेमेल सा रिश्ता सुझा , तनु को तलब कर जाते होंगे | 
उसकी दादी अगर अभी तक बची होगी तो हर दूसरी बात में अपनी मौत का जिक्र लाती होगी |
उलाहना देती होगी कि किस तरह उसकी आत्मा प्यासी ही परलोक गामी होगी |
उसके कजन्स हमेशा उससे कुछ न कुछ महंगे गिफ्ट की आस लगाए रहते होंगे |
सब दोस्त, रिश्तेदारों को ये लगता होगा कि इस लड़की के पास बहुत पैसा है जो यूँ ही बिना इस्तेमाल व्यर्थ पड़ा हुआ है |

ऑफिस में , अपार्टमेंट बिल्डिंग में नए कम-उम्र लड़के अपने 'डेब्यू ' के लिए उसे उपयुक्त और आसान शिकार समझ दुःसाहसी हो जाते होंगे |
शादी-शुदा , रिश्तों में घुटते पुरुष सहकर्मी तनु से कुछ पल के ताज़ा एहसासो के गुजारिशमंद रहते होंगे |
दो दो बच्चों के बाप और ऐसे ऐसे लोग जिनकी जवानियाँ भी उनसे हाथ छुड़ा रही होंगी ,  तनु को देख उनकी उम्मीदें भी खिल जाती होंगी |
और फिर बात बनती न देख ऐसे ऐसे लोग खीज में उसे 'ठंडी औरत' करार देते होंगे| 
क्रूर है ,पर आदतों में बंधे लोगों से देवता बनने की उम्मीद ?
पर एक वो संजीदा इंसान, वो अदद सच्चा इंसान कहाँ है ? शायद कोई है ही नहीं | तनु का मन कभी निराश हो कहता होगा |

मॉल के टॉप फ्लोर पर ईटिंग आउटलेट्स थे | हल्दीराम में काफी भीड़ थी | अच्छा हुआ , सात्विक पहले आ गया | उसने किनारे की दो सीट कब्ज़ा लीं थीं | 
तनु आयी | पीले रंग के टॉप में , नीली जीन्स पहने | जँच रही थी | उसके चश्मे का फ्रेम ,जो पहले चौकोर हुआ करता था , गोल हो गया था |
वॉइलेट कलर का बड़ा हैंडबैग उसने टेबल पर रख दिया और बड़ी चौड़ी सी मुस्कान लिए बोली"  अरे तू तो वैसा ही है , बाहर जाकर भी नहीं बदला | "
"नहीं यार , पहले से तो ज्यादा हैंडसम लगने लगा हूँ | " बालो में हाथ मार सात्विक भी हंसा |
"हाँ , शादी के बाद आदमी की अपील बढ़ जाती है " वो खिलखिला रही थी |
सात्विक उसे गौर से देख रहा था | वो अभी भी सुन्दर थी पर बदलाव नुमाया थे | उसका चेहरा पहले से भारी हो गया था | बाल लम्बे , केमिकल बॉन्डिंग किये हुए, स्टेप कटिंग में  |  किसी अच्छे शैम्पू की खुशबु से आस-पास की हवा तर हो गयी थी |

"सुना फिर , कहाँ कहाँ , घूमा तू इस बीच | फैमिली  का बता | " तनु बोले जा रही थी और सात्विक उसके वर्तमान के अक्स को ,भूत से तौल रहा था |
वे जब साथ थे , उसके ऊपर के होठ के किनारों  पे बारीक रोयां ऊगा होता था जो उसके कमसिन होने का अहसास देता था | आज उसके होंठ के किनारे चिकने और हलके नीले थे | उसके होंठ  के ऊपर बाई तरफ जो तिल था वो अब पहले से बड़ा हो गया था |

" क्या , तू थाईलैंड भी घूम के आया है | खूब मस्ती की होगी फिर तो | मसाज करा के आया होगा | क्यों ?"उसने अपनी कोहनियाँ  टेबल पर टिका दी थी और सात्विक के चेहरे में ऐसे देख रही थी जैसे सारे राज पढ़ डालेगी | वो कितना खुल गयी थी | उम्र के साथ स्त्रियां ऐसी हो जाया करती है | झिझक जाती रहती है |
"नहीं , ऐसे ही ग्रुप टूर , 'बीच' अच्छे है वहाँ के | "
वो हल्का गुस्सा हुई " जाने दे , जानती नहीं मैं | मेरे ऑफिस के 'जेण्ट्स' का भी आये दिन थाईलैंड जाने का ही प्लान बनता रहता है | "
वो शांत हुई , चेहरा ढीला हुआ तो सात्विक ने फिर गौर से देखा | तनु अपना ख्याल रखती थी पर एक दरमियानी सी  डबल-चिन अब अपनी जगह बना रही थी |
अह्ह्ह .. , वो.. वो नसें  जो गले से निकल उसके वक्ष स्थल को जाती थी ,कहाँ थीं , डूब चुकी थी |  
मिनरल वाटर की बोतल मुँह में उड़ेले वो पीछे की ओर लचकी  | उफ्फ , जालिम वक्त .. निगल गया वो गेंदे के फूल ,निष्ठुर ..| 
ओह मृगनयनी , जवानी महत्वाकांक्षा की भेट कर दी ! बिना जिये ही ?
फिर उसके मन में आया , औरत का शरीर भोग वस्तु ही है क्या? इस तरह से दिखावट के आधार पर ही इंसान को तौलना सही है क्या ? पुरुष-प्रधान समाज में देखो वो कैसे सफलता की सीढिया चढ़ती चली गयी | देखो , देखो वो कितना ऊपर पहुंच गयी | ट्रेनी , जूनियर प्रोग्रामर , सीनियर डेवलपर , टीम लीड , प्रोजेक्ट मैनेजर .....| अद्भुत , उदहारण देने  योग्य !
'दुष्ट -सज्जन' का ऐसा द्वन्द उस पुरुष के मन में चल रहा था |

"दो नार्थ इंडियन वेज थाली" आर्डर दे सात्विक अपनी कुर्सी पर आ जमा था |
चमकीले ,ब्लैक महंगे फ़ोन पर, जिस पर कोई भी कवर नहीं चढ़ा था, उंगली नचाती हुई तनु बोली:" देख तो , ये लड़का कैसा रहेगा ?"
और जोर से हॅसते हुए उसने फ़ोन सात्विक की ओर बढ़ा दिया था |
"लड़का ?" वो एक अधेड़ आदमी था , सिर से फसल गायब थी | चेहरा किसी ज्यादा नमक खाये बकरे की तरह फूला हुआ था |  
"यू एस  में प्रोजेक्ट मैनेजर है |"
" हम्म "
"अब ऐसा ही मिलेगा मुझे , तूने तो कभी बोला नहीं |  " वो हंसी दबा रही थी |
सात्विक के चेहरे पे गुस्सा उभर आया था | उसने गर्दन तिरछी की , आँखे छोटी की "अच्छा?"
साफगोई की कोई जरूरत ही क्या थी | दोनों जानते थे |

उस काल में , जब वो एक दूसरे के हो सकते थे , एक दिन ऐसा भी आया था जब वैलेंटाइन के दिन वो बेचारा फूलों  का गुलदस्ता लिए 'प्रीत विहार ' के बस स्टैंड पर खड़ा रहा |  एक के बाद एक ब्लू लाइन बसें आती रहीं |  वादा करके भी वो नहीं आई | और शाम को उसने इतना बोला " सॉरी , नींद आ गयी थी यार | " क्रूरता की पराकाष्टा थी वो | 

"मुझे पता था , वो नहीं आएगी | " शाम को यमुना ब्रिज पर नीचे पैर लटकाये दोस्त बल्ली ने कहा था | सात्विक बीच में बैठा था और  बायीं तरह नंदन |
इंसान के रोज रोज के बलात्कार से कराहती जमुना घिसट रही थी | गाढ़े काले पानी में पॉलिथीन , फूल माला , केमिकल के झाग , जलकुंभी , कागज में लपेटे हुए मुंडन के बाल , इस्तेमाल किये हुए कंडोम , पुराने त्याज्य लत्ते कपडे , सब कुछ , एक दूसरे से रगड़ता हुआ बहा जा रहा था |
ब्रिज में बीच -बीच में छिछले गतिरोधकों की श्रंखला थी | उन स्पीडब्रेकरो से गाड़िया गुजरती जाती | धड़ धड़ , धाड़ धाड़ .....| महीन कंक्रीट उड़ कर उन तीनो की कमरों से टकराती |

"मैं कूदूंगा नहीं | " सात्विक ने  कहा | सात्विक को दबा के बैठा नंदन खूब ऊँचा हंसा |
"कूद जा , मेरे कद्दू से " नंदन कठोर शब्दों में बोला |
सिगरेट का लम्बा कश खींच बल्ली बोला " देख , उसकी लाइफ की अपनी वरीयताएं है | फिर उसकी उड़ान का कर्व देख और अपनी उड़ान देख |  यार वो अपने से ज्यादा सक्सेसफुल आदमी ही देखेगी न| हुँह ... "

एक आदमी की ट्रेजेडी में दूसरा आदमी अपनी मस्ती ढूढ़ता है | नंदन बोला "फिर ये साला , लगता भी तो मज़दूर टाइप ही है न | शकल देख , चूसा हुआ आम | और आँखे देख |
हरकते छोड़ेगा तू ?"
" एनडूरा  मॉस(वजन पुष्टिबर्धक) खा|  "
फिर थोड़ा संजीदा होते हुए बोला "भाई तेरे नीचे 'यामाहा अफ ज़ी'  होती न , तो वो आती |" नंदन का इशारा अच्छी सी बाइक की तरफ था |

बल्ली थोड़ा उखड गया था " ये सब फ़ालतू की बातें है | "
उसने सिगरेट वाला हाथ ब्रिज के किनारे से लटका दिया था |
"इट डजंट मैटर| "
" वीमेन मेरी आ लाइफस्टाइल , नॉट अ  मैन | "  हमेशा याद रख |
"उसे तुझ में वो पोटेंशियल नहीं दीखता | साफ़ सीधी बात | "
बल्ली अब से नहीं कॉलेज टाइम से सिगरेट पीता था और सिगरेट पीने वाले लड़को की समझ (कम से कम  लड़कियों के बारे में ) सटीक होती है | सात्विक को सहारा देने वाले कंधे थे |  

बटर-नान को टीशू से दबाती हुई तनु बोली " कहाँ खो गया ? कैसा रहेगा पेयर ?"
"अह्ह्ह , कम ऑन, लाख बेहतर मिल जायेगे |"
"बात रंग रूप की नहीं है , सात्विक | अभी इन भाई साब से तीन या चार बार बात हुई है |
इनका इंटरेस्ट सिर्फ और सिर्फ मेरे पुराने अफेयर जांनने में है | "
बोलता है " ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम्हारा कुछ रहा न हो| "
"फिर उससे भी आगे  - अच्छा ये बताओ , तुम्हे किस पोज़ में प्यार करना अच्छा लगता है !"
"चार बार बात हुई है हमारी | "
सात्विक को उस बकरे जैसे आदमी से घिन हो रही थी | इंसान बूढा हो जाता है , फितरत नहीं जाती |
तनु की उंगलिया फ़ोन पर नाच रही थी " इसे देख , खुद निचुड़ा हुआ नीबू है ,लेकिन लड़की वर्जिन चाहिए | "
" और ये , दो बार बात करके ही , इसे मेरा व्हाट्सप्प ऑफ चाहिए | सिर्फ और सिर्फ शाम को खोलू जब ये जनाब फ्री हों |"
पके बाल , फूली गर्दन , घड़े जैसे पेट लिए ऐसे ऐसे मर्द और सोच देखो , ख्वाहिशे देखो |
सात्विक को लगा जैसे तनु पूरी मरद जात का चिट्टा उसके सामने खोल रही हो | और वो बिना कसूर शर्मिंदा हुए जा रहा था | 
" ऐसे किसी बन्दे के साथ रहने से  अच्छा है , एक डॉगी पाल लूँ" और वो खूब ऊँचा हंसी | दर्द का एक रेशा तक उसके चेहरे पर नुमाया न था | उसने दुख को चेहरे की परतो में गहरा , खूब गहरा दबाना सीख लिया था | 

पर सात्विक गुस्सा तनु पर भी था | 'ऊपर' , बहुत ऊपर जाने की चाह में ही उसने ये अंजाम चुना था |
अब समाज की व्यवस्था के अनुरूप क्यों जीना चाहती है |
जिए अपनी लाइफ | लिव इन , यूज़ एंड थ्रो , मनी , पावर , नो स्ट्रिंग अटैच्ड .....
शिकायत ही क्यों है ? फिर उसका किरदार... उसने किसे तरजीह दी ?

वेटर ने खाने की थालियां हटा दी थी |
अब उनके सामने दो सफ़ेद प्लेट्स में  रसमलाई थी |
गाढ़ी गुलाबी रबड़ी  में डूबी , पिस्ते में गुंथी रसमलाई , जिसमे केसर के कुछ तिनके बुरके हुए थे |
चाँदी सी सफ़ेद चम्मचे रबड़ी में डूबी हुई थी |

कुर्सी एडजस्ट करता हुआ सात्विक बोला "अच्छा , एक बात पूछूँ ? "
"हाँ , पूछ ना? "
"चल जाने दे |"
"अबे , पूछ ना| "
"सच बताना , आर यू स्टिल अ वर्जिन ?"

रसमलाई से चम्मच  लबालब भरी हुई थी | सीने के सामने तनु ने चम्मच रोक दी |
सात्विक की तरफ उसने देखा , न कोई गुस्सा , न कोई दूसरा भाव |
फिर धीरे से उसने वो चमच्च अपने मुँह में डाल ली | फिर एक दो और चम्मच डालीं |
अपना मोबाइल उसने अपने हैंडबैग में डाला और बोली" अच्छा सुन , मुझे काम है , मैं निकलती हूँ |"

"अरे अचानक, बुरा मान गयी क्या ?"
"नहीं , मुझे कुछ काम है | "
"तनु , ये सही नहीं है , ऐसे कैसे... "

तनु लम्बी डिग भरती हुई एस्केलेटर तक आ चुकी थी |
"तनु!"
तनु का चेहरा मारे गुस्से के बलबला रहा था " ऐसे कैसे पूछ सकता है तू ?"
"अरे..."
"नहीं, ऐसे कैसे पूछ सकता है तू ?"
सात्विक को एहसास हुआ था कि उसने एक खुले जख्म पर जाने अनजाने हाथ रख दिया था |
इस तरह के सवाल ही तो उसकी आत्मा को रोज रोंधते होंगे |
विडंबना , यही आदमी घण्टे भर पहले बड़ा समझदार,मंझा हुआ ,संवेदनशील होने की हुनक भर रहा था |
एस्कलेटर पर वो आधा उतर चुकी थी ,मुड़ी और बोली " कभी भी मैसेज मत करना |"

वो आंधी तूफ़ान सी चली जा रही थी | मॉल के मुख्य निकास   पर वो थोड़ा ठिठकी और फिर निकल गयी |
सात्विक को ऐसे लगा जैसे वो मुड़ेगी और जोर से चिल्लायेगी " सब एक जैसे ही हो तुम लोग | फिल्थी डॉग्स | "

                                                                                                               - सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                                                      7 जून 2019
                                                                                   

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...