शुक्रवार, 14 जून 2019

आखिरी दांव


I
काली अमावस से पिछली रात ,उस हवेली में सब बड़े आराम में थे | एक मै ही था जो उस तंग , बौने पायें  वाले खटोले में करवटें बदल रहा था | ठीक उसी दिन दोपहर में , गांव के बाहर खदाने में , जहाँ गांव के तमाम लोग कूड़ा फेंकते थे , एक काला नाग , ऊँचे दरखत पर चढ़ कऊओं के अंडे खा गया था |
खटोला , जिसे मैंने भाइयों से लड़-झगड़ कर कब्जाया था , उसमे फंसा मै किसी कोवे के अंडे जैसा महसूस कर रहा था |
जब रहा नहीं गया तो मै बोला " माँ , एक बात बताओ , जब सांप ऊँचे नीम पर चढ़ सके है , तो चारपाई के पाए तो बहुत छोटे होवे हैं !"
माँ बड़े आश्वस्त स्वर मे बोली " ना लल्ला , साँप खाट-खटोलो पे ना चढ़ा करते | "
"पर क्यों ?" जबाब से मै मुत्मइन नहीं था |
थोड़ा दूर पुराने कोठड़े के सामने, निवाड़ के पलंग पर लेटी दादी सब सुन रही थी , बोली " जिस दिंना, कोई सांप खाट खटोले पै चढ़ गया , ठीक उसी दिना सांपो का वंश ख़तम हो जावेगा | ऐसा किसी देवता का वचन है |"
फिर हवेली की सारी औरतों और बच्चो को चुनौती देती हुई दादी बोली " कही भी , किसी सांप के खाट पर चढ़ने की बात सुनी हो तो बताओ| "
सचमुच किसी ने नहीं सुनी थी |
यानी खटोले के किले मे मै सुरक्षित था !
गांव के बाहर जोहड़ के किनारे भंगियों के कच्ची भीत, पक्की खपरैलों के कुछ मकानों का छत्ता था | उन घरों मे शायद कुछ मेहमान थे उस रात | करीब आधे घंटे चिंघाड़ने के बाद सूअर अब चुप था | घरों  के बगल में टीकरी पर , लोहे के सरिये में धंसा साबुत जानवर आग की लपटों मे भुनता , अब गुलाबी हो चला था | कोई आधा फर्लांग की दूरी पर , रास्ते के किनारे, मोहल्ले  के कुछ शराबी-कबाबी खुसर-पुसर बतिया रहे थे | खुद को ऊँची जात मानने वाले उन आदमियों मे से कोई भंगियों से सूअर का गोश्त मांगने जाने वाला था |
ये पहली दफा नहीं था | ऐसा करते हुए ये चटोरे लोग पहले भी पकडे गए थे | जब किसी 'समझदार' ने इन्हे ऊँची जात का हवाला दे दुत्कारना चाहा तो इनमे से कोई बड़ा गुमान लिए बोला था " जिसने ना खाया सूरा , ऊ हिन्दू ना है पूरा !"
और मामला रफा दफा हो गया था |
एक बैल गाड़ी चली आ रही थी | हाँकिया बैल को धमकाता " चल भी ले , म्हारे ससुर के | कसाई कै कटवाऊ तुझे | "
बैल कुछ तेज चले पर हाँकिया हड़बड़ाया हुआ था | उसने बांस की पतली लकड़ी मे धंसी कील को एक बैल के पिछवाड़े मे ठोंक दिया | मारे दर्द खड़ंजे पर पैर पटकते बैल भाग निकले |
एक बूढी औरत की आवाज़ आयी " ले चलो रे , जल्दी ले चलो | मेरा लाल , मेरा जिगर का टुकड़ा | आहहह .. हाय रे .. हाय| "
बूढी दादी के पैरो मे जैसे इस्पात के स्प्रिंग लग गए हो " चौधरन चौधरन | "
चिल्लाती हुई दादी दरवाजा खोल गली मे आ गयी | उसके पीछे पीछे हमारी सारी पल्टन |
बैलगाड़ी आगे निकल गयी थी | दो तीन जनें  उसके पीछे रोते हुए लपकते चले जा रहे थे |
आगे जाकर शराबियों की टुकड़ी ने बैलगाड़ी को थाम लिया |
एक नौजवान गाड़ी मे चित्त पड़ा था | उसके मुँह पर एक पुराना, मैला गमछा लिपटा था जिससे बासी , खट्टे दूध की बू आ रही थी |
काका नरपत जो शराबियों की टोली के उस्ताद थे , उन्होंने नौजवान के मुँह से गमछा हटाया और अपने हाथ से उसका सिर डुलाके बोले " जगपाल ओ जगपाल , सुनै है ना | "
कोई प्रतिक्रिया नहीं | उस नौजवान का मुँह आधा खुला था | आँखे बंद थी पर पुतलियाँ  घूम रही थी |
एक हाथ गाडी से नीचे लटका हुआ था तो दूसरा छाती पर जमा था | मैला और सिकुड़ा हुआ घुटन्ना पहने , यूकेलिप्टिस के तने सी मांसल टाँगे ,गाडी के तखत से चिपटी पड़ी थीं  |
रुक रुक कर वो नौजावन ऐसे सांस लेता जैसे बरसात मे कोई भैंसा ज्यादा घास खा गया हो |
काका नरपत हांकिए से मुखातिब हो धीमे से बोले " गुंजायस दिखती हो तो ही ले जइयो भैया |
सुसरे डांग्दर (डॉक्टर) ठन्डे आदमी मे भी सुआ लगा देवे है पैसो के लालच में  | "
काका की बात सुनकर बूढ़ी चौधरन और भी ऊँचा कराहने लगी " ले चलो रे , ले चलो रे जल्दी | मेरा लाल , मेरा लख्ते जिगर | आअह्ह हाय, मुझै मरी कू ना आती रे , हाय..."
माँ का दिल , उसकी ममता |
जगपाल ने फांसी लगा ली थी | किसलिए ? उसकी विहाता ने अपने पीहर से वापस लौटने से मना कर दिया था , इसलिए !


अचानक कुछ नहीं होता , कुछ भी नहीं | भूकंप भी अचानक नहीं आता | धरती के नीचे फँसी चट्टाने एक दूसरे  को रगड़ रही होती है | एक दूसरे को नीचा दिखाने , हावी होने की परिणीति मे धरती डोलती है |
तीन तीन चंट, हर तरह के छल कपट करने वाली बहुओं  को बूढी चौधरन जैसे तैसे बांधती चली आ रही थी | घर का अनुशासन तो उसी दिन उड़न छू हो गया था जिस दिन चौधरी की जिंदगी का कबूतर उड़ा था |
तब से वो बेचारी बूढ़ी, झींकती रोती गाती, जैसे तैसे साझे मे परिवार को चलाती रही |
चौधरी कह गए थे "बेटे अलग हों  तो हवेली के चबूतरे से बाहर तक भी चर्चा न हो | बड़ा पहले अपना मकान बनाये और छोटे उसमें  सहयोग करें  | फिर मंझला | और तब तक खाना सांझे चूल्हे पर ही बने |"
अच्छी खासी जमीन थी | दोनों बड़े खेती मे कमाते |
और सबसे छोटा जगपाल ढोर-डंगरो का दाना पानी करता | दूध दूहता | दूधिये को दूध बेच माँ के हाथ पैसे धरता|
बहुओं  में  छटपटाहट तो बहुत थी पर चौधरी जो कह गए , उस लकीर को कौन लांघे |
पर जब से छोटी राजवती आई, बर्तन भांडे रोज खटकने लगे | इकहरे हाड की सांवली  राजवती बुरी औरत न थी | हाँ वो थोड़ा महत्वकांक्षी थी | बड़े चींटी की मानिंद रेंगे तो रेंगे , भला वह  क्यों उनके चक्कर मे पिछड़े ?
वह  खेत क्यारी अलग कर अपने हिसाब से काम चाहती थी |
फिर उसके जेठ सुबह शाम ही तो खेतो मे होते , दिन मे अपनी अपनी जनानियों संग कमरों मे पड़  सुस्ताते | और उसका हलंता सुबह से लेकर रात तक भैंसो के पिछवाड़े साफ़ करता ! उसके चौड़े  कंधे और उनसे जुड़े  किसी पेड़ के तने जैसे मजबूत हाथों  मे खली (मवेशियों का चारा) की भारी बाल्टियां लटकी ही रहतीं  |
जगमाल घर का ही काम न करता | असल में वह  एक ऐसे पालतू भैंसे जैसा था जिसे मुहल्ले  वाले भी गरज़ पड़ने पर अपने अपने काम मे जोत लेते |
पूरे गांव मे किसी का भी छप्पर छाया जाता तो जगपाल की ढुँढ़वार होती |
और वो गवरू मोटी सी टेक ले पूरी ताकत लगा एक सिरे से अकेला ही छप्पर उठा लेता |
उसके रूखे , झाड़ू जैसे बालो मे कूड़ा करकट घुस जाता | फूस की सूखी पत्तियों से हाथो मे चीरे लग जाते | और वो मुस्कुराता हुआ काम निपटा बदले मे एक गुड़ की डली खाता मस्त सांड सा लम्बी लम्बी डग भरता चला आता | उसकी छोटी आँखे चमकती और दरमियानी गोल नाक के नथुने फड़फड़ाते |
कौन औरत बर्दाश्त करेगी ये सब?
"अय्यो मति लिवाने , मै नाय  आउ अब " गेहूँ की फसल से निपट जब राजवती अपने पीहर गयी तो ये बोल कर गयी |
और जगपाल बाहर से नकली गुस्सा तो अंदर से बहुत सारा प्यार लिए बोला " मति आइये , इहा कौन भूखा है तेरा , मेरे ससुर की !"
पर राजवती मन पक्का करके गयी थी |
पंद्रह दिन पीछे जगपाल पहुंच गए लिबनहार | माँ और बेटी दोनों ने इतनी सुनाई, इतनी सुनाई कि कथा सुनते सुनते रात से भोर हो आई |
सुबह फिर गुजारिश की तो सास बोली " नाय भेजू , जब तक वो डंकनी (दोनों बड़ी जेठानी ) उस घर मे है , नाय भेजूँ  |" थका हारा नौजवान चला आया |
माँ से किस्सा सुनाया तो माँ बोली " अब तो चला गया , अब से आगे न जइयो | अरे , नाक रगड़ती हुई आवेगी | देखियो | चुप्पी चान पड़ा रह तू | रोटी खा , मौज कर | मै भी देखूं , कब तक ना आवेगी |पीहर मे भी भला किसी का गुजारा हुआ है आजतक | "
और भाभियाँ ? भाभियाँ के सुकून की तो खबर ही ना पूछो !
पर मरद की जिंदगी मे उसकी औरत की कमी कोई और पूरा कर सकता  है क्या ?
फिर अभी बिहा को डेढ़ साल ही तो हुआ था | कोई बच्चा भी न था |
पंद्रह दिन और बीते | पड़ोस की एक औरत  जो राजवती के ही गांव की थी , अपने पीहर को जाती थी | जगपाल ने रोक लिया " ओ भाभी , ओ भाभी , खादर कू जाओ हो क्या ?"
फिर कुछ दूर उस औरत के साथ साथ चल जगपाल धीमे से लालच देते बोला " छड़ी के मेले कू गाडी जोड़ूंगा मै भाभी | कह दीजो | उसकी बात सर माथे रखूँगा !"
और प्यारी भाभी ने बड़े भरोसे से कहा " धीरज रखो देवर , संगी लेती आऊंगी  "
जगमाल ने सड़क के किनारे कि पाखड़ तले खूब इंतज़ार किया | निठल्लो की चौकड़ी संग खूब ताश खेले | खूब चिलम धुआँ किया |
उसकी आँखे टकटकी बाँध सड़क पर जमी रहीं | राजवती नहीं आई |
जगमाल की छटपटाहट बढ़ती ही जा रही थी | घर मे उसकी औरत का जिक्र तक न होता था |
मर्द का दिल दिन रात रोता था |
उसने काका नरपत को तैयार किया | कहलवाया "पीर की हाट उजड़ने से पहले नहीं आयी तो मरा मुँह देखेगी | जिन्दे पे ही आ जा , नहीं तो मेरे सीने पे चूड़ी तोड़ने आएगी|  "
नतीजा ? राजवती नहीं आयी !
उस शाम जगमाल ने मोहल्ले के शराबियो के साथ कच्ची बसंती पी , आम के अचार और कच्ची प्याज़ की गोल कतरनों के साथ |
देर से घर पंहुचा तो माँ ने डाट दिया |
कमरे मे जा वो बेचारा नौजवान खटिया पर निढाल सा पड़ा रहा |
खटिया पर कुछ लत्ते बिखरे पड़े थे | एक साडी थी , पुरानी साडी जिसे राजवती घर के काम करते हुए पहनती थी | गुस्से मे जाते हुए नार लत्ते कपडे बिखरे छोड़ गयी थी |
उसने साडी किसी तकिये की भांति गुड़मुड़ कर सिर तले दबा ली | साडी में  राजवती की देह की खुशबु ने उसे पागल सा कर दिया | विरह की वेदना में  पड़ा वो नौजवान घंटो तडफता रहा | अचानक वो बिजली की फुर्ती सा उठा , किबाड़ की सांकल लगाई और फिर उसी साडी मे फंदा लगा, छत के कुंडे से लटक गया | घहघहघह ... किसी जानवर के घुटने जैसी आवाज हुई और हवेली मे हल्ला मच गया |
III
पुरानी पाखड़ तले ताश खेल खेल , निठल्ले शराबी उकता गए थे | दोपहर अभी लम्बी थी |
गजुआ ताऊ , जिनका निकम्मे और बिगडो की टोली मे काका नरपत जितना ही ओहदा था , उन्होंने बच्चों की टोली को बुलावा भेजा |
हम आठ दस लड़के अर्ध चंद्राकार गोले मे खड़े थे | गोले को पूरा करते एक तरफ गजुआ ताऊ बैठे थे | तोतई नाक के नीचे पतली और नीचे को लटकी मूछों  को उन्होंने इत्मीनान से खुजलाया |
फिर कमची से जमीन मे एक वलय खींच दिया | वलय के ऊपर तीन बिंदु बनाये |
फिर हंसी दबाते हुए बोले "बालको , चलो आज मजे करते है !"
"क्या ?" एक साथ कई बारीक स्वर गूंझे |
"चलो आज खरमहुआ पकड़ते है | "
खरमहुआ एक प्रकार की जँगली  चिड़िया जो मुर्गे से कुछ छोटी होती है | कुछ काले कुछ गाजरी रंग की ये चिड़िया बमुश्किल तीन उड़ान भर पाती है | इसका मांस मुर्गे जैसा , पर थोड़ा खट्टा होता है |
खेल खेल मे गजुआ ताऊ अपनी जीभ के चटान का सामान  जुटा रहे थे !
किसी सेनानायक की तरह हमें  समझाते हुए वे  बोले " देखो , खरमहुआ पहली उड़ान झील के खेतों  की तरफ से भरेगा | हम धावा देंगे | पहली बार पंछी गिरेगा दूधियों  के ट्यूबवेल के आस पास |
आराम न पकड़ने पाए | हम फिर धावा देंगे | दूसरी बार पंछी गिरेगा धर्मा के खेतो के आस पास |
हम दबाब बनाते रहेंगे | फिर तीसरी और आखिरी उड़ान मरघटियाई के आस पास ख़तम हो जाएगी |
बस , काम ख़तम !"
पल्टन की ब्रीफिंग ख़तम कर गजुआ ताऊ अपने तहमद की एन्टी से बीड़ी निकाल सुलगा रहे थे |
एक बुजुर्ग जिसने नील लगा कुरता और फेट की धोती बाँधी थी , पाखड़ के पास से गुजरे |
ताऊ की तरफ दायाँ हाथ उठा बुजुर्ग ने ऊँची आवाज़ मे बड़े जोर से कहा " राम राम साहब | "
बुजुर्ग के बाए हाथ मे एक पारदर्शी थैली थी , जिसमे दर्जन भर , अच्छे पके हुए , बड़े बड़े केले थे |
उन केलो को देख मुझे याद आया कि उन गर्मियों की  छुट्टियों मे एक भी रिश्तेदार हमारे घर नहीं आया था | वे  जगपाल के ससुर थे |
पीछे पीछे राजवती चली आ रही थी | जून की तपती दुपहरी मे उसने बड़ी भारी और चमकीली साडी पहनी हुई थी | लम्बा घूँघट काढ़ा था | उसके कंधे अपराध बोध में  झुके थे | ऐसा लगता था जैसे किसी रोग ने उसकी सारी जान खींच ली हो और वो बेचारी रोने का दम भी न रखती हो |
ससुर साब परिवार के किसी बच्चे के हाथ में केले की थैली थमा बाहर की तरह बने दालान की ओर मुड़ गए |
"आ गयी कुलटा , आ गयी मुँह दिखाने | बेशर्म | नीच जात | भंगी की औलाद | " जगपाल खाट पर चित पड़ा था , पड़े पड़े ही फड़फड़ाया |
उसका गला सूजा हुआ था औऱ उस पर बुझे हुए चूने औऱ शहद का लेप लपटा था | बाजु वाले सूती बनियान औऱ तहमद मे वो किसी चोट खाये सांड सा फनफना रहा था |
राजवती कुछ भी ना बोली | चुपचाप सासु के पाँव लगे |  जेठानियों से गले मिली औऱ अपने कमरे मे घुस गयी |
कपडे बदल बाहर निकली तो उसकी सासु ने उसका दुप्पटा पीछे से पकड़ लिया |
"अब क्यों आयी है यु हरामन, पूछ तो इससे | " जगपाल माँ की तरफ देख गुस्से मे फड़का |
राजवती सासु की तरफ मुड़ी तो चौधरन बोली " चिकना है , रपटना लगे है तेरा दुपट्टा| छापा अच्छा है औसे!! "
"नीलोफर दुपट्टा है माँ , बिलकुल भी रपटना ना है !" राजवती ने जबाब दिया था |
फिर उसने अपना बैग  खोल झमकीली ओढ़नी अपनी सासु की गोद मे लाकर रख दी |
घरवाले काम काज मे लग गए | राजवती कुछ सामान ढूँढ़ती  जगपाल की खाट के पास से गुजरी तो उसने उसकी बाँह पकड़ ली औऱ फिर बच्चे की तरह नखरे करते हुए बोला " अब भी तो आयी ससुरे  की .. मै तो तब मानता जो अब भी ना आती | "
राजवती का चेहरा सख्त था पर उसकी आँखे डबडबा आयी थी |
जगपाल ने हाथ छोड दिया था औऱ कोहनी से अपना मुँह ढाँप लिया |
कितना गुस्सा करता औऱ किससे गुस्सा करता ?
जिसे वापस लेन के लिए उसने 'दाँव' खेला था , आखिर वो वापस आ गयी थी |

-सचिन कुमार गुर्जर
14 जून 2019

शुक्रवार, 7 जून 2019

फ़िल्थी डॉग्स

उस लड़की में दो 'खामियाँ' थीं।
एक, वो खूबसूरत थी| मतलब काफी खूबसूरत।
दूसरा, वो हिंदी हार्टलैंड की किसी यूनिवर्सिटी ( कम प्रसिद्ध) की टॉपर थी।
अब आप सोचते होंगे , भला खूबियाँ, खामियाँ क्योंकर हुई?
देखिये, खूबसूरती का ऐसा है कि ये अगर सूरत में हो , तो सामने वाले की तबियत हरी करती है। और दिमाग मे घुस जाए तो गुमान पैदा करती है|  दिक्कत वही से शुरू होती है। ज्यादा खूबसूरत इंसान से आप व्यवहार में बराबरी की तबक्को नही कर सकते। क़द्रदान आप ही नहीं ,बहुते होते हैं ।

और पढ़ाई लिखाई में 'नंबर १' होने में दिक्कत ये है कि स्कूल-कॉलेज में जिन्हें आप कमतर आंकते रहे , वो अगर जिंदिगी के पोडियम पर आपके समकक्ष भी दिखें तो आप गैरआराम हो उठते है। 'अंडरएचीवर' होने की टीस आपको घुन की तरह खाती जाती है|
सनकी कहना तो ज्यादती होगी ,पर हाँ इन दो वजुआत के चलते वो लड़की थोड़ी तनुक-मिजाज तो थी ही।

बेबी फेस, दूधिया सफेद रंग,पढ़ाकू चश्मे में वो जब पहलम-पहल आफिस आयी थी तो कई बोले" अरे ,ये स्कूल की बच्ची कहाँ से आ गयी!"
लंबाई कम थी, सुतवा शरीर, कम विकसित स्तन। वो छौने से हिरनी होने की बीच की अवस्था मे थी।
हालांकि वो पोस्टग्रेजुएट करके आयी थी, पर उसका डील-डोल कम उम्र होने का भरम पैदा करता था।चटक रंग के फिटिंग वाले सूट, स्लीवलेस टॉप्स पहनने का उसे चाव था जो उसके निख्खर रंग पर खूब फबते। वो 'अपर क्लास' लगती थी|
अजी हमउम्र सहकर्मियों की बात छोड़िये। पत्थर जैसे चेहरे वाले अधेड़ मैनेजर्स, कम-उम्र ट्रेनी, कैफेटेरिया वर्कर्स, दरवाजे पर खड़े गार्ड्स , सबके टेटुए उसके दीदार को ऐसे घूमते जैसे उषा का टेबल फैन!
हर आंख उसकी ख्वाहिशमंद होती |
उसे काम मे थोड़ी भी अड़चन आती तो मदद करने वालो की कतारें लग जाती| 
पर तनु ये सब एन्जॉय करती ।इस तरह नज़रों में भरे रहकर भी बेपरवाह हो जीने का हुनर उसने सीख लिया था |  होनहार थी ,मन लगाके काम करती |

समय बीता, धीरे धीरे उसका व्यवहार निखरा |
एक दिन ऐसे ही हल्के फुल्के मूड में वो अपने वाइड स्क्रीन फ़ोन पर, जिस पर पर्पल रंग का कवर चढ़ा था, उंगली नचाती हुई बोली:" देखो सात्विक, ये लड़का मेरे घर तक पहुँच गया था, खुद ही शादी का प्रस्ताव लेकर| यहीं गुड़गांव में जॉब करता है।"
"और ये ,ये.." उमंग में वो सात्विक की तरफ झुक आयी थी।
" ये कॉलेज में था। बोलता था, नही मानोगी तो सुसाइड कर लूंगा। अभी तक जिंदा है। शादी भी कर गया!"
इसके बाद उसने करीब दर्जन भर , कुछ सजीले तो कुछ औसत, कुछ पढ़ाकू तो कुछ अफ़लातून टाइप, इस तरह के लड़कों की तस्वीरें दिखाई।
वो उन सबको सहेज कर अपनें मोबाइल में रखती थी।
उन लम्हों में उसके चेहरे की भाग-भंगिमा ऐसी थी जैसे सवाना के मैदान का कोई 'ट्रॉफी-हंटर' अपने द्वारा शिकार शेर, चीते, भालू, सियार, लोमड़ इन सबकी मुण्डियों की नुमाइश करता हो| 
पर उन सबमें एक भी तस्वीर ऐसी न थी जिस पर तनु की नज़र ठहरी हो।
वो एक 'दिल तोड़ने की मशीन' थी जो इन सबको और भी न जाने कितनों को रौंदती, नेस्तोनाबूत करती आगे बढ़ती जाती थी।
महत्वाकांक्षी थी , मानक काफी ऊँचे थे उसके |प्यार-व्यार , कसमो-वादों के लिए टाइम नहीं था उसके पास |

समय का चक्का घूमता रहा | ऑफिस में 'फ्रेश रिक्रूट्स' के दो तीन नए बैच आ गए थे इस बीच | पुरुष बेचारे , आदत के मारे , उनकी तबज्जो नवयौवनाओं की ओर मुड़ गयी थीं ।
तनु कभी फुर्सत में होती ,मूड अच्छा होता तो सात्विक की डेस्क पे आ जमती। अठखेलियां करती। काम नही करने देती। बिना वक्त चाय कॉफी के लिए ले जाती। फिर कभी ऐसा होता कि तनु का मूड उखड़ जाता । और ऐसा उखड़ता कि वो हफ़्तों बात ही न करती।
एक बात जो उसे हमेशा खाती रहती थी वो ये कि काबिलियत के लिहाज से वो काफी पिछड़ रही थी। वो घुटन महसूस करती।

सात्विक सीधा साधा , गवई | एकहरा हाड़, मंझले कद का वो पीला लड़का शांत स्वभाव था | 'नौकरी है ,आउर का चईये' इस भाव से उसकी आत्मा तर रहती | उसका मन बस प्यार की मुरादे मांगता , पर साल दर साल यूँ ही बीतते गए |
उफ्फ्फ , एक तरफ़ा चाहत का एक और किस्सा | 
साथ घूमे फिरे, 'सलीमा'  देखा, शहर के तमाम रेस्टोरेंट्स गुलज़ार किये , अनगिनत पार्को के फुटपाथ नापे। पर मजाल है कि गलती से भी हाथ की खाल हाथ से रगड़ी हो। प्यार 'शाकाहारी' ही रहा!
फिर एक दिन वो चली गयी। रास्ता बदल लिया |
ऊँचे  सितारों में खुद को स्थापित करने की उसकी तलब| उसे कौन बाँध पाता|

सरल दिमाग सात्विक उसे भूल नही पाया। बल्कि इस तरह से तनु के अचानक रास्ता काट चले जाने से उसका जुनून और भी बढ़ गया।
रात को खा पी सात्विक हल्की टीशर्ट और कैपरी डाल बिस्तर पर लेटता।
पुराने तकिये को दुहरा मोड़ सिर तले लगाया होता।बैड से सटी दीवार पर वो पैर थोड़ी ऊंचाई पर जमा देता।
उसकी आँखें छत को घूर रही होती और वो बिना किसी प्रयोजन उंगलिया चटकाता रहता।
तनु के चेहरे पर सजा हर छोटा-बड़ा तिल उसे याद आता ।
उसका ऊपरी होठ कैसे किनारे से पतला और बीच में आकर ऊपर की ओर उभरा हुआ था |
निचला होठ कमानीदार , किसी पान के पत्ते जैसा , ऊपर के होठ से काफी भारी , संतरे की फाख सा रसीला !
तनु का गला कितना पारदर्शी था। गोरी-मक्खन चमड़ी में गुंथी नीली नसे कैसे गालों के नीचे से निकल गले को नापती हुई उसके वक्षस्थल की ओर जाती थी।
वो सोचता कि नसों का ये जाल स्तनों की ओर जाता हुआ सिकुड़ता जाता होगा और अंत मे स्तनों के शिखर के ठीक नीचे पतली शिराएं आपस मे जुड़ जाती होंगी।इस तरह वे जिंदा , सांस लेते , अधखिले गैंदे के दो फूलों की शक्ल अख्तियार कर लेती होंगी!
सात्विक तनु की मैनीक्योर उँगलियाँ, अपनी उंगलियों में फंसी होने की कल्पना करता।
ख्याली पुलावो के लिए रात छोटी पड़ती!
हकीकत और सपने रेल की दो पटरियों से सपाट दौड़ते। हमेंशा साथ साथ, पर बिना मेल हुए।

कभी कभार तनु का फ़ोन आता।
उसकी भाभी एक दुष्ट डायन थी। जो उसकी माँ को जहर देकर या 'औघड़ बाबा' से कुछ टोटका करवा कर मरवाना चाहती थी।
उसका भाई कभी 'सोने का आदमी' हुआ करता था। पर 'डायन' के चक्कर मे पड़ बुजदिल हो गया था। हाँ ,उसके भाई के हाथ मे कोई ताबीज़ बंधा था जो उसकी भाभी मायके से लाई थी| 
नए आफिस में लोगबाग कितने 'मीन' थे। उसे वो पहचान नही मिल पा रही थी जिसकी वो हक़दार थी। उसे उम्मीद से काम 'सैलरी हाइक' मिला था |
बस इत्ता सुकून था  कि वो 'लेटेस्ट टेक्नोलॉजी' पर काम कर रही थी , ग्रोथ के चांस अच्छे थे | उसे आगे, बस आगे और बहुत आगे जाना था |
सात्विक उसे कुरेदता भी |मोहतरमा करियर , जॉब, अप्रैज़ल से अलग भी एक दुनिया है , प्यार की दुनिया |  पर लड़की के अंदर से महत्वाकांक्षा की परतों, और शिकायतों के अम्बार के अलावा कुछ न निकलता |
वो  छोटी  छोटी बातों पर रोती।मन हल्का करती, आगे बढ़ जाती।
सात्विक का किरदार नाक पोछने वाले रुमाल जैसा हो गया था।
धीरे धीरे राब्ते कम होते गए। कभी कभार तनु किसी चमकीले धूमकेतु सी नुमाया हो जाती और फिर लंबे घुप्प अंधकार में लापता।

जमना जी में बहुत पानी बह चुका था | सालों बाद उसका मैसेज आया | कई सालों बाद |
उसने इतना भर लिखा: "?"
" हाँ जी, क्या हाल? " सात्विक ने जबाब दिया |
"अरे , तू इधर ही है , दिल्ली में?"
"हाँ , मैं तो साल भर से इधर ही हूँ | "
फिर वो झूठमूठ का नाराज होने का नाटक कर बोली" बताना नहीं था , कब आया विदेश से वापस?"
"तूने  कभी पूछा नहीं | "
"चल छोड़ , यूँ कर , कल सैटरडे है , मिलते है | "

कैब से मॉल की तरफ जाता हुआ सात्विक उसे ही सोच रहा था |
तनु उससे अगर एक दो साल छोटी भी हुई , फिर भी उसकी उम्र तैंतीस-चौंतीस के बीच में कही झूलती होगी |
तैंतीस-चौंतीस साल की उम्र और कुँवारी ! ये स्थिति किसी आपातकाल जैसी होती है |  समाज द्वारा पैदा की गयी इमरजेंसी| 
सोच रहा था कि तनु से उन सब बातों का चर्चा तक नहीं करेगा जिनसे वो रोज कुश्तमकुश्त होती होगी : शादी की बातें , बच्चों और परिवार की बातें |

वो जानता था इस उम्र तक गैर-शादीशुदा होने की जद्दोजहद |
जानता था कि तनु की माँ ने अब लड़ना छोड़ दिया होगा | हाँ , वो अब सप्ताह में एक दिन की बजाय अब दो दिन व्रत रखती होगी |मंदिरो के चक्कर काटती होगी |
उसके रिश्तेदार कोई भी बेमेल सा रिश्ता सुझा , तनु को तलब कर जाते होंगे | 
उसकी दादी अगर अभी तक बची होगी तो हर दूसरी बात में अपनी मौत का जिक्र लाती होगी |
उलाहना देती होगी कि किस तरह उसकी आत्मा प्यासी ही परलोक गामी होगी |
उसके कजन्स हमेशा उससे कुछ न कुछ महंगे गिफ्ट की आस लगाए रहते होंगे |
सब दोस्त, रिश्तेदारों को ये लगता होगा कि इस लड़की के पास बहुत पैसा है जो यूँ ही बिना इस्तेमाल व्यर्थ पड़ा हुआ है |

ऑफिस में , अपार्टमेंट बिल्डिंग में नए कम-उम्र लड़के अपने 'डेब्यू ' के लिए उसे उपयुक्त और आसान शिकार समझ दुःसाहसी हो जाते होंगे |
शादी-शुदा , रिश्तों में घुटते पुरुष सहकर्मी तनु से कुछ पल के ताज़ा एहसासो के गुजारिशमंद रहते होंगे |
दो दो बच्चों के बाप और ऐसे ऐसे लोग जिनकी जवानियाँ भी उनसे हाथ छुड़ा रही होंगी ,  तनु को देख उनकी उम्मीदें भी खिल जाती होंगी |
और फिर बात बनती न देख ऐसे ऐसे लोग खीज में उसे 'ठंडी औरत' करार देते होंगे| 
क्रूर है ,पर आदतों में बंधे लोगों से देवता बनने की उम्मीद ?
पर एक वो संजीदा इंसान, वो अदद सच्चा इंसान कहाँ है ? शायद कोई है ही नहीं | तनु का मन कभी निराश हो कहता होगा |

मॉल के टॉप फ्लोर पर ईटिंग आउटलेट्स थे | हल्दीराम में काफी भीड़ थी | अच्छा हुआ , सात्विक पहले आ गया | उसने किनारे की दो सीट कब्ज़ा लीं थीं | 
तनु आयी | पीले रंग के टॉप में , नीली जीन्स पहने | जँच रही थी | उसके चश्मे का फ्रेम ,जो पहले चौकोर हुआ करता था , गोल हो गया था |
वॉइलेट कलर का बड़ा हैंडबैग उसने टेबल पर रख दिया और बड़ी चौड़ी सी मुस्कान लिए बोली"  अरे तू तो वैसा ही है , बाहर जाकर भी नहीं बदला | "
"नहीं यार , पहले से तो ज्यादा हैंडसम लगने लगा हूँ | " बालो में हाथ मार सात्विक भी हंसा |
"हाँ , शादी के बाद आदमी की अपील बढ़ जाती है " वो खिलखिला रही थी |
सात्विक उसे गौर से देख रहा था | वो अभी भी सुन्दर थी पर बदलाव नुमाया थे | उसका चेहरा पहले से भारी हो गया था | बाल लम्बे , केमिकल बॉन्डिंग किये हुए, स्टेप कटिंग में  |  किसी अच्छे शैम्पू की खुशबु से आस-पास की हवा तर हो गयी थी |

"सुना फिर , कहाँ कहाँ , घूमा तू इस बीच | फैमिली  का बता | " तनु बोले जा रही थी और सात्विक उसके वर्तमान के अक्स को ,भूत से तौल रहा था |
वे जब साथ थे , उसके ऊपर के होठ के किनारों  पे बारीक रोयां ऊगा होता था जो उसके कमसिन होने का अहसास देता था | आज उसके होंठ के किनारे चिकने और हलके नीले थे | उसके होंठ  के ऊपर बाई तरफ जो तिल था वो अब पहले से बड़ा हो गया था |

" क्या , तू थाईलैंड भी घूम के आया है | खूब मस्ती की होगी फिर तो | मसाज करा के आया होगा | क्यों ?"उसने अपनी कोहनियाँ  टेबल पर टिका दी थी और सात्विक के चेहरे में ऐसे देख रही थी जैसे सारे राज पढ़ डालेगी | वो कितना खुल गयी थी | उम्र के साथ स्त्रियां ऐसी हो जाया करती है | झिझक जाती रहती है |
"नहीं , ऐसे ही ग्रुप टूर , 'बीच' अच्छे है वहाँ के | "
वो हल्का गुस्सा हुई " जाने दे , जानती नहीं मैं | मेरे ऑफिस के 'जेण्ट्स' का भी आये दिन थाईलैंड जाने का ही प्लान बनता रहता है | "
वो शांत हुई , चेहरा ढीला हुआ तो सात्विक ने फिर गौर से देखा | तनु अपना ख्याल रखती थी पर एक दरमियानी सी  डबल-चिन अब अपनी जगह बना रही थी |
अह्ह्ह .. , वो.. वो नसें  जो गले से निकल उसके वक्ष स्थल को जाती थी ,कहाँ थीं , डूब चुकी थी |  
मिनरल वाटर की बोतल मुँह में उड़ेले वो पीछे की ओर लचकी  | उफ्फ , जालिम वक्त .. निगल गया वो गेंदे के फूल ,निष्ठुर ..| 
ओह मृगनयनी , जवानी महत्वाकांक्षा की भेट कर दी ! बिना जिये ही ?
फिर उसके मन में आया , औरत का शरीर भोग वस्तु ही है क्या? इस तरह से दिखावट के आधार पर ही इंसान को तौलना सही है क्या ? पुरुष-प्रधान समाज में देखो वो कैसे सफलता की सीढिया चढ़ती चली गयी | देखो , देखो वो कितना ऊपर पहुंच गयी | ट्रेनी , जूनियर प्रोग्रामर , सीनियर डेवलपर , टीम लीड , प्रोजेक्ट मैनेजर .....| अद्भुत , उदहारण देने  योग्य !
'दुष्ट -सज्जन' का ऐसा द्वन्द उस पुरुष के मन में चल रहा था |

"दो नार्थ इंडियन वेज थाली" आर्डर दे सात्विक अपनी कुर्सी पर आ जमा था |
चमकीले ,ब्लैक महंगे फ़ोन पर, जिस पर कोई भी कवर नहीं चढ़ा था, उंगली नचाती हुई तनु बोली:" देख तो , ये लड़का कैसा रहेगा ?"
और जोर से हॅसते हुए उसने फ़ोन सात्विक की ओर बढ़ा दिया था |
"लड़का ?" वो एक अधेड़ आदमी था , सिर से फसल गायब थी | चेहरा किसी ज्यादा नमक खाये बकरे की तरह फूला हुआ था |  
"यू एस  में प्रोजेक्ट मैनेजर है |"
" हम्म "
"अब ऐसा ही मिलेगा मुझे , तूने तो कभी बोला नहीं |  " वो हंसी दबा रही थी |
सात्विक के चेहरे पे गुस्सा उभर आया था | उसने गर्दन तिरछी की , आँखे छोटी की "अच्छा?"
साफगोई की कोई जरूरत ही क्या थी | दोनों जानते थे |

उस काल में , जब वो एक दूसरे के हो सकते थे , एक दिन ऐसा भी आया था जब वैलेंटाइन के दिन वो बेचारा फूलों  का गुलदस्ता लिए 'प्रीत विहार ' के बस स्टैंड पर खड़ा रहा |  एक के बाद एक ब्लू लाइन बसें आती रहीं |  वादा करके भी वो नहीं आई | और शाम को उसने इतना बोला " सॉरी , नींद आ गयी थी यार | " क्रूरता की पराकाष्टा थी वो | 

"मुझे पता था , वो नहीं आएगी | " शाम को यमुना ब्रिज पर नीचे पैर लटकाये दोस्त बल्ली ने कहा था | सात्विक बीच में बैठा था और  बायीं तरह नंदन |
इंसान के रोज रोज के बलात्कार से कराहती जमुना घिसट रही थी | गाढ़े काले पानी में पॉलिथीन , फूल माला , केमिकल के झाग , जलकुंभी , कागज में लपेटे हुए मुंडन के बाल , इस्तेमाल किये हुए कंडोम , पुराने त्याज्य लत्ते कपडे , सब कुछ , एक दूसरे से रगड़ता हुआ बहा जा रहा था |
ब्रिज में बीच -बीच में छिछले गतिरोधकों की श्रंखला थी | उन स्पीडब्रेकरो से गाड़िया गुजरती जाती | धड़ धड़ , धाड़ धाड़ .....| महीन कंक्रीट उड़ कर उन तीनो की कमरों से टकराती |

"मैं कूदूंगा नहीं | " सात्विक ने  कहा | सात्विक को दबा के बैठा नंदन खूब ऊँचा हंसा |
"कूद जा , मेरे कद्दू से " नंदन कठोर शब्दों में बोला |
सिगरेट का लम्बा कश खींच बल्ली बोला " देख , उसकी लाइफ की अपनी वरीयताएं है | फिर उसकी उड़ान का कर्व देख और अपनी उड़ान देख |  यार वो अपने से ज्यादा सक्सेसफुल आदमी ही देखेगी न| हुँह ... "

एक आदमी की ट्रेजेडी में दूसरा आदमी अपनी मस्ती ढूढ़ता है | नंदन बोला "फिर ये साला , लगता भी तो मज़दूर टाइप ही है न | शकल देख , चूसा हुआ आम | और आँखे देख |
हरकते छोड़ेगा तू ?"
" एनडूरा  मॉस(वजन पुष्टिबर्धक) खा|  "
फिर थोड़ा संजीदा होते हुए बोला "भाई तेरे नीचे 'यामाहा अफ ज़ी'  होती न , तो वो आती |" नंदन का इशारा अच्छी सी बाइक की तरफ था |

बल्ली थोड़ा उखड गया था " ये सब फ़ालतू की बातें है | "
उसने सिगरेट वाला हाथ ब्रिज के किनारे से लटका दिया था |
"इट डजंट मैटर| "
" वीमेन मेरी आ लाइफस्टाइल , नॉट अ  मैन | "  हमेशा याद रख |
"उसे तुझ में वो पोटेंशियल नहीं दीखता | साफ़ सीधी बात | "
बल्ली अब से नहीं कॉलेज टाइम से सिगरेट पीता था और सिगरेट पीने वाले लड़को की समझ (कम से कम  लड़कियों के बारे में ) सटीक होती है | सात्विक को सहारा देने वाले कंधे थे |  

बटर-नान को टीशू से दबाती हुई तनु बोली " कहाँ खो गया ? कैसा रहेगा पेयर ?"
"अह्ह्ह , कम ऑन, लाख बेहतर मिल जायेगे |"
"बात रंग रूप की नहीं है , सात्विक | अभी इन भाई साब से तीन या चार बार बात हुई है |
इनका इंटरेस्ट सिर्फ और सिर्फ मेरे पुराने अफेयर जांनने में है | "
बोलता है " ऐसा हो ही नहीं सकता कि तुम्हारा कुछ रहा न हो| "
"फिर उससे भी आगे  - अच्छा ये बताओ , तुम्हे किस पोज़ में प्यार करना अच्छा लगता है !"
"चार बार बात हुई है हमारी | "
सात्विक को उस बकरे जैसे आदमी से घिन हो रही थी | इंसान बूढा हो जाता है , फितरत नहीं जाती |
तनु की उंगलिया फ़ोन पर नाच रही थी " इसे देख , खुद निचुड़ा हुआ नीबू है ,लेकिन लड़की वर्जिन चाहिए | "
" और ये , दो बार बात करके ही , इसे मेरा व्हाट्सप्प ऑफ चाहिए | सिर्फ और सिर्फ शाम को खोलू जब ये जनाब फ्री हों |"
पके बाल , फूली गर्दन , घड़े जैसे पेट लिए ऐसे ऐसे मर्द और सोच देखो , ख्वाहिशे देखो |
सात्विक को लगा जैसे तनु पूरी मरद जात का चिट्टा उसके सामने खोल रही हो | और वो बिना कसूर शर्मिंदा हुए जा रहा था | 
" ऐसे किसी बन्दे के साथ रहने से  अच्छा है , एक डॉगी पाल लूँ" और वो खूब ऊँचा हंसी | दर्द का एक रेशा तक उसके चेहरे पर नुमाया न था | उसने दुख को चेहरे की परतो में गहरा , खूब गहरा दबाना सीख लिया था | 

पर सात्विक गुस्सा तनु पर भी था | 'ऊपर' , बहुत ऊपर जाने की चाह में ही उसने ये अंजाम चुना था |
अब समाज की व्यवस्था के अनुरूप क्यों जीना चाहती है |
जिए अपनी लाइफ | लिव इन , यूज़ एंड थ्रो , मनी , पावर , नो स्ट्रिंग अटैच्ड .....
शिकायत ही क्यों है ? फिर उसका किरदार... उसने किसे तरजीह दी ?

वेटर ने खाने की थालियां हटा दी थी |
अब उनके सामने दो सफ़ेद प्लेट्स में  रसमलाई थी |
गाढ़ी गुलाबी रबड़ी  में डूबी , पिस्ते में गुंथी रसमलाई , जिसमे केसर के कुछ तिनके बुरके हुए थे |
चाँदी सी सफ़ेद चम्मचे रबड़ी में डूबी हुई थी |

कुर्सी एडजस्ट करता हुआ सात्विक बोला "अच्छा , एक बात पूछूँ ? "
"हाँ , पूछ ना? "
"चल जाने दे |"
"अबे , पूछ ना| "
"सच बताना , आर यू स्टिल अ वर्जिन ?"

रसमलाई से चम्मच  लबालब भरी हुई थी | सीने के सामने तनु ने चम्मच रोक दी |
सात्विक की तरफ उसने देखा , न कोई गुस्सा , न कोई दूसरा भाव |
फिर धीरे से उसने वो चमच्च अपने मुँह में डाल ली | फिर एक दो और चम्मच डालीं |
अपना मोबाइल उसने अपने हैंडबैग में डाला और बोली" अच्छा सुन , मुझे काम है , मैं निकलती हूँ |"

"अरे अचानक, बुरा मान गयी क्या ?"
"नहीं , मुझे कुछ काम है | "
"तनु , ये सही नहीं है , ऐसे कैसे... "

तनु लम्बी डिग भरती हुई एस्केलेटर तक आ चुकी थी |
"तनु!"
तनु का चेहरा मारे गुस्से के बलबला रहा था " ऐसे कैसे पूछ सकता है तू ?"
"अरे..."
"नहीं, ऐसे कैसे पूछ सकता है तू ?"
सात्विक को एहसास हुआ था कि उसने एक खुले जख्म पर जाने अनजाने हाथ रख दिया था |
इस तरह के सवाल ही तो उसकी आत्मा को रोज रोंधते होंगे |
विडंबना , यही आदमी घण्टे भर पहले बड़ा समझदार,मंझा हुआ ,संवेदनशील होने की हुनक भर रहा था |
एस्कलेटर पर वो आधा उतर चुकी थी ,मुड़ी और बोली " कभी भी मैसेज मत करना |"

वो आंधी तूफ़ान सी चली जा रही थी | मॉल के मुख्य निकास   पर वो थोड़ा ठिठकी और फिर निकल गयी |
सात्विक को ऐसे लगा जैसे वो मुड़ेगी और जोर से चिल्लायेगी " सब एक जैसे ही हो तुम लोग | फिल्थी डॉग्स | "

                                                                                                               - सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                                                      7 जून 2019
                                                                                   

शुक्रवार, 31 मई 2019

दरकती जमीन

अक्सर ऐसा होता। हम सात आठ लड़के मिलकर उस औरत को घेर लिया करते।
चार आगे से और तीन चार पीछे से।
वो भांप जाती और पहले से ही मुँह बिगाड़ना शुरू कर देती।
हम नाचते और खूब ऊंचा ऊंचा गाते
" सांति ओ सांति। तू कहना क्यू ना मानती।"

वो हमलावर हो जाती। पैर पटकती हुई हमारी ओर लपकती। हमारे साइकिल के पुराने टायर , सरकंडो की कम्मचों की चोट से भाग निकलते।
कुछ देर तितर बितर हो जंगली कुत्तो से हम फिर गुच्छा बनाते ।
फिर वही पैरोडी" सांति ओ सांति। तू कहना क्यो ना मानती।"

शांति चिंघाड़ती" ओ कलुआ के, ओ गजुआ के। हरामजादो। मरो तुम आधी रात। तुम्हारी मेहतारियों से खाल उधड़वा दूँगी।" ईंटा उठा वो पुरजोर भागती।
बचपना था। तफरीह की उम्र थी। क्या सही, क्या गलत। पूरा गांव उसे पागल कहता पर वो औरत हमारे लिए खिलौना थी।

एक बड़े पहुँचे हुए पत्रकार अभी तस्करा कर रहे थे" दीदी जुझारू है। सड़क पर उतर कर आमने सामने की लड़ाई में यकीन रखती है। कद्दावर हैं। मत भूलिए, बंगाल से कम्युनिस्टों को इन्होंने ही उखाड़ फेंका है।"

ममता दीदी को बार बार 'जय श्री राम' का नारा लगाने पर खाल उतरवाने की धमकी देता देख शांति की याद आती है।
दीदी फड़फड़ा रही है। ललकार रही है। पब्लिक मजे ले रही है।
देखना, आने वाले दिनों में ऐसा न हो कि सड़क किनारे से ईंटा उठा सचमुच पब्लिक के पीछे दुडकी लगा दें।

बंगाल की जमीन दरक रही है। पुराने हथकंडे देर तक नही चलने वाले।
कोई समझबार, और उससे भी ज्यादा हिम्मतवार मानुस होवे तो दीदी को सलाह दे दे।
यही कि वो एक ठों बढ़िया सा बंगला बनवा लेवें हुगली किनारे।
और हाँ, सरकारी बंगले में जो भी टोंटी पत्री अपने निजी खर्च पे लगवाई हो उसकी भी लिस्ट  बनवा लेवें।
पुराने ढोल बजाने वालो के बोरिया बिस्तर बंधने का सिलसिला चल पड़ा है।

                                            सचिन कुमार गुर्जर
                                             1 जून 2019

फिर कभी

ऐसा महीने दो महीने में एक बार होता, जब किनारे के क्यूबिकल में बैठा वो लड़का अपना बैकपैक साफ करता।
जरूरी डाक्यूमेंट्स के प्रिंटआउट जो अब गैर जरूरी हो गए होते, टैक्सी बिल जो कभी क्लेम नही किये गए होते, आफिस के आस पास के ईटिंग आउटलेट्स के पैम्पलेट, और एक दो 'घातक'  किताबें।  अमूमन ये सब ही निकला करता।
'हाऊ टू विन फ्रेंड्स...', 'थिंक एंड ग्रो रिच', 'अलकेमिस्ट' कु छ इस तरह की किताबें।
ऐसा जखीरा जो इंसान को अपनी औकात भूलकर कुछ बड़ा, कुछ अदभुत करने की हवा भर देता है।

कुछ ऐसी ही चरस के नशे में धुत्त वो शर्मीला, दब्बू सा लड़का , पहले चार क्यूबिकल और उसके बाद बीच का गलियारा लाँघ कर चला गया था।
सीने तक उठी क्यूबिकल की दीबार पर कोहनी तक दोनों हाथ सपाट लिटा कर बोला" चाय पीने चलोगी?"
पहला संवाद था और बस ये तीन शब्द!

और जबाब?
उस चश्मिश ने कम्प्यूटर स्क्रीन से  नज़र हटाई। चश्मे को गोरी, पतली नाक पर पीछे धकेला।
पल भर को ऐसे सोचा जैसे पेशकश पर बड़ी संजीदगी से विचार करती हो।
और फिर बड़ा सपाट सा जबाब" अहह.. सॉरी। मैं चाय नही पीती।"

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 48 से चिपककर खड़ी सात मंजिला इमारत।
शाम के 4 बजे के आस पास फ्लोर पे हालात ऐसे होते जैसे अघोषित कर्फ्यू लगा हो।
तीन ,चार, पाँच.. कुछ ऐसी ही संख्या में कर्मचारियों के गुट उतरते जाते। चाय , समोसा, सिगरेट , बस यही सब  चूसने, फ़ूखने।

और वो लड़का। वो सातवी मंजिल पर लगे नीले शीशों के सीखचों से बाहर की दुनिया को टुक टुकाता रहता।
शंकर चौक, इफको चौक, राजीव चौक....।
एक के बाद एक , हाइवे में फ्लाईओवर के उतार चढ़ाव यू आते जैसे बड़े रेगिस्तान में रेत के ऊंचे नीचे टीले।
और उन टीलों के इर्द गिर्द काले नीले काँच के कुछ ऊंचे तो  कुछ बहुत ऊंचे कैक्टस जमे होते।
चींटियों की कतारों से मोटर कार, ट्रक, बस बाइक , टेम्पो एक दूसरे को धकियाते जाते। बदहवास, अजीब सी आपाधापी।
कभी रेंगते, कभी भागते उन आदमीयों के ग़लों के कौवे सूखे होते, आंखे चिरमिराती। पर मीठे शर्बत की तलाश में वो घिसटते जाते।

पर अंदर का नजारा कुछ इतर होता। खुशपुश होती जो कभी नोंक झोंक में तब्दील हो जाती।
कोई फॉर्मल , कोई कैज़ुअल, कोई प्रौढ़ तो अधिकतर जवादिल। कुछ इस तरह के जीवों के कहकहे , ऐ सी की ठंडी हवा के साथ साथ तैरते रहते।

इस सबके बीच वो लड़का अदृश्य रहता। कभी कोई विरला गौर करता तो कहता" तू चोर जैसा क्यो रहता है, हुह!"
हाँ, वो एक अदृश्य आदमी ही तो था। 'मिस्टर इंडिया' वाला नही!
हांसिये पर लटका गुमनाम आदमी।
ऐसा इंसान जो रंग रूप, भेषभूषा, बोलचाल, कद काठी, बुद्धिमत्ता , हर लिहाज से मामूली होता है। और वो इस कदर मामूली होता है कि सामने वाले का दिमाग इसकी मौजूदगी गैरमौजूदगी को रजिस्टर ही नही करता।
उसका वजूद हल्का होता है। चरित्र के लिहाज से नही, प्रस्तुति के हिसाब से।

मैं आपको ज्यादा मशक्कत नही करवाऊंगा। पर जरा सा पेशानी पर बल देंगे तो आप ऐसे किरदार पा लेंगे।

इस तरह का प्राणी अगर कतार में लगा हो तो बाद में आया आदमी इसके आगे लग जाता है, बिना किसी अपराध बोध।
ट्रैन में ,बस में बैठा हो तो नया आदमी इस भाव से चढ़ बैठता है जैसे सीट खाली ही हो।
जरूरी मीटिंग में ये जीव कितना भी महत्वपूर्ण सुझाव दे दे, वार्ता आगे बढ़ जाती है , बिना गौर।
और सबसे बड़ा दर्द। अपनी जवानी के चढ़ते दिनों में जब ऐसे शखस ने किन्ही आँखों से गुजारिश की नज़र से , बड़ी उम्मीद लिए देखा होता है, तो सामने की पथ्थर आंखों ने आरपार पेड़ पौधे, सड़क, बस, रिक्शा, कंकड़ पत्थर, यहां तक की गुटखों के लावारिश रैपरों को भी देखा होता है, पर इस आदमी का वजूद नज़र नही आता।

चलो, कोशिश तो की.. बस इस होंसले का झुनझुना थामे , हमारा नायक सात्विक , कैफेटेरिया की घटिया कॉफी लिए अपनी सीट पर आ जमा था।
रोबर्ट कियोसकी की मुस्कुराती तस्वीर कुछ यूं भाव लिए सांत्वना दे रही थी :शाबाश , ये पहल मील का पत्थर साबित होगी। देखना।

आप सोचते होंगे कि जब इंसान इस कदर शर्मीला है, किरदार सीधा, सपाट है, तो फिर वर्णीय क्या है।
ज़नाब, यकीन कीजिये, जिम्मेदारी के साथ कह रहा हूँ।
ये जो बेहद शर्मीले और सीधे इंसान हुआ करते है ना,इनके सीने में तमाम किस्से, शरारते, और और ...
कई कई औरतें एक साथ दफन हुआ करती हैं।

घंटे भर बाद उस चश्मिश का मैसेज आया था" सात्विक, प्लीज डोंट टेक इट अदर वाइज। थोड़ा बिजी हूँ। चल लेंगे।फिर कभी..:)।"

                                         क्रमशः.......
                                    
                                       सचिन कुमार गुर्जर
                                       31 मई 2019
 
                                         

गुरुवार, 16 मई 2019

बड़ा सबक


मौसम अनुकूल हो ,जमीन की परतें नरम हों,तो बिना बीज, बिना रखवाल भी कुकुरमुत्तों के गुच्छे यहाँ वहाँ छितरा जाया करते हैं। देखा होगा आपने।  ये सब कुदरत के बंदोबस्त हुआ करते है।
बस कुछ यूं कर ही दिल्ली हापुड़ बाईपास पर दर्जनों छोटे बड़े इंजीनियरिंग कालेज उग आए हैं।
राजधानी और उसके इर्दगिर्द कुर्सी पर बिठा काम कराने वाले कारखाने हैं।कामगारों की फौरन पूर्ति की जा सके, इसी सोच के साथ ही ये इमारतें जमायी गयी हैं।

रोजगार मेला लगा था ऐसे ही एक कॉलेज में। एक बड़ी ही नामचीन कंपनी , जॉब आफर दे रही थी।
हिंदुस्तान है, भीड़ तो होगी ही, लिहाजा इस बारे में लिखना समय और शब्द दोनो की बर्बादी है।
जैसे जैसे टेक्निकल , नॉन टेक्निकल ,मैनेजरियल राउंडस का सिलसिला आगे बढ़ता गया ,  खुशकिस्मतों की सूची सिकुड़ती गयी।

दिन भर आग उगल थका हारा सूरज अपनी आरामगाह  को चला तो एक प्यारी सी ,मुलायम सी एच आर वाली लड़की ने ,यही कोई दो दर्जन भर आफर लेटर बांटे।
भटकने के कुछ सिलसिले थमे तो ज्यादातर नौजवान, नवयोवनाये  पसमांदा ,चलने को मजबूर हुए।उन्हें नए अवसर की तलाश में अगली सुबह फिर जाना था। 
ताड़ की कतारों के समानांतर चलते वो लड़के लड़कियों के गुच्छे कॉलेज गेट से रुखसती कर , बाहर दुनिया की भीड़ में पिघल गए।

मुझे बस एक अदद मौके की दरकार थी सो वो मुझे मिल गया। कॉलेज कैम्पस से बाहर आकर रुका। अपने  नक़ली वाइल्ड क्राफ्ट के नीले बैकपैक में आफर लेटर को सही से जमा के,  कंधे उचका कर  फेफड़ो में बड़ी गहरी सांस भरी। ठहरा रहा काफी देर ।विजेता का भाव लिए गोधूलि के लाल काले आसमान को देखता रहा। उन लम्हो में आपने मुझे देखा होता तो आप मुझमे किसी सिकंदर या नेपोलियन का अक्स पाते!

खैर, विचार टूटा पर जश्न नही।कोई देखें न देखे। अपने दाएं हाथ को ताकत के साथ पीछे खींच मैंने जोरदार पम्प किया। वैसे ही जैसे खिलाड़ी लोग किया करते हैं।
मस्त बछड़े जैसे कुछ तेज डग भरे और फिर अपनी गाढ़ी क्रीज वाली काली पेंट को नाभि की ओर खींचा।
दिन भर की आपाधापी के बाबजूद मेरे पैरों में ताजा खून दौड़ रहा था।
अपने नए गोल्डस्टार के जूते से मैंने यू ही खामखाँ , चुपचाप लेटी कंकड़ को  हवा में उछाल दिया।वो दिन भी क्या दिन था। आंखें खुशी से नाच रहीं थीं। काश उन पलों में कोई मेरा अपना, मेरे साथ होता।

माँ का हक़ पहला था सो पहला फ़ोन माँ को ही किया और बोला" माँ, दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी में मेरी नौकरी लग गयी!"
सच्ची,यही बोल थे मेरे। मां की खुशी का पैमाना छलक पड़े बस इसी ख्वाईश के चलते बातचीत मे थोड़ा सा, हल्का सा छोंक लगा बैठा था।

वापस शहर जाना था। लक्ष्मीनगर-पांडवनगर में अपना ठोर ठिकाना हुआ करता था। बाँट जोहता रहा पर कम्बक्त की मारी बस न मिले।अकेला ना था। पांच छह लड़के लडकियां और भी थे।बड़े इंतेज़ार के बाद सब्जी दूध सप्लाई का जो मिनी ट्रॅक होता है ना, उसका ड्राइवर मेहरबान हुआ। गदापदद.. हम सारे उसी में पीछे। ट्रक की छत खुली थी, रस्सियों का जाल था जो तिरपाल थामने के काम आता होगा। बस, उसे ही पकड़े हम खड़े हुए।
एक तो सफर भी बहुत लंबा न था ऊपर से वो मुफलिसी का दौर , लिहाजा असुविधा का रोना रोना फिजूल की बात होगी।

एक लड़का था। वो जो लड़का था, लंबा दूहरे हाड़ का, जो अपनी मित्र के साथ सटकर ट्रक के अगले हिस्से में चिपका खड़ा था उसका सलेक्शन हो गया था। चेहरे पे सुकून था।
पर उसकी मित्र का चेहरा उदासी ने ढांप रखा था। बहुत ही गहरी उदासी। दिल्ली गाजियाबाद के स्मोग जैसी गहरी। ऐसा लगता था कि दुनिया जहान की सारी आफतों का बड़ा सा गट्ठर भड़भड़ा के उस बेचारी की काख पे आ गिरा हो। सभी रास्ते मूंद गए हो।आत्मा दर्द में कराह रही थी।वो दोनों एक दूसरे को संबल दे खड़े थे।

ताज्जुब न कीजियेगा। अगर आप उस दौर से गुजरें हैं तो इस तरह के हालातों से जरूर रूबरू हुए होंगे।
देखिये, जब तक आपका खुद का कोई आफर लेटर हाथ नही आ जाता, हर दोस्त, हर बैच मेट को मिलने वाला  आफर सीने पे हथोड़े की चोट सा ही होता है।
उस पर गोया कोई कमतर बाजी मार जाए तो हालत ऐसे होती है जैसे कोई महीन छैनी से धीरे धीरे कलेजा खुरेज रहा हो।

चेहरे पे बारीक कतरन की दाढ़ी लिए वो लड़का उस लड़की के कान में बार बार कुछ कहता। निसंदेह वो सांत्वना के शब्द होते होंगे। बेहतर कल की आस जागते शब्द।
और वो लड़की ।
थोड़ी सी सावली, मंझले कद की सुत्वा वो लड़की अपने पीले टॉप को एडजस्ट करती ,पर बोलती कुछ भी नही।
ट्रक की जाली से वो अपनी बड़ी दीवे जैसी आँखों से  पीछे भागते पेड, सड़क किनारे की दुकानें ,गुमटियां और यहां तक कि कूड़े के ढेरों को भी ऐसे देख रही थी जैसे पहली बार इन सबका दीदार करती हो।

अपनी जिम्मेदारी का एहसास कर लड़का हर थोड़ी देर में कोई छोटी सी बात लड़की के कान में कहता।
ऐसा करने के लिए उसे तिरछा हो थोड़ा नीचे आना होता।
वो थोड़ा रुकता और फिर कोई लंबी सी बात से अपनी मित्र का ढांढस बांधता ।
ये दौर चलता रहा। सड़क के गड्ढो, स्पीड ब्रेकरों जैसे ही भावनाओँ की लहरें उछलती, उतरती रहीं।

शब्दो का मरहम जब उस लड़की को सदमे के कुहासे से बाहर न खींच सका तो उस लड़के के अंदर का 'महात्मा बुद्ध' जाग उठा!
जिस भाव से राजकुमार गौतम ने तीर से घायल हंस को आलिंगन कर दुलारा था उसी भाव से उस लड़के ने अपनी मित्र का हल्का सा आलिंगन कर उसके बालो में हाथ फिराया।
फिर यकायक परोपकार का भाव इस कदर हावी हुआ, कि  दयाभाव से वशीभूत वो मानव काफी देर तक हाथ फिराता रहा, दुलारता रहा, पुचकारता रहा!!

शहर ज्यो ज्यो नजदीक आता जाता उस लड़के की व्याकुलता बढ़ती जाती। अपने शरीर का भार वो कभी दाये पैर पर ले जाता तो कभी बाये पैर पर।
एक ही लक्ष्य, एक ही ध्येय।
कैसे भी हो वो अपनी मित्र का दर्द खींच लेना चाहता था।

इसी प्रयास के क्रम में जब दर्द असह हो चला तो उसने अपने होठ अपनी मित्र के माथे के  सिरे पर कुछ इस भाव से टिका दिए जैसे कि वो दर्द के जहर को चूँस फेकना चाहता हो। हमदर्द को कौन नही पहचानता!
लड़की ने अपने मित्र की आँखों मे देखा तो उसने आँखे झपका दी। सब ठीक हो जायेगा। होंसला रख पागल!!

फिर वो किसी हुनरमंद सपेरे की तरह जहर खींचता ही गया  और खींचता ही चला गया। कभी माथे पर ,तो कभी गाल पर तो कभी गर्दन पर।
शहर आया तभी ये सिलसिला रुका।

मैं वापस कमरे पर पहुँचा तो तीन चार साथी इंतेज़ार में थे।
बियर की बोतलें प्लास्टिक की बाल्टियों में डूबी हुई थी। मुर्गे काटे जा चुके थे।
मिंटू से रहा नही गया , वो अभी काम की तलाश में था। तंज कसा" तुझे कैसे ले लिया बे, लगता है इस कंपनी को कुछ ज्यादा ही बड़ा प्रोजेक्ट मिल गया है।"

मैं हंस पड़ा , बोला" पिंटू भाई, जा तेरे लिए एक बियर एक्स्ट्रा। ऐश कर।"
एक तो पिंटू मेरे ही जंगल का लड़का था, मेरठ मुरादाबाद बेल्ट का।
फिर उस पर अभी कोई पौन घंटे के सफर में मैं बड़ा सबक सीखकर आया था।

सबक?
हाँ,  यही की हमे दूसरे के दुख दर्द में शरीक होना चाहिए।
वो भी सही समय पर और पूरी शिद्दत के साथ!!!

         
                                                   -सचिन कुमार गुर्जर
                                                    18 मई 2019

गुरुवार, 9 मई 2019

पांचवा आदमी

उस बूढ़े आदमी का मर जाना बेहद जरूरी था। सात जात की खिचड़ी बस्ती में एक चिड़ी का बच्चा भी ऐसा ना था  जो ये विचार रखता हो कि होरी बुड्ढा जीवत रहे! जनाना-मर्दाना , हर कोई उसे ऐसे देखता जैसे निढाल, दम तोड़ते मवेशी को गिद्ध| 
पर वो बूढ़ा न मरता।
घसियारिनो के झुंड घास फूस जुटाने जंगल जाते तो एक दो जरूर कुढ़ती और धीमी आवाज़ में कहती" जुआन जुआन आदमी जा रहे हैंगे, इस बुड्ढे कु मरी न आती| "
तो कोई ठलोरा,लुखण्डर सामने के चबूतरे से दांत निपोरता कहता" इनकी तो फ़ाइल ही गुम हो गयी दीखे है भाभी!"

बूढा मैला ,फटेहाल दिन भर चबूतरे पर ,नीम की छांव में पड़ा रहता । ढीली सी मैली धोती में अपनी टांग सिकोड़े वो चित्त लेटा रहता। कोई बड़ा रास्ते से गुजरता तो गुस्से में ताना मार कहता " ओ दददा,  धोती तो संभाल लय करो , बालक बच्चे निकले बढ़े हैंगे, तुम अपना सामान बिखेरे पड़े रओ हो दिन भर|  "
बूढा उहूह की आवाज़ करता , फड़फड़ाता और अपनी धोती के इधर उधर भागते सिरों को अपनी टांगों के बीच मे घोस लेता, लाज के अंगों को ढांप लेता।
टाँगों में दम था ।पड़े पड़े बोर होता तो आस पास के घरो की चौखटों तक घूम आता। कोई चाय पिला देता ।आने जाने वालों से मांग के बीड़ी पीता रहता।
जिंदिगी चलती जाती , पर उसे मौत न आती।

होरी की मूँछे किसी पुरानी झाड़ू जैसी झाबेदार थीं, जो चेहरे से काफी आगे तक पहले तो सीधी आती थी और फिर अचानक नीचे की ओर मुड़ जाती थीं। गालो में दो बड़े बड़े  पानी के पोखर जैसे गड्ढे थे जो मूछो के सिरों से जुड़े थे। आँखे बड़ी लेकिन हमेशा गन्दीली रहती थी। नाक किसी उम्र में ऊंची हठीली रही होगी पर अब थकी सी आगे से ढलक गयी थी। ज्यादा खाँसने से कंधे उचक गए थे। पेट किसी पतली लकड़ी की धाच सा मालूम होता था।

असल मे वो आदमी किसी ऐसी पुरानी सरकारी इमारत जैसा था जिसे कंडम कर खुद से गिर जाने के लिए वीरान छोड़ दिया गया हो।परिवार के बेटे, पोते पोती उसे अपनी जिंदगी का मैल समझते थे ।पर अपने हाथों गला कौन दबाये, उनकी यही ख्वाइश होती कि बस ऊपर वाला ही कुछ बहाना करे, विपदा से जान छूटे। पर उस बूढ़े की मौत पता नही कहाँ सोती थी।

सात घरो के फासले पर कथा का पाठ चलता था , चार पांच मानुस फर्श पर बैठे पंडित जी का वाचन सुने थे। घर की मालकिन जमाने को कोसती हुई घर मे दाखल हुई" सब से कह आई, सब टीवी देखे हैंगे। रांम नाम कौन सुने है आजकल। "
घर का मालिक बोला " पंडित जी ऐसा करो, शंख फूख दो एक बार जोर ते, जो धर्मी होगा , आय संगत करेगा।"
कोई पहुचा न पहुँचा, होरी बुद्धा पहुच गया।

पंडित जी ने कथागान किया :सुनो जजमान, राजा परीक्षित ज्यो ही महल से बाहर निकल रथ में सवार हो चले, एक भिखारी कही से रथ के नीचे आन मरा।
राजन बोले, हे इष्ट , मैं धर्म लाभ को निकला, ये कैसा अधर्म कमा लिया।
राज पुरोहित से परामर्श किया तो पुरोहित गंभीर हो बोले" हे राजन, विपदा बड़ी है। जिस काल में ये भिखारी कालगति को प्राप्त हुआ, उस घड़ी को पांडव काल से जाना जाता है। यानी के अगर उपाय न हुआ तो पांच मृत्यु होंगी, और फिर पांच पांडवो की भांति सभी आत्माये एक साथ परलोक की गामी होंगी।"

पंडित जी रुके, पोथी का पन्ना पलटा और फिर शुरू किया: राजा परीक्षित विचलित हुए और बोले, " चूंकि ये व्यक्ति मेरे रथ नीचे आ मरा। मैं दोषी हुआ। कुछ उपाय बताओ गुरु।
तब पुरोहित बोले" सोमवार की प्रातः में जिस वक्त सूरज आसामान का कलेजा फाड़ बाहर आता हो, पांच काली , दुधारी गायो का दान करने से आया काल टल सकता है।"
"प्रबंध हो जायेगा , पुरोहित जी" ऐसा कह राजा अपने इष्ट को प्रणाम कर चल पड़े।"

" धर्म श्रद्धा से चलता है" ऐसा कह पंडित जी ने अपनी दक्षिणा के करारे नोट जेब मे रख, खीर पूड़ी का भोज किया। होरी के भी भाग जागे, एक तो धर्म लाभ ,ऊपर से खीर पूड़ी। मालकिन  ने पांच रुपए बीड़ी माचिस खातिर भेट दे दिए| 

फसल काट किसान मजदूर खेत क्यारियों में पेड़ो तले सुस्ताते  थे। लू के थपेडे ऐसे लगते  थे जैसे गरम तवा खाल से छूआ दिया हो।  नन्हे कुम्हार ने जैसे तैसे अपनी लंगड़ी घोड़ी समेत यूकेलिप्टिस के बाड़े में स्थान लिया। पसीने से लथपथ, ईंट भट्ठे की मिट्टी में कुर्ता पुता हुआ।
खेत के बटाईदार से पानी मांगा । हलक खुसक था, बेचारा मंजिल काट के आया था। उखड़ू बैठ पानी पीने लगा तो पीता ही गया, पीता ही गया। फिर एक ठों पीछे की ढाल लुढक गया। ज्यादा पानी पीए से उसका कलेजा डूब गया था| 

अगली सुबह नन्हे का लड़का पंडित जी के घर से झल्लाता हुआ निकला " बेबकूफ समझो हो हमे पंडित, हम अपने आप कर लेवेंगे  रसम पगड़ी। अरे, बूढ़े थे बाबा हमारे, कौन सी बुरी मौत मरे जो हम ये सब जतन करें।"

वो गरीब किसान मज़दूरों का टोला था। वहां इंसान का जीवन जितना बेरंग और फीका था ,मौत भी ऐसे ही सस्ती सी आती थी।
अब मटरू को ही ले लो। बेचारा अच्छा खासा खेत क्यारी का काम करके आया। नहाय धोय के लत्ता बदले।
बरामदे पे बैठ कढ़ी चावल खाता था । भूख जबर थी, जल्दबाजी में कढ़ी चावल का कुछ बड़ा गोसा ले लिया। साँस की नली में ऐसा गुच्छा लगा कि बेचारा वही लंबा हो गया। भोजन का थाल धरा का धरा रह गया, पंछी उड़ गया। दो चार जिक्र हुआ, फिर नर नार अपनी जिंदगियो की जदोजहद में उलझ भूल गए।

लेकिन जब जगता और उसकी घरवाली ने गृहकलह में एक साथ कीटनाशक पी लिया तो समूचे गाँव मे कपकपी सी दौड़ गयी। बड़े , समझदारों के मुतालवे हुए।
पंडित जी को बुला भेजा। बड़ी बैठक की घनी पाखड़ तले चार चारपाइयों पे गाँव के बड़े और गंभीर लोग बैठे।
गोद मे पोथी लिए पंडित जी कुर्सी पे बिराजमान ।
बड़े काका ने मूछो को अंगूठे से दबाया और चिंता सुनाई तो पंडित जी भड़भड़ा उठे" एक बात बताओ, उस दिना, जब नन्हे का लौंडा पूरे गाँव के सामने मुझे लालची और पता नहीं क्या क्या बका, किसी ने बूझ की उस दिन?"

" जे बताओ कि गाँव की भलाई से बड़ा काम है कोई मेरे ताई।" पंडित जी का गुस्सा जायज था।

बड़े काका बोले" देखओ पंडित जी, मानू हुँ। बात तुम्हारी जायज  है,पर अब आगे का सोचो। दिशा काल का कुछ गणित करो। चार चार मानस उठ गए तीन महीना के भीतर!"

पंडित जी ने अपनी कुर्सी को आगे खिसका के बड़े काका की खाट से मिला दिया और फिर धीमे और गंभीर शब्दो मे बोले" देखो, पांडव काल मे गया है नन्हे। उपाय होता तो तभी होता, अब बात कब्जे से बाहर है। गऊ दान तभी का कारगर होता।" पंडित के ओठो के सिरों ले थूक जम गया था। ऐसा बोल उन्होंने तीनों खाटों पर अपनी नजर ऐसे घुमाई जैसे घूमती गर्दन वाला बिजली का पंखा।

करीब बीस जन होंगे, तीन तीन खाटें भरी थी, पंडित जी की बात सुन ऐसी मुरदाई सी फ़ैली कि सबसी साँसों की आवाज सुनी जा सकती थी। गाँव मे विपदा थी!
कुछ सोच समझ के सुझाइयो पंडित, बड़े काका ने ये कह सभा खत्म कर दी थी।

आदमी के अंगूठे के कटे नाखून जैसा चाँद था उस रात।
गुप्प स्याह रात के तीसरे पहर में दूर , साफ खलिहानों में गीदड़ों के झुंड हुडहुडाये " हुत हुत , हुती हाउ....।"
तो गाँव के किनारे से आवारा कुत्ते जबाब में रोये" आउ..आउ..उ।"
उस रात के सन्नाटे में एक आदम आवाज़ हुई" होरी लाल , सोओ हो क्या!"
चार आकृतियां , तीन पतली और लंबी और एक नाटी, खाट के चार पायो पे चार खड़ी थीं। झक सफेद चादर में सर से पाँव तक ढकी हुई।
कुछ जबाब ना आया तो सिरहाने की लंबी आकृति ने
हल्के से खाट को झटका" होरीलाल, सोये हो?"
कोई जबाब नही।

कुछ पल पीछे पायत खड़ी नाटी आकृति बड़े ही मीठे सुर में बोली, जैसे कोई कविता गाई हो" तुम्हारा दाना पानी पूरा हुआ होरीलाल । अब चलो।मोह न करो"
पर तमाम कोशिशों के बाबजूद वो आकृतियां बूढ़े के हलक से एक बोल न निकलवा सकी।
हाँ, नाटी आकृति की आवाज सुन उसने अपने दोनों हाथ खाट के किनारों से उठा अपने सीने पे जरूर जमा लिए।

सुबह सूरज ने पूरब दिशा को फोड़ा ही था।। बूढ़े के चबूतरे पे सिर ही सिर दिखते थे।
भीड़ को चीर जमनिया बूढ़े के पाँवों तक जैसे तैसे पहुची।
सफेद चादर पैरो में डाल बोली" दादा ओ दादा, कहा सुना माफ करियो हमारा। हमारे बड़े बूढ़े हुए तम, मेहर करियो।"

चबूतरे से जैसे ही अर्थी उतरी , मोहल्ले के चार नए कंधो ने भार अपने ऊपर ले लिया। तीन पतले , लंबे और एक बेहद नाटा!

आगे की ओर लगे लंबे जवान ने साथ मे चलते काका से रुआंसा हो कहा "कक्का ओ कक्का  देखो तो पश्चिम से क्या गाढ़ी घटा का बादल उठा हैगा। मेह बरसेगा। पहुँच गए दादा हमारे। जाए लगाई दरबार मे हाज़िरी!

बड़े काका ने पंडित जी की तरफ देखा तो उनके  चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे किसी देव ने बड़े तूफान का रास्ता मोड़ दिया हो।
पांचवा आदमी जा चुका था!
                                          -सचिन कुमार गुर्जर
                                            11 मई 2019

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...