शुक्रवार, 31 मई 2019

दरकती जमीन

अक्सर ऐसा होता। हम सात आठ लड़के मिलकर उस औरत को घेर लिया करते।
चार आगे से और तीन चार पीछे से।
वो भांप जाती और पहले से ही मुँह बिगाड़ना शुरू कर देती।
हम नाचते और खूब ऊंचा ऊंचा गाते
" सांति ओ सांति। तू कहना क्यू ना मानती।"

वो हमलावर हो जाती। पैर पटकती हुई हमारी ओर लपकती। हमारे साइकिल के पुराने टायर , सरकंडो की कम्मचों की चोट से भाग निकलते।
कुछ देर तितर बितर हो जंगली कुत्तो से हम फिर गुच्छा बनाते ।
फिर वही पैरोडी" सांति ओ सांति। तू कहना क्यो ना मानती।"

शांति चिंघाड़ती" ओ कलुआ के, ओ गजुआ के। हरामजादो। मरो तुम आधी रात। तुम्हारी मेहतारियों से खाल उधड़वा दूँगी।" ईंटा उठा वो पुरजोर भागती।
बचपना था। तफरीह की उम्र थी। क्या सही, क्या गलत। पूरा गांव उसे पागल कहता पर वो औरत हमारे लिए खिलौना थी।

एक बड़े पहुँचे हुए पत्रकार अभी तस्करा कर रहे थे" दीदी जुझारू है। सड़क पर उतर कर आमने सामने की लड़ाई में यकीन रखती है। कद्दावर हैं। मत भूलिए, बंगाल से कम्युनिस्टों को इन्होंने ही उखाड़ फेंका है।"

ममता दीदी को बार बार 'जय श्री राम' का नारा लगाने पर खाल उतरवाने की धमकी देता देख शांति की याद आती है।
दीदी फड़फड़ा रही है। ललकार रही है। पब्लिक मजे ले रही है।
देखना, आने वाले दिनों में ऐसा न हो कि सड़क किनारे से ईंटा उठा सचमुच पब्लिक के पीछे दुडकी लगा दें।

बंगाल की जमीन दरक रही है। पुराने हथकंडे देर तक नही चलने वाले।
कोई समझबार, और उससे भी ज्यादा हिम्मतवार मानुस होवे तो दीदी को सलाह दे दे।
यही कि वो एक ठों बढ़िया सा बंगला बनवा लेवें हुगली किनारे।
और हाँ, सरकारी बंगले में जो भी टोंटी पत्री अपने निजी खर्च पे लगवाई हो उसकी भी लिस्ट  बनवा लेवें।
पुराने ढोल बजाने वालो के बोरिया बिस्तर बंधने का सिलसिला चल पड़ा है।

                                            सचिन कुमार गुर्जर
                                             1 जून 2019

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