सोमवार, 13 जुलाई 2020

होता आया है , होता रहेगा !

आपने कभी कोई चोर देखा है ? कोई जेबकतरा , उठाईगीर या कोई छोटा मोटा चोर उचक्का ?
अपवाद हो सकते है लेकिन अमूमन ऐसा होता है कि कोई भी ऐसा निकृष्ट आदमी रंगेहाथ पकडे जाने पर लज्जित महसूस करता है | लात घूंसे पड़ें या पुलिस के डंडे , ऐसे आदमी की गर्दन नीची ही रहती है | ये एक अलग बात है कि छुटकारा पा वो फिर से उन्ही कुकृत्यों में संलिप्त हो जाए | पर पकडे जाने पर  लजायेगा जरूर |
हमारे लोकतत्र का नेता ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपनी हवस , लालच , सत्तालोभ का नंगा नाच करता हुआ पकड़ा जाए , उसकी चालीस चोरो की माल बॅटवारे को लेकर सर फुटब्बल की कहानी पब्लिक डोमेन में भी आ जाये , फिर भी वो किसी महंगे रिसोर्ट में विक्ट्री का "V" साइन वाला पोज़ ऐसे देगा , जैसे महाराज ने समाजहित में बड़ा ऊँचा झंडा गाढ़ दिया है |
देखि है कही आपने समाज सेवा को लेकर ऐसी सिर फुटव्वल ??

आप इस फोटो को देखिये और मुझे बताइये कि कोरोना की मार झेलते देश में , जहाँ हर दूसरा आदमी बेरोजगारी के मुहाने पे खड़ा है , जनमानस अवसाद से गुजर रहा है , इन लोगो ने कौन सा तीर मारा है जो ये विक्ट्री सिंबल बना रहे ? क्या इन्हे शर्मिंदा नहीं होना चाहिए कि इनकी हवस , ज्यादा से ज्यादा डकारने की छीना झपटी , जो अभी तक सत्ता के बंद , गुप्प गलियारों तक दबी ढकी थी , वो अब खुले मैदान में आ गयी है ?


हमे घोट कर पिलाया गया है लोकतंत्र , लोकतंत्र , लोकतंत्र |
असल में ये लोकतंत्र है ही नहीं , भीड़तंत्र है | सही लोकतंत्र एक लक्ज़री है जो चेतना के एक स्तर को पार कर चुके समाज के हिस्से आता है |
जरा सोचिये , जिस भीड़तंत्र में एक पव्वे के लिए , 500 की पत्ती के लिए, या महज ये सोच के कि फलाँ हमारी जात  का है ,  कही भी ठप्पा लगा देने वाले वोट की ताकत , 'देश दुनिया की सोचने समझने वाले' आदमी के वोट के बराबर हो , वहाँ किस तरह के नेता सामने आएंगे ?
आप इसे गरीब -अमीर के खाँचो में रखकर नहीं , चेतना के स्तर के लिहाज से आंकिये  |
डेमेगॉग समझते है न आप ? बस वही लोग सामने आते है |

सुकरात का लोकतंत्र से इन्ही कारणों से मोह भंग था |
प्लेटो की कृति 'रिपब्लिक ' में सुकरात का एक वार्ता उल्लेख है जिसने वो पूछता है कि यात्रियों से भरे जहाज को कौन चलाएगा , जहाज का कप्तान कौन होगा , इसका निर्णय किसको करना चाहिए ?
क्या जहाज के सभी यात्रियों को ?
या उन लोगो को जिन्हे जहाज चलाने का कुछ ज्ञान हो , हवा , दिशा , भूगोल का कुछ  अध्ययन जिन्होंने किया हो  , और जो ये जानते हों कि जहाज को सही दिशा में में ले जाने के लिए कौन सबसे होनहार कैप्टेन साबित होगा |

अपने तर्क को और आगे बढ़ा सुकरात कहता है कि एक डॉक्टर है और एक मीठे की दुकान वाला हलवाई |
अपना समर्थन बटोरने को हलवाई कहता है की देखो भाइयों ये इंसान तुम्हे कड़वे काढ़े देता है , तुम्हारे शरीर में छेद करता है , चीरे लगाता है , तुम्हारा खून निकाल लेता है , ये तुम्हारा भला कैसे हो सकता है !
मुझे समर्थन दो , मैं तुम्हे मिठाइयां , रेवड़ियाँ देता हूँ , मैं ही तुम्हारा हितैषी हूँ !

और देखो न , सचमुच मिठाइयां , रेवड़ियाँ बांटने वाले डेमागोग ही तो हम चुनते आये है |
बदकिस्मती  कि  ये दस्तूर जारी रहेगा  | हाँ ,पार्टियों के नाम बदलते रहेंगे |

                                                                                              -सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                              १३ जुलाई २०२०    

रविवार, 12 जुलाई 2020

चमड़ी की फसल


उस आदमी को मैं जानता था | ठीक ठाक जानता था | ठीक उतना  ही , जितना  मैं मेरे ऑफिस के पास की रेड लाइट पर लगे लैम्पपोस्ट को जानता हूँ |  मतलब बिना किसी प्रजोयन , बिना किसी प्रयास , बस भौगोलिक परिस्थिति वश |
मैं उसे जानता तो था  , लेकिन वो इस दर्जे का कलाकार है ,इसका गवाह मैं पहली बार बना !

उस आदमी का रूटीन मेरे रूटीन से मेल खाता था | अक्सर वो नौ से दस के बीच की किसी ट्रैन से उतरता | हम एक ही लालबत्ती पर सड़क पार करते और सिंगापूर के बिज़नेस पार्क में , कार्डबोर्ड के चट्टे जैसी इमारतों के झुण्ड में खो जाते | मेरी ही तरह वो भी किसी आई टी फर्म या बैंक में चाकरी करता रहा होगा |
उसका  व्यक्तित्व बड़ा  रूखा, उबाऊ जान पड़ता  था | मेरा अनुमान है कि वो तीस का तो रहा ही  होगा | उसका चेहरा किसी ज्यादा नमक खाये बकरे जैसा फूला हुआ था | कद पांच नौ या पांच दस रहा होगा  | बाल घने थे , बालिश भर लम्बे ,लापरवाह हिप्पिकट में , कनपटियों से  किनारे छोड़ने लगे  थे | मोटा तो नहीं , थोड़ी बियर बैली लिए था | डील  डॉल से  मुझे नहीं लगता वो अपने को फिट रखने को कुछ ख़ास तबज्जो  देता  होगा |
अमूमन तौर पर वो कोई सिलेटी या बदरंग ट्रॉउज़र पहने , ऊपर से लूस टीशर्ट डाले होता था | हमेशा उनींदा , जैसे किसी ने जबरदस्ती बिस्तर से  उठाकर सड़क  में धकेल दिया हो | उसके अंग अंग से आलस टपकता था |
उसके जूते एंटीक पीस मालूम होते थे ,पुराने  स्पोर्ट्सवेयर, जिन्हे मानो कोई सालों तक घर के कोने में फेंक कर भूल गया हो |
 कुछ भी आकर्षक नहीं था | एस्थेटिक्स के लिहाज से  मैं उसे औसत से भी कम आंक सकता हूँ |


बिज़नेस पार्क और मेट्रो स्टेशन की बीच में एक मॉल है , जिसके गलियारे पैरामीशियम की आकृति लिए हुए है , जूते की सोल की तरह घुमाब लिए हुए  |
शाम को अक्सर मैं मॉल के फ़ूड कोर्ट में खाना खाता और फिर विंडो शॉपिंग करता हुआ , घूमता फिरता निकल जाता |
स्टेशन के दूसरी पार एक एक्सहिबीशन सेंटर है जहाँ अक्सर कुछ अच्छी तो कुछ वाहियात थीम वाली प्रदर्शनियाँ लगा करती है | उस शाम को कोई फ़ूड एक्सहिबिशन लगी थी वहाँ |
तंदूरी रोटी और पनीर की खुराक को 'ते सी सुताये'(कम चीनी की चाय ) के सहारे पेट में धकेल मै फ़ूड कोर्ट से निकल रहा था |
तीन चीनी मूल की युवतियाँ  , किनारे के एस्कलेटर से चढ़ी , एक दुसरे से चिपकती हुई , थोड़ी असहज |
उनकी असहजता शायद उनके नए परिवेश में होने को लेकर थीं | शायद लोकल नहीं थीं |
"हेलो  ब्यूटीफुल !" इतना कह कर एक  युवक मेरे बगल निकल कर चला गया | वही आदमी !
और वो तीनो लड़कियां , खिलखिला के  हँस दी | वो व्यक्ति  बिना रुके एस्कलेटर से उतर गया | लड़कियां कुछ आगे बढ़कर ठिठकी फिर जिज्ञासा वश मुड़ उसे जाते हुए देखने लगी |
ये जरा भी अप्रत्याशित नहीं था | इस तरह के कॉम्प्लिमेंट्स , खासकर मेरे परिवेश में बड़े आम से है | सिंगापूर में दुनिया के कोने कोने के आदमी है , सब अपना अपना कल्चर , अपनी आदतें , तौर तरीके लेकर आते है  | और इस सब का प्रदर्शन यहाँ  वहाँ होता रहता है |


माल के एग्जिट पर और मेट्रो स्टेशन के बाहर स्टील के बेलनाकार स्टैंड लगे है , जिन पर लोगबाग अक्सर अपने शॉपिंग बैग्स  रख सांस ले लेते है , या कई बार जूते की लेसेस बाँधने के लिए टिककर खड़े हो जाते है |
मै एग्जिट से निकला, तो मैंने उसे एक स्टैंड के सहारे खड़े हुए पाया |  बड़ी ही चौड़ी मुस्कान बिखेरते हुए | इतनी चौड़ी कि उसके होंठ एक कान से दुसरे कान तक कमानी की तरह खिंचे हुए थे !
वो मुझे देख कर भला क्यों मुस्कुराएगा , आखिर मैं उसे उतना ही जानता था जितना कि रेड लाइट पर लगे लैम्पपोस्ट को !
और मेरा अनुमान गलत नहीं था | मेरे ठीक पीछे वो तीन युवतियां भी चली आ रही थी |
उन्होंने भाँप लिया और थोड़ी असहज होती वो ठिठक गयीं |
"शायद ये पिए हुए है , अल्कोहल ने इसके न्यूरल सर्किट को कुछ अस्थ्याई नुक्सान पहुंचाया है "हाँ  यही लगा मुझे |
मैंने अपनी चाल धीमी कर दी | वो धीमे से मेट्रो स्टेशन के एस्केलेटर पर उतरने लगा , किसी टिपिकल टपोरी की तरह सीटी बजाता हुआ | उससे थोड़ी दूरी पर वो तीन युवतियाँ भी सीढ़ियां उतरने लगी |
तीनो लड़कियों की आकृतियाँ अलग ही थी | एक लम्बी , दूसरी औसत लम्बाई तो तीसरी कम विकसित छोटी बच्ची जैसी |
उम्र के हिसाब से वो तीनो बीस बाइस की ही रही होंगी |
लम्बी लड़की सुन्दर , सुतवा , सुराही सी गर्दन लिए | वो किसी कोरियन पॉप स्टार जैसी ड्रेस पहने थी | चीनी जीन पूल से आने के बाबजूद उसकी नाक रोमन थी | मंझली थोड़ी कमतर , लेकिन  आकर्षक , कलर बाल , स्टाइलिश हैंडबैग , डिसेंट |
तीसरी किसी भी टिपिकल स्कूल गोइंग किशोरी जैसी |

उस सनकी आदमी को एस्कलेटर पर न जाने क्या हुआ वो पीछे मुड़ा और बड़ी भोंडी सी हंसी हंसा | उसकी आँखों में , उसके लहजे में इच्छा थी |
'इच्छा' मानव मूल का स्वभाव  है , लेकिन ये रिझाने का  तरीका ही तो होता है जो परवर्ट और डिसेंट होने का फर्क पैदा करता है | एक तरीका होता है शालीन  और मर्यादित | एक होता है फूहड़ , जंगली |
एक तरीका होता है जो सौंदर्य के आगे नतमस्तक हो गुजारिश करता है , तारीफों की झड़ी लगा अपना मुकदमा पेश करता है , सुनवाई होती है , बात जंचती है तो निगाहे करम !
फूहड़ता के हिस्से में क्या आता है : थप्पड़ , धमकी या फिर नजरंअदाजी !


मुझे अभी तक ये समझ नहीं आ रहा था कि वो आदमी किस बात को लेकर इस कदर कॉन्फिडेंस से लबरेज था | प्लेटफार्म पर वो कुछ यूँ मुँह फेर कर खड़ा हो गया जैसे कोई कन्हैया हो और अदृश्य डोर से बंधी गोपियों का उसकी गोद मेम गिरना ही नियति हो |
फिर वैसा ही हुआ जैसा मुझे आभास था | उस सिरफिरे को पूरी तरह इग्नोर मार उन नवयौवनाओ की टोली प्लेटफार्म पर दूसरी तरफ चली गयी |
ट्रैन आने में अभी पूरे छ मिनट थे | स्टेशन पर लगे डिस्प्ले स्क्रीन पर कुछ नामशहूर एक्टर्स दिखा रहे थे कि किसी संदिग्ध की पहचान कैसे करें , अनजान वस्तु दिखे तो कैसे रिपोर्ट करें |
ट्रैन जब प्लेटफार्म के एक सिरे से दाखिल हुई तो मैंने पाया कि लड़कियों के समूह में हलचल थी | दूसरी दो लड़कियां लम्बी और खूबसूरत लड़की को कोहनियो से धकेल रही थी |
और ये क्या , ट्रैन के दरवाजे खुलने तक वो उस सिरफिरे युवक के पास आ खड़ी हुई थी |
नहीं मालूम उसने  क्या कहा , पर जोर का एक अट्टहास गूंजा | बातचीत की शुरुआत में असजहता को तोड़ने के लिए इस तरह की ठिठोली होती ही है |
"ओह , वाओ , पेनांग " वो युवक अब ऊर्जा से लवरेज था | वो लड़किया मलेसिआ के पेनांग द्वीप की रहने वाली थी |
उसने उस सुन्दर लड़की से पेनांग के बारे में कुछ घिसे पिटे सवाल किये , जैसा खाना कैसा है , घूमने को क्या क्या है ?
फिर.. अगर वो वहाँ आये तो क्या वो उसके साथ घूमेगी ? जबाब बड़ा ही मंत्र मुग्ध सा हाँ था |
वो तीनो लड़कियाँ और वो सिरफिरा भी उसने पीछे ही अगले स्टेशन पर उतर गए थे और बंद होते दरवाजो के बीच मैं देख सकता था कि उस सुन्दर , सुराही सी गर्दन वाली लड़की और उस युवक के बीच फ़ोन नंबर्स का आदान प्रदान हो चूका था |

मैं मेट्रो के शीशे से बाहर ताक रहा था | ऊँचे अपार्टमेंट्स के बीच में पेड़ो का एक छोटा सा झुण्ड था | उसके सिरे पर किसी बिल्डर ने ऊँची सी क्रेन पर लाल झंडा टांग दिया था | सुन्दर ,सदाबहार पेड़ो का वो जंगल बस इंसान की हवस में धुआँ धुआँ होने को ही था |
मुझे चिढ़ क्यों हो रही थी ? क्या मैं रेस में था ? अधेड़ आदमी जिसकी  रेलगाड़ी कब की प्लेटफार्म छोड़ चुकी हो , उसे भला क्यों कर चिढ़ या जलन हो ?
उसे  तो अब तक नियति , उम्र , बायोलॉजी , परिस्थितियाँ  जैसे तमाम कारको के आगे घुटने तक जिंदगी से सामंजस्य बना लेना चाहिए  |  फिर भी मैं द्वन्द में था |

फिर मुझे लगा मेरी  चिढ़ मुझे लेकर नहीं थी |  मेरी जगह कोई भी ऐसा आदमी होता जिसकी  "मरिटोक्रेसी " में अथाह आस्था हो , उसे उन पंद्रह बीस मिनटों में खीज जरूर हुई होती |  बिना किसी प्रतिभा प्रदर्शन,  सिर्फ और सिर्फ  सफ़ेद  चमड़ी  और कॉकेशियन लुक्स की बदौलत वो गोरा प्रेम के मैदान में सफलता के झंडे गाढ़ता चला गया था !










  

बोझ



हाँ ,वह  चली गयी थी | उसे जाना ही था |
और वह इतनी सफाई के साथ गयी थी कि चींटी को भी पता ना चलता |
 पर मोहल्ले के एक साँसिये बूढ़े ने, जिसे दमा रत भर सोने न देता था ,  उसने अहले सुबह , सूरज की लाली फूटने से भी घंटा भर पहले , उसे किसी अनजान नौजवान के साथ मोटर साइकिल  पर पीछे चिपक कर जाते देखा था | जीन्स पहने , लड़कों  की तरह टांग फैलाकर बैठे, पीठ पर बड़ा ट्रैकर बैग लाधे और एक हाथ में पॉलीथिन लटकाये , वो फरफराती हुई निकल गयी थी | रीति रिवाज , इज्जत , लाज ,सबको ढेंगा दिखाती|  कम्बख्त , अकल की मारी  |

बमुश्किल अठरह बीस साल की ही तो हुई होगी |  कद की थोड़ी छोटी , गौरवर्ण ,तोते जैसी नाक , बड़ी बड़ी कटार जैसी आँखें  और  वाचाल | चाल चलन लड़को जैसा था उसका | इंदिरा कट बाल रखती | डंडे वाली ऊँची मर्दानी साइकिल दौड़ाती | मोहल्ले में लड़कियों में जीन्स टॉप पहनने का चलन उसी ने तो शुरू किया !
वो आँखे मटका के बातें करती तो गांव की बड़ी बूढ़ियाँ उसे टोक देती  " ऐ लल्ली , ऐसे आँखो में आँखे डाल के बाते न किया कर | बहु बेटी लजाती हुयी ही अच्छी लगा करें हैं  |"
और वो कहती " क्यों काकी , लजाय वो जो चोर हो , जिसमें कोई खोट हो |  मैं क्यों लजाऊ  | "
उससे कौन जीतता भला | मुँहजोर थी वो लड़की |

पर इतना बड़ा दाग | उफ्फ !
जेठ की दुपहरी में सूरज अंगारे बरसाता हो , उसी की हाँ में हाँ मिला पछवा लू थपेड़े लगाती हो और ऐसे में गाँव के एक सिरे पर आग लग जाये | बस  कुछ इसी रफ़्तार से उस लड़की के भाग जाने की खबर गाँव भर में फैल गयी  |
गाँव की होशियार , तेज तर्राट , हर घर के चूल्हे चौके की खबर रखने वाली जनानियों ने एक सुर में कहा " हमे पता था कि वो भागेगी , उसके लक्षण कहते थे | "
गाँव की सीधी सुदल्ली औरतें , जिन्हें  घर की दहलीज  के बाहर की कुछ भी खबर नहीं होती   , उन्होंने भी कहा " हमें तो पहले से ही  पता था वो भागेगी , उसके लक्षण कहते थे ! "

खैर , उस नवयौवना के इस तरह प्यार में अंधे हो भाग जाने की खबर की सनसनाहट जब कम हुई तो गाँव वालों की तबज्जो उसके परिवार की तरफ मुड़ हुई |
बड़े बूढ़े , औरत ,मर्द सबको गुस्सा आया कि इन ससुरो को दिखते  ना थे उसके लक्षण|  वो पूरे दिन कान  में फ़ोन की लीड फंसाये छत पर खड़ी  रहती थी|  जाने किस किस से बतलाती थी | महतारी की आँखें फूट गयी थी क्या | दो दो जवान हलंता भईया घर में पड़े डकारते रहे  , इन जानवरों  को कैसे खबर न हुई | भेड़ के फूफा हैं ये सब के सब | अहह , सबकी ही मत मारी गयी | 

गाँव वालों  का गुस्सा जायज था | वो यूँ , कि  सबके घरों  में जवान होती बेटियाँ थीं  , नई बहुए थीं |  इस तरह के कुकृत्यों का असर सबके कच्चे दिमागों पर पड़ता है | वो सब अपने परिवारों को लेकर फिक्रमंद  थे | 

फिर ऐसा हुआ कि दो तीन दिन बाद  चेतराम ने अपनी जनानी  को खूब जम कर पीटा | और इस कदर पीटा कि उस बेचारी को पड़ोस  के घर में छिप कर जान बचानी पड़ी | और पीट पीट जब उसका शरीर हाँफने लगा तो वो मरियल हाड का आदमी चबूतरे पर आ खड़ा हुआ और खूब ऊँचे सुर में फड़फड़ाया " मेरे ससुर की जनि , मैं दिन रात खेती कमावै था | औलाद पे नज़र रखने का काम तेरा था | बता तेरा था कि  नहीं |ओ हरामन , नीच कमीन खानदान की पैदाइश , बता तेरा फ़र्ज़ था कि नहीं ?"
चौराहों पर , बीड़ी गुटखों की गुमटियों पर खड़े हर आदमी ने कहा " सही बात है | आदमी दिन रात खेत में कमावै था |  धी बेटी पे नज़र रखने का काम मां का हुआ करे है !"
चबूतरे पर झुण्ड में बैठे लोगो को सुना एक बुजुर्ग ताऊ ने धीरे से पर ताल के साथ कहा
"नार नहीं नौरंगी है , नौरंगी नहीं रसरंगी है |
रसरंगी नहीं , दशरंगी है |
ढक ले तो ढक ले सारे कुल को , नहीं तो नंगी की नंगी है | "

और फिर झुण्ड में से कई मर्द एक साथ बोले " नहीं तो नंगी की नंगी है | "
उन सबका पर्याय नारी द्वारा परिवार की इज़्ज़त तार तार करने से था |

चेतराम के तीन बच्चे थे | बड़ा लड़का मंगेश , उससे छोटी ये मुंहफट  निम्मी  और छोटा लड़का गुड्डू |

मंगेश बी ए पास था | दिल्ली में नौकरी के लिए कोचिंग तक कर आया था, पर घर ही पड़ा था | उम्र निकल रही थी पर आस में था | बहुतों ने  समझाया "बेटा उम्र निकल रही है |  सरकारी नौकरियाँ तो दिन ब दिन कम ही होती जा रहीं हैं |  कुछ प्राइवेट काम ही कर लो | पैसा तो प्राइवेट में भी अच्छा खासा है|  "
पर कुल जमा सत्ताईस  सावन देख चुका और बहुत ही ज्ञानी मंगेश एक हथेली से दूसरी हथेली को पीटता ,कहता " ना कक्का  , होना तो पटवारी ही है ! "
फिर वह तिरछी निगाह कर दाएं  हाथ से चुटकी बजाता और कहता " पांच साल में औसत निकल आएगा कक्का  , पांच साल में|  "
फिर अपने अनवरत संघर्ष और कोशिशों की कहानी को आगे खींचता  मंगेश कहता " बात तो हमारी हो गयी थी कक्का , सीधे लखनऊ सचिवालय में | दस लाख में | रकम  उधर और लेखपाल का नियुक्ति पत्र हमारे हाथ | "
और ऐसा कहते हुए वो हाथ की मुठियाँ भींच  लिया करता |
फिर निराश हो कहता " क्या करें  , निम्मी का भी देखना है |  इसके बिहा का काम सबसे अर्जेंट है|  "

पता नहीं कितनी दिवाली आयीं गयीं , उनके घर में रंगाई पुताई तक न हुई | चेतराम को रोज रात को जोर की खांसी का दमदमा उठता ,  पर शहर तक दवाई तक लेने न जाते   |  गांव में ही कुछ अलाय बलाय , जड़ी बूटी खाते   | रोता  झींकते जीते जाते  |

पर बीमारी ने उस आदमी को नहीं तोडा , बेटी के इस अपमान ने जरूर तोड़ दिया |
मर्द ने खाट  पकड़ ली , कई दिन अन्न पानी नहीं  किया | पूरे घर में ऐसी मुरदाई छाई रही जैसे कोई जवान आदमी मर गया हो | 
लड़कों  ने कहा भी कि  कुछ भाग दौड़ करते हैं , तो चेतराम बोले " जाने  दो |  अब अपमान हो ही गया |  जख्म को कुरेदते रहने से क्या फायदा |  "
चेहरे पर घृणा लिए कहते" जिए या मरे , हमारी लिए तो उसी दिन मर गयी जिस दिन उसने घर की दहलीज से बाहर कदम रखा |"
लड़के क्या कहते , वे  बेचारे अपने बिस्तरों पर पड़े , लाज के मारे,  अपने मोबाइलों  में ताकते रहते |
अजी परिवार को संभलने में महीनो लग गए | पर वो संभल गए |
चेतराम जंगल पानी को निकलने लगे | आखिर कब तक खटिया पर पड़े पड़े औलाद के करम को रोते  |  लड़के भी मोटरसाइकिलों  से इधर उधर जाने लगे !



वक्त का क्या है , सूखी रेत है ,यूँ ही फिसलता निकल जाता है | साल बीता , दो साल बीत गए | गाँव वाले अपनी अपनी जिंदगियों में उलझ गए | चेतराम और उसका परिवार पुराने ढर्रे पर आ गया |
मोहल्ले की कोई काकी शहर गयी थी दवा लेने | अस्पताल के बाहर संयोग से निम्मी उससे टकरा गयी |
काकी ने देखा अनदेखा किया पर निम्मी का मन ऐसा उखड़ा, ऐसा उखड़ा  कि वो काकी से लिपट गयी और खूब रोई  |
औरत का चरित्र जो होता है , भावनाओ का ढेर होता है , निम्मी ने हिड़की बाँधी तो काकी का वात्सल्य भी बह चला |
रो धो जी हलके हुए तो दोनों चुप हुई |  काकी ने अपने दोनों हाथ निम्मी के गालों पर रख दिए और बोली" ठीक है मेरी बच्ची ?"
" बस काकी अच्छी हूँ | "
"जीती रह मेरी बच्ची |"
 काकी थोड़ा रुकी , जैसे ये तोलती हो की कुछ कहा जाए या नहीं | "ये निमिया , तुझे ऐसा करना न था मेरी बच्ची|  " काकी ने कह दी , जो उसके दिल में थी | 

निम्मी का जो चेहरा अभी तक किसी छोटे बच्चे जैसा नरम , रुआंसा था, अचानक से सख्त हो गया |
"बस काकी , जो होना था , हो गया | "
फिर खीज और गुस्से के मिश्रित भाव लिए वो बोली" अब तो सब दिलद्दर निकल गया होगा उस घर का , है न काकी ?"
"उनके सारे काम मेरी वजह से ही तो रुके पड़े  थे |
मंगेश की नौकरी लग गयी होगी | पिता जी की दवाई हो गयी होगी | क्यों ?"
"घर भीत लिप पुत गए होंगे | "
" नई भैसिया आ गयी होगी , बाल्टी दो बाल्टी दूध होता होगा|  "
"नया टूबवैल लग गया होगा | "

काकी ने उसे रोका " औ मेरी बच्ची , मेरी मुनिया वो सब वैसे के वैसे हैंगे  , जैसा तू छोड़ के आयी |  करमजले , एक लम्बर के  निकम्मे | "

"क्यों , क्यों ? उन्होंने जो सारी संपत्ति मेरे लिए जोड़ कर रखी थी, अब तो सब काम बन जाने चाहिए थे | "

फिर निम्मी बहती चली गयी |
"काकी,  जब से मैंने उस घर में होश संभाला , सिवाए तानो के कुछ न सुना | उनके हर काम में मैं रोड़ा थी |
बोझ ऐसा भारी  , जिसके तले पूरा परिवार दबा चला जा रहा था |
मुझे भी लगता था उनके  दुखों  का कारण मैं ही थी  |
साल दर साल , गाहे बेगाहे वो मुझे ऐसे दलदल में धकेलते चले गए जहाँ मुझे अपने वजूद से ही घिन हो चली थी |
मैं वहाँ रहती तो मर ही जाती , काकी | मर ही जाती मैं | 
बस ये समझ लो , कि मौत और अपमान में से मैंने अपमान को चुना | "

"और सुनो |  जिस दिन मैं आई काकी , मैं कोई दुबक छिपक के ना आई  | मैं जब निकल रही थी तो मेरी महतारी ने जान बूझ मेरी  तरफ से मुँह फेर लिया | उस माँ ने जिसने मुझे अपनी कोख में पाला | उस माँ ने ! "
निम्मी का गला फिर से रुंध आया  था " वो मुझसे छुटकारा चाहते थे काकी |  वो सब के सब मेरा जाना चाहते थे | सच्ची मानियो काकी | मेरा जाना उनकी सबकी मर्ज़ी था | "

काफी देर हो गयी थी |  निम्मी का पति मोटरसाईकिल पर खड़े खड़े आवाज़ लगा रहा था | काकी को नमस्ते कर निम्मी आगे बढ़ गयी थी |


                                                                                             सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                             रविवार , १२ जुलाई २०२०  

फ्लोरल मास्क

पता नहीं ये अनुशासन कब तक कायम रहेगा पर आजकल मेरा रूटीन ये है कि जरूरी,  गैर जरूरी, पसंद ना पसंद , हर तरह के काम निपटाते हुए मैं शाम के साढ़े...