रविवार, 12 जुलाई 2020

चमड़ी की फसल


उस आदमी को मैं जानता था | ठीक ठाक जानता था | ठीक उतना  ही , जितना  मैं मेरे ऑफिस के पास की रेड लाइट पर लगे लैम्पपोस्ट को जानता हूँ |  मतलब बिना किसी प्रजोयन , बिना किसी प्रयास , बस भौगोलिक परिस्थिति वश |
मैं उसे जानता तो था  , लेकिन वो इस दर्जे का कलाकार है ,इसका गवाह मैं पहली बार बना !

उस आदमी का रूटीन मेरे रूटीन से मेल खाता था | अक्सर वो नौ से दस के बीच की किसी ट्रैन से उतरता | हम एक ही लालबत्ती पर सड़क पार करते और सिंगापूर के बिज़नेस पार्क में , कार्डबोर्ड के चट्टे जैसी इमारतों के झुण्ड में खो जाते | मेरी ही तरह वो भी किसी आई टी फर्म या बैंक में चाकरी करता रहा होगा |
उसका  व्यक्तित्व बड़ा  रूखा, उबाऊ जान पड़ता  था | मेरा अनुमान है कि वो तीस का तो रहा ही  होगा | उसका चेहरा किसी ज्यादा नमक खाये बकरे जैसा फूला हुआ था | कद पांच नौ या पांच दस रहा होगा  | बाल घने थे , बालिश भर लम्बे ,लापरवाह हिप्पिकट में , कनपटियों से  किनारे छोड़ने लगे  थे | मोटा तो नहीं , थोड़ी बियर बैली लिए था | डील  डॉल से  मुझे नहीं लगता वो अपने को फिट रखने को कुछ ख़ास तबज्जो  देता  होगा |
अमूमन तौर पर वो कोई सिलेटी या बदरंग ट्रॉउज़र पहने , ऊपर से लूस टीशर्ट डाले होता था | हमेशा उनींदा , जैसे किसी ने जबरदस्ती बिस्तर से  उठाकर सड़क  में धकेल दिया हो | उसके अंग अंग से आलस टपकता था |
उसके जूते एंटीक पीस मालूम होते थे ,पुराने  स्पोर्ट्सवेयर, जिन्हे मानो कोई सालों तक घर के कोने में फेंक कर भूल गया हो |
 कुछ भी आकर्षक नहीं था | एस्थेटिक्स के लिहाज से  मैं उसे औसत से भी कम आंक सकता हूँ |


बिज़नेस पार्क और मेट्रो स्टेशन की बीच में एक मॉल है , जिसके गलियारे पैरामीशियम की आकृति लिए हुए है , जूते की सोल की तरह घुमाब लिए हुए  |
शाम को अक्सर मैं मॉल के फ़ूड कोर्ट में खाना खाता और फिर विंडो शॉपिंग करता हुआ , घूमता फिरता निकल जाता |
स्टेशन के दूसरी पार एक एक्सहिबीशन सेंटर है जहाँ अक्सर कुछ अच्छी तो कुछ वाहियात थीम वाली प्रदर्शनियाँ लगा करती है | उस शाम को कोई फ़ूड एक्सहिबिशन लगी थी वहाँ |
तंदूरी रोटी और पनीर की खुराक को 'ते सी सुताये'(कम चीनी की चाय ) के सहारे पेट में धकेल मै फ़ूड कोर्ट से निकल रहा था |
तीन चीनी मूल की युवतियाँ  , किनारे के एस्कलेटर से चढ़ी , एक दुसरे से चिपकती हुई , थोड़ी असहज |
उनकी असहजता शायद उनके नए परिवेश में होने को लेकर थीं | शायद लोकल नहीं थीं |
"हेलो  ब्यूटीफुल !" इतना कह कर एक  युवक मेरे बगल निकल कर चला गया | वही आदमी !
और वो तीनो लड़कियां , खिलखिला के  हँस दी | वो व्यक्ति  बिना रुके एस्कलेटर से उतर गया | लड़कियां कुछ आगे बढ़कर ठिठकी फिर जिज्ञासा वश मुड़ उसे जाते हुए देखने लगी |
ये जरा भी अप्रत्याशित नहीं था | इस तरह के कॉम्प्लिमेंट्स , खासकर मेरे परिवेश में बड़े आम से है | सिंगापूर में दुनिया के कोने कोने के आदमी है , सब अपना अपना कल्चर , अपनी आदतें , तौर तरीके लेकर आते है  | और इस सब का प्रदर्शन यहाँ  वहाँ होता रहता है |


माल के एग्जिट पर और मेट्रो स्टेशन के बाहर स्टील के बेलनाकार स्टैंड लगे है , जिन पर लोगबाग अक्सर अपने शॉपिंग बैग्स  रख सांस ले लेते है , या कई बार जूते की लेसेस बाँधने के लिए टिककर खड़े हो जाते है |
मै एग्जिट से निकला, तो मैंने उसे एक स्टैंड के सहारे खड़े हुए पाया |  बड़ी ही चौड़ी मुस्कान बिखेरते हुए | इतनी चौड़ी कि उसके होंठ एक कान से दुसरे कान तक कमानी की तरह खिंचे हुए थे !
वो मुझे देख कर भला क्यों मुस्कुराएगा , आखिर मैं उसे उतना ही जानता था जितना कि रेड लाइट पर लगे लैम्पपोस्ट को !
और मेरा अनुमान गलत नहीं था | मेरे ठीक पीछे वो तीन युवतियां भी चली आ रही थी |
उन्होंने भाँप लिया और थोड़ी असहज होती वो ठिठक गयीं |
"शायद ये पिए हुए है , अल्कोहल ने इसके न्यूरल सर्किट को कुछ अस्थ्याई नुक्सान पहुंचाया है "हाँ  यही लगा मुझे |
मैंने अपनी चाल धीमी कर दी | वो धीमे से मेट्रो स्टेशन के एस्केलेटर पर उतरने लगा , किसी टिपिकल टपोरी की तरह सीटी बजाता हुआ | उससे थोड़ी दूरी पर वो तीन युवतियाँ भी सीढ़ियां उतरने लगी |
तीनो लड़कियों की आकृतियाँ अलग ही थी | एक लम्बी , दूसरी औसत लम्बाई तो तीसरी कम विकसित छोटी बच्ची जैसी |
उम्र के हिसाब से वो तीनो बीस बाइस की ही रही होंगी |
लम्बी लड़की सुन्दर , सुतवा , सुराही सी गर्दन लिए | वो किसी कोरियन पॉप स्टार जैसी ड्रेस पहने थी | चीनी जीन पूल से आने के बाबजूद उसकी नाक रोमन थी | मंझली थोड़ी कमतर , लेकिन  आकर्षक , कलर बाल , स्टाइलिश हैंडबैग , डिसेंट |
तीसरी किसी भी टिपिकल स्कूल गोइंग किशोरी जैसी |

उस सनकी आदमी को एस्कलेटर पर न जाने क्या हुआ वो पीछे मुड़ा और बड़ी भोंडी सी हंसी हंसा | उसकी आँखों में , उसके लहजे में इच्छा थी |
'इच्छा' मानव मूल का स्वभाव  है , लेकिन ये रिझाने का  तरीका ही तो होता है जो परवर्ट और डिसेंट होने का फर्क पैदा करता है | एक तरीका होता है शालीन  और मर्यादित | एक होता है फूहड़ , जंगली |
एक तरीका होता है जो सौंदर्य के आगे नतमस्तक हो गुजारिश करता है , तारीफों की झड़ी लगा अपना मुकदमा पेश करता है , सुनवाई होती है , बात जंचती है तो निगाहे करम !
फूहड़ता के हिस्से में क्या आता है : थप्पड़ , धमकी या फिर नजरंअदाजी !


मुझे अभी तक ये समझ नहीं आ रहा था कि वो आदमी किस बात को लेकर इस कदर कॉन्फिडेंस से लबरेज था | प्लेटफार्म पर वो कुछ यूँ मुँह फेर कर खड़ा हो गया जैसे कोई कन्हैया हो और अदृश्य डोर से बंधी गोपियों का उसकी गोद मेम गिरना ही नियति हो |
फिर वैसा ही हुआ जैसा मुझे आभास था | उस सिरफिरे को पूरी तरह इग्नोर मार उन नवयौवनाओ की टोली प्लेटफार्म पर दूसरी तरफ चली गयी |
ट्रैन आने में अभी पूरे छ मिनट थे | स्टेशन पर लगे डिस्प्ले स्क्रीन पर कुछ नामशहूर एक्टर्स दिखा रहे थे कि किसी संदिग्ध की पहचान कैसे करें , अनजान वस्तु दिखे तो कैसे रिपोर्ट करें |
ट्रैन जब प्लेटफार्म के एक सिरे से दाखिल हुई तो मैंने पाया कि लड़कियों के समूह में हलचल थी | दूसरी दो लड़कियां लम्बी और खूबसूरत लड़की को कोहनियो से धकेल रही थी |
और ये क्या , ट्रैन के दरवाजे खुलने तक वो उस सिरफिरे युवक के पास आ खड़ी हुई थी |
नहीं मालूम उसने  क्या कहा , पर जोर का एक अट्टहास गूंजा | बातचीत की शुरुआत में असजहता को तोड़ने के लिए इस तरह की ठिठोली होती ही है |
"ओह , वाओ , पेनांग " वो युवक अब ऊर्जा से लवरेज था | वो लड़किया मलेसिआ के पेनांग द्वीप की रहने वाली थी |
उसने उस सुन्दर लड़की से पेनांग के बारे में कुछ घिसे पिटे सवाल किये , जैसा खाना कैसा है , घूमने को क्या क्या है ?
फिर.. अगर वो वहाँ आये तो क्या वो उसके साथ घूमेगी ? जबाब बड़ा ही मंत्र मुग्ध सा हाँ था |
वो तीनो लड़कियाँ और वो सिरफिरा भी उसने पीछे ही अगले स्टेशन पर उतर गए थे और बंद होते दरवाजो के बीच मैं देख सकता था कि उस सुन्दर , सुराही सी गर्दन वाली लड़की और उस युवक के बीच फ़ोन नंबर्स का आदान प्रदान हो चूका था |

मैं मेट्रो के शीशे से बाहर ताक रहा था | ऊँचे अपार्टमेंट्स के बीच में पेड़ो का एक छोटा सा झुण्ड था | उसके सिरे पर किसी बिल्डर ने ऊँची सी क्रेन पर लाल झंडा टांग दिया था | सुन्दर ,सदाबहार पेड़ो का वो जंगल बस इंसान की हवस में धुआँ धुआँ होने को ही था |
मुझे चिढ़ क्यों हो रही थी ? क्या मैं रेस में था ? अधेड़ आदमी जिसकी  रेलगाड़ी कब की प्लेटफार्म छोड़ चुकी हो , उसे भला क्यों कर चिढ़ या जलन हो ?
उसे  तो अब तक नियति , उम्र , बायोलॉजी , परिस्थितियाँ  जैसे तमाम कारको के आगे घुटने तक जिंदगी से सामंजस्य बना लेना चाहिए  |  फिर भी मैं द्वन्द में था |

फिर मुझे लगा मेरी  चिढ़ मुझे लेकर नहीं थी |  मेरी जगह कोई भी ऐसा आदमी होता जिसकी  "मरिटोक्रेसी " में अथाह आस्था हो , उसे उन पंद्रह बीस मिनटों में खीज जरूर हुई होती |  बिना किसी प्रतिभा प्रदर्शन,  सिर्फ और सिर्फ  सफ़ेद  चमड़ी  और कॉकेशियन लुक्स की बदौलत वो गोरा प्रेम के मैदान में सफलता के झंडे गाढ़ता चला गया था !










  

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