सुनो , कभी कोसना मत किस्मत को , कि कब तक पापड़ बिलबायेगी |
कब तक आजमाएगी |
क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत तुम्हारे सामने ऐसे शानदार नज़ारे खोलेगी कि देखने वाले कहेंगे कि सब नसीबों की बात है |
सुनो , कभी कोसना मत किस्मत को , कि कब तक पापड़ बिलबायेगी |
कब तक आजमाएगी |
क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत तुम्हारे सामने ऐसे शानदार नज़ारे खोलेगी कि देखने वाले कहेंगे कि सब नसीबों की बात है |
जानते हो ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?
क्योकि ये जवानियों पर फलते फूलते हैं |
इन नौकाओं में आती जवानियों पर |
जवानियाँ जो आती है दूरदराज के गाँवों से |
मेरे इलाके के गाँव से |
फिर वे सींचती है इन शहरों को , भरती हैं इनकी रगो में अपना खून |
और जब ये शहर उन जवानियों को निचोड़ चुके होते है , तब उनके बचे खुचे मलबे को वापस भेज देते है |
इन्ही नौकाओं में | उन्ही गावों में जहाँ से वे आये थे |
ट्रैन पटरी पर चल रही है , सही समय पर |
एस्कलेटर इंसानो को पाताल में बने स्टेशनो से जमीन की सतह तक ले जा रहे है |
ट्रैफिक लाइटें जल रही है और ट्रैफिक स्मूथ है |
आदमी काम पर जा रहा है |
कैसी रोजमर्रा की बातें हैं | मामूली हैं |
मामूली चीज़े मामूली होती हैं तब तक जब तक वे हो रही होती है | उनका रुक जाना गंभीर होता है |
जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ?
शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं |
रोज रोज कहाँ टांगी जाती है ऐसी रंगीन कंदीले |
और ये सोचकर मैं सुकून पाता हूँ कि शायद तुम अब भी उत्सव सा मानती होंगी अपने मिलन का
जो उत्सव की ही तरह लघु था , दुर्लभ था |
असहज
यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं |
कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ |
सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ |
और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी |
कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो पति होने से पहले मर्द हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद | मरद जो घोड़े की गर्दनों पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे मरद आपने पाषाण पर |
सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे परिवार जहाँ मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !
अच्छी खासी पढ़ती लड़की |
सपने ऊँचे गढ़ती लड़की |
फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है
और पढाई छुड़ा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा |
गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी |
फिर प्रलोभन में बिहा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे
आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे |
भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर
मनबल सकल गिरा देते हैं |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी |
दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी |
फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
जानते हो मुझे ऐसे कैफे में बैठ कर चाय पीना क्यों पसंद है | वो यूँ के ऐसे ही चाय के साथ बैठ मैंने न जाने कितने ही लोगो को खोला है | ऐसे लोग जो खुशहाल शादियों में है पर जिन्होंने सालों से अपने पार्टनर का हाथ तक नहीं थामा | लोग जो ऊँचे ओहदो पर है पर उनका बस चले तो सब कुछ छोड़छाड़ कर पहाड़ भाग जाए ,अकेले।
लोग जिनकी अपने भाई बहनो से बात तक नहीं होती , प्रॉपर्टी के चक्कर में |
चाय की चुस्कियों के साथ पीना सीख रहा हूँ मैं उनका अकेलापन , उनका गिल्ट , उनकी बेबसी , उनका ट्रामा |
हर इंसान भरा बैठा है | मैं सीख रहा हूँ उसे खोलना , हर एक कप चाय के साथ |
लोग , मेरी पीढ़ी के लोग
जो मानते रहे और जीते रहे इस फलसफे को कि रहा जा सकता है एक ही घर में बिना प्यार क्योकि खुद के वजूद से कही बड़ा होता है परिवार
पीढ़ी आखिरी पीढ़ी जिसके नितम्बों पर आज भी छपे है बचपन में अनुशासन में बाँधने को बरसी कमचियों के निशान
पीढ़ी जिसने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था अपना पहला फ़ोन
पीढ़ी जो छिपाती रही माँ की बात बीवी से , बीवी की बात माँ से इस उम्मीद कि क्या हर्ज़ है जो जुड़ा रहे परिवार रहकर थोड़ा मौन
लोग जिन्होंने अपने शौक अपनी इच्छाएं अपनी पसंद सब बाँध दिया खूंटी पर
जुट गए ऐसे कामों में जहाँ रोज पीना होता है खून का एक घूँट
देखता हूँ क्षितिज में कैसे नए आत्ममुग्ध लोग उतरे आ रहे हैं
सब कुछ सहकर जीने वाली मेरी पीढ़ी के लोग अब बुढ़ा रहें हैं
भ्रम में जी रहे हो तुम ,अगर तुम्हें लगता है कि AI, या कोई भी कटिंग एज टेक्नोलॉजी सीख लेने से तुम्हारा करियर उड़ान भर देगा l
हो सकता है ये चंद साल तुम्हारी जॉब बचा ले जाये l सर्वाइवल लेवल पे ही l
असली स्किल कुछ और है l
असली स्किल है अपने ऑर्गेनाइजेशन में अपने से ऊपर बैठे ऐसे आदमी तक पहुँच पाना जिसके पास तुम्हे पोडियम पे खड़ा करने की अथॉरिटी है l
ना सिर्फ़ पहुँच पाना बल्कि उस आदमी को ये एहसास दिला पाना कि तुम उसके बड़े काम के आदमी हो l हर बड़े आदमी को बहुत सारे दाये हाथ बाये हाथ की दरकार होती है जो उसकी ख़ुद तरक्की झंडा उठा कर चलें lजिस दिन आप ने ये परसेप्शन बना लिया , समझ लो तरक्की की सीढ़ी पे तुम्हारा पाव पड़ गया l बाक़ी सब टेक्नोलॉजी आनी जानी है ल
सोचता हूँ मैं , कोई समाजविद क्यों नहीं ढूढ़ता इस बात का जबाब , कि अब अमूमन हर कामकाजी आदमी की जिंदगी में रविवार ऐसे क्यों नहीं आता , जैसे पहले ज़माने में आता था | लापरवाह सा , किसी त्यौहार सा | अब ऐसे आता है जैसे अगली सुबह जंग पर जाना है और आज ही अपनी रसद जुटाना है | अजीब सा चिड़चिड़ा , feel low day हो गया है रविवार | क्यों हो गया है ऐसा ?
दुनिया बदल गयी है | रविवार भी बदल गया है |
सुनो , कभी कोसना मत किस्मत को , कि कब तक पापड़ बिलबायेगी | कब तक आजमाएगी | क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत त...