अच्छी खासी पढ़ती लड़की |
सपने ऊँचे गढ़ती लड़की |
फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है
और पढाई छुड़ा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा |
गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी |
फिर प्रलोभन में बिहा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे
आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे |
भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर
मनबल सकल गिरा देते हैं |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी |
दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी |
फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
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