असहज
यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं |
कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ |
सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ |
और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी |
कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो पति होने से पहले मर्द हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद | मरद जो घोड़े की गर्दनों पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे मरद आपने पाषाण पर |
सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे परिवार जहाँ मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !
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