शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

उन्हें ग्लैमरस सपने नहीं आते

लड़कों को , जिन्हे मिलकियत के नाम पे मिलती है सिर्फ दो बीघा जमीन , लोन में डूबे  हुए माँ बाप , गली का पतला मकान , और जवान होती बहन | ऐसे लड़कों को सपने नहीं आते : पैशन के , ऊँचे बिज़नेस के , स्टार बन जाने के | उन्हें नज़र आती है तो सिर्फ सरकारी नौकरी | एक अदद सरकारी नौकरी जो पूरे परिवार को उबार सकती है | 


एक अदद सरकारी नौकरी पूरे परिवार के सम्मानपूर्ण जीवन की गारंटी होती है | 

Survival mode

ये जो कांच के ऊँचे कॉर्पोरेट ऑफिस से घर लौटते लोग है न , 

इनमे से न जाने कितने सिर्फ survival mode में ही जीते हैं 

नौकरी में survival, work visa में survival , पर्सनल रिश्ते , फिजिकल हेल्थ , मेन्टल हेल्थ , सब में बस जैसे तैसे survival 

विडंबना ये है कि इनमे से बहुतों के जीवन में बिना डर जीने का मोड़ शायद कभी नहीं आएगा | 

survival mode से सीधे not fit for work mode ही आएगा 


बुधवार, 22 अप्रैल 2026

विरोधाभास

 कितना मज़ेदार विरोधाभास है ये कि अनाप शनाप कीमतों में तुम्हें चीज़ें बेचकर , तुम्हे गरीब करने वाले ये ब्रांड्स तुम्हे बदले में अमीर होने का एहसास बेचते है !

और उतनी ही मज़ेदार बात ये कि इस लेवल के मैनीपुलेशन में जहाँ ये तय इंडस्ट्री तय करती है कि तुम्हे इस साल क्या पसंद आएगा , तुम ख़ुशी खुशी सारा सामान माय लाइफ - माय चॉइस समझ के उठा रहे होते हो !

मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

स्पोर्ट्स शूज

जमाना लग गया | स्त्रियों को सलवार के साथ स्पोर्ट्स शूज पहन कर काम पर जाने में | 

क्योंकि उसे विरासत में सलवार ही मिली है | स्पोर्ट्स शूज उसने पुरुषों के वर्चस्व वाले दंगल में 

अपना कौशल दिखा कर जीते है |  

बुधवार, 15 अप्रैल 2026

प्रेम केवल वहाँ टिकता है

 रिश्ते में प्रेम कहाँ टिकता है ? केवल वहाँ  , जहाँ दोनों को लगता हो कि मुझे मेरी औकात से ज्यादा मिला है | 

कहीं और ऐसा ना मिल पाता |

बाकि की सारी दुनिया अपने रिश्ते सीजफायर मोड जी रही है | दबे ढके , इधर उधर से समर्थन की जुगत में लगी ही रहती है |   


रोना छोड़ दोगे अपने रिश्ते के अधूरेपन का , जिस दिन जान लोगे कि सोशल मीडिया पे 'माय वाइफ , माय लाइफ ' , 'बेस्ट हबी इन दी वर्ल्ड ' के स्टेटस लगाने वाले भी अपने रिश्तों से खुश नहीं हैं ! 

शनिवार, 21 मार्च 2026

इंसान लड़ते ही रहेंगे

इंसान आपस में लड़ते ही रहेंगे | 
तब तक , जब तक तीन टांगी वाले एलियंस धरती पर नहीं आ जाते और इंसानो को एक साझा दुश्मन नहीं मिल जाता | 
जैसे प्रेम है , भूख है , लालच है , वैसे ही इंसान के वजूद में नफरत भी है | 

आदमी का एवोलुशन एक कबीलाई प्राणी के तौर पर हुआ है | और हर एक कबीले वालो को दूसरे कबीले वाले बतौर दुश्मन लाजिमी ही चाहिए | 
सो , सहूलियत के हिसाब से , कहीं हिन्दू  मुस्लिम के नाम पे, कही अरब यहूद के नाम पे , अमीर गरीब के नाम पे , काले गोर के नाम पे , कम्युनिस्ट कैपिटलिस्ट के नाम पे , इंसान लड़ते ही रहेंगे | 
लड़ते रहना ही इंसान के वजूद को पूरा करता है | 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2026

ऐब भी हुनर

ये दुनिया तुम्हारे ऐबो में भी हुनर ढूढ़ लेगी | वैसे ही जैसे एक अच्छे कवि की ख़राब कविता में लोग गूढ़ मायने तलाश लेते है | 

शर्त बस इतनी है कि तुम्हारा शुमार कामयाब लोगों में हो |  

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

इत्ता सा सफर

गाँव के फार्म से शहर को निकला आदमी अपनी पूरी जवानी इस प्रयोजन में काट देता है कि वो बुढ़ापे में अपने फार्महाउस में आराम से रहेगा | 

यानि कि उसकी जिंदगी की तमाम भागदौड़ का हासिल फार्म से फार्महाउस तक का सफर ही है | 

विडंबना ये कि ये सफर भी विरले ही हासिल हो पाता है ! 

काम हमेशा रहेगा



ये जो दुनिया भाग भाग कर काम कर रही है 

काम को खत्म कर देना चाहती है 

क्या इसे नहीं पता 

काम कभी खत्म नहीं होता 

इंसान खत्म हो जाता है | 

काम शाश्वत होता है 

तुम्हारी व्यस्तताएँ फ़र्ज़ी हैं | तुम्हारे 'जरूरी' काम , दुनिया के लिए इतने जरूरी नहीं है, जितने तुम्हे लगते हैं | 


सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

वह हीरो नहीं है

अपनी निजी जिंदगी खूंटी पे टाँगकर ऑफिस में दूसरों से ज्यादा और तय घंटों से देर तक काम करने वाला आदमी कोई हीरो नहीं होता | 

इसके बरक्स , ऐसा आदमी , अनजाने में ही अपने साथियों के लिए एक ऐसा बेंचमार्क खड़ा कर रहा होता है , जो असाध्य भी है और गैरजरूरी भी | 

और इसके बदले में वो खुद क्या पाता है ? परसेंट दो परसेंट ज्यादा सैलरी  , थोड़ा सा ज्यादा बोनस , जिससे वो पास के मॉल में जाकर या ऑनलाइन ही , गैरजरूरी सामान खरीदता है | खुद को पैंपर करने के नाम पर | 

यानी कि ये आदमी अपने कलीग्स के लिए तो नुकसानदायक होता ही है , ये ब्लाइंड consumerism की लालची मशीन में ईंधन झोंक धरती को भी नुक्सान पंहुचा रहा होता है | 


क्या आपके आस पास है कोई ऐसा आदमी ? 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2026

ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं

 "ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं? इसलिए... क्योंकि तरक्की की सीढ़ी के पायदान लकड़ी के नहीं होते, ज़िंदा आदमियों के सिर के ऊपर पैर रखकर ऊपर चढ़ना होता है। शरीफ़ दिल का भोला आदमी या तो ऊपर चढ़ ही नहीं पाता, या भूले से चढ़ भी गया... तो वहां उसका कोई वक़ार, कोई रुतबा नहीं होता।"

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

असली स्त्रियों के मूछें भी होती हैं |

सारी उम्र बाहरी रूप और रोमांच के पीछे भागने वाले पुरुष ये स्वीकार ही नहीं कर पाते कि असली स्त्रियों के मूछें भी होती हैं | 

और ये स्वीकार न कर पाना , उनके भीतर एक नासूर की तरह रिसता है | जिसके चलते वे एक चमक से दूसरी चमक , एक शरीर से दुसरे शरीर के पीछे भागते रहते है | पर सुकून कही भी नहीं आता | 

असलीप्रेम  असली लोगों से ही मिल सकता है , मोम के पुतलो से नहीं | 

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

बजरबानी

बजरबानी 


बजरबानी नहीं जानती, क्या होता है फेमिनिज्म !

उसका मर्द जब शराब में धुत्त , किसी के चबूतरे पे पड़ा होता है ,तो वो उठाती है उसे उसकी गुदधी से पकड़ | 

ला पटकती गई भूसे के कोठड़े में , जहाँ सूख जाता है आदमी का नशा और गुरूर , दोनों ही | 

बजरबानी , नहीं जानती क्या होते है वीमन राइट्स के शिगूफे | 

हाँ , वो जब देखती है कि  विष्ठा खाने निकला है  उसका आदमी ,तो वो अपने घुटने के सटीक वार  से चटका देती है उसकी मरदी !

और उतार देती है इश्क़ का बुखार | बजरबानी को क्या पता , क्या होते है गुड पेरेंटिंग के चोचले | वो जब पाती है कि स्कूल को निकला उसका जाया , बस्ता छुपा 

खदाने में गेंद बल्ला नचा रहा है | तो वो आग फूखने की फुकनी से तोड़ देती है अपनी कोख से जने जाए का मंघर | 

और जोड़ देती है बिगड़ा हुआ अनुशासन | ठोकती , बजाती , दनदनाती , सबको सही रास्तों पे लाती |पालनकर्ता, मुखिया ,करताधर्ता ,  सब कुछ होती है बजरबानी | 

  बस गिड़गिड़ाती बेचारी अबला नहीं होती ! 

                                                     सचिन कुमार गुर्जर 

उन्हें ग्लैमरस सपने नहीं आते

लड़कों को , जिन्हे मिलकियत के नाम पे मिलती है सिर्फ दो बीघा जमीन , लोन में डूबे  हुए माँ बाप , गली का पतला मकान , और जवान होती बहन | ऐसे लड़को...