बजरबानी
बजरबानी नहीं जानती, क्या होता है फेमिनिज्म !
उसका मर्द जब शराब में धुत्त , किसी के चबूतरे पे पड़ा होता है ,तो वो उठाती है उसे उसकी गुदधी से पकड़ |
ला पटकती गई भूसे के कोठड़े में , जहाँ सूख जाता है आदमी का नशा और गुरूर , दोनों ही |
बजरबानी , नहीं जानती क्या होते है वीमन राइट्स के शिगूफे |
हाँ , वो जब देखती है कि विष्ठा खाने निकला है उसका आदमी ,तो वो अपने घुटने के सटीक वार से चटका देती है उसकी मरदी !
और उतार देती है इश्क़ का बुखार | बजरबानी को क्या पता , क्या होते है गुड पेरेंटिंग के चोचले | वो जब पाती है कि स्कूल को निकला उसका जाया , बस्ता छुपा
खदाने में गेंद बल्ला नचा रहा है | तो वो आग फूखने की फुकनी से तोड़ देती है अपनी कोख से जने जाए का मंघर |
और जोड़ देती है बिगड़ा हुआ अनुशासन | ठोकती , बजाती , दनदनाती , सबको सही रास्तों पे लाती |पालनकर्ता, मुखिया ,करताधर्ता , सब कुछ होती है बजरबानी |
बस गिड़गिड़ाती बेचारी अबला नहीं होती !
सचिन कुमार गुर्जर
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