चिंता की बात थी , जमीन जायदाद , इतना बड़ा घर ,ऐसे कैसे बिन वारिस रह जायेगा |
चिरैया सा छोटा मुँह लिए फिरै थे बेचारे , विधाता न जाने क्या दिन दिखायेगा |
एक समझदार दाई ने भांप लिया कि बहु का पेट लम्बा है इस बार , गोल नहीं ,
बोली क्यों घबराओ हो भलेमांसो , इस बार लड़का ही आएगा |
और ना जाने सुरसती ही बैठी थी क्या उसकी जुबान पे , लगते अगहन लल्ला हो गया |
कुलदीप आ गया बड़ी हवेली , पूरे गाँव में हल्ला हो गया |
दो दो चिंताओं के पीछे आया था घर का चिराग |
बड़ी मिन्नतें , बड़े पूजापे , तब जागे थे उनके भाग |
और तब से ही कुलदीप का जनम किसी त्यौहार सा मनाया जाता है |
आजाद पड़ोस , यार मिलनिया , अजी पूरा गाँव जिमाया जाता है |
और वे चिंताए , वे लड़कियाँ , वे सको परोसती है खीर और पूड़ियाँ ,
थोड़ा और थोड़ा और खुशामद करती जाती है |
कराहते हुए उठते है सबजन , इतना जोर खिलाती हैं |
हाँ , उन दोनों का जन्मदिन तो नहीं होता |
पर जन्मदिन त्यौहार है और त्यौहार तो परिवार होता है न , पूरे परिवार का |
और फिर वे परिवार की ही तो हैं |
वैंसे ही जैसे परिवार की गायें , परिवार की जमीन , परिवार की अलमारी में रखे गहने , घर पे पछीत में खुलती दुबकी सी खिड़कियाँ |
हाँ , इतना ही वजूद है उनका , वे परिवार की है , महज परिवार की लड़किया |