मंगलवार, 3 नवंबर 2026

महज परिवार की लड़कियां

शहर की बड़ी डॉक्टरनी ने कह दिया कि थोड़ा फांसला लेलो , तीसरे बच्चे के बाद कोई बच्चा नहीं हो पायेगा | 

चिंता की बात थी , जमीन जायदाद , इतना बड़ा घर ,ऐसे कैसे बिन वारिस रह जायेगा | 

चिरैया सा छोटा मुँह लिए फिरै थे बेचारे , विधाता न जाने क्या दिन दिखायेगा | 
एक समझदार दाई ने भांप लिया कि बहु का पेट लम्बा है इस बार , गोल नहीं ,
बोली क्यों घबराओ हो भलेमांसो , इस बार लड़का ही आएगा | 

और ना जाने सुरसती ही बैठी थी क्या उसकी जुबान पे , लगते अगहन लल्ला हो गया | 
कुलदीप आ गया बड़ी हवेली ,  पूरे गाँव में हल्ला हो गया | 

दो दो चिंताओं के पीछे आया था घर का चिराग | 
बड़ी मिन्नतें , बड़े पूजापे , तब जागे थे उनके भाग | 

और तब से ही कुलदीप का जनम किसी त्यौहार सा मनाया जाता है | 
आजाद पड़ोस , यार मिलनिया , अजी पूरा गाँव जिमाया जाता है | 

और वे चिंताए , वे लड़कियाँ , वे सको परोसती है खीर और पूड़ियाँ , 
थोड़ा और थोड़ा और खुशामद करती जाती है | 
कराहते हुए उठते है सबजन , इतना जोर खिलाती हैं | 

हाँ , उन दोनों का जन्मदिन तो नहीं होता | 
पर जन्मदिन त्यौहार है और त्यौहार तो परिवार होता है न , पूरे परिवार का | 
और फिर वे परिवार की ही तो हैं | 

वैंसे ही जैसे परिवार की गायें , परिवार की जमीन , परिवार की अलमारी में रखे गहने , घर पे पछीत में खुलती दुबकी सी खिड़कियाँ | 
हाँ , इतना ही वजूद है उनका , वे परिवार की है , महज परिवार की लड़किया | 

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