वक्त के साथ इंसान ही नहीं बदलते | कई बार शब्दों के मायने भी बदल जाते हैं | ऐसा ही एक शब्द है 'मुआवजा '
मुआवजा का शाब्दिक अर्थ नुक्सान की भरपाई की कोशिश में दी गयी राशि या मदद होता है | गौर कीजियेगा यहाँ नुकसान बड़ी घटना है और भरपाई की कोशिश छोटी |
लेकिन जब बसे ये इधर उधर के हाईवे प्रोजेक्ट , sez , इंडस्ट्रियल प्लॉटिंग जैसे प्रोजेक्ट्स में तेज़ी आयी है और शहरों के पेट बड़े होने लगे है , मैं पाता हूँ कि मुआवजे का मतलब 'बल्ले बल्ले ' हो गया है |
मुआवजे की रकम इतनी मोटी हो गयी है कि काश्तकार खुद सोमवार के रोज बंदरो को चना चनौरी खिला रहे कि हे वानरराज प्रभु तक अर्ज़ी पंहुचा दो कि कोई हाईवे आये और मेरी पुश्तैनी जमीन को चीर फाड़ कर जाए |
और ऐसा होने से वो जमीन बेचने के दाग से भी बच जाए , अपने लोन निपटा दे , बच्चो को धूमधाम से बिहा दे और अमीर हो जाए |
इसमें किसान का उतना दोष है भी नहीं | दरअसल खेती मायूसी की इंतिहा है और मायूस आदमी का चमत्कारों में भरोसा बढ़ जाता है |
मुआवजा चमत्कार ही है | मैंने खुद देखा है कि ऐसे ऐसे इलाके जहाँ कीकर के सिवा कुछ न उगता था , रेह यानि महीन धूल उड़ती रहती थी वहां दिल्ली नॉएडा जैसी समृद्धि आ गयी है | कितने ही लोगो ने दूर के खादर बांगरों में जायदादें खरीद ली हैं | ट्रांसपोर्ट कम्पनिया खोल ली हैं | गांव में चौमंजिला महल खड़े कर लिए है जिनमे लिफ्ट लगी हैं | मकान किराये पर चढ़ा दिए है जिनसे अच्छा भाड़ा आता है |
लेकिन मुआवजे को कमाऊ बैल समझना , जो बस तुम्हारे लिए काम करेगा और चुपचाप चर पर आ खड़ा होगा , गलतफहमी है | ये दरअसल एक खुला सांड है जिसे काबू न किया गया तो ये तबाही लाता है |
पिछवाड़े जो ताउम्र लकड़ी के तख्त के आदि रहे अचानक से थार और फॉर्चूनर मांगने लगते है | ऊलजलूल के बिजनस आईडिया आने लगते है जिनसे आदमी का दिमाग भन्ना जाता है | लड़के गाड़ियां , ट्रेक्टर , बाइक मॉडिफाई कराने लग जाते है जिन पर गोली मारु बीच सड़क पर जैसे भोंडे गाने फुल वॉल्यूम में बजते है |
पैसा जब धीरे धीरे आता है तो आदमी में उसे सँभालने की सलाइयत भी आती है | वो सीखता है कहा नफा है कहा नुक्सान |
अचानक से आयी बाढ़ का आदमी क्या करे ? इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि कितने ही ऐसे लोग हैं जो मुआवजे की रकम कुछ सालो में ही खा पी बैठे और अब उन प्रॉपर्टीज में ही रात के गार्ड की नौकरी कर रहे जो कभी उनकी मिलकियत हुआ करती थीं |
इस अंधाधुंध बहने वाले मुआवजे का सही सही सोशल इम्पैक्ट पकड़ने में अभी वक्त लगेगा लेकिन २ बाते है जो मैं साफ़ पाता हूँ |
पहली कि बड़े शहर नॉएडा दिल्ली की चौतरफा हाईवे पर 100 100 किलोमीटर के फासले तक हाईवे पर चिपके गाँवों के किसान अब बेजमीन हो चुके है | उन्होंने जो भी किया हो पैसे का , जमीन की खसरा खतौनी से उनका नाम जा चूका है |
दूसरा ये कि हाईवे से नीचे बैठे गाँवो के लोगों की कूबत नहीं रही कि वे अपनी नौकरी या नकदी फसल की आमद की बदौलत बीघा दो बीघा जमीन इजाफा कर लें | उनके लिए अपनी मौजूदा जमीन को बचाना ही अपने आप में एक मिशन हो गया है |
मुआवजा बह रहा है | कुछ तर जा रहे है तो बहुत से डूब रहे है |
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