शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

कोई गुनाह है क्या , औसत होना

कोई गुनाह है क्या , औसत होना 

दोयम होना किताबो में , खेलों में 

नहीं तो !

तो फिर गुनाह है क्या ,

एक इज्जत की नौकरी का हक़दार होना ?

नहीं बुनियादी हक़ है ये तो !


तो गुनाह होगा एक जवान आदमी का , 

पड जाना प्रेम में , उम्र के गुलाबी सालों में !

नहीं , कुदरती है ये भी !


तो फिर स्वार्थी होगा वो आदमी 

जो कहता है कि जीवन उसका छोटा है और जीना चाहता है वो अपनी शर्तो पर 

नहीं , जीवन तो उसका है | 

तो फिर ?

गुनाह ये है कि ये आदमी भीड़ में पैदा हुआ है !

जहाँ आदमी सब कुछ है  गाजर , मूली , कद्दू , आवारा , नाकारा | 

बस , आदमी नहीं है ! 


मेरे जंगल का आदमी, आदमी क्यों नहीं है ?

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