बुधवार, 16 सितंबर 2026
टाइमपास
बुधवार, 9 सितंबर 2026
मेरी पोटली
शुक्रवार, 4 सितंबर 2026
मेरा भोला होना
मैं ठगा गया हूँ बार बार
रिश्तों में , प्यार में , पैसे के लेनदेन में , व्यापार में |
इसलिए नहीं कि दुनिया बुरी है | इसलिए क्योंकि आसान होता है भोले लोगों को ठगना |
पर सीधे होने में , भोले होने में , पता है फायदा क्या है ? आप देख पाते हो होशियार लोगों के वे रंग , वे पहलु जो वे दूसरे होशियार लोगों को नहीं दिखा पाते |
भोले लोगों को दुनिया के ज्यादा रंग दीख पड़ते है | और ज्यादा चटख |
और इसलिए मैं चुनता हूँ भोला होना |
ज्यादा देख पाता हूँ |
बुधवार, 2 सितंबर 2026
नाकाम लड़के
लड़के जो छूट जाते हैं , तरक्की की राह में , पीछे |
रह जाते हैं गाँव में |
ऐसे 'नाकाम ' लड़कों के सहारे ही चलते हैं , परिवारों के सारे काम |
शनिवार, 29 अगस्त 2026
डरता हूँ मैं
डरता हूँ मैं कई बार नौकरी छोड़ देने के विचार से
तमाम थकान के बावजूद |
इस विचार से कि उस दुनिया में जहाँ हर वो आदमी जो काम पर नहीं है , नाकाम है !
उस दुनिया में कौन सा मुखौटा लेकर जाऊँगा |
अगर मेरे पास बताने के लिए कोई काम नहीं होगा
क्या तब भी ये दुनिया मुझे किसी काम का आदमी समझेगी ? डरता हूँ मैं |
प्यार के इकरार से
हर बार तुम तोड़े नहीं जाओगे, प्यार में किये गए इंकार से !
कई बार तोड़े जाओगे, प्यार के इकरार से |
इकरार जो उस वक़्त आएगा ,जब न मौसम होगा, और ना ही हालात |
तुम्हे हलाक कर जायेगा कोई, इस एहसास से कि काश तुमने कोई संजीदा कोशिश की होती |
डरना तुम ऐसे इकरार से , और रोक देना उसे कहने से पहले ही , जो आये तुम्हारे पास ऐसे किसी मिज़ाज़ से |
क्योकि प्यार में मिला इंकार मामूली सा एक तमाचा है |
लेकिन गलत वक़्त का इकरार , देह में छूटा काँटा है !
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
कभी कभी
कभी कभी
ऐसा किया कीजिये कि हो जाया कीजिये गायब उन जगहों से जहाँ तुम्हारी मौजूदगी को गैर जरूरी समझा जाता हो |
लोगो को थोड़ा चखने दीजिये, अपनी गैर मौजूदगी |
कभी कभी बिना किसी प्लान के उठाया कीजिये झोला, डाला कीजिये कोई किताब और जा बैठिये, कहीं भी |
किसी पार्क में , कही बहते पानी के किनारे |
देखिये कि कैसे कुदरत में कितनी ही गैर जरूरी चीजे है!
गिलहरी पेड़ पर चढ़ उतर रही है , खामखा |
चीटियाँ कतारों में भागी जा रही है | बिलाबजह | जैसे जंग पे जाती हों |
छोटे छोटे बीटल्स फ़ालतू का कूड़ा कचरा धकेले ले जा रहे है | अपने बिलों में |
एहसास कीजिये
कि कैसे इन तमाम गैरजरूरी चीजों के जक्सटापोसिशन से ही दुनिया खूबसूरत बन पड़ी है |
सिंक होने दीजिये इस थॉट को कि कुदरत में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो फ़ालतू है |
और फिर जाने दीजिये उन लोगों को जिन्हे लगता है कि तुम किसी काम के नहीं हो |
घर की चारदीवारी
क्यों गिनी जाती हैं सारी बंदिशे औरतो के नाम
और सारी आजादियाँ मर्दो के नाम
क्यों माना जाता है घर की चारदीवारी को उम्रकैद
जबकि मैं अपने आस पास न जाने कितने ही ऐसे मर्दों को देखता हूँ जो खर्च हो रहे है
घर से बाहर ही , इस जतन में कि जुट जाए इतना भर कि जवानी में न सही बुढ़ापे में ही मयस्सर हो जाए घर की चारदीवारी |
शुक्रवार, 21 अगस्त 2026
सब नसीबों की बात है
सुनो , कभी कोसना मत किस्मत को , कि कब तक पापड़ बिलबायेगी |
कब तक आजमाएगी |
क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत तुम्हारे सामने ऐसे शानदार नज़ारे खोलेगी कि देखने वाले कहेंगे कि सब नसीबों की बात है |
गुरुवार, 20 अगस्त 2026
ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?
जानते हो ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?
क्योकि ये जवानियों पर फलते फूलते हैं |
इन नौकाओं में आती जवानियों पर |
जवानियाँ जो आती है दूरदराज के गाँवों से |
मेरे इलाके के गाँव से |
फिर वे सींचती है इन शहरों को , भरती हैं इनकी रगो में अपना खून |
और जब ये शहर उन जवानियों को निचोड़ चुके होते है , तब उनके बचे खुचे मलबे को वापस भेज देते है |
इन्ही नौकाओं में | उन्ही गावों में जहाँ से वे आये थे |
बुधवार, 19 अगस्त 2026
मामूली बातें
ट्रैन पटरी पर चल रही है , सही समय पर |
एस्कलेटर इंसानो को पाताल में बने स्टेशनो से जमीन की सतह तक ले जा रहे है |
ट्रैफिक लाइटें जल रही है और ट्रैफिक स्मूथ है |
आदमी काम पर जा रहा है |
कैसी रोजमर्रा की बातें हैं | मामूली हैं |
मामूली चीज़े मामूली होती हैं तब तक जब तक वे हो रही होती है | उनका रुक जाना गंभीर होता है |
शनिवार, 15 अगस्त 2026
उत्सव
जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ?
शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं |
रोज रोज कहाँ टांगी जाती है ऐसी रंगीन कंदीले |
और ये सोचकर मैं सुकून पाता हूँ कि शायद तुम अब भी उत्सव सा मानती होंगी अपने मिलन का
जो उत्सव की ही तरह लघु था , दुर्लभ था |
असहज
असहज
यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं |
कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ |
सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ |
और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी |
कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो पति होने से पहले मर्द हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद | मरद जो घोड़े की गर्दनों पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे मरद आपने पाषाण पर |
सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे परिवार जहाँ मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !
गुरुवार, 13 अगस्त 2026
ये जो अपने होते है न अपने
अच्छी खासी पढ़ती लड़की |
सपने ऊँचे गढ़ती लड़की |
फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है
और पढाई छुड़ा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा |
गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी |
फिर प्रलोभन में बिहा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे
आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे |
भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर
मनबल सकल गिरा देते हैं |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी |
दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी |
फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है |
ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है |
सोमवार, 10 अगस्त 2026
Order Number 22
जानते हो मुझे ऐसे कैफे में बैठ कर चाय पीना क्यों पसंद है | वो यूँ के ऐसे ही चाय के साथ बैठ मैंने न जाने कितने ही लोगो को खोला है | ऐसे लोग जो खुशहाल शादियों में है पर जिन्होंने सालों से अपने पार्टनर का हाथ तक नहीं थामा | लोग जो ऊँचे ओहदो पर है पर उनका बस चले तो सब कुछ छोड़छाड़ कर पहाड़ भाग जाए ,अकेले।
लोग जिनकी अपने भाई बहनो से बात तक नहीं होती , प्रॉपर्टी के चक्कर में |
चाय की चुस्कियों के साथ पीना सीख रहा हूँ मैं उनका अकेलापन , उनका गिल्ट , उनकी बेबसी , उनका ट्रामा |
हर इंसान भरा बैठा है | मैं सीख रहा हूँ उसे खोलना , हर एक कप चाय के साथ |
शनिवार, 8 अगस्त 2026
मेरी पीढ़ी के लोग
लोग , मेरी पीढ़ी के लोग
जो मानते रहे और जीते रहे इस फलसफे को कि रहा जा सकता है एक ही घर में बिना प्यार क्योकि खुद के वजूद से कही बड़ा होता है परिवार
पीढ़ी आखिरी पीढ़ी जिसके नितम्बों पर आज भी छपे है बचपन में अनुशासन में बाँधने को बरसी कमचियों के निशान
पीढ़ी जिसने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था अपना पहला फ़ोन
पीढ़ी जो छिपाती रही माँ की बात बीवी से , बीवी की बात माँ से इस उम्मीद कि क्या हर्ज़ है जो जुड़ा रहे परिवार रहकर थोड़ा मौन
लोग जिन्होंने अपने शौक अपनी इच्छाएं अपनी पसंद सब बाँध दिया खूंटी पर
जुट गए ऐसे कामों में जहाँ रोज पीना होता है खून का एक घूँट
देखता हूँ क्षितिज में कैसे नए आत्ममुग्ध लोग उतरे आ रहे हैं
सब कुछ सहकर जीने वाली मेरी पीढ़ी के लोग अब बुढ़ा रहें हैं
बुधवार, 5 अगस्त 2026
असली खेल
भ्रम में जी रहे हो तुम ,अगर तुम्हें लगता है कि AI, या कोई भी कटिंग एज टेक्नोलॉजी सीख लेने से तुम्हारा करियर उड़ान भर देगा l
हो सकता है ये चंद साल तुम्हारी जॉब बचा ले जाये l सर्वाइवल लेवल पे ही l
असली स्किल कुछ और है l
असली स्किल है अपने ऑर्गेनाइजेशन में अपने से ऊपर बैठे ऐसे आदमी तक पहुँच पाना जिसके पास तुम्हे पोडियम पे खड़ा करने की अथॉरिटी है l
ना सिर्फ़ पहुँच पाना बल्कि उस आदमी को ये एहसास दिला पाना कि तुम उसके बड़े काम के आदमी हो l हर बड़े आदमी को बहुत सारे दाये हाथ बाये हाथ की दरकार होती है जो उसकी ख़ुद तरक्की झंडा उठा कर चलें lजिस दिन आप ने ये परसेप्शन बना लिया , समझ लो तरक्की की सीढ़ी पे तुम्हारा पाव पड़ गया l बाक़ी सब टेक्नोलॉजी आनी जानी है ल
सोमवार, 3 अगस्त 2026
रविवार भी बदल गया है |
सोचता हूँ मैं , कोई समाजविद क्यों नहीं ढूढ़ता इस बात का जबाब , कि अब अमूमन हर कामकाजी आदमी की जिंदगी में रविवार ऐसे क्यों नहीं आता , जैसे पहले ज़माने में आता था | लापरवाह सा , किसी त्यौहार सा | अब ऐसे आता है जैसे अगली सुबह जंग पर जाना है और आज ही अपनी रसद जुटाना है | अजीब सा चिड़चिड़ा , feel low day हो गया है रविवार | क्यों हो गया है ऐसा ?
दुनिया बदल गयी है | रविवार भी बदल गया है |
बुधवार, 29 जुलाई 2026
मुचलका
मुचलका
इमारतें , ये बुलंद इमारतें , स्विमिंग पूल , जकूज़ी और जिम से सजी इमारते
इमारतें जिनमे गाड़ी के लिए गार्ड बेरिकेडिंग हटाते हैं |
ये इमारतें दरअसल एक मुचलका हैं पूंजीपतियों और अमीरी का एहसास लेने की ख्वाइश लिए मिडिल क्लास आदमी के बीच दस्तखत किया गया एक एग्रीमेंट
अग्रीमेंन्ट जो एक मुआयदा है इस बात का कि तमाम जलालत , तमाम हरस्मेंट और टोटल बर्नआउट के बावजूद यह आदमी अपनी नौकरी से चिपका ही रहेगा | हमेशा
इमारते जिनमे गार्ड गाडी के लिए बेरिकेडिंग हटाते है
कि तमाम जलालत , तमाम हरैसमेंट , टोटल बर्न आउट के बाबजूद ये आदमी अपनी नौकरी से चिपका ही रहेगा , हमेशा |
शुक्रवार, 24 जुलाई 2026
असली मेजोरिटी
ये जो शक्ति प्रदर्शन करते हैं न लोग , मुद्दे लपक कर भीड़ के बीच में मंच पर मेजोरिटी का रहनुमा बन रहे होते है , ये सब झूठे है |
कोई भी भीड़ जो प्रदर्शन करती है न कितनी भी बड़ी क्यों न हो मेजोरिटी नहीं होती |
असली आदमी जो मेजोरिटी में है वो वह आदमी है जो प्रदर्शन के चलते रास्ता जाम होने की वजह से गलियों से निकल काम पर पहुंच रहा होता है |
उसकी जिंदगी का मिशन होता है | परिवार के लिए रोटी और अदद सम्मान जुटाना ,बस |
और इस मिशन के लिए वो न सरकार को ताकता है न यूनियन को न किसी मसीहा को, न इंटेल्लेक्टुअल्स को , न कम्युनिस्ट्स को |
वो चुप चाप निकल रहा होता है सब जानते हुए कि कौन सा नारा खोखला है कौन ढोंगी है , कौन उछाला जा रहा है कौन चमकाया जा रहा है |
वो देख रहा होता है कैसे मीडिया बोनो को महामानव बना पेश कर रहा है | कैसे बिना कार्ल मार्क्स पढ़े लोग समाजवादी बने है कैसे गाँधी को जाने बिना लोग प्रजातान्त्र पर भाषण पेल रहे होते हैं |
वो सब जानता है और सब जानने के बाबजूद वह सुकून चाहता है | सिर्फ सुकून |
टाइमपास
कभी गम मत मनाना इस बात का कि कोई तुम्हे महज टाइम पास समझकर , तुम्हारा इस्तेमाल कर आगे निकल गया | अपने किसी परमानेंट की तलाश में | हाँ , तु...
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I must thank to my frined Ajeet who persuaded me to go for this memorable trip to Langkawi. Langkawi is definitely among best and most sp...
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बक्सा , बाल्टी, एक अदद मग्गा , कुछ जोड़ी कपडे , बिस्कुट , दालमोठ और पंजीरी | इंतज़ाम तो कुछ ऐसा था जैसे कोई फौजी पल्टन को जाता हो | ऐसे जैसे ...
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This is wonderful morning today. I got up with pleasant breeze blowing though my window. Sky is covered with thick clouds and sproadic down...