बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

गरीबी का खौफ

 तुम तोड़ तो दोगे गरीबी का चक्र , अपनी मेहनत से | 

लेकिन तुम नहीं तोड़ पाओगे उसका खौफ ! 

खौफ, जो दो पीढ़ियों तक चलता है | 


जब भी तुम कहोगे कि तुम लौट जाना चाहते हो | 

तो तुम्हारे अपने ही कहेंगे तुमसे , कि लौट तो आओ ,पर वापस आकर करोगे क्या ?

और उनके चेहरों की फ़िक्र मजबूर करेगी तुम्हे कि तुम बदस्तूर जारी रहो अपने हालातो में | 

क्योंकि  हालात तुम्हारे जो भी हों , इन्ही हालातों की वजह से घर के हालात बदले हैं | 

तुम तोड़ तो दोगे गरीबी का चक्र , अपनी मेहनत से | 

लेकिन तोड़ नहीं पाओगे उसका खौफ | 



सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

अभाव

झूठमूठ का ही सही , कुछ अभाव जरूर रखना अपने बच्चों के जीवन में | 
वरना , वे टिक नहीं पाएंगे उनके सामने , जो पहुंचेंगे उन तक अभावों का दरिया पार कर | 

          

शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2026

राब्ते

वे कहते है कि तुम अब बदल गए हो , 
पहले जैसे नहीं रहे | तो मैं नहीं कहता कि तुम कौन सा पहले जैसे हो | 
मैं सिर्फ हम्म कहता हूँ | 
वे कहते है कि मैं फ़ोन नहीं करता तो मैं नहीं कहता कि वे कौन सा करते है | 
मैं सिर्फ माफ़ी मांग लेता हूँ | 

फिर मैं राय लेता हूँ उनकी उन मुद्दों पर जिन पर मुझे कोई खास राय नहीं चाहिए !
और मैं सुनिश्चित करता हूँ कि 
वे जब मुझसे बतियाये तो एक दो इंच ऊँचे होकर ही जाए 
और कुछ इस तरह बचा रखे है मैंने राब्ते लोगो से !
वर्ना मैं निपट अकेला ही हूँ | 


बुधवार, 30 सितंबर 2026

ऊब


मैंने समझाया उसे कि मत देखा करो ये रील्स !

मेरे लिए , अपने लिए , अपने रिश्ते के लिए !

क्योकि खौफ है मुझे कि एक दिन तुम ऊब जाओगी मुझसे 

और ये रील्स की आदत , सहने ना देगी तुम्हे ऊब  | 


बैठी रहा करो कभी मेरे पास उबासियाँ लेते हुए 

तब भी जब कि मेरा हाथ ठंडा हो या खुश्क हो | 

 वो यूँ के खरसाह जरूरी है , पहले बारिश के तभी फुलबारी सजती है | 

रोज रोज बारिश होने में केवल घास ही उगती है | 

दीर्घायु भव: 


बहुत जरूरी है ऊब के बाबजूद बने रहना रिश्ते में , बदकिस्मती से इंसान की ऊब बर्दाश्त करने की कूबत कम हो रही है | 


शनिवार, 19 सितंबर 2026

असली कला

 वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है | 

मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने 

उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला है | 


लोग करते है फक्र सीनो को सजा भरी भरकम तमगों से 

मैं कहता हूँ उतार देना बोझ थोड़ा किसी के सीने से असली कला है 


दुनिया करती है प्यार उन्हें 

वे जो मासूम हैं , हसीं हैं , जवां हैं | 

प्यार करना उन्हें जिन्हे देखकर किसी को प्यार नहीं आता 

असली कला है | 


और ये दुनिया लगी है तमाम 

देवता हो जाने की होड़ में 

मैं कहता हूँ कि इंसानो की इस भीड़ में 

एक फकत इंसान हो पाना 

असली कला है 

बुधवार, 16 सितंबर 2026

टाइमपास

कभी गम मत मनाना इस बात का कि कोई तुम्हे महज टाइम पास समझकर , तुम्हारा इस्तेमाल कर आगे निकल गया | 
अपने किसी परमानेंट की तलाश में | 

हाँ , तुम बनना उनका टाइम पास , मगर इस हुनर से उनकी रूह की सलबटों में छुपा आओ कही अपना  रंग | 

रंग जो वक़्त के साथ उतरता जाए गहरा और गहरा | कुछ वैसे जैसे खजूर का काँटा वक़्त के साथ देह में गहरा और भी गहरा धँसता जाता है | 

और फिर तुम देखना दूर से ही  कि कैसे उनका परमानेंट फीका पड़ता जाता है तुम्हारे साथ किये गए टाइम पास की याद में | 

बुधवार, 9 सितंबर 2026

मेरी पोटली

अक्सर मैं ऐसा करता हूँ कि जब घूमने निकलता हूँ तो साथ लेकर चलता हूँ  एक पोटली | 
रखता हूँ उसमे कुछ छोटी ,कुछ बड़ी , कुछ दरमियानी , बेवफाइयाँ , हारें , मेरी शर्मिन्दगियां | 
कई बार उफनती नदी के पुल पर 
कभी रेलवे की पटरियों के पास 
तो किसी सुनसान कोने में 
मिल जाते है मुझे कुछ लोग | 

ऐसे लोग जिनका दुनियादारी से भरोसा उठ चूका होता है | 

और मैं कहता हूँ उनसे कि कुछ भी तो नहीं है मेरे पास जो ठीक कर सके वो सब जो तुम्हारे साथ हुआ है | 

लेकिन जाने से पहले सुनाकर जाओ मुझे , अपनी हार , बेवफाई , अपनी शर्मिंदगी का किस्सा | 

और मैं चुपचाप सुनता हूँ कि कैसे भरी दुनिया में कोई भी उनसे ज्यादा बदनसीब आदमी नहीं है | 

फिर मैं टटोलता हूँ अपनी पोटली और ढूंढ निकालता हूँ कोई एक अच्छी सी हार , एक बेवफाई , एक शर्मिंदगी | 
इतनी बड़ी कि उसके आगे उनकी छोटी पड जाए !

मैं सुनाता हूँ उन्हें कि कैसे मंदिर के कूड़ेदान से उठाया गया मुझे | 
कैसे शादी के कार्ड छपने के बाद भाग गयी थी मेरी पहली और आखिरी मंगेतर | 

कैसे लोन न चूका पाने के चलते गिरवी रखी है मैंने अपनी मोटरसाइकिल 

वे सुनते है और फिर मैं देखता हूँ कि धीरे धीरे उनका चेहरा मुलायम पड़ने लगता है | 

मैं चल पड़ता हूँ अपने रस्ते पर और कुछ दूर जा देखता हूँ कि उन्होंने भी बस्ती का रास्ता पकड़ लिया है | 
 

 


कि कैसे भरी 

 ढूंढ निकालता हूँ अच्छी सी हार , एक बेवफाई 

इतनी बड़ी कि 
कैसे मंदिर के कूड़ेदान से उठाया गया था मुझे | 

कैसे शादी के कार्ड छपने के बाद भाग गयी थी मेरी पहली और आखिरी मंगेतर 

देखता हूँ कि धीरे धीरे उनका चेहरा मुलायम पड़ने लगता है 

जा देखता हूँ कि उन्न्होंने भी बस्ती का रास्ता पकड़ लिया है 

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

मेरा भोला होना

मैं ठगा गया हूँ बार बार 

रिश्तों में , प्यार में , पैसे के लेनदेन में , व्यापार में | 

इसलिए नहीं कि दुनिया बुरी है | इसलिए क्योंकि आसान होता है भोले लोगों को ठगना | 

पर सीधे होने में , भोले होने में , पता है फायदा क्या है ? आप देख पाते हो होशियार लोगों के वे रंग , वे पहलु जो वे दूसरे होशियार लोगों को नहीं दिखा पाते | 

भोले लोगों को दुनिया के ज्यादा रंग दीख पड़ते है | और ज्यादा चटख | 

और इसलिए मैं चुनता हूँ भोला होना | 

ज्यादा देख पाता हूँ |  

बुधवार, 2 सितंबर 2026

नाकाम लड़के

 लड़के जो छूट जाते हैं , तरक्की की राह में , पीछे | 

रह जाते हैं गाँव में | 

ऐसे  'नाकाम ' लड़कों के सहारे ही चलते हैं , परिवारों के सारे काम |  

शनिवार, 29 अगस्त 2026

डरता हूँ मैं

 डरता हूँ मैं कई बार नौकरी छोड़ देने के विचार से 

तमाम थकान के बावजूद  | 

इस विचार से कि उस दुनिया में जहाँ हर वो आदमी जो काम पर नहीं है , नाकाम है ! 

उस दुनिया में कौन सा मुखौटा लेकर जाऊँगा | 

अगर मेरे पास बताने के लिए कोई काम नहीं होगा 

क्या तब भी ये दुनिया मुझे किसी काम का आदमी समझेगी ?  डरता हूँ मैं | 

प्यार के इकरार से


हर बार तुम तोड़े नहीं जाओगे, प्यार में किये गए इंकार से !

कई बार तोड़े जाओगे, प्यार के इकरार से | 

इकरार जो उस वक़्त आएगा ,जब न मौसम होगा, और ना ही हालात | 

तुम्हे हलाक कर जायेगा कोई, इस एहसास से कि काश तुमने कोई संजीदा कोशिश की होती | 

डरना तुम ऐसे इकरार से , और रोक देना उसे कहने से पहले ही , जो आये तुम्हारे पास ऐसे किसी मिज़ाज़ से | 

क्योकि प्यार में मिला इंकार मामूली सा एक तमाचा है | 

लेकिन गलत वक़्त का इकरार , देह में छूटा काँटा है ! 

गुरुवार, 27 अगस्त 2026

कभी कभी

 कभी कभी 

ऐसा किया कीजिये कि हो जाया कीजिये गायब उन जगहों से जहाँ तुम्हारी मौजूदगी को गैर जरूरी समझा जाता हो | 

लोगो को थोड़ा चखने दीजिये, अपनी गैर मौजूदगी | 


कभी कभी बिना किसी प्लान के उठाया कीजिये झोला, डाला कीजिये कोई किताब और जा बैठिये, कहीं भी | 

किसी पार्क में , कही  बहते पानी  के किनारे | 

देखिये कि कैसे कुदरत में कितनी ही गैर जरूरी चीजे है! 

गिलहरी पेड़ पर चढ़ उतर रही है , खामखा | 

चीटियाँ कतारों में भागी जा रही है | बिलाबजह | जैसे जंग पे जाती हों | 

छोटे छोटे बीटल्स फ़ालतू का कूड़ा कचरा धकेले ले जा रहे है | अपने बिलों में | 

एहसास कीजिये 

कि कैसे इन तमाम गैरजरूरी चीजों के जक्सटापोसिशन से ही दुनिया खूबसूरत बन पड़ी है | 

सिंक होने दीजिये इस थॉट को कि कुदरत में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो फ़ालतू है |  

और फिर जाने दीजिये उन लोगों को जिन्हे लगता है कि तुम किसी काम के नहीं हो | 


घर की चारदीवारी

क्यों गिनी जाती हैं सारी बंदिशे औरतो के नाम 

और सारी आजादियाँ मर्दो के नाम 

क्यों माना जाता है घर की चारदीवारी को उम्रकैद 

जबकि मैं अपने आस  पास न जाने कितने ही ऐसे मर्दों को देखता हूँ जो खर्च हो रहे है 

घर से बाहर ही , इस जतन में  कि जुट जाए इतना भर कि जवानी में न सही बुढ़ापे में ही मयस्सर हो जाए घर की चारदीवारी | 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

सब नसीबों की बात है

सुनो , कभी  कोसना मत किस्मत को , कि कब  तक पापड़ बिलबायेगी | 

कब तक आजमाएगी | 

क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत तुम्हारे सामने ऐसे शानदार नज़ारे खोलेगी कि देखने वाले कहेंगे कि सब नसीबों की बात है | 


गुरुवार, 20 अगस्त 2026

ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?

जानते हो ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?

क्योकि ये जवानियों पर फलते फूलते हैं | 

इन नौकाओं में आती जवानियों पर | 

जवानियाँ जो आती है दूरदराज के गाँवों से | 

मेरे इलाके के गाँव से | 

फिर वे सींचती है इन शहरों को , भरती हैं इनकी रगो में अपना खून | 

और जब ये शहर उन जवानियों को निचोड़ चुके होते है , तब उनके बचे खुचे मलबे को वापस भेज देते है | 

इन्ही नौकाओं में | उन्ही गावों में जहाँ से वे आये थे | 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

मामूली बातें



ट्रैन पटरी पर चल रही है , सही समय पर | 

एस्कलेटर इंसानो को पाताल में बने स्टेशनो से जमीन की सतह तक ले जा रहे है | 

ट्रैफिक लाइटें जल रही है और ट्रैफिक स्मूथ है | 

आदमी काम पर जा रहा है | 

कैसी रोजमर्रा की बातें हैं | मामूली हैं | 

मामूली चीज़े मामूली होती हैं तब तक जब तक वे हो रही होती है | उनका रुक जाना गंभीर होता है | 



शनिवार, 15 अगस्त 2026

उत्सव

जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ? 

शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं | 

रोज रोज कहाँ टांगी जाती है ऐसी रंगीन कंदीले | 

और ये सोचकर मैं सुकून पाता हूँ कि शायद तुम अब भी उत्सव सा मानती होंगी अपने मिलन का 

जो उत्सव की ही तरह लघु था , दुर्लभ था | 

असहज

 असहज 

यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं | 

कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ | 

सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली  मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ | 

और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर  , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी | 

कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो  पति होने से पहले मर्द  हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद |  मरद जो घोड़े की गर्दनों  पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद  आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे  मरद आपने पाषाण पर | 

सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे  परिवार जहाँ  मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !



गुरुवार, 13 अगस्त 2026

ये जो अपने होते है न अपने

अच्छी खासी पढ़ती लड़की | 

सपने ऊँचे गढ़ती लड़की | 

फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है 

और पढाई छुड़ा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा | 

गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी | 

फिर प्रलोभन में बिहा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे 

आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे | 

भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर 

मनबल सकल गिरा देते हैं | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी | 

दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी | 

फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

Order Number 22

जानते हो मुझे ऐसे कैफे  में बैठ कर चाय पीना क्यों पसंद है | वो यूँ के ऐसे ही चाय के साथ बैठ मैंने न जाने कितने ही लोगो को खोला है |  ऐसे लोग जो खुशहाल शादियों में है पर जिन्होंने सालों से अपने पार्टनर का हाथ तक नहीं थामा | लोग जो ऊँचे ओहदो पर है पर उनका बस चले तो सब कुछ छोड़छाड़  कर पहाड़ भाग जाए ,अकेले।

लोग जिनकी अपने भाई बहनो से बात तक नहीं होती , प्रॉपर्टी के चक्कर में | 

चाय की चुस्कियों के साथ पीना सीख रहा हूँ मैं उनका अकेलापन , उनका गिल्ट , उनकी बेबसी , उनका ट्रामा | 

हर इंसान भरा बैठा है | मैं सीख रहा हूँ उसे खोलना , हर एक कप चाय के साथ | 

गरीबी का खौफ

 तुम तोड़ तो दोगे गरीबी का चक्र , अपनी मेहनत से |  लेकिन तुम नहीं तोड़ पाओगे उसका खौफ !  खौफ, जो दो पीढ़ियों तक चलता है |  जब भी तुम कहोगे कि त...