अक्सर मैं ऐसा करता हूँ कि जब घूमने निकलता हूँ तो साथ लेकर चलता हूँ एक पोटली |
रखता हूँ उसमे कुछ छोटी ,कुछ बड़ी , कुछ दरमियानी , बेवफाइयाँ , हारें , मेरी शर्मिन्दगियां |
कई बार उफनती नदी के पुल पर
कभी रेलवे की पटरियों के पास
तो किसी सुनसान कोने में
मिल जाते है मुझे कुछ लोग |
ऐसे लोग जिनका दुनियादारी से भरोसा उठ चूका होता है |
और मैं कहता हूँ उनसे कि कुछ भी तो नहीं है मेरे पास जो ठीक कर सके वो सब जो तुम्हारे साथ हुआ है |
लेकिन जाने से पहले सुनाकर जाओ मुझे , अपनी हार , बेवफाई , अपनी शर्मिंदगी का किस्सा |
और मैं चुपचाप सुनता हूँ कि कैसे भरी दुनिया में कोई भी उनसे ज्यादा बदनसीब आदमी नहीं है |
फिर मैं टटोलता हूँ अपनी पोटली और ढूंढ निकालता हूँ कोई एक अच्छी सी हार , एक बेवफाई , एक शर्मिंदगी |
इतनी बड़ी कि उसके आगे उनकी छोटी पड जाए !
मैं सुनाता हूँ उन्हें कि कैसे मंदिर के कूड़ेदान से उठाया गया मुझे |
कैसे शादी के कार्ड छपने के बाद भाग गयी थी मेरी पहली और आखिरी मंगेतर |
कैसे लोन न चूका पाने के चलते गिरवी रखी है मैंने अपनी मोटरसाइकिल
वे सुनते है और फिर मैं देखता हूँ कि धीरे धीरे उनका चेहरा मुलायम पड़ने लगता है |
मैं चल पड़ता हूँ अपने रस्ते पर और कुछ दूर जा देखता हूँ कि उन्होंने भी बस्ती का रास्ता पकड़ लिया है |
कि कैसे भरी
ढूंढ निकालता हूँ अच्छी सी हार , एक बेवफाई
इतनी बड़ी कि
कैसे मंदिर के कूड़ेदान से उठाया गया था मुझे |
कैसे शादी के कार्ड छपने के बाद भाग गयी थी मेरी पहली और आखिरी मंगेतर
देखता हूँ कि धीरे धीरे उनका चेहरा मुलायम पड़ने लगता है
जा देखता हूँ कि उन्न्होंने भी बस्ती का रास्ता पकड़ लिया है
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