सोचो , कितने बंधनों में बँधी रही होगी वह स्त्री , जिसने नौकरी में अपनी आज़ादी ढूंढी |
रविवार, 28 जून 2026
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दादा का दौर
दादा को हम बाबा कहते थे | माँ पर्दा करती थी बाबा से | बाबा जब दालान से घर की दहलीज पर आते तो झूठमूठ का खाँसते | अहम अहम | कुछ ऐसे | माँ जह...
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कोई गुनाह है क्या , औसत होना दोयम होना किताबो में , खेलों में नहीं तो ! तो फिर गुनाह है क्या , एक इज्जत की नौकरी का हक़दार होना ? नहीं बुनि...
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झूठमूठ का ही सही , कुछ अभाव जरूर रखना अपने बच्चों के जीवन में | वरना , वे टिक नहीं पाएंगे उनके सामने , जो पहुंचेंगे उन तक अभावों का दरिया प...
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जालिम हूँ मैं ! मार देता हूँ अपनी खुशियाँ कुछ ऐसे भी | गुजरता हूँ अकेले कई बार , खूबसूरत नज़ारो से | होना चाहता हूँ खुश | और फिर सोच देता...

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