शनिवार, 28 अक्टूबर 2017

बेटा जब बाप होता है !


वो आदमी जो कि एक अच्छा पिता है , मैंने उसे बेहद गुस्से में देखा |
वो आदमी एक 'सजग पिता' है जो किसी भी हालत में अपनी औलाद को पथ भ्रष्ट  न होने  देने की कसम खाये हुए है |

आँख लाल किये और अपने पुराने कुर्ते की बाहें ऊपर चढ़ाये वो साँवला , तौंदला पिता अपने ऊँचे चबूतरे पर खड़ा था|   हाथ में मोबाइल लिए जिससे लटकी ईयर फ़ोन की तार जमीन छू रही थी |

उसने मुझे रोक लिया | फ़ोन उसने अपने 'बिगड़े हुए' किशोर बेटे से जब्त किया था जो अपमान का घूँट पिए बरामदे में  अपनी माँ के पास खड़ा कुछ बड़बड़ा रहा था |

" प्यार से भी तो समझा सको हो कोई बात , बिना बंदूक कोई बात ना होती  तमारी  " किशोर की माँ  भिनभिनाई | उसका वात्सल्य बेटे की ओट बनके आया |

पर पिता की त्योरियाँ चढ़ी थी|  " तू चुप कर ,  तेरे ही तो लच्छन है इसमें , तेरा लाड ही लेके डूबेगा इसे, देख लीजै " पिता गरजा |

मैं ठिठक गया था | अपनी भावनाओ पे काबू  की कोशिश करते हुए उसने मुझसे पूछा "सुनाओ भईया , कहो , नौकरी कैसी चल रही | बाल गोपाल यही गाँव में है या शहर में ? "

इससे पहले की मैं कोई जबाब देता वो फिर भड़का " भाई साहब , औलाद के लाये सुबिधा सब करो , पर बच्चो को  गर सुधारना है तो देखो सालो को कसाई की  नज़र सै ! "
ऐसा कहते हुए उसने अपने दाए हाथ की ऊँगली  को हवा में कई बार आगे  पीछे लहराया  जो  बात का इजहार था कि उसका प्रवचन जग हित में था , धरती के सभी  पिताओ  के लिए आदर्श सूत्र था |

"चला जा , टर जा मेरे सामने से |  दिन सही हो तेरा तो  किताब खोल ले |"  पिता ने बेटे को फिर लताड़ा | बेटा खुले बरामदे में खटिया पर  पैर सिकोड़े लेटा अपने अपमान का घूँट पी सुनता रहा बस |

" कंधो में मूत आने लगा है , नालायक के " उस पिता की आँखों में गुस्सा तो था ही , हाँ थोड़ा  फ़िक्र भी थी |

मैंने होशियार बनते हुए बात जोड़ने की कोशिश की " भईया , लल्ला तुम्हारा कान बरब्बर हो आया | अब गुस्सा न  किया करो | प्यार से जितना समझे ठीक "
फिर फ़िक्र का माहौल पैदा करने को मैंने जोड़ा "  नया खून है , किसी दिन सामना कर दिया तो !"

पर उसका उबाल था कि थमने का नाम न लेता था " अजी , कर दिया सामना, जब तक मेरे गट्टो में दम है | चलेगा साला मेरे हिसाब से , नहीं तो भाग जाए जहाँ इसका जी करे | "


हम चबूतरे के कोने पे लगे नीम के पेड़ के नीचे चारपाई पे आ बैठे थे |

मुझे याद आया कि कोई दो दशक भर पहले आज के इस  'आदर्श पिता ' का बूढा बाप उसी  स्थान पे खटिया पे चिपका बैठा होता था |
उन दिनों बैठक की  बाहरी बड़ी ताख में टेप रिकॉर्डर दिन भर अश्लील रसिये गाता था |
"गौने वाली रात , बालम तूने धोखा दीयो , ,खटोला छोटा दीयो $..... मर जाउंगी पिया जी मरोड़ा मत मारे , मर जाउंगी $$$..... "

और वो बूढा चिल्लाता था " कम्बखत के मारे , सांझ के टैम तो आरती भजन लगाई दिया कर | "
पर आज का 'आदर्श पिता' जो उस टाइम का 'इंकलाबी लड़का' हुआ करता था एक न सुनता था |  हँसता था , बूढ़े को हड़का भी देता था |
और वो बूढा |  वो बूढा झुंझलाता के रह जाता था बस , कहता  था " मेरा क्या है , मेरी तो कट गयी | अपने करम अपने आप भुगतेगा ससुरा  "
" बुढ़ापा बुरापा होता है " ऐसा कहता था वो बूढा |


मैं चलने को हुआ तो मैंने बरामदे में लेटे  किशोर की तरफ देखा | वो जवानी की सीढ़ियां तेजी से चढ़ रहा था |

मैं गवाह नहीं बनना चाहूँगा पर इस बात की पूरी पूरी गुंजाईश है कि आज का किशोर कल का 'औरंगजेब'  निकले और आज का कड़क पिता कल का ' बूढा शाहजहाँ ' हो जाए |

मैं गवाह नहीं बनना चाहूंगा , पर नियति में हो सकता है कि इसी नीम के नीचे फिर से कोई बूढा पुरानी खाट से चिपका लाचार हो बड़बड़ाये, झुंझलाये  " मेरा क्या है , मेरी तो कट गयी | अपने करम अपने आप भुगतेगा ससुरा  | "


                                                                                    सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                     29 /10 /2017


शुक्रवार, 13 अक्टूबर 2017

ऊपरी हवा का असर



परिवार के पढ़े लिखे कई बार मजाक उड़ा जाते है |  बोलते है "भैय्या , पढ़े लिखे हो, समझदार हो , इस सब में यकीन क्यों रखते हो ?"
और मैं मुस्कुराता भर हूँ बस | मेरी मुस्कान उनकी धारणा को बल देती है |

"ये सब अंध विश्वास है भैय्या , इसको बढ़ावा नहीं देना चाहिए  | " पढ़े लिखे नसीहत देते है अक्सर |  नसीहत देना पढ़े लिखे लोगो की आदत हो जाती है |  है कि नहीं ?

मैं उनकी रायशुमारी पर  मुस्कुराता हूँ पर मानता मैं भी नहीं |

मैं अक्सर ऐसा करता हूँ , जब भी घर जाता हूँ |  हर बार नहीं करता ,वो यूँ के हर बार दोहराने  से जादू अपना असर खो बैठता है |

होता यूँ है कि सफर की थकान से चूर मैं अक्सर बिस्तर या सोफे पे पसर जाता हूँ |
थकान जो की अमूमन सफर की धक्कम धक्का  का नतीजा होती है , मैं उसे थोड़ा बढ़ा चढ़ा के, चासनी लपेट के पेश करता हूँ |
माँ की आदत होती है पूछना | तो मैं बोलता हूँ कि हाथ पैरो में दर्द है , हल्का सिर दर्द भी | पूरे शरीर में अकड़न सी है |
माँ माथा छू कर देखती है और बोलती है " सिर तो नहीं गरम तेरा ,    हम्म......  "

ये बाद में जो माँ  'हम्म ' लगाती है ना, उसमे माँ तबियत नासाज़ होने का राज़ जान लेती है |
करीब दर्जन भर घरो के  फासले पर एक बूढी औरत रहती है | अस्सी पार कर जाने  बाबजूद काकी की कमर एकदम सीधी है , लपक के चलती है |
सस्ता चश्मा लगाती है जिसके सिरों पर उसने अपने हाथ से बारीक डोरी लपेटी हुई है | चेहरा झुर्रीदार है , बाल दूध से सफ़ेद | काका दशक भर पहले ही चले गए , बेटे हैं , बहुये है , पोते पोती हैं , पर विधवा काकी का अब वो  रुआब नहीं रहा |  काकी अशक्त है , लड़के दब्बू हैं |  कई बार बहुये खाने पीने को भी तरसा देती है |
कुल मिला के लाचार बुढ़ापा है काकी का |

काकी माँ  के पीछे पीछे आती है दबे दबे पाँव | हाथ में नीम की टहनी लिए होती है |
काकी मेरा सिर नीचा कर अपना हाथ मेरे सिर पर रख देती है और बहुत देर तक कुछ कुछ बुदबुदाती रहती है |
फिर चमड़े का जूता लेकर मेरा सिर छू भर देती है| फिर कई बार जूता जोर जोर से जमीन पर पटापट पीटती जाती है |

टोटका पूरा  होने के बाद काकी हमेशा पूछती है " अब कुछ हल्का हुआ , लल्ला शरीर तेरा |"
और मैं हमेशा बोलता हूँ " हाँ , काकी काफी हद तक सही है | "

जाते जाते काकी माँ को लगभग हड़का के बोलके जाती है " इसके बैग में लहसुन की गाँठ रखे बिना मत जाया दिया कर इसे सहर | 'हवा ' का हिसाब हो जावै है ईसै"
और मेरी मां हमेशा काकी की बात से इत्तेफाक रखती नज़र आती है |

काकी जब जब अपने जादू टोने से मेरे ऊपर से 'हवा ' का असर काटती है ना , उसकी आखों में चमक होती है , उन लम्हो में वो एक ताकतवर औरत होती है जो अपने हुनर से मेरा दर्द खींच लेती है |

काकी की आँखों में वो रौशनी देखने के लिए और उसे उसकी ताकत का एहसास कराने  के लिए ही मेरे शरीर पे अक्सर ' ऊपरी हवा ' का असर होता रहता है!

                                                                                                            सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                                                 13/10/2017








मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

तेरे घर की , मेरे घर की



"चलाओ तुम अपनी, जितना मर्ज़ी है चलाओ |  खूब चलाओ | मैं भी देखूं ,  आखिर कब तक अपनी चलाओगे " |
 मिर्ची के छोंक से तीखे , नश्तर से  चुभते ये बोल,  रसोई से उठ घर की फ़िज़ा में तैर गए |
और गुस्सा केवल वाणी  में ही नहीं था  ! लाइटर की आवाज़ , फ्राई पेन के स्टोव  रखने की आवाज़ , जूठी  प्लेट्स  के सिंक में रखे जाने की आवाज़ ! सबसे के सब में एक रौद्रता, भिड़ जाने की , आर पार करने की चाह |
यूँ कह लीजिये कोई बबंडर सा था |

और दुश्मन ? दूसरी ओर  सौफे पे पसरा था | इकहरा लेकिन जिब्राल्टर की चट्टान सा मजबूत इरादा | लापरवाह ! मूड यूँ था कि अजी आओ , टकराओ , बिखर जाओ , हम ऐसे ही खड़े रहेंगे |
जबाब लाज़िम था सो दिया भी गया " गलत होऊ या सही | जो मुझे सही लगेगा वही करूँगा | तुमसे हेल्प नहीं मागूंगा | तुम हेल्प  मत करना |  " 

और बच्चे ?  पुरुष नियति का मर्म ये भी है कि जब जब मुकाबला बराबरी या जीत में छूटने  को होता है , स्त्री बच्चो को ढाल  की तरह इस्तेमाल करती है |   दाव चलता न देख जालिम ने पैतरा बदल दिया |

कुलदीपक  ने  डिमांड नहीं की ,  बिना  फरमाइश उसके सामने उसके फेवरेट नूडल्स परोसे गए  और ममता का तड़का लगा के बालों पे हाथ फिरा बोला गया  " बेटा , तेरे पापा तो  मानेंगे नहीं अपनी | तू जल्दी से बड़ा हो जा | तू ही संभालेगा घर | "

कुल जमा साढ़े चार साल के कुलदीपक ने पुरुष को ऐसे घूरा  जैसे दरोगा किसी मुल्जिम को ,  जो अभी अभी ताज़ा अपराध करके आया हो |
 जायज भी है कौन चाहेगा कि दूसरे  के कंधो का बोझ अपने ऊपर उठाया जाए |

खैर ,घंटे  दो घंटे  में बादल छंट गए  ,  गृहस्थी झूलती झालती अपने ढर्रे पे चल निकली |
टी वी के किसी प्रोग्राम को देख घर में ठहाके भी गूंझे |

माहौल पिंघलता देख कुलदीपक ने कहा " मम्मी मेरा अभी भी बड़ा होना जरूरी है क्या !"
मतलब भाव ये था कि अब जबकि सब नार्मल हो गया मुझे बड़े होने से छूट मिलेगी क्या !

 "ठीक है बेटा , तू अभी बच्चा ही रह | "

हँसी बहुत आयी पर पुरुष मन में पी गया | बच्चे आजकल ओवर सेंसिटिव हैं ! बुरा मान जाते हैं |

कॉलेज टाइम की किसी प्लेलिस्ट का गाना चल  रहा था " 'इट्स नो सैक्रिफाइस.... नो सैक्रिफाइस एट आल... "

ये है गृहस्थी , तेरे घर की , मेरे घर की |


                                                                      सचिन कुमार गुर्जर
                                                                      ०३ अक्टूबर २०१७


शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

फ्रस्टू दोस्त और उबाऊ मीटिंग

वो मीटिंग जो की एक बेहद जरूरी मीटिंग थी ,घंटे भर की माथापच्ची के बाद खत्म हो गयी !
मीटिंग रूम से बाहर निकलते हुए मिंटू के चेहरे पे संतोष था , सुकून था । कुछ पा जाने का सुकून नहीं , छुटकारा पा जाने का सुकून !
और चिंटू , वही जैसा वो  हमेशा से रहा है , उनींदा , आँखे मीड़ता , ढले कंधे लिए हुए बाहर निकल आया था  ।

कतारबद्ध बने केबिन्स को दो फाँक करती पतली गैलरी में टहलते हुए मिंटू  की पेशानी पर बल उभर आया था । बोला " देखा तूने , कुछ गौर किया ? क्यों ?"

" हाँ यार , ये मैनेजर थोड़ा सख्त रहेगा शायद , रूल बुक से चलने वाला !" चिंटू ने बड़ी  ही उबाऊ सी आवाज़ में जबाब दिया था ।

बात पूरी होने से पहले ही मिंटू ऊँची आवाज़ में लगभग दुत्कारते हुए बोल पड़ा  " नहीं साले , नहीं ।  हम इस प्रोजेक्ट  के सबसे सीनियर लोग हो गए है । मेरा मतलब है सबसे पुराने । समझा कुछ ?"

मिंटू को  अपने पुराने हो जाने का , पीछे छूट जाने का , कुछ नया ना कर पाने का , नौकरी न बदल पाने का दर्द  आये दिन उठता ही रहता था । कभी दर्द  हल्का होता तो मिंटू  बस भिन्नाता , तेज होता तो लगता सब कुछ फ़ेंक फाक  कर दुडकी  लगा देगा । पर सालों से वह अपनी जगह टिका रहा ।  रिसता रहा कभी फूटा नहीं ।

निठल्ले और सालों  से किस्मत को अपना स्टेयरिंग थमाए चिंटू  को पता था कि दोस्त के इस दर्द का तुरंत उपचार तो कोई है नहीं । हाँ एक अच्छे दोस्त की तरह दोस्त का गम गलत करने को उसने बोला " चल , नीचे खोखे पे चाय पी आते हैं।  "

पुराने नीम के पेड़ से सटे खोखे  के बाहर पड़ी लकड़ी की सीधी सपाट बेंच । खोखे की तरपाल पर धूल इतनी कि उसका रंग हरे की वजाय मटमैला ही दीखता था ।  सस्ती , कम दूध वाली चाय की चुस्की लेकर  मिंटू बोला " बहुत हुआ । अब  कुछ करना ही होगा । "

अचानक से मिंटू के  भाव बदल गए थे । चाय पत्ती की तेजी ने उसमे जोश सा ला दिया था । " यार सीनियर  लोग फॉर्म में आ रहे इस सीजन । देखा ,धोनी ,युवराज कैसे  रंग में आ गए फिर से ।  और अपना  फेडरर, क्या ग़ज़ब खेला भाई , अब भी ! "

फिर लंबी साँस छोड़ते हुए बोला "इस सीजन मुझे भी PMP सर्टिफिकेशन करना ही होगा । नो एक्सक्यूसेस !"
ऐसा बोलते हुए हुए उसके जबड़े की हड्डियां मजबूती के साथ बाहर उभर  आयी थी , जो की उसके दृढ निश्चयी होने का सबूत थीं !

उसका ये शिफूगा और हवा से मोटिवेशन चूसने की कोशिश  करना चिंटू के  अंदर बैठे निट्ठल्ले को बेहद  नागवार गुजरा था । तिलमिला सा उठा था चिंटू । 

सच्चे दोस्त कौन होते हैं  ? 
वही , जो एक दूसरे  की मदद करते है । हाँ, वो तो होते ही है ।  वो भी होते है जो एक दूसरें  को कुछ भी ना करने की वजह देते है !

सो  मिंटू के ताजा ताजा फुलाव में पंचर करने को चिंटू ने कहा " यार  PMP किया तो कौन सा पसेंजर से बुलेट ट्रैन में सवार हो जायेगा । हाँ, अगले डब्बे में सवार हो जाये शायद !
स्टार्टअप  कर स्टार्टअप  !"

 'स्टार्ट अप'  शब्द   चिंटू ने लंबा खींचा था , जान बूझ कर !  उसे  पता था कि ये शब्द उसके दोस्त के  जेहन में खीझ पैदा करेगा ही करेगा । 


 वो यूँ कि इस विचार के साथ कि 'कुछ अपना कुछ करेंगे' , 'कुछ नया करेंगे '   उन  दोनों जिगरियों ने तमाम मंत्रणाएं की थी  । आइडियाज बहुत आये । चाय की सस्ती दुकानों की चेन खोलने से लेके,  कार्ड बोर्ड बनाने तक , खुद की सॉफ्टवेर कंपनी खड़ी करने से लेके किसानों का काया कल्प  करने तक आदि आदि । फेरिस्त लंबी है । पर वे  स्टार्ट का बटन दबाने में विफल रहे थे । 'ओवर प्लानिंग' , 'अंडर प्लानिंग' , 'कॅश क्रंच' , 'टू रिस्की' , 'नॉट आवर कप ऑफ़ टी' ... वजह  आईडिया के साथ बदलती  रही । 

"कद्दू करेगा तू कुछ । बोलता ही है "  खीज गया था मिंटू । 
"अबे करूँ ना करूँ ।  जिक्र  करने से 'कुछ तो करना है , कुछ  तो करना है ' वाली हाजत तो मिटा लेता हूँ ना  ।  और वे  जोर से हंस दिए थे ।

अपने डब्बे नुमा केबिन की ओर टहलते हुए चिंटू ने पूछा " यार , आजकल ऑफिस  का कुछ गॉसिप नहीं मिलता । ये नए लड़के लड़कियाँ  कुछ अफ़ेयर बफेयर नहीं करते क्या ? कौन किसे लंच पे ले गया । कौन किसके साथ  घूम रहा । कौन कौन ऑफिस टाइम में भी मूवी थिएटर हो आ रहे  । हवा बदल गयी क्या इधर की ?। क्यों ?"

"अबे साले , मैंने बोला न , हम सीनियर हो गए । मेरा मतलब है पूराने और बूढ़े " मिंटू का तर्क मजबूत था ।

हाँ  , उस 'बेहद जरूरी मीटिंग  का' जो की सुबह नए बॉस ने बुलाई थी , उसका  'की टेक अवे' ये था कि उसी तरह की मीटिंग फिर से होगी , पंद्रह दिन बाद !

                                                                         - सचिन कुमार गुर्जर 

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

समर्पित प्रेम


प्यार की तासीर उतावलेपन की होती है । नतीजन, वो नया प्रेमी गैरआराम था । उसकी उँगलियाँ  उसके  वाइड स्क्रीन फ़ोन पर बेचैन सी नाच रहीं थी ।  आँखे  कुछ टोह रही थी , इंतज़ार था उन्हें किसी का शायद !

 अच्छे खासे अरसे उल्लू की तरह स्क्रीन को घूरने के बाद प्रेमी की आँखे चमकी और उसने बड़ी वाली स्माइल देकर बोला  " सुनो  जानू , आई लव यू , आई मिस यू . "

जबाब आया " ह्म्म्म "
नपा तुला ह्म्म्म , हाँ  बस इतना ही !
प्रेमी  का चेहरा मुस्कान से  दर्द में कुछ ऐसी फुर्ती से बदला जैसे  खिलते लहलहाते हुए छुईमुई के  पौधे को कोई झंकझोर  गया  हो।
उदास मन शांत हो गया । निशब्द, अवसादग्रस्त वाला शांत ।
 
 किसी भी गंभीर प्रेमिका की तरह वो प्रेयसी भी सब कुछ सह सकती थी पर सन्नाटा नहीं !
सो उससे रहा ना गया और उसने बोला " बोलो भी कुछ "

प्रेमी बहुत कुछ कहना चाहता था , पर ये जो प्रेम होता है ना , इसकी विधा नाटक माँगती है , सो उसने कहा " कुछ नहीं , बस ऐसे ही , मूड थोड़ा उखड़ा हुआ है आज । "

सर्वज्ञात है पर फिर भी बताने योग्य है कि स्त्री पुरुष प्रेम में स्त्री की भावनाएं ज्यादा सूक्ष्म होती है , वो अपने प्रेमी के 'हेलो ' कहने के आधार पर ही उसका मूड भांप सकती है !
सो उम्मीद के मुताबिक प्रेयसी  ने प्रेमी को  कुरेदा " क्यों बेबी , क्यों ? हुआ  क्या है ?

बोलो , क्या चल रहा है दिमाग में ? जल्दी बोलो "


प्रेमी मानसून के बादल सा  फटने  के इंतेज़ार में ही था " सुनो , रात तुम पूरे 25 मिनट तक व्हाट्सएप्प पर ऑनलाइन थी ? पर एक भी मैसेज किया ?"

"ओह्हो ,बात की तो थी ?"

"हाँ , पर वो  तब , जब मैंने मैसेज किया ।" 

प्रेमी  यही नहीं रुका  " तुम सुबह 6 बजे भी पूरे 8 मिनट ऑनलाइन थी , पर एक भी मैसेज नहीं किया । "

प्रेयसी  को अपनी बारी  का इंतज़ार था और उसका जबाब तैयार था  " यार , तुम्हे मैं  कैसे यकीन दिलाऊ कि बस एक तुम  ही हो , और कोई   नहीं । दूर दूर तक भी नहीं ।
क्या  करूँ मैं ऐसा यार , दिल चीर के दिखाऊ अब । तब मानोगे ? "

प्रेयसी  समस्या का त्वरित समाधान चाहती थी " सुनो , मैं सच कह रही हूँ  , मैं व्हाट्सएप्प डिलीट किये देती हूँ । ठीक है?   तब तो तुम आराम से , बेफिक्र रह सकोगे ना ? बोलो ? "
 बोलो ना माय सोना , क्या मैं आपके लिए इतना सैक्रिफाइस नहीं सकती ?
बोलो तो एक बार।  " 

प्रेमी का गुस्सा और उसकी शिकायत दोनों  उथले ही थे । पल भर  में भाप हो गए । पेशकश ने उसे कसमकश  में डाल दिया ।
दिल पिंघल  गया । क्षण  भर में उसके चेहरे पे प्यार और पछतावा उभर आया ।
" नहीं नहीं , व्हाट्सएप्प डिलीट मत करना पागल ।
मैं.... मैं तो बस  ऐसे ही । बहुत चाहता हूँ तुम्हे यार ।
समझता हूँ ।  पर यू नो , होता है प्यार कभी कभी पोसेसिव  हो जाता है ।सॉरी बेबी , सॉरी मेरी कुच्ची पुच्ची !"

प्रेमी अब आराम में था, प्यार बेफिक्र था । वो  मज़बूत दिल था पर प्रेयसी के समर्पण और व्हाट्सएप्प तक उड़ा डालने की पेशकश से उसकी आँख में छोटा सा आँसू उतर आया था !


                                                                                                ---सचिन कुमार  गुर्जर




गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

एक था पिन्टू


उसके पैरो में इस्पात की  स्प्रिंग लगीं  थीं शायद ,जिनकी मदद से वो दौड़ता नहीं  ,बल्कि उड़ता था ।
मौहल्ला क्या ,पूरे गाँव में उसकी टक्कर का धावक ना था ।
चोर सिपाही के खेल मे वो हमेशा सिपाहियों का नायक माने दरोगा बना करता। नाम होता दरोगा 'जालिम  सिंह' !  तगड़े से तगड़े चोर को वो फर्लांग भर में धर दबोचता और सचमुच जालिमो जैसे धुलाई करता ।
लकड़ी  के तख्ते  वाले स्वनिर्मित  बैट से उसने जो छक्के मारे , आज तक उस गूजर टोले में कोई धुरंधर उसका रिकॉर्ड ना तोड़ पाया ।
उसका सीना फौलाद का था ,जिसका मुजायरा वो कई बार साथ  के लड़को से अपने सीने पे पुरजोर मुक्के बरसवा कर किया करता था ।
पिंटू  ने अपने खडूस बापू से कई बार मार खाई थी पर उसे अपनी शर्ट के ऊपरी बटन लगाने मंज़ूर ना थे ।
वो कुछ भी पहनता , इस  बात का जरूर ख़याल रखता कि उसका नंगा सीना नुमाया होता रहे !

उस चांडाल चौकड़ी में हालाँकि  वो सबसे बड़ा था , पर इत्ता बड़ा भी नहीं । हमउम्र ही माना जायेगा ।  हाँ  शरीर  उसका ड्योढ़ा था  और जैसा वर्णित है ' जिगर से भी जबर'  था । सही मायनो में वो उस  चांडाल चौकड़ी का 'अल्फ़ा मेल ' यानी ' सबसे जबर मर्द' था ।
एक बार लाला की दुकान की आधा दर्जन  संतरे वाली टॉफियाँ खिला कर झुंड  के सबसे पिद्दी लड़के ने बड़ी लगन से पूछा था "यार पिंटू ,आड़ी ! ,  सच सच बता, तेरे फौलादीपन का राज क्या है ?"

गहरी साँस ले और सच्चे दिलदार की भाँति पिंटू ने दिल खोल के राज उगला था " यार मैं सुबह खाली पेट ,अपनी काली  गाय का कच्चा दूध निपनिया (बिना पानी की मिलाबट  ) मिश्री की डली के साथ पिया करूँ हूँ। वो भी नाक बंद कर , एक साँस में !  "

पिद्दी लड़के ने जब ये वृतांत अपने दादा को  उबाचा वो दादा ख़ुशी ख़ुशी अपने प्यारे पोते को  सेर भर निपनिया , कच्चा दूध ,मिश्री की डली डाल  पिलाने लगे । हफ़्तों गए  ,फिर महीने चले गए , काली गाय  का कच्चा दूध गटकने के बाबजूद भी पिद्दी  पिद्दी ही रहा ! पिन्टू  की परछाई जितना फौलाद भी ना बन पाया ।मरियल शरीर और कमजोर फेफड़ो के चलते चोर सिपाही के खेल में पिद्दी का किरदार हमेशा छोटे चोर या फिसड्डी हवलदार का  ही रहा । लकड़ी के तख्ते के बैट से वो इकड़ी दुकडी  ही ले पाया या उसे बाउंड्री  पे इस उम्मीद साथ लगाया गया कि उधर विरले ही कोई शॉट  जायेगा !

 उस उम्र में जब बाकि लड़के इंजेक्शन के डर से रोने के बजाय मुँह फेर ऊँगली मुँह में दबाना सीख रहे थे ,पिन्टू   अपने सीने  पे बड़ा बड़ा , स्पष्ट अक्षरो में 'मर्द' गुदवा के आया था ।

हाँ  जी , उस उम्र में! किसी मेले में गुदवा के आया था ।

मोहल्ले  के फौजी काका ने बड़ी जांच पड़ताल  के बाद ये ऐलान किया था कि गाँव  तो क्या  सात गाँवो  में भी पिंटू जैसा धावक नहीं हो सकता । ऐसा  उनके अनुसार , उसके पैरो की ख़ास बनाबट की वजह से था । पिंटू  के पैर  के पंजे और ऐड़ी  के बीच में इत्ती  ज्यादा खाली जगह थी कि मोटे से मोटा नाग भी आराम से निकल सके था ।और ये ख़ास बनावट उसे ख़ास बनाती थी ।

फिर क्या हुआ ? वही जो होता आया है , लड़के ज्यो ज्यो समझदारी की ओर कदम रख रहे थे , जिंदगी की जद्दोजहद उनपे पकड़ बना रही थी । जो पढाई में थोड़े बेहतर थे उनपर किताबे रटने का दबाब , बाकि पे काश्तकारी में गंभीरता से हाथ बटाँने का दबाब । पर हिचकोले खाती जिंदगियों में यारियाँ कायम रही ।

पिंटू बड़ा था , तेजी से गवरू हो चला था । ऊपर से उसके हिस्से छः एकड़ मोटी उपजाऊ जमीन थी , उस पर पढ़ने का दबाब ना था । सो उसका बिहा सबसे जल्दी हुआ ।कम उम्र ही थी बेचारे की । मसे भीगी ही थी , शौकिया ही वो नाई से उस्तरा लगवा  दाढ़ी मूछे  साफ़ कराने लगा था ।

हाँ , बिखरती यारियों का पहला लक्षण पिंटू की शादी के तुरन्त बाद ही परिलक्षित हो गया था,  जब  तमाम वादों को जुठलाते हुए उसने अपने खासम ख़ास दोस्तों को सुहागरात की कहानी सुनाने से साफ़ साफ़ इनकार कर दिया था । पिंटू अब सिकुड़ रहा था उसकी जगह प्रभास नाम का व्यक्ति उदित हो चला था ।

बाकि के दोस्त उसका उपहास करते । टीस भरा  उपहास । दोस्त को खो देने का उपहास ।
पर बदल तो वो भी रहे ही थे । उनके व्यक्तिव  भी आकार ले रहे थे । पिद्दी अब अपने को पिद्दी ना समझता था ।
उसे लगता था कि उसका शरीर भले ही दुर्बल हो , उसका दिमाग मित्र मण्डली में सबसे बड़ा है ।  वो सबसे बेहतर स्कूल में जाता था ।
जिन्दिगियाँ और भी तेज़ रफ़्तार  से भागने लगीं , चौकड़ी  तितर बितर  होने को विवश हुई, तो पिद्दी को मुहल्ले  की रिपोर्टिंग के लिए अपनी माँ  का सहारा लेना पड़ा ।
माँ की  कहानियों में रंग बिरंगे , छोटे बड़े वृतांत  होते ।

पिंटू अब दो ही जगह दिखाई पड़ता था , खेत के मेंड़ पर या अपनी पत्नी के दुप्पटे के सिरे पर ।
बिहाता ऐसी तेज कि साल भर में ही घर के बर्तन खटकने लगे । और दूसरा साल पकड़ते पकड़ते पिंटू के बापू को जमीन आनाज सब अलग करना पड़ा ।     

एक दिन खरसाह ( गर्मी के दिन) की शाम को पिद्दी को पिंटू खेत से लौटता  दिखा । धूल धूसरित , कंधे लटके हुए , चाल सुस्त ।
बचपन के आड़ी को देख उसने निगाह  बचा ली  । किसी अपराध बोध वश नहीं , किसी शर्म की वजह से नहीं ।  उसकी जिंदगी  की व्यस्तता ही इतनी थी शायद ।

'इसे क्या हुआ ? " पिद्दी के मुँह से निकला था ।
' गृहस्थी  में पड़ गया पिंटू ' किसी ने बताया था ।  फिर उस शाम को उस नुक्कड़ वाले चबूतरे पर पिंटू  और उसकी बीवी का चर्चा चला ।
परते खुली कि किस तरह उसकी बिहाता ने सास ससुर के लिए खाना दाना करने से इनकार कर दिया और पिंटू चुप रहा ।
कि किस तरह उसकी बिहाता ने सारे जेवर अपने मायके में रख छोड़े और पिंटू चुप रहा ।
कि किस तरह पिंटू की पिता की मन्नतो के बाबजूद उसने अन्नागार का दरवाजा खोल सारा आनाज आँगन में ला उड़ेला  और अपने हाथों ही बटबाँरा करने बैठ गयी ।
किस तरह घर रिश्तेदारो के समझाने के बाबजूद उसने घर के आँगन को दो फाख  कर दीवार खड़ी कर दी ।

' बुजदिल साला, कम दिमाग ' पिद्दी ने मुँह भीच इतना भर कहा ।
उसका मन पिंटू के रूपांतरण से दुखी हुआ , झुंझलाया ।

'अरे , पिंटू बुरा नहीं है भईया , इसकी बिहाता राड रखा करे है ' एक काकी ने समझाया था ।
पर  पिद्दी अपने बचपन के यार को माफ़ करने के मूड में ना था ।
' काकी  , मर्द अपनी जमीन पे मजबूती से रहे तो औरत उसे डिगा सके है भला ? क्यों ? '
' गुलाम साला , सीने पे मर्द लिखाये घूमता है '
' मज़बूर हो जाता है आदमी लल्ला , जो भुगते वो ही जाने " ताऊ बोले थे धीमे से पर बड़े अनुभव से ।
पर पिद्दी अपनी बात पे अड़ा था , उसकी मुट्ठियाँ जकड़ी थी , वो अपने पुरषार्थ से दिशाएँ बदलने का माद्दा रखने वाला जान पड़ता था ।
और पिंटू , हवा में तिनके सा  कमजोर जान पड़ता था ।

समय का चक्का और भी घुमा । कल के बन्दर  से छोकरे अब कमाते  आदमी थे ।
सब की गृहस्थियाँ  , जिम्मेदारियाँ , अपनी अपनी जिंदगियाँ ।


महीनो से भी ज्यादा चलती दिन रात की महाभारत से तंग पिद्दी ने अपनी बीवी से गहरी साँस ले  बोला " ठीक है , आगे से जो भी जमा पूँजी होगी उससे हम अलग का अपना , शहर में १००  गज भर का प्लाट ले  लेंगे । बच्चो की इंग्लिश मीडियम की पढाई खातिर ! "
" पर सुनो , मैं  पिता जी से कुछ नहीं लूँगा , अपनी कमाई से ही । "

" हम्म , जैसा सही समझो " पत्नी इतना भर बोली ।
पत्नी  की जद्दोजहद में ये एक पड़ाव भर था शायद  ,मंजिल अभी दूर थी ।  उसे गृहस्थी को और पति को सही दिशा  में निर्ममता से धकेलते जाना था ।  ममता  और निर्ममता में कितना फर्क होता है । ज्यादा नही शायद । शायद माँ और पत्नी होने भर का ।
पुराने घरो की उजड़ी नींव पर नए मकान बनते आये है । पुराने नीड के तिनके नए घरोंदो की तुरपन में लगते आये है ।
पिद्दी बहुत कुछ सोच रहा था । इंसान बुरा होता है या उसका किरदार कराता है सब । पता नहीं ।  सवाल है , जबाब सबका अपना अपना होता है । अपने अपने अनुभव के हिसाब से ।


पता  नहीं क्यों , सालो बाद उस दिन उसका मन पिंटू के साथ संतरे वाली टॉफियाँ खाने का था ।
 दिमाग में सालो से पिंटू के लिए भरा द्वेष धीरे  धीरे पिंघल रहा था ।
उसने माँ से पूछा था " ये प्रभास नहीं दिखता आजकल गाँव में ?"
माँ ने बतलाया था " वो तो पिछले साल ही चला गया शहर । वही मकान बना लिया । आधी जमीन बेच दी , आधी बटाईदार पे रख छोड़ी है ।  अपने बच्चो को इंग्लिश मीडियम स्कूल  में पढ़ाने की खातिर  वो  शहर में जा बसा है !"

उसारे से सब सुनते हुए उसकी बीवी ने बोला " चाय पियोगे क्या ?"

                                                                                -- सचिन कुमार गुर्जर                  



मंगलवार, 6 सितंबर 2016

वर्क फ्रॉम होम


" एक बात बता लल्ला, और सच्ची सच्ची बतइयो।तीन महीने हुए ,आये दिन घर पर ही दीख पड़े है। नौकरी चल रही है या कुछ अड़चन ?" काका ने कुर्सी पे टिकते ही सवाल दाग मारा | सूती तौलिया जिसे उन्होंने अपने सिर से लपेटा था , उसे उतार घुटनों पर रख लिया | चाइनीज सनमाईका की चिकनी मेज पर काका ने अपनी कोहनियां चौड़ी कर बड़े इत्मीनान से टिका दीं। उनके हाव भाव से साफ़ था कि वे बड़ी फुरसत में थे और विस्तार से कुछ बात कहने सुनने की तबियत में थे ।

इंजीनियर लड़का बस हँस भर दिया । इंजीनियर जो  इसलिए इंजीनियर था क्योंकि वो सरकारी पटवारी ना हो सका !
हँसने का मूड न होने पर भी वो हँस दिया । अंदर से ख़ीज से भरा था उसका मन । वो यूँ कि जब से उसने पिछले कुछ महीनों से उम्मीद से ज्यादा गाँव में रुकना शुरू किया , ये सवाल सैंकड़ों बार दागा जा चुका था । और फिर उसने कोशिश भी तो बहुत की थी हर बार । कोशिश ये समझाने की  कि प्राइवेट कम्पनियों में 'वर्क फ्रॉम होम ' माने ' चलो , आज घर से ही लॉगिन कर लो'  नाम की भी कुछ कार्य प्रणाली होया करे है । पर हर बार असफल रहा बेचारा | 

सात  जातों की  मिली जुली आबादी वाले उस गाँव में जितने भी चतुर दिमाग थे किसी को भी ये बात गले नहीं उतर पा रही थी कि भला कोई घर बैठ कैसे कंप्यूटर में ताक ताक आफिस का काम कर सके है !
अजी !  नौकरी सरकारी हो जैसे  मास्टरी , पटवारी  , अमीन , क्लर्क, चपरासी , तब तो कोई संयोग बन सके है |   पर भला कोई प्राइवेट फर्म क्यों दिए बैठी घर बिठाये तनख्वाह!
हैं जी !प्राइवेट नौकरी में मालिक आँख के सामने काम लेता है , तेल निचोड़ मेहनत लेता है! तब तनख्वाह देता है ।
ये सहज ज्ञान की बात है ,सबको पता होती है ।

पर इंजीनियर लड़का जानता था कि काका के सामने उनके सवाल से खिसिया जाना घातक होगा ।बेहद घातक ! वैसे ही जैसे सामने से आते थानेदार से घबराकर कोई चोर गली काट कर भागने का सोचे | कुछ वैसे ही  गुच्छेदार मूँछों  और  लंबी रोमन नाक के ऊपर अंगारों सी सजी काका की बड़ी आँखें पत्थर फोड़ कर मामले की तह तक जाने की कूबत रखती है | ज़रा सी भी बेचैनी दिखाई होती या बात काटने की कोशिश की होती तो काका ने पूरे मामले का निष्कर्ष अपने सहज ज्ञान से कर दिया होता और फिर वो निष्कर्ष गाँव की हर गली , हर नुक्क्ड़ ,हर बैठक दालान पे कथा सा बाँचा जाता!

लिहाजा लड़के ने ठण्डी साँस लेकर कहा " नहीं काका , नौकरी बराबर चल रही है ।मैं 'वर्क फ्रॉम होम' कर रहा इन दिनों!
 मतलब कुछ दिनों के लिए घर से ही काम ।  इधर पिछले दिनों से काम कुछ कम है । फिर अभी हाल में मेरा तबादला भी हुआ है सो कंपनी ने घर से ही काम करने की छूट दे रखी है । "

"अच्छा , हाँ तेरा काम तो कंप्यूटर का ही है । ऐसा हो जाया करे है लल्ला ? मतलब घर बैठे ही काम ? " काका ने स्थिति समझने को पुरजोर प्रयास किया था ।

" हाँ काका ,सब काम इन्टरनेट पर  हो जाता है ऑनलाइन । " लड़के ने समझाते हुए बोला।
" हाँ हाँ , मैं समझूँ हूँ । जमीन की खसरा खतौनी भी तो निकल रही आजकल कंप्यूटर पे। तहसील का तो आधा काम कंप्यूटर ही कर रहे । है के नहीं ? सब प्रमाण पत्र इसी पे निकल रहे। " काका के मगज में दुनिया भर का ज्ञान भरा हुआ है , पहली बार लड़के को ऐसा अहसास हुआ ।उसे इस बात का सुकून आया कि चलो कोई तो है जो मामले को समझा । 

"यो ससुरा बनवारी" काका ने धीमे से बड़बड़ाया ,पल भर को भृकुटियाँ तानी , मुठ्ठी भींची और फिर तुरंत ही ढीली छोड़ दीं ।
फिर अपनी बड़ी बड़ी आँखें लड़के के चौखटे पे टिका बोले " अच्छा ,एक बात बता लल्ला। ये प्राइवेट कंपनियों में भी रिश्वतबाजी चला करे है क्या? मतलब उधर भी ऊपर की आमद , लेन देन चला करे है क्या?"  बड़ा ही मासूम सा सवाल दागा था काका ने | 

" ना काका ना ,ये कोई सरकारी नौकरी थोड़े ना है । कंपनियों में बड़ी सख्ताई होती है । घूसखोरी का कोई गणित नहीं बनता उधर ।होता होगा कही,  पर मेरे इधर तो इत्ता सा भी ना है , नाखून बराबर भी नहीं| "
अभी तक लैपटॉप के पीछे छिपे लड़के ने लैपटॉप किनारे खिसकाते हुए सफाई दी। लड़के की आवाज़ में गर्व था , मेहनत और ईमानदारी से रोटी कमाने का गुमान !
" प्राइवेट फर्म की नौकरी मेहनत और ईमानदारी की होती है काका" बात पुरानी थी , सुनी सुनाई थी, पर लड़के ने इसे जोड़ना जरूरी समझा।

" ह्म्म्म, समझू हूँ ।.... यो ससुरा बनवारी!" काका ने फिर बड़बड़ाया।

"मौसम में बदलाव है रघुआ, आधी रात बाद मुझे खेस ओढ़ना पड़ा । हल्का सर्द हुआ है मौसम"  रघवर सिंह आ गए थे | रघवर सिंह यानि इंजीनियर लड़के के पिता | रघवर सिंह जिनके दिल ने हमेशा ये चाहा कि लड़का पटवारी हो या दरोगा | लेकिन लड़के ने जब ये कहा कि पैकेज चक्रवृद्धि ब्याज सा बढ़ेगा, और मेहर हुई तो विदेश का डॉलर भी बरसेगा  तो उन्होंने धीर पकड़ ली ।
उन्होंने नए बीड़ी के बण्डल का कवर कागज़ फाड़ा | बण्डल में पचास पैसे के इनाम का कूपन था |  कूपन को कुर्ते की जेब में संजो दो बीड़ियाँ सुलगा लीं और एक बीड़ी काका की ओर बढ़ा दी ।
" अरे अभी अभी तो बीड़ी पी मैनें  भैय्या | " काका ने बीड़ी थामते हुए बस ऐसे ही बोल दिया था ।

" तो तुमने चर्चा सुनी रघवर  " पहला कश खींचते ही काका कुर्सी घुमा बोले।
" हाँ , जिक्र आया एक दो जगह से। सुना है मैंने भी।" पिता  का सुर निरुत्साही था। बात उन्हें पता थी ।

" ये हरामखोर बनवारी और उसके लड़के , हर चौपाल पर बकते फिर रहे  कि लल्ला की नौकरी चली गयी। निकाल दिया । के  लल्ला ने कंपनी में रिश्वत ले ली और बड़े मैनेजर ने रंगे हाथों धर दबोचा ! इसी लाने  आजकल आये दिन गाँव में डोलता फिरे है । " काका ने साँस तब लिया जब पूरी की पूरी कथा उवाच गए ।

"क्या?????"  अभी तक उदासीन , बेमन से बात करते लड़के को मानो चार सौ चालीस वाल्ट का करंट सा छू गया । उसे लगा वो उछल के छत से जा टकरायेगा।

"हाँ , कई दिनों से , कई चौपालों से ऐसी चर्चा सुनने में आई है। " रघवर सिंह  ने ठंडी सांस ले बात की पुष्टि की ।

बनवारी और उसके लड़कों  की रचनाशीलता से लड़का हतप्रभ तो था ही | मन हुआ कि हँसे भी।

रघवर  झुंझलाये  । परिवार पे कोई छोटा सा भी लांछन लगाए उन्हें ये गवारा नहीं । और हो भी क्यों , उन्होंने उम्र भर पैसा कम इज़्ज़त नाम ज्यादा कमाया है ।
" देख पीतम  , जिस दिन सरपंची का चुनाव ख़तम  हुआ , हमने गाँव की राजनीत से हाथ जोड़ लिए । है कि नहीं ?
पर ये साले, हमे खींचना छोड़ेंगे नहीं ।कुछ  काम धंधा है नहीं इनके पास ,हम पर कीचड़ उछालने के अलावा।" इंजीनियर के पिता उबाल पर थे ।

" मतलब ये सोचो भैया , के इन लोगन के दिमाग चलते किस कदर तेज़ है ।" 

"कहन दो भैय्या , तुम अपने काम से लगे रहो , जे राजनीत का खेल कतई अच्छा ना है । कीचड का जबाब देना चाहोगे तो खुद भी तो कीचड में उतरना पड़ेगा । है कि नहीं | "  काका ने बुझती बीड़ी को अपने चमड़े के जूते से रगड़ मेज तले खिसका दिया और उठ चले | 


अब जब खबर पूरे गाँव में हो तो पत्नी  से कैसे छिपे । शाम को मैनेजर के ऑफिस मेसेंजर से ऑफलाइन होते ही लड़के ने लैपटॉप समेट खाने की फरमाइश की |  
" पता है सुनोगे नहीं , पर फिर भी बताती हूँ । सुनो हो भैय्या का फोन आया था। १२०  गज में अच्छे प्लॉट कट रहे है , नए मुरादाबाद शहर में । अच्छा लगा अपनी चर्चा सुन के , क्यों ? जिंदिगी भर यही देहाती उठापटक सुनोगे या इंसानो की तरह भी जियोगे ?"  पत्नी ने खाने की प्लेट सामने रखते हुए उबाचा ।
" कितनी बार बोला है ,नमक कम रखा करो सब्जी में " लड़के ने खीजते हुए कहा।
और पत्नी मुस्कुराई भर । गाँव का मोह भंग कर लड़के को शहर खींच ले जाने का जो उसका सपना है , उसे साकार करने में 'बनबारी की अफवाह' जैसी घटनाओं  का घटना बेहद जरूरी है ।

                                                           --- सचिन कुमार गुर्जर

इत्ता सा सफर

गाँव के फार्म से शहर को निकला आदमी अपनी पूरी जवानी इस प्रयोजन में काट देता है कि वो बुढ़ापे में अपने फार्महाउस में आराम से रहेगा |  यानि कि उ...