शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

बेटा जब बाप होता है !


वो आदमी जो कि एक अच्छा पिता है , मैंने उसे बेहद गुस्से में देखा |
वो आदमी एक 'सजग पिता' है जो किसी भी हालत में अपनी औलाद को पथ भ्रष्ट  न होने  देने की कसम खाये हुए है |

आँख लाल किये और अपने पुराने कुर्ते की बाहें ऊपर चढ़ाये वो साँवला , तौंदला पिता अपने ऊँचे चबूतरे पर खड़ा था|   हाथ में मोबाइल लिए जिससे लटकी ईयर फ़ोन की तार जमीन छू रही थी |

उसने मुझे रोक लिया | फ़ोन उसने अपने 'बिगड़े हुए' किशोर बेटे से जब्त किया था जो अपमान का घूँट पिए बरामदे में  अपनी माँ के पास खड़ा कुछ बड़बड़ा रहा था |

" प्यार से भी तो समझा सको हो कोई बात , बिना बंदूक कोई बात ना होती  तमारी  " किशोर की माँ  भिनभिनाई | उसका वात्सल्य बेटे की ओट बनके आया |

पर पिता की त्योरियाँ चढ़ी थी|  " तू चुप कर ,  तेरे ही तो लच्छन है इसमें , तेरा लाड ही लेके डूबेगा इसे, देख लीजै " पिता गरजा |

मैं ठिठक गया था | अपनी भावनाओ पे काबू  की कोशिश करते हुए उसने मुझसे पूछा "सुनाओ भईया , कहो , नौकरी कैसी चल रही | बाल गोपाल यही गाँव में है या शहर में ? "

इससे पहले की मैं कोई जबाब देता वो फिर भड़का " भाई साहब , औलाद के लाये सुबिधा सब करो , पर बच्चो को  गर सुधारना है तो देखो सालो को कसाई की  नज़र सै ! "
ऐसा कहते हुए उसने अपने दाए हाथ की ऊँगली  को हवा में कई बार आगे  पीछे लहराया  जो  बात का इजहार था कि उसका प्रवचन जग हित में था , धरती के सभी  पिताओ  के लिए आदर्श सूत्र था |

"चला जा , टर जा मेरे सामने से |  दिन सही हो तेरा तो  किताब खोल ले |"  पिता ने बेटे को फिर लताड़ा | बेटा खुले बरामदे में खटिया पर  पैर सिकोड़े लेटा अपने अपमान का घूँट पी सुनता रहा बस |

" कंधो में मूत आने लगा है , नालायक के " उस पिता की आँखों में गुस्सा तो था ही , हाँ थोड़ा  फ़िक्र भी थी |

मैंने होशियार बनते हुए बात जोड़ने की कोशिश की " भईया , लल्ला तुम्हारा कान बरब्बर हो आया | अब गुस्सा न  किया करो | प्यार से जितना समझे ठीक "
फिर फ़िक्र का माहौल पैदा करने को मैंने जोड़ा "  नया खून है , किसी दिन सामना कर दिया तो !"

पर उसका उबाल था कि थमने का नाम न लेता था " अजी , कर दिया सामना, जब तक मेरे गट्टो में दम है | चलेगा साला मेरे हिसाब से , नहीं तो भाग जाए जहाँ इसका जी करे | "


हम चबूतरे के कोने पे लगे नीम के पेड़ के नीचे चारपाई पे आ बैठे थे |

मुझे याद आया कि कोई दो दशक भर पहले आज के इस  'आदर्श पिता ' का बूढा बाप उसी  स्थान पे खटिया पे चिपका बैठा होता था |
उन दिनों बैठक की  बाहरी बड़ी ताख में टेप रिकॉर्डर दिन भर अश्लील रसिये गाता था |
"गौने वाली रात , बालम तूने धोखा दीयो , ,खटोला छोटा दीयो $..... मर जाउंगी पिया जी मरोड़ा मत मारे , मर जाउंगी $$$..... "

और वो बूढा चिल्लाता था " कम्बखत के मारे , सांझ के टैम तो आरती भजन लगाई दिया कर | "
पर आज का 'आदर्श पिता' जो उस टाइम का 'इंकलाबी लड़का' हुआ करता था एक न सुनता था |  हँसता था , बूढ़े को हड़का भी देता था |
और वो बूढा |  वो बूढा झुंझलाता के रह जाता था बस , कहता  था " मेरा क्या है , मेरी तो कट गयी | अपने करम अपने आप भुगतेगा ससुरा  "
" बुढ़ापा बुरापा होता है " ऐसा कहता था वो बूढा |


मैं चलने को हुआ तो मैंने बरामदे में लेटे  किशोर की तरफ देखा | वो जवानी की सीढ़ियां तेजी से चढ़ रहा था |

मैं गवाह नहीं बनना चाहूँगा पर इस बात की पूरी पूरी गुंजाईश है कि आज का किशोर कल का 'औरंगजेब'  निकले और आज का कड़क पिता कल का ' बूढा शाहजहाँ ' हो जाए |

मैं गवाह नहीं बनना चाहूंगा , पर नियति में हो सकता है कि इसी नीम के नीचे फिर से कोई बूढा पुरानी खाट से चिपका लाचार हो बड़बड़ाये, झुंझलाये  " मेरा क्या है , मेरी तो कट गयी | अपने करम अपने आप भुगतेगा ससुरा  | "


                                                                                    सचिन कुमार गुर्जर
                                                                                     29 /10 /2017


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