शनिवार, 23 अप्रैल 2016

एक चटोरी औरत


एक थी चटोरी औरत । चांट पकौड़ी , रस मलाई खाने के लिए घर से बाहर सैर सपाटे करने वाली औरत !
घर में जवान होती , ताड़ सी बढ़ती तीन तीन बेटियाँ ,  पर उस निर्लज त्रिया का पैर कही थमता ही न था । उसके पाँवो में फेर था फिरकी सी नाचती फिरती थी । घर में कम, पिकनिक पे ज्यादा !
लड़कियों की माँ होने की जिम्मेदारी क्या होती है , इसका उस कमअक्ल को कुछ इल्म ही ना  था । नाखून भर भी नहीं !

 कुनबे पड़ोस की औरते कहतीं   " हे राम जी, इस लापरवाह औरत को क्यों दे दीं तीन तीन बेटियां , पता ना क्या होगा बेचारियों का आगे चल। "

पर वो औरत बस हर रोज चमक चांदनी बन घूमती , जवानी की भांग के नशे में चूर मस्तानी बन डोलती ।

बड़की लड़की  का विवाह जैसे तैसे कर दिया था जोड़ गांठ कर ।  मंझली लंबी पोर थी  और छुटकी भी जंगल बेल सी बढ़ रही थी । पर उस कमबख्त  औरत की खुद की निगोड़ी जवानी सिमटने का नाम ही न लेती थी !
उसे कई समझदार लोगो ने अपने कानों  गुनगुनाते हुए सुना था " चार दिन की है ये जवानी , खुल के जी लो ओ दिल जानी !"

रोज सुबह गाँव के बस अड्डे पे खड़ी दिख जाती, शहर जाने वाली बस के इंतज़ार में । पल्लू सर पे रखना उसे कतई भी गँवारा न था । बूढ़े , समझदार बुजुर्ग खुद अपनी निगाह बचा निकल जाते थे ।

उसका पति बूढा था , उससे उम्र में कम से कम एक दहाई बड़ा । लाचार, किसी अज्ञात बीमारी का शिकार रहता था  । बेचारा मेहनत का काम न कर पाता था ।एक एकड़ भर जमीन थी  पुश्तैनी ,उसी में कुछ आनाज हो जाता था ।
औरत  लंपट थी , बहुत ही मुँहजोर । कमजोर , बीमार पति का उस पर अख्तियार ना चलता था ।

चर्चा था कि पहले उसका उस स्कूल के मालिक से मिलना जुलना रहा जहाँ वो पढ़ाती थी और बाद में शहर के किसी बड़े अस्पताल के डॉक्टर के यहाँ आना जाना हो गया था । ऐसा गाँव के बहुत से समझदार प्राणी वांचते फिरते थे ।उसके कुनबे वाले, अडोस पड़ोस वाले  तो उसे कुलटा कहते थे । हर बात बेबात उसकी इज़्ज़त हवा में उछाल देते थे । बेशर्म चरित्रहीन कहा करते ।  औरते उसकी परछाई छूने भर से कतराती ।

गाँव के लफंडर कहते  कि उसके कई यार थे और उन्होंने उसे शहर के सिनेमा हाल पे , पार्क किनारे कुल्फी उड़ाते औेर काला बड़ा धुप का चश्मा लगाते कई बार देखा था । 
कुछ उसकी अनैतिक कारगुजारियों के किस्से सुनाते , मिर्च मसाले के साथ !

वो औरत सुंदर सजीली नार थी ।
एक बार तो उसने बेशर्मी की हद ही कर दी , बिना स्लीव्स का और पान के गले का ब्लाउज साडी के साथ पहन शहर के लिए निकल ली !
उस दिन गाँव के बड़े मुकद्दम से रहा न गया और उन्होंने औरत के नकारे पति तो खूब लताड़ा ।
" क्यों रे  राम आसरे , आँखो पे कतई पट्टी बांधे ही बैठे रहते हो क्या बे । ओ बुजदिल इंसान , अपना नहीं गाँव बस्ती की दूसरी बहु बेटियों का तो कुछ सोचा कर , तेरी अकेली जनि पूरे गाँव का माहौल ख़राब किये हुए है । नालायक , कुछ न सूझता हो तो कही चुल्लू भर पानी में डूब मर ।"
बुजदिल , नामर्द कह उसके जमीर को झंकझोर गए बड़े मुकद्दम । उनकी बातों का असर हुआ था , शाम को औरत का पति बसंती गटक के उससे खूब लड़ा , दोनों में हाथापाई भी हुई और औरत खूब फूट फूट के रोयी । पर कोई न गया बीच बचाव करने ।

हाँ , उस  दिन के बाद से उस औरत ने स्लीवलेस ब्लाउज पहनना छोड़ दिया था ।

फिर एक दिन अचानक खबर आई कि एक वो औरत जहर खा कर मर गयी ।
बड़ी मूछों वाले समझदार लोगो ने कहा " चटोरी थी , कम दिमाग थी , उसका मन चंचल था । उसका पाँव कही टिकता न था , दुनिया में भी न टिक सकी । "

इसे विधि का विधान कहिये या वो औरत शापित थी पर उसके चले जाने के बाद गाँव के कोने पे बसा राम आसरे का वो घर धीरे धीरे पटरी पे आने लगा ।
लड़कियां पढ़ने में अब्बल  थीं , अकारण घर के बाहर पैर तक न रखती थी । मंझली लड़की ग्रेजुएशन कर गई , अभी आगे भी कॉरेस्पोंडेंस से पढ़ रही थी  । हाई स्कूल , इंटर,  बी. ए. सब के सब डिस्टिकंशन !
गाँव के स्कूल में निर्विवाद शिक्षामित्र हो गयी मंझली । समय आया और सरकार ने सभी शिक्षमित्रों को सरकारी टीचर घोषित कर दिया । अच्छी खासी मोटी पगार पाती है अब !
अज्ञात और कभी ना ठीक होने वाली बीमारी  से पीड़ित राम आसरे अब भी घुटनो के दर्द को ले कराहता है ।
उसकी बीमारी उसे बार बार बीड़ी फूँकने , दर्जनों चाय पीने और खाट पर उकड़ू बैठ दिन भर अखबार को घूरने को मज़बूर करती है ।
वो झगड़ता नहीं अब , मंझली बेटी लक्ष्मी उसकी दवा दारु, बीड़ी मंडल सबका खर्च सहर्ष उठाती है ।

छोटी वाली लड़की मँझली से भी तेज़ है , सिविल सेवा में जाने का सपना देखती है और तैयारी कर रही है  । मँझली  के रिश्ते अच्छे अच्छे घरों से आ रहे है , लेकिन वो हर रिश्ते को कुछ न कुछ नुक्स  निकाल सलटा देती है ।

काका पूरे गाँव के माननीय है, मृदुभाषी  , पढ़े लिखे , देस दुनिया घूमें, सच में समझदार  । शहर के बड़े कॉलेज में प्रोफेसर । बिरादरी वालों का उनपे भी दबाब बना कि किसी तरह राम आसरे की लड़की को समझाओ, इतने अच्छे अच्छे रिश्तों को ठुकराए चली जा रही है ।

दबाब ज्यादा बना  तो काका एक रोज पहुंचे । कांठ के दरवाजे की साँकल खटका काका बोले " किधर हो राम आसरे भैय्या , चले आवे क्या ? " रामआसरे  खाट पे उकड़ू बैठे अखबार में लीन थे , हाथ में बीड़ी सुलगी हुई थी , हाथ खाट से नीचे लटकाए हुए  ।
"तनिक ना झिझको प्रोफेसर साब  , अपना घर समझों , बेहिचक चले आओ । " राम आसरे ने बैठे बैठे ही जबाब दिया ।

 छुटकी ने लपक कर लाल रंग की प्लास्टिक की कुर्सी राम आसरे की खाट के बगल लगा दी । प्रोफेसर काका पसर गए । इधर उधर की बात करने के बाद काका मंझली से बोले " सुनो बिटिया , हम तुम से ही बात करने खातिर आये है , इधर बैठो और हमारी बात गौर से सुनो । "

" वो तो हम समझ ही गए काका , अकारण तुम्हारे दर्शन कहाँ होते है गाँव में " मंझली ने जोड़ा ।

" देखो बेटा , कितने सुथरे कितने ऊँचे घरों से रिश्ते आ रहे , बिरादरी के लोग मुझे भी दबाब में ले रहे , अब तुम पैरों खड़ी हो, घर का काम सही है , तुम्हारी उम्र भी है , हाँ करने में हर्ज़ क्या है ?"
" बड़े मुकद्दम अपने साले के लड़के का योग चाह रहे है , बड़ा घर है , लड़का सरकारी क्लर्क है। अच्छा हिसाब है बेटा । "

"हम प्रण किये है काका। जब तक छुटकी अपने पैरो खड़ी न हो जाए, हम इस घर की देहलीज लांघ पराये घर नहीं जाएंगे । और हाँ, इस गाँव के किसी भी मुकद्दम या दूसरे साहुकार के सुझाये रिश्ते को तो हमारा आँख मूंद इनकार ही होगा । ये गाँठ बाँधी है हमने !"

" हम भरे बैठे है काका , आप हमे कुरेदोगे , तो हम फट पड़ेंगे । "

" काका इस कुनबे ने , बिरादरी ने , इस बस्ती ने हमारी माँ का जो चीर हरण किया , उसके लिए हम इन सबको कभी माफ़ नहीं कर पाएंगे । 
मन होता है किसी दिन लाउड स्पीकर लगा राम कथा सी बांच दे माँ की लिखी डायरी । बहुत सारे इज्जत वालो के नकाब उतर जायेंगे।"

" कहो बेटा , बेख़ौफ़ कहो , हम सुनने ही तो आये है । " काका ने जोड़ा ।

" सच कहूँ  ,  हमें अपने जीवन में दो मर्दों  का ही अनुभव है एक ये पिता जी और दुसरे बड़की दीदी के पति। और दोनों से ही हमारा तजुर्बा ऐसा है कि शादी करने का मन ही नहीं होता । हमे भी कही ऐसे निठल्ले खुदगर्ज़ मर्दों से पला पड़ा तो । "

मंझली की बात सुन राम आसरे सिकुड़ से गए , बीड़ी का कश जोर जोर से मारने लगे पर कुछ बोलने का साहस न जुटा सके ।

मंझली अपनी रौ में बहती चली गयी ।
" हम जो भी है ना काका , माँ की वजह से है । हमने जो भी सीखा माँ से सीखा , माँ ही हमारी गुरु थी ।  माँ ने ही हमे खुली आँखों से बड़े सपने देखने की हिम्मत दी । माँ इंसान के रूप में देवी थी । खुद जलके हमारा जीवन साध गयी ।"

फिर रुआँसी होकर बोली " पता है , माँ ने मरने का प्लान बहुत पहले ही बना लिया था , उसे बस दो बातों का इंतज़ार था , एक छुटकी  के बारहवीं के एग्जाम का और दूसरा निठल्ले जीजा को खुश करने को दी मोटर साइकिल के क़र्ज़ की आखिरी क़िस्त चुकाने का । जिस दिन वो जहर खा मरी , उस दिन क़र्ज़ की आखिरी क़िस्त की  चुकता रसीद उसके पर्स में थी । "

" वो न मरती पर रोज रोज के दुनिया के ताने , घर अकेले चलाने की जद्दोजहद । तनाव उसके शरीर को दीमक सा चाट रहा था भीतर भीतर । सीने में दर्द उठा था कई बार , हमे बताई भी नहीं । डॉक्टरों ने दिल्ली जा इलाज कराने की सलाह दी थी । बस ये एहसास ही उसे लील गया कि कही वो बेटियों पे बोझ न बन जाए । "

" और कितना करती वो , खर्च चलाने को सिलाई तुरपाई , सुई धागे का काम किया । गुजारा होता ना दीख पड़ा   तो स्कूल में पढ़ाना शुरू किया । वहाँ  का मालिक पगार  मार लेता  , गलत नज़र से देखता , इच्छा रखता तो हिम्मत बाँध शहर का रुख किया । भगवान् जाने क्या क्या जतन किये होंगे , शहर के बड़े अस्पताल में नर्सिंग का काम सीखने करने को ।  कोई कमदिल होती तो चारदीवारी से सर पटक पटक रो मरती । खुद को नियति के हवाले छोड़ देती। पर माँ  दुर्गा का अंश थी काका । "

" माँ पूरी कहानी लिख छोड़ गयी है काका ।
हम किसी को भी माफ़ न कर पाएंगे आजीवन। पर हम माफ़ माँ को भी न कर पाएंगे। उसे क्या लगता था , वो हमसे अपनी जद्दोजहद बताती और हम समझ न पाते, हम इतने छोटे भी ना थे  । कंधे से कन्धा मिला लड़ते दुनिया से  और जीत कर दिखाते । अकेली ही लड़ती रही  , दुत्कारो गयी , कुलटा कहलाई पर हमारे सपने सींचती रही।  क्यों री माँ? हम समझ जाते, बोलती तो एक बार । "

आंसुओ का समंदर सा बह निकला वहाँ । हिडकियां बंध गयी । छुटकी मूक सी सुन रही थी सब  ,उसके आगे रखी प्रितियोगिता दर्पण के विशेषांक  का पूरा पन्ना उसके आंसुओ से तर ब तर था । राम आसरे शुन्य में ताकने लगा , गंभीर हो गया  । बस जोर से खांस कर ये जतावा दिया कि वो अभागा  बीमार है,  लाचार है ।

"तनिक भी दबाब महसूस न करो बेटी , विवेक जो सही बताये वही करो । तुम्हारी माँ सचमुच दुर्गा का अंश थी । किसी भी मदद की दरकार हो तो बेझिझक मुझे याद करना । मैँ जो बन पड़ेगा करूँगा । " ये कहते हुए प्रोफेसर साब उठ चले ।

प्रोफेसर साब ने वापसी का रास्ता पकड़ा तो एक कई पूतों वाली समझदार औरत ने उन्हें रोक लिया । 
" तुम भी फेल होके आ गए क्या प्रोफेसर , जे लड़की किसी के कहे सुझाये से बिहा न करेंगीं । पढ़ लिख भले ही गयी हैं  ,  पर इनमे आभा देवी का अंश है। 
अच्छा ही हुआ वो चली गयी वरना अपनी छव में इन्हें भी हीनता की ओर ही खींच ले जाती  ।"

प्रोफेसर साब को कुछ न सूझा कि लठ चलाये या वाद विवाद करे !

हाँ थोडा सुकून है उन्हें , धीरे धीरे ही सही उस औरत की बेटियाँ  अपनी माँ की तस्वीर का खाका 'चटोरी औरत '  से 'कर्मयोगिनी आभा देवी' की ओर पलट रही हैं।

                                                                                 --सचिन कुमार गुर्जर



सोमवार, 18 अप्रैल 2016

बिटिया आ गयी है या कोई इमरजेंसी आ गयी है !

बिटिया अब बीस दिन की हो गयी है । 'भव्या ' नाम पर सहमति भी बनती दिख रही है ।
अच्छा नाम है 'भव्या ', अपने  आप में विराटता समेटे हुए । एक बाप के लिए इससे बड़ी इच्छा क्या हो सकती है कि उसकी बेटी भव्या  हो , जीवन पथ पर  आसमान की ऊंचाइयों को चूमें ,श्रेष्ठ हो , दीप्तिमान हो ।

पर इस बाप का अनुभव थोड़ा अलग रहा इस बार , पिछली बार बेटे के आगमन से हटके ।

माँ की तबियत थोड़ी नासाज़ है आजकल , कमर की चोट से रिकवर कर रही है । डॉक्टर ने फुल बेड-रेस्ट बोला  है । सो डिलीवरी के समय अस्पताल तक न आ सकी ।
फ़ोन पर बिटिया की खबर सुनते ही पहला सवाल ये दागा ।
" रंग साफ़ है कि  नहीं , आँखे  कैसी हैं , तुझपे तो न चली गयी?  नाक रोमन है की नहीं ?"
फिर समझाया "नाक अगर कुछ चपटी मालूम होती  हो , तो थोड़ी सी सूत दीजो , नया बच्चा मुलायम मिटटी होता है , नाक सुतवा होनी चाहिए । हाँ , कान आगे को झुके दीखते हो तो थोड़ा उन्हें भी दबा दीजो । "

माँ की चिंता को मैँ समझता हूँ , बहुत आगे तक का सोच लेती है माँ ।
पोती सुन्दर होनी चाहिए ताकि आगे चल शादी विवाह में कोई अड़चन न हो ।

एक रिश्तेदार है बीमा करने कराने का काम करते है ।
सालों  से मैँ उन्हें टरकाता रहा , हाँ अब कराऊंगा , तब कराऊंगा ।
बिटिया के आने के चंद घंटो बाद ही उन्होंने फ़ोन घनघना दिया ।
बोले " बच्चू , अब तो कराना ही पड़ेगा । देखो मेरे पास कई अच्छे चाइल्ड प्लान है ।
'जीवन सुकन्या ' लेलो और चिंता मुक्त हो जाओ । थोड़ा पैसा 'कोमल जीवन' और 'जीवन अंकुर' में भी लगा दिया तो सोने पे सुहागा । "

फिर काउंसलिंग करने लगे "देखो बेटा ,बेटी बाप के सीने पे रखा पहाड़ होती है , अभी से प्लान न किया तो चिंता सागर में डूबे जीवन कटेगा ।  समय से पहले बूढ़े हो जाओगे । सही से प्लान करोगे तो बिटिया जब तक शादी लायक होगी , इतना पैसा इकट्टा हो जायेगा कि सारे इंतज़ाम खुद ब खुद ।
बेटे को लेके गम्भीर न हुए  लेकिन अब तो बिटिया आ गयी है , अब तो सुधर जाओ , लीक पे आ जाओ । "

सप्ताहंत बाद ऑफिस लौटा तो फिर श्रीमती जी का फ़ोन आ गया । जीवन में इतना भावुक मैंने उन्हें कभी न पाया ।
" देखो जी , बहुत हुआ । इतने सालों से आप अपने हिसाब से चलते रहे , मैँ  चुप रही । कभी दखल ना  दिया ।
सारा कमाया धमाया आपने यूँ ही इधर उधर बहाया  या घर वालों पे न्योछावर कर दिया ।
साफ़ कहे देती हूँ , अब नहीं चलने दूँगी ये सब । अब सुधर जाओ , बिटिया के लिए कुछ करोगे कि नहीं ?
हमे अभी से पाई पाई जोड़ना होगा । ध्यान से सुन लीजो और गाँठ बाँध लीजो मेरी बात । सुधर जाओ बिटिया आ गयी है !"

अभी दो दिन पहले आफिस में भी किसी ने हलकी फुल्की मज़ाक करने पे चेता दिया " सुधर जाओ बे , अब तो घर में बेटी आ गयी है । "

सब चेता रहे है और ये बाप परेशान है , बिटिया आ गयी है या कोई इमरजेंसी आ गयी है !
हैं जी ?

                          गम्भीर और समझदार होने के नुख्से ढूढ़ता एक बेटी का बाप  -                                                                                                                                          
                                                                                           --सचिन कुमार गुर्जर 

रविवार, 17 अप्रैल 2016

दैत्य और सुंदरी ..

रेस्टोरेंट  की किनारे वाली टेबल पर आप अकेले बैठे है । तभी एक दैत्य का आगमन होता है ।

दैत्य छह फ़ीट से भी लम्बा  ,बेडौल मोटा। बड़ा मुँह , मोटे लेंस का  चश्मा । उसके जूते का साइज भी दस होगा शायद । उसके कानो में लम्बे लम्बे बाल उगे है । पीठ से गर्दन की ओर भी बालों की गुच्छियां टी शर्ट के बाहर झांक रही है ।आप भालू की संज्ञा दे तो कोई ज्यादा अतिश्योक्ति न होगी !
अधेड़ सा प्रतीत होता है , चाल ढाल से सुस्त । सिर के बाल भी हारी हुई लड़ाई लड़ रहे है ।
अजीब से जूते पहने , बच्चों जैसी मोटे डायल की घडी बांधे है ।

दैत्य में आपकी कोई रूचि न होती लेकिन उसकी बाहों में बाहें फंसाए एक सुंदरी भी है उसके साथ ।
कैसी ?  बिलकुल आपके सपनो की राजकुमारी जैसी ।
दूध सा उजला रंग, पतला शरीर , सही जगहों पे सही अनुपात में मांसल ।
मतलब वही साँचा ,वही ढांचा , जैसी की कल्पना आप वर्षो से करते आ रहे है ।
आप बस कुर्सी से उछलने को है " हे प्रिये , हे शकुंतला कहाँ थी आज तक , यहाँ तुम्हारा दुष्यंत दर दर मारा फिरता है । "

फिर आप खिन्न हो जाते है , खीज उठते है । दैत्य बाप तो नहीं लगता ।  पति पत्नी हैं । भला भालू और हिरणी का क्या मेल ?
आप बेहद दुखी महसूस करते है , हृदय वेदना से भर जाता है । अपने लिए नहीं , उस फूल सी  राजकुमारी , उस स्वप्नसुंदरी के लिए ।

आप उस हिरणी की काली,  कटोरे जैसी बड़ी आँखो में झांकते है , उसके  दुख और लाचारी की थाह लेने के भाव से ।  उफ्फ बेचारी , क्या किस्मत ।
फिर आप सबको कोसते है ।  जालिम दुनिया , सुंदरी के माँ बाप से लेकर अंधे समाज तक को , जिन्होंने कुछ न देखा और स्वप्न सुंदरी को  बेमेल दैत्य के आगोश में धकेल दिया ।

हे सुंदरी , तुम कहाँ छुपी बैठी थी पहले । क्यों न मिल गयी मुझे ।
देखो कितना सही मेल होता अपना । कद सही अनुपात , रंग ढंग , नाक नक्श , हम उम्र ।
कसम से, दो हिरणो के जोड़े जैसा होता अपना मेल ।
उफ़ क्या किस्मत पायी सुंदरी ।

आप सुंदरी से एक बार फिर से आँखे मिलाते है और आँखों ही आँखों पूछते  है " बोलो प्रिये , तनिक न झिझको , हम जान लड़ा देंगे ,  छुड़ा लेंगे तुम्हे इस दुष्ट दानव से । तुम हमारी अधिकारी बन रहो , बोलो तो । इशारा हो तो बन्दा जंग का ऐलान करे । "

पर सुंदरी सब समझती है । आप पहले अनोखे तो है नहीं जिसका दिल मचला है सुंदरी की मदद के लिए,  उसे घुटन भरी जिंदिगी से आजाद करने के लिए !

सुंदरी दानव का हाथ अपने हाथ में लेती है और बिना प्रयोजन के ही एक चुम्बन उसके हाथ पे अंकित कर देती  है । फिर दानव के  बचे खुचे बालों में कुछ इस कदर हाथ फिराती है जैसे किसी बच्चे को  दुलार रही हो ।

उसका ये  प्रेम प्रदर्शन अचानक ,अकस्मात नहीं बल्कि आप के लिए सन्देश भर है ।
कि हे दया मूर्ती , ये सूंदर देह मूर्ती । हम खुश है , तृप्त है । सुनो इस दानव ने हमको नहीं , हमने इस दानव को बांधा है , और इसकी चाबी हमारे हाथ है ।

आप हतप्रभ , अकल्पनीय , ये क्या परिस्तिथि है ।
आप फिर से एक बार दानव देह पे सूक्ष्म दृष्टि दौड़ाते है ।
दानव ने जो दस नंबरी जूता पहना है वो लुइस वुइत्तों के बेहद महंगे जूते है , जो घडी अभी तक आपको फनी,  बचकाना लग रही थी वो दरअसल टैग हेउेर का महंगा मॉडल है जो अभी आपने बड़े शो रूम में विंडो शॉपिंग के दौरान देखा भर था । आप पाते है  कि दानव का एक्सेंट भी कुछ विलायती है जो  लम्बे  विलायत प्रवास  से उत्पन होता ज्ञात होता है । टेबल पे पड़े उसके पर्स में महंगे क्रेडिट कार्ड सजे है । हो न हो , दानव जरूर कोई न कोई ऊँचा ओहदेदार है , धनाढ्यता उसके व्यक्तित्व और व्यवहार से टपक रही है ।

आपका भोला, सरल  दिमाग अब जाकर स्थिति का सही आंकलन कर पाता है ।
बेचारगी आप पर फिर से  हावी है  , इस बार सुंदरी के लिए नहीं ,अपने आप के लिए !

                                                                                          -- सचिन कुमार गुर्जर

एक बूढा आदमी


एक बूढ़ा , बेहद बूढा आदमी । हमेशा व्हीलचेयर से  चिपटा, बोझिल । उसकी जिंदिगी की लौ  इतनी धीमी है कि कोई मरियल सा हवा का झोंका भी खामखाँ  ही बदनाम होगा । बत्ती अब बुझी कि तब बुझी । उसकी जिंदिगी की डोर किसी बेहद महीन धागे से लटकी है ।

दिन भर अकेला , बस एक लापरवाह, फ़ोन पे चिपकी सेविका के सहारे। वो आदमी बालकनी से बाहर ताकता  रहता है और पूरे जोश खरोश में कुछ गाता  रहता है । हमेशा !
  
स्विमिंग पूल के सामने वाले उस घर के सामने से मैँ जब भी गुजरता हूँ वो आदमी और भी जोर से गाने लगता है।

उसका मुँह फोफ्ला है , चेहरा बेहिसाब झुर्रीदार , स्वर उच्चारण कुछ स्पष्ट नहीं , पर वो गाता रहता है कोई मलय गीत , अथक , अनवरत ।

पता नहीं ,  उसके गाने का क्या प्रयोजन है । राम ही जाने । हो सकता है बुझ जाने का भय खाता हो उसको ।
या एकाकीपन ,लाचारी  से उपजी हताशा में जकड़ा घुटता हो।
या हो सकता है वो जश्न मनाता हो लम्बी पारी का ।
निर्भर करता है , वो जीवन संध्या को कैसे लेता है ।

मैँ हमेशा मुस्काता हूँ उसके गीत पे और गर्दन नीची कर अभिवादन करता हूँ ।
वो बूढा आदमी , हाथ उठा मेरा अभिवादन स्वीकार करता है और फिर और भी ऊँचा गाने लगता है ।
उसके जीवन की लौ सचमुच बहुत धीमी है और उसका 'संध्या गीत' बहुत ही प्रबल ।

                                                                                   - सचिन कुमार गुर्जर

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

एक क्रांतिकारी मित्र


हमारे एक मित्र बहुत ही क्रांतिकारी हैं ।
हालाँकि दुनिया को  उनकी क्रांतिकारिता का बोध ज्ञान होना अभी शेष बचता है, पर वो सही राह पर है !

उन्होंने लैपटॉप के पिट्टू बैग की जगह खादी का कंधे पर किनारे से लटकने वाला झोला खरीद लिया है , लैपटॉप उसी में रखते है ।  कार्ल मार्क्स , चे गुवेरा  , अरुंधति रॉय आदि की किताबें उनके झोले से बाहर झांकती रहती है । दाढ़ी बढ़ा ली है , बाल लम्बे कर खुले छोड़ दिए है । नज़र कमजोर न होते हुए भी नज़र का चश्मा लगा लिए हैं! उन्होंने समाज हित,  देशहित के हलके-भारी , सरल-जटिल सभी मुद्दों पर अपना मोर्चा खोल दिया है , फेसबुक पर , व्हाट्स एप्प पर और ट्विटर पर । अपना ब्लॉग भी लिखते है । खुद का एक NGO भी डाल दिया है , जो फंडिंग होने पर गरीब लाचार बच्चों की पढाई का इंतज़ाम किया करेगा ।

चंदा इकट्ठा करने में उन्होंने निपुणता हासिल कर ली है , उनकी कुशलता का लोहा हमने तब माना जब उन्होंने दिल्ली के बड़े क्रांतिकारी भाई को ऐसे ऐसे लोगो से चन्दा दिला डाला जो वीकेंड पे ऑफिस सिर्फ और सिर्फ इसलिए जाते है ताकि ओवरटाइम के बहाने मुफ्त की चाय कॉफी , और लंच उड़ा पाये !  ऐसे लोगो की जेब से हज़ार रुपए निकलवाने का काम तो कोई महारथी ही कर सकता है । है कि नहीं ?

हमारे मित्र ब्राह्मण कुल से आते है , लेकिन उनकी क्रांतिकारिता अगर चल निकली  तो उसके सबसे पहले शिकार बामन ही होंगे । बोलते है " भारत में वास्तविक परिवर्तन का दौर तभी आएगा , जिस दिन ये चोटी वाले , कर्म कांडी पड़िए ,बामनो की पांत खत्म हो जाएगी । "

मोदी  और भा जा पा के धुर विरोधी है , और मोदी भक्तो को सोशल मीडिया पर हर रोज धोबी पछाड़ दे पटकते रहते है ! एक सांस में सारे बाबाओ , गुरुओं , भक्तो को गालियाँ भकोसते है । बेहद भद्दी गालियाँ !
गालियाँ और गुस्सा क्रांतिकारी होने के मूल अवयव होते है , आप अगर हर वक़्त तोड़ फोड़ के मूड में न हो ,अगर आप की भोए गुस्से में कमान न होती हों  तो आप घंटे का इंकलाब लाएंगे !

उनके पिता जी बड़े ही कर्मकांडी ब्राह्मण है , चोटी रखते है , पूजा पाठ वाले है , जात कुल को मानते है । क्रांतिकारी मित्र के विजय पथ के सबसे बड़े रोड़ा वे ही है ।
मैँ दावे के साथ कह सकता हूँ कि क्रांतिकारी मित्र पर इंकलाब की चरस इस हद तक तारी है कि कर्मकांडी पिता जी की नाक पे मक्खी बिठाने को जो बन पड़ेगा वो करेंगे। घर वालो के सामने उनकी आस्तीन हमेशा ऊपर चढ़ी रहती है , भृकुटियां तनी रहती है , हमेशा भिड़ने के मूड  में ।

शादी के बारे में उन्होंने घर वालो को साफ़ साफ़ कह दिया है " भला मानो या बुरा , करूँगा तो प्रेम विवाह करूँगा। और हाँ ,  ब्राह्मण  कुल की कन्या तो क़तई नहीं चलेगी। "
जातिवादी , मनुवादी व्यवस्था के धुर विरोधी मित्र प्रेम विवाह चाहते है वो भी अपने से किसी नीची जाति की कन्या के साथ। दलित कन्या हो तो सोने पे सुहागा ।  इससे उनकी क्रांतिकारिता को चार चाँद लगना तय हो जायेगा  और पिता जी की मनुवादी सोच पर तुषारापात होते देखने का सुनहरा अवसर भी प्राप्त होगा।

हमने पूछा " आप प्रेम विवाह चाहते है , लेकिन किसी  ब्राह्मण कन्या से ही आपका  दिल लग बैठा  तो ? "
" कतई नहीं ,  कोई आई भी तो विवाह तो कतई भी नहीं , विवाह होगा तो विजातीय " ऐसा बोलते हुए मित्र की मुट्ठियाँ भिच गयी जो उनके दृढ निश्चियी  होने का संकेत था ।

उनकी शिकायत है कि उन्हें उतनी गम्भीरता से क्यों नहीं लिया जाता जिसके वो हकदार है ।
हमने कहा "आपके विचार तो सूक्ष्म है, ओजस्वी है  , विषय पे आपकी पकड़ अच्छी है,  । जनता, व्यवस्था , शासन-प्रशासनऔर बरखा दत्त  की आपसे रुसवाई हमारी भी समझ से परे  है ! "

यकीन मानिए , कश्मीर मामले को लेकर उन्होंने कन्हैया से भी ज्यादा भीषण , फुकाउ , धुर राष्ट्र विरोधी विचार अपने फेसबुक वॉल पे लिखे है , कई बार मोदी  जी  की लुंगी उतारी है  सरेआम , पर किसी कम्बक्त राष्ट भक्त , मोदी भक्त ने गाली के दो लफ्ज़ भी लिखना गवारा न समझा, आज तक । कम्पलीट इगनोर  !

हमने जोड़ा "शायद आपकी कम उम्र आड़े आती होगी । अभी आप कुल जमा पैंतीस  के ही तो है , दाढ़ी पूरी तरह काली है , इकहरे  हाड के हैं सो उम्र और भी कम जंचती है ।  "

उन्होंने ठुड्डी के नीचे सफ़ेद होते कुछ बालों की ओर  इशारा करते हुए बड़े इत्मीनान से कहा " कोई न , ज्ञान और अनुभव की फसल शनै शनै बढ़ रही है , हमे पता है संघर्ष के फलित होने में चंद साल लगेंगे अभी , हम तैयार है !"

हमने उनसे ये कहते हुए विदा ली कि आप लगे रहे , सही ट्रैक पर है , दुनिया ऐसे ही काम करती है । वक़्त आएगा आपका । घूरे के भी दिन फिर जाते है साल में एक बार तो , आप तो इंकलाबी है !
"फर्स्ट दे इगनोर यू , देन दे लाफ एट यू, देन दे फाइट यू , देन यू विन! "

                                                 मित्र की सफलता का आकांक्षी , लो आई क्यू वाला , बेहद फट्टू                                                         -  सचिन कुमार गुर्जर


आभार :प्रेरणा स्रोत , श्रद्धेय हरिशंकर परसाई की कहानी 'क्रांतिकारी ' से प्रेरित ।


रविवार, 10 अप्रैल 2016

कोई अच्छा सा नाम सुझा देना भाई !


हाल फिलहाल में मुझे अगर किसी चीज़ ने सबसे ज्यादा इंटेलकचुअली  चैलेंज किया है तो वो है बच्चे का नाम करण ।
और बड़ा ही ख़राब प्रदर्शन रहा अपना इस मामले में । कम से कम पाँच छह रिश्तेदारों , जान पहचान वालो के फ़ोन तो आये ही होंगे कि भईया आप तो बहुते ही समझदार ठहरे और होशियार हुए , देश दुनिया घूमे हो , सुझा दो कोई अच्छा सा नाम ।

और हमने सुझाएँ भी है , कुछ इंटरनेट से,  कुछ  ऑफिस और अपने सर्कल में सुने सुनाए । पर अफसोस , सब रिजेक्ट । कतई खरे न उतर पाये हम उम्मीदों पर , बाल बराबर भी नहीं ।

 धक्का लगा है हमारी शाख को ।

नाम जो है एक तो कतई 'आउट ऑफ़ बॉक्स ' होना चाहिए और हाँ एकदम  अनहर्ड  भी ।
ऐसे ऐसे नाम सुनने को मिल रहे है कि जीभ भी साली मोच खा जाए । सीधे वेद  पुराण , उपनिषदों से आ रहे है , फ्रेश्ली पिकड !

एक जमाना था , जेठ में पैदा हो गए तो जेठा , पूस में पैदा हो गए तो पूसा । इतवार को पैदा हो गए तो इतवारीलाल  , मंगल तो आ टपके तो मंगला ।
कई बार तो माड़ साब खुद ही लिख जाते थे  और चबूतरे पे आ बोल जाते थे "सुनो बालको की माँ , तुम्हारे ननुआ का नाम हमने बलराज चढ़ा दिया है रजिस्टर में ।"  और ननुआ बलराज हो जाता था ।
उस पीढ़ी  में काम पे ध्यान था , नाम पे नहीं ।
आजकल की पीढ़ी बत्ती बुझाने से पहले नाम पर ब्रैन्स्टॉर्म कर रही है ;)

फिर नेम  पूल का जमाना आया । पूल के हिसाब से चलने लगे जैसे कोई भी अक्षर उठाओ बाद में इन्दर जोड़ दो ।  महेंदर , राजेंदर , सुरेंदर , हरेंदर , बलबिंदरइत्यादि ।
अभी पिछले दशक में 'आंश ' 'आँशु'  का पूल चल रहा था , दिव्यांश , चंद्रांश , प्रियांशु , हिमांशु  आदि आदि ।
मम्मी पापा का नाम जोड़के कुछ नया इज़ाद करने का चलन भी आया था थोड़े टाइम के लिए !

 भला हो हमारी अर्धांगिनी का जिसने हमारे नकारे पन को अरसे पहले ही परख  लिया और  हमे अपनी बिटिया के नामकरण के बोझ से महीनो पहले ही बरी कर छोड़ा  । उसे पता है ये जटिल काम हमसे न हो पाएगा , कतई भी नहीं ।

आज बिटिया दस दिन की हो गयी है पर नाम पे कुछ डिसाइड नहीं कर पा रही बेचारी । रोज १० से १५ नाम की सूची व्हाट्स एप्प करती है , हमे ये भी सही लगता है वो भी सही ।
आपको कोई सही सा नाम याद हो बिटिया के लिए ' भ '  अक्षर से , तो सुझा दीजियेगा , पसंद आ गया तो आपकी बुद्धिमत्ता के कायल होंगे हम । हमारी अर्धांगिनी का भार भी हल्का हो जायेगा !

वैसे नाम को लेके ये झमेला अब उफान पे जरूर है , बिलकुल  नया भी नहीं है । 
उस ज़माने में , तेंदुलकर के उदय से पहले , उन दिनों माँ ने गाँव के खडकू  के नाती का नाम ' सचिन ' सुन लिया था  तो बलबला उठी थी , शकल न सूरत , नाम नक़ल कर लिया फोकट । माँ का बस चलता तो बदलवा ही डालती उसका नाम :)
                                                                                        - सचिन कुमार गुर्जर








बुधवार, 23 मार्च 2016

पहाड़ी लड़का और दिल्ली वाले उस्ताद

वो लड़का पहाड़ के किसी गाँव  से कॉलेज आया था । एकदम गवई , हर एंगल से । बातचीत का लहजा , ड्रेसिंग सेंस , विचार व्यवहार  । मतलब हर लिहाज से । गोल फ्रेम की  ऐनक लगाता था जो  पुराने हेडमास्टर के लुक वाला फील देता था । 

दूसरी तरफ उस्ताद था , जो दिल्ली से आया था । राजधानी दिल्ली से ! 
उसके बोल बोल से एटीट्यूड टपकता था । बहुत ही सफास्टिकेटेड  !
खुद बोलता था " हम हम है , बिना सुतली  के बम है , हमे रोक सके कोई , किसमें  इतना दम  है! " 

लड़के की आँखे सपनो से भरी थी , बस डिग्री मिल जाये , फिर नौकरी और फिर जिंदिगी शुरू हो । 
उधर उस्ताद निर्वाणा  की स्टेट में रहता था  हमेशा  । लगता था सब पा लिया , अब कुछ बचा नहीं अनुभव करने जैसा , चखने जैसा ! उसने घाट घाट का पानी पी रखा था , सराय काले खां  से लेकर , बेर सराय ,  मदनगिरी से ऍम जी रोड तक !
कॉलेज में चाय के ठीये पे बैठ उस्ताद अक्सर बोलता , "यार, मेरे कॉलेज आने का मकसद डिग्री या पढाई नहीं , मैं तो हवा पानी बदलने को आया इधर !"

लड़का इल फिटिंग पैंट  , गाँव के अनगढ़  टेलर की सिली हुई , नाभि के ऊपर बांधता था, वो भी गोल्ड्स्टार के जूतो के साथ  !  उस्ताद लोअर वेस्ट पहनता था , जिसमे से उसका जॉकी का अंडरवियर बाहर झांकता था , मतलब अंदर से लेकर बाहर तक ब्रांड की दूकान था उस्ताद !

लड़का डबल बबल चबा के ही स्टाइलिश होने की आग को बुझा लेता था , उस्ताद सिगरेट को ऐसे पकड़ता था  , मानो सिगरेट नहीं कोई लड़की पकड़ी हो । मतलब जे  कि दबा के  नज़ाकत भरी थी उस्ताद की तबियत में !
उस्ताद रोल मॉडल था , और लड़का  नौसिखिया ,जो उस्ताद की अनुभव की दूकान से एक एक अनुभव अपने जीवन में उतार लेना चाहता था ।

एक बार उस्ताद ने ज्ञान वांचते हुए बोला " अरे बुड़बक , ओ तुच्छ प्राणी , तू कैसे टिकेगा  उधर दिल्ली  में , बहुत ही सीधा है , लोग बाग़ बहुत  चूरन काटेंगे तेरा !
तेरे को इल्म नहीं पिसुए ,  ज़माने की रफ़्तार क्या है उधर । 
पता है उधर लड़कियाँ  कैसी कैसी है , कैसे कपडे पहनती है ?
 टैटू दिखाती है , उनकी नाभि में बालियां लटकी होती है । और सिगरट , मैं तो कुछ भी नहीं , उधर की लड़कियाँ सिगरेट के धुएं के ऐसे छल्ले बनाती है रे बाबा ! टायर जैसे गोल गोल !
और हाँ ,तू अगर गलती से भी पास उनके पास फटक गया तो तेरे मुँह पे धुँआ छोडेंगी  और बोलेंगी , हट बेन ******, दूर हट !"
"तू तो दिल्ली की बस में भी नहीं चढ़ पायेगा । भाग के ही चढ़ना होता है , रूकती नहीं है वहाँ बस " 

लड़के का कलेजा बैठ जाता। उसे लगता नौकरी तो शायद वो पा जाये ठीक ठाक , पर ये सीधापन और देहाती चौखटा इज़्ज़त का फालूदा कराया करेगा यहाँ वहाँ !  हीन भावना के न्यूनतम स्तर को छू जाता था लड़के का मन  उस्ताद की बातों से ! " 

खैर , समय का चक्का घुमा , नौकरियां शोकरिया लग गयी , लड़का जम गया दिल्ली में । 
पर उस्ताद की  बात दिमाग  में टकराती रहती थी, खटकती रहती थी  । जिज्ञासु बालक बन घूमता था इधर उधर । कहाँ है वो दिल्ली , जिसका वर्णन उस्ताद कर गए लम्बे अरसे पहले अपने प्रवचन में !"
दूर से ही दिख जाये , लड़कियों का कोई ऐसा झुण्ड , जिनकी नाभियो में लटकी हो सुनहरी बालियाँ , कमर पे कही बना हो कामदेव के छल्ले वाला टैटू  और जो सिगरेटों के छल्ले उड़ाती हो हवा में बेख़ौफ़, बेपरवाह । .. 
और जो जरा सा  पास फटकने पे  बोलती हो  हट बेन********* दूर हट ! 

उसे लगा , उस्ताद उसे यूँ  ही गिरियाते रहे कॉलेज  , इधर तो ऐसा कुछ माहौल है ही नहीं । वो लड़का दिल्ली की गली गली घूमा । पराठे वाली गली से लेके चटोरी गली तक । पालिका बाजार से  नयी सड़क तक । तभी ठंडी रोड तो कभी गरम रोड !   पर धुएं के छल्ले उड़ाती , मादक टैटू वाली लड़की न दिखी ! 

रहा न गया उससे , घुमाया उसने एक रोज उस्ताद को फ़ोन और सुनाई पूरी व्यथा । 
मार्गदर्शन दे गुरु , आपमें आस्था टूटी जाती है । जीवन अनुभवहीन बीता जाता है । 

उस्ताद हँस दिए । बोले  " बालक , जैसी जिसकी द्रष्टि  , वैसी दिखे सृष्टि ! " 
" नज़र पैदा कर बालक , सब है इधर ही !"
" चल शाम को आता हूँ।  " 

शाम को उस्ताद अवतरित हुए  और लड़के को प्रकृति दर्शन को ले चले । गुरु का मार्गदर्शन !
एक इंटरनेशनल  कॉल सेंटर के सामने बैठ उस्ताद ने मुँह में मिंट फ्रेश दबा ली और सिगरेट सुलगा ली । 
यौवन का मेला था कॉल सेंटर के बाहर । हँसी ठिठोली करते कम उम्र लड़के लड़कियाँ  । वेल ग्रूम्ड !  स्टाइलिश बेहद अंग्रेजीदां । चुस्त जीन्स , फटी जीन्स ,  बेहिसाब नुकीले , चमकीले जूते ,  कोई बदन उघाड़ू  तो कोई  फुल्ली कवर्ड , कोई जैल लगे अजीबो गरीब बाल लिए  , तो कोई  दूधिया सफ़ेद , चमचमाता टकला  सिर लिए !
कोई सुराही सी कन्या , तो कोई बर्गर सी तो कोई मिल्क चॉकलेट से दूधिया !
मतलब कॉकटेल सा था , परिभाषा में बाँधना मुश्किल है ।  

" एक बात बता , कोई आदमी तेरे से हाथ मिलाये और फिर तेरी हथेली में अपनी ऊँगली से खुजाये तो इसका मतलब क्या हुआ ? " उस्ताद प्रवचन के मूड में थे । 
लडक ने सहज जबाब दिया ," इसका मतलब  वो आदमी कोई अदना मैनेजर है किसी आई टी फर्म में , जो एक्स एल शीट भर भर कर अपनी उंगलिया चोटिल कर रहा है कीबोर्ड पीट पीट के !"

"एकदम गलत! इसका मतलब ये है कि वो आदमी समलैंगिक है और तुम्हे प्रणय निवेदन कर रहा है , वो तुम्हे टटोल रहा है , किसी सिग्नल की आस में " 

" सच्ची ?"
"हा , सोलह आने सच्ची! " 

 ज्ञान की धाराए बह रही थी कि तभी कोई सुरीली सी आवाज़ ने ध्यान खीच लिया । 
" एक्सक्यूज  मी , मे  आई बोरो योर लाइटर फॉर ए मोमेंट , प्लीज !" 

एक बेहद सुन्दर , सुतीली ,सिगरेट सी लड़की ! उसकी आँखे जरूर थोड़ी थकी सी थी,  लॉन्ग , ओड  शिफ्ट की वजह से शायद!  वो लड़की उस्ताद से लाइटर मांग रही थी , सिगरेट सुलगाने को । लूज़ , हिप हॉप शार्ट टीशर्ट , जो नाभि दर्शन का अवसर प्रदान कर रही थी । नाभि में तीन छल्ले थे , बड़ा , मीडियम औए स्माल ।  उसके कंधे पे बटरफ्लाई टैटू बना था ।

"स्योर , व्हाई नॉट !" भारी आवाज़ में उस्ताद ने बोलते हुए मुस्कान के  साथ लाइटर आगे बढ़ा दिया ।

सिगरेट सुलगाते  ही उसने धुए का बड़ा सा छल्ला बना हवा में उछाला , मानो धुँआ नहीं स्ट्रेस रिलीज़ कर रही हो । 

एक एक घटना क्रम एकदम ऐसा ही घटा जैसा उस्ताद सालों पहले कॉलेज में वर्णन कर गए । 
गनीमत ये रही कि उसने लड़के की ओर मुड़कर  ये नहीं  बोला कि " तू कौन , हट बेन ***"
बस एक प्यारा सा " थैंक यू वेरी मच " बोल आगे बढ़ गयी । 

लड़के को काटो तो खून नहीं , हलक सूख गया एकदम , और दिल तो ऐसे दौड़ा मानो कोई हथोड़ा चला रहा हो सीने पर । 
 शब्द सूख गए , बोलने जैसा कुछ बचा भी नहीं था । बस नतमस्तक हो गया गुरु के सामने ।  क्षमा महाराज, व्यर्थ आपके प्रवचनों पे शक किया । 

गुरु गोविन्द दाऊ खड़े काके लागु पाय 
बलिहारी गुरु आपणो गोविन्द दियो बताय !

वापस घर लौटते हुए लड़के ने उस्ताद से मिंट फ्रेश मांगी और मुँह में डाल गाडी के मिरर में मुँह टेढ़ा कर  , आवाज भारी  कर नकली एक्सेंट में बोला 
"स्योर , व्हाई नॉट !"

"क्या उस्ताद ,  घंटे का इनोवेशन कर रहा मैं उधर  , एक्सेल शीट में घूर घूर के गोल चीज़े भी चौकोर नज़र आती है !
और क्या बाहियात पीपीटी बनाता  हूँ , किन किन फ़िज़ूल चीज़ो को लेकर बनाता हूँ । 
भटक गया हूँ उस्ताद । 
इस  पार जीवन तो जी लेता । और कौन सा पैसा बचता है उधर ? महीने का आखिर , और बस सब लाम पेट बराबर !"

"तू मौज मस्ती  टाइप का नहीं  है रे ! तेरी पर्सनालिटी अलग है! और हाँ  चीज़े दूर से ही सुहानी दिखती है । तेरी लाइफ दुसरे ट्रैक पे है । आगे देख ! "
"सुन , नॉएडा एक्सटेंशन में घर बुक करा दे ,  इन्वेस्टमेंट के हिसाब से । भाड़े पे चढ़ा देना । तेरा पुराना लोन चुकने को आया , नया ले ले ! "
उस्ताद लड़के को उसकी सच्चाई और नियति के  कोऑर्डिनेट्स में घसीटते हुए बोले ।

"ठीक है उस्ताद " किसी आज्ञाकारी बालक सा हाँ करता चला गया वो लड़का । 

सूरज हिल सकता है , धरती डोल सकती है  , पर लड़के के मन में जमी उस्ताद के प्रति आस्था और उनके एक एक प्रवचन  में भरोसा , कोई नहीं हिला सकता । 

उसे हमेशा डर सताता है कि कही कोई दिल्ली की अल्ट्रा मॉडर्न लड़की उसके मुँह पे धुँआ छोड़ ये न बोल दे कि "हट बेन***!"
                                         सचिन कुमार गुर्जर 

मुचलका

मुचलका   इमारतें , ये बुलंद इमारतें , स्विमिंग पूल , जकूज़ी और जिम से सजी इमारते  इमारतें जिनमे गाड़ी के लिए गार्ड  बेरिकेडिंग हटाते हैं |  ये...