शुक्रवार, 23 मई 2014

नए कंधे , पुराना ढोंग


फ्रांस की जनक्रांति के दौरान जब भूख और कुपोषण से परेशान मज़दूर, किसान  सड़को पर उतर आये और रोटी की मांग करने लगे तो फ्रांस की महारानी मैरी अंटोइनेटे ने उन्हें रोटी के अभाव में केक खाकर गुजारा करने की सलाह दे डाली थी ।महारानी के इस बयां का क्रांतिकारिओ ने खूब प्रचार किया था । आम जनता ने इस बयां को उनके कठिन हालातों का मखौल माना । 

ये बयां आपको भी अटपटा लग सकता है पर महारानी ने ये बयां गरीबो का मखौल उड़ाने के लिए दिया होगा ऐसा मैं कतई नहीं मानता । दरअसल, महारानी के इर्द गिर्द जिन चाटुकारो , सलाहकारों का जमावड़ा था वो सब धनाढ्य वर्ग से आते थे । दो जून की रोटी भी कोई समस्या हो सकती है , महारानी को इसका इल्म न था । केक लक्ज़री नहीं, दिन प्रतिदिन की भोजन सूची में शामिल था । 
 
जनसाधारण की आकांक्षाओं के कंधो पर चढ़ जब कोई नया नायक उभर कर सामने आता है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती तृणमूल से जुड़े रहने की होती है ।चुनौती होती है जनमानस का मूड भाँपने की , उनकी आकांक्षाओं ,दबी आवाज़ो को बुलंद करने की । आप अगर चाटुकारो की  फ़ौज़ से घिर गए और जमीनी हकीकतों से कट गए तो समझो पतन शुरू हुआ ।

 दिन प्रतिदिन के अरविन्द केजरीवाल के व्यवहार में भी सच्चाई से कट जाने और अप्रासंगिक विचार,सुझाव  मंडली से घिर जाने के लक्षण प्रतीत होते है । दिल्ली में 'आप' का प्रादुर्भाव दबी कुचली जन इच्छाओ, छटपटाहटो  और भ्रष्टाचार का कुचक्र तोड़ने की कोशिशो का एक प्रयास था । लेकिन परिवर्तन की इस नाव के चालक दल ने समय के साथ जो दिशा पकड़ी है उससे लगता है कि ये प्रयोग पतन की ओर है । 

भ्रष्टाचार उन्मूलन के मूल मंत्र से पथ भ्रमित अरविन्द केजरीवाल ने उन सब पैंतरों  का इस्तेमाल किया  है जो  ठीठ , पुराने नेता और राजनैतिक दल समय समय पर करते रहे है । न्यायालय की अवमानना कर जेल जाना, जनता में सहानभूति पैदा करने का एक प्रपंच मात्र ही लगता है । 
'आप' के भावुक समर्थक शायद इत्तेफाक न रखें पर माफ़ करना , 'आप' के व्यवहार में बदलाव की हवा नहीं बल्कि जड़ता और पुरातन की सड़ांद ही महसूस होती है ।

                                                                'आप' का एक पुराना समर्थक 
 

गुरुवार, 1 मई 2014

एक अनुत्तरित पत्र



कभी कभी यूँ  होता  है कि आप बड़ी ग़रज से काम के किसी दस्तावेज  की तलाश में अपनी अलमारी में बेहतरतीब  लगी क़िताबों को उलट पलट रहे होते है । अलमारी के उन कोनो में झाँक रहे होते है जहाँ  सालो से सिर्फ़ और सिर्फ़ धूळ  का हीं साम्राज्य रहा  होता है । बन्द पड़ी किताबो के पीले पड़ते पन्नों को पलटते है इस आस में कि न जाने कहीँ आपकी ज़रूरत का  पेपर हाथ लग जाये ।
या आप अपंने मेलबॉक्स के आर्काइव्स में झाँक रहे होते है ।
ऐसे में वो जरूरत का दस्तावेज़  तो हाथ नहीं आता ,पर कुछ ऐसा  दिख जाता है जो बड़ा ही अप्रत्याशित होता  है ।कोई पुराना खत ,कोई  पुरानी  मेल दिख पडती है जो आपकों अतीत में खीच ले जाती  है ।

आज एक ऐसा ही एक भावुक मेल पत्र  हाथ लगा जो कभी  सालों पहले उस युग के प्रेमी मन ने लिखा था । यादों का एक पिटारा सा खुल गया है।धुंधले चेहरे फिर से चटक हो उठे है । 
बहुत कुछ याद आ पड़ा  है झपाक से याद आ गया है वो गुड़गांव का किराये का मकान । वो दोस्त जिससे देर रात तक दुनिया जहान की बातें होती थी ,सब तरह की बातें ! उसके सलाह मशवरे याद आते है जो अक्सर नाकाम हो जाते थे ।याद आ जाती है वो मकान मालकिन जो उम्र के लिहाज़ से तो आँटी ही दिखती थी पर जिसने हमसे साफ़ साफ़ शब्दों में बोला था कि हम उसे भाभी जी बुलाकार ही सम्बोधित करें । 

उस पृष्ठभूमि में और उस काल में ही रचित किया गया था ये प्रेम पत्र । घंटो की मेहनत और अंग्रेजी डिक्शनरी का इस्तेमाल करके लिखा गया ये पत्र उस युग के प्रेमी की करुण चीत्कार है । इसमें मुन्हार है, मान मनोव्वल की कोशिश है , भावनाओं का समंदर है जो उस दौर के मानस में उमड़ा था । सम्मोहन  ,खिचाव ,प्रेम पिपासा  की लबलबाती एक नदी है ।
 एक ऐसी नदी जो भावहीन ,निष्ठुर और संवेदनहीन मरुभूमि में भटकती , राह बनानें  क़ी नाकाम कोशिश करते हुए दम तोड़ देती है ।उस युग के प्रेमी को आस थी कि भले ही तब तक के सारे टोटके असफल ,निष्तेज साबित हुए हो ,पर इस मनुहार का  जबाब जरूर आएगा ।

उसके बाद दिन गए , महीने गए फिर साल भी  गुजर गये । ज़िन्दगियाँ  अपने अपंने रास्ते निकल चलीं , पत्र अनुत्तरित ही रह  गया । शायद अच्छे के लिए ही!

आज सोचता हूँ कि अंग्रेजी में न लिखकर अगर हिँदी मेँ लिखा होता तो शायद शब्द चयन की आसानी होती और भावनाएं भी बेहतर उभर पातीं । हालाँकि अंतिम परिणाम हार ही होता क्योंकि पत्थरदिल चट्टान से सामना था । और चट्टान से टकराकर तो लहर को ही बिखरना होता है ।

हालाँकि पत्र अंग्रेजी में क्यों लिखा गया इस बात को लेकर भी मनोवैज्ञानिक विशलेषण किया जा सकता  है । प्यार का मॉडल अंग्रेज़ीदा हो चला है शायद इसलिए । अपनी संस्कृति और जुबान भी प्यार के इज़हार में असहज महसूस कराती है , टूटीं फूटीं अंग्रेजी में 'आई लव यु ' के उदगार उस सांस्क़तिक असहजता  से निज़ाद दिला देते है ।

कौन कहता है कि भूलना , बिसरा देना एक बीमारी  है । यही तो कुदरत की एक नेमत है कि आज का मन मुस्कराहट के साथ इस प्रेमपाती  को मसालेदार खबर क़ी तरह पढ़ रहा है ।
वर्ना ,उस दौर में तो दिल ख़ून  के आँसू रोया था  !





रविवार, 27 अप्रैल 2014

विदेशी बाजार में देसी फल



सिंगापुर के एक बड़े सुपरमार्केट मे  घूमते हुए यूँ ही अचानक नजर शेल्फ में बड़े करीने से सजे इस फल पर पड  गयी । नजदीक  से देखा  तो पाया ये तो अपना जाना पहचाना देहाती फल है जिसकी दावत हम यूँ हीं खेत खलियानों में  घूमते हुए उड़ा लिया करते  थे । नाम भी शायद कुछ स्थायी नहीं है  , हमारे  यहाँ तो बच्चे वीरबताशा कहकर बुलाते  है । होता भी सचमुच बताशे जैसा मीठा है । 

भारत में इसका व्यावसायिक उत्पादन न के बराबर है । अधिकतर क्षेत्रों में ये खरपतवार के रुप मेँ ही  उगता है । वैसे इसका अंग्रेजी नाम पिसलिस   गूसबेरी (PHYSALLIS GOOSEBERRY) है । 
 सिंगापुर में ये फल कोलंबिया से आयातित किया जाता है । डेढ़ सौ ग्राम के पैकेट की कीमत है लगभग तीन सिंगापुर डॅालर!
गुणा भाग करे तो अपने रूपयें के हिसाब से ये फल यहाँ लगभग नौ सौ पचास रुपए किलो के हिसाब से बेचा जा रहा  है । 

विटामिन ए एवं विटामिन सी से भरपूर ये फल खॉसी , बुखार से लेके वजन घटाने तक के लिये लाभकारी है ।सलाद के रूप में भी इसका चलन बढ़ा है । 
तो अगली बार गर्मियों की छुट्टियों में जब आप ग़ाँव जाये और खेत खलियानों में टहलते हुए इस प्यारे वीरबताशे के दर्शन हो जाएं तो उसे यूँ ही खरपतवार समझ नज़रअंदाज़ न करे । सिंगापुर में इसके कदरदान इसे हज़ारो मील दूर कोलंबिया से आयातित कर प्रयोग कर रहे है। 


शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

बावरा मन





उस दिन अचानक तुम यूँ ही दिख पड़ी थी गुडगाँव के उस मॉल की सीढ़िया उतरते  हुए । एक क्षण को तो पहचान ही न पाया ।पहचानता भी कैसे , तुम इतना  जो बदल गयी हो  ।बोलने के लिए दो शब्द भी न जुटा पाया । सही किया तुम शायद पहचान भी न पाती । बोल तो तब भी न पाया था जब बोलना  चाहिए था । अब तो गृहस्थी के घेरे बंध गए है इधर भी ,उधर भी ।

सच में ,शर्मीला होना भी एक त्रासदी है । भावनाओं का , उलझे विचारों का , इच्छाओं का एक भॅवर सा उमड़ता है पर संकोच का कवच भेद दो शब्द बाहर नहीं आ पाते । पल्ले आती है तो सिर्फ झुंझलाहट । बारिश  में भीगी पत्तियों के ढेर में लगी आग की  सुलगन की तरह , ना भड़कती है , ना मरती है ।

पर ये जो समय है न , बड़ा ही बलबान है । सब कुछ बदल छोड़ता है ,यादें भी ।आज जिसे तुम अपनी जिंदगी की त्रासदी समझ निढाल हुए जाते हो , कल हो सकता है महज एक संस्मरण बन कर रह  जाये । महज एक याद , भावना का लेस भी शायद जाता रहे ।

तुम एक ऐसी स्मृति ही हों , भावना के अंकुर  तो कब के  सूख गए ।
फिर भी ,न जाने क्यों देर तक पीछे मुड़कर  देखता रहा तुम्हे , जब तक तुम मॉल के मुख्य द्वार से  ओझल न हो गयी । तुम्हारी बेटी बिलकुल तुम ही पे  गयी है । वही नाक नक्श ,दिये  सी चमचमाती आँखे , वही सूरज को शर्माता उजला रंग । कही से भी नहीं उतरी । शायद जिद्दी भी होगी ,तुम्हारी ही तरह।  निष्ठुर !



तुम कितना बदल गयी हो , पिछले कुछ ही सालों में । मोटी हो गयी हो , समय की  लकीरें माथे पे साफ़ दिखती है ,हिना में रंगे कुछ बाल भी सफेदी की दुहाई देते दीख पड़ते है । अब भी सुन्दर हो कोई दोराय नहीं , पर वो रूप कहाँ जिसे मैंने अपने मानस की गहराइयो में दबा संजो के रखा है ।
कॉलेज में तो साँसे थम जाया करती थी नजरो के साथ साथ  । किसी सिद्ध योगी के ध्यान सा अनुभव देता था तुम्हारा साक्षात्कार । मन बाँध लिया था तुमने ,सम्मोहन का अटूट तिलिस्म था जो कभी न टूटता था ।

पहले तुम हँसती थी तो आँखे नाच उठती थी ,फूल से झड़ते थे ।तुम्हारी परछाई को भी छू मन झूम उठता था । तुम आज  भी हँसी थी पर वो उल्हास न था ,महज खानापूर्ति थी  ।पहले  तुम कितना सजती थी , बालो की लटे बार बार झटकती थी । बाल आज  भी ठीक ठाक से बंधे थे  पर उपेक्षा की दुहाई देते थे  , शायद अब तुम्हारा सारा ध्यान तुम्हारी बिटिया पे रहता होगा ।तुम अब आँटी हो चली हो , किसी खाते पीते घर की आँटी, दूसरी आँटियों की ही तरह , साधारण !
 क्रूर है, पर तुम्हारे आंटी होने में मन को बड़ा सुकून है। तार्किक  मन, भावुक मन को समझा रहा है कि कॉलेज का प्यार महज एक कैमिकल लोचा था जो अक्सर उस उम्र में  हुआ करता है। परी तो दिमाग में ही बसती  थी , तुम हमेशा से ही साधारण थी । 

समय की लकीरें इधर भी खिची हैं।  और भी ज्यादा गहरी, और भी ज्यादा उलझी हुई ।मॉल से लौटते हुए एक दुकान के शीशे में झांकता हुँ , कनपटी के सफ़ेद बाल अब प्रबल होते जा रहे है ।
बूढ़ा हम भी रहे हैं ,पर शायद हमारे अंकल होने में किसी को सुकून न आये । हम कभी किसी के सपनों के राजकुमार  जो न थे ।










 

सोमवार, 3 मार्च 2014

खूब रोई दमयन्ती


अभी पिछले दिनों अपने गाँव की एक शादी में शिरकत का मौका मिला ।  सिंहासन पे बैठी वधुबाला  वर को अपने रिश्तेदारो से परिचित करा रही थी । दोनों एक दूसरे को पहले से ही जानते थे , अपनी पसंद से ही शादी कर रहे थे । दोनों अच्छे पढ़े लिखे , दोनों कमाने  वाले  । परिवार वालो ने सहर्ष स्वीकार किया था दोनों का फैसला । विदाई हुई तो माहौल कुछ ग़मगीन सा हुआ |  पर आँसू रिवायती ही जान पड़ते थे ।
आह न थी , टूटने की करुण चीत्कार न थी । अच्छा ही है , परिवर्तन का दौर महिला सशक्तीकरण और बेहतर जीवन का आश्वासन देता जान पड़ता है । 
 
कल अमृता प्रीतम की एक किताब पढ़ रहा था । किताब  चालीस पचास के दौर में भारतीय नारी के जीवन संघर्ष की दास्तां से भरी हुई है । रुँआसा हो आया था मन , कितना त्याग , कितना समर्पण फिर भी नरक सा जीवन । 
अहसास हुआ , अरे वह दौर तो हमारे बचपन तक खिंचा था ।अतीत के अधियारे युग के उत्तरार्ध के साक्षी तो हम भी रहे हैं  । बाल विवाह ,बेमेल विवाह ,अशिक्षा और महिला वस्तुकरण के  दौर के मूक गवाह हम भी रहे है ।  अमृता की सहेलियों का जिक्र उनकी किताबों में तो आया । गाँव टोलों की न जाने कितनी पीड़ित मासूम तो गुमनामी के अँधियारों में अपना जीवन काट चुकी | कुछ जीवन पथ पर घिसट रही है। 

ऐसा ही एक वाकया है दमयंती के विवाह का । जिसे मैंने खुद अपने कानों  से अपनी दादी से सुना था । 

दमयंती एक हँसती खेलती इकहरे हाड की बच्ची थी । अपनी हमउम्र सहेलियों जैसी ही । स्कूल से दूर दूर का भी वास्ता न था । घर का चौका बर्तन करती । उपले गोबर का काम करती । गाय भैंसो की देख भाल करती । फुर्सत होती तो पड़ोस की सहेलियों संग गुड़िया गुड्डो का खेल भी खेल लेती । दमयंती के बापू लम्बे कद के रौबीले इंसान थे । रंग साँवला था पर खाए पिए की चमक चेहरे पे दिखती थी । रौबीली मूछें  थी |  आवाज़ मूछों से भी ज्यादा रौबीली थी । जमीन जयदाद अच्छी खासी थी । तब शादी विवाहों के फैसले चौपालों पे हुक्का गुड़गुड़ाते हुए ही हो जाया करते थे । दमयंती के बापू ,दमयंती के रिश्ते की जुबान पास के गाँव के सरपंच को दे चुके थे । 

काल बड़ा बलबान होता है , जब जिसका बुलावा आ जाये , जाना पड़ता है । दमयंती के बापू का भी बुलावा आ गया । निर्मोही ने छोटे छोटे बच्चो का भी कुछ न सोचा । दमयंती खूब रोती  थी ,पर ऊपर वाले की मार के आगे सब निहत्थे है । 

इधर बापू की तेहरवीं निपटी उधर पास गाँव के सरपंच ने शादी का दबाब बनाना शुरू कर दिया । सीधी साधी दमयंती की माँ ना  भी ना  कर सकी । तय हुआ , गेहुं की फसल उठते ही बारात आ जायेगी । उस दौर के बच्चों को ग्यारह बारह साल की उम्र में जीवन ज्ञान कम ही होता था ।ग्यारह बारह साल की दमयंती को इस सब का कुछ  पता न था । पता होता तो भी उसे  कौन सा न कहने का अख्तियार मिल जाता? 

 
 खैर दिन आया |  बारात द्वारे आ पहुंची । दूल्हा दमयंती से उम्र में बहुत बड़ा था । तीस बत्तीस का तो रहा ही होगा । परिवार , गाँव की औरतो ने खूब लानते दी । क्या देखा ? फूल सी नन्ही लड़की और ये पत्थर सा ,उम्रदराज  वर । वर के व्यवहार और चाल ढाल में भी मृदुलता न थी । कोई मेल न था । पर उस पुरुष प्रधान समाज में किसी की हिमाकत न थी कि जी खोल के बोल भी दे । 

 दमयंती भावहीन थी । न दुःख का भाव ,न कोई ख़ुशी । हो सकता है उसके  बालमन ने सदमे और गम में भाव हीनता धारी हो या हो सकता है कि उस कम उम्र में कुछ समझ ही न रही हो कि उसका जीवन भाग्य बंधा जाता है । विदाई का समय आया । दमयंती न रोई ,न सुबकी । बस बुत सी बनी रही ।किराये की अंबेस्डर कार द्वारे आ खड़ी हुई । परिवार पड़ोस की बड़ी औरतों ने दमयंती को समझाया । री भलमानस झूठ माट का ही रो दे , अपशगुन हुआ जाता है । उन दिनों बिना दहाड़े मार मार रोये कोई डोली न उठती थी । पर दमयंती न रोई ।औढ़नी में दमयंती को लपेटे औरतों का जमघट कार की ओर  बढ़ चला । 
कार तक पहुंचने से पहले औरतों का जमघट रुका | किसी बड़ी स्त्री ने दमयंती के घूँघट में घुसकर कहा " रोया करें है बेटा | आज तेरे बाबा होते तो अच्छे से विदा करते "
पर दमयंती न रोये !
किसी ने फिर फुसफुसाया " अये दमयंती , झूठ मूठ का ही उहू उहू कर बच्ची | अच्छा न लगता ऐसे | अपशगुन होया करे है ऐसे "
पर दमयंती न रोइ | 
मोहल्ले की सबसे बुजुर्ग और समझदार चौधरन से रहा न गया । गाँव टोले की बेइज़ज़ती हुए जाती थी । क्या सोचेंगे रिश्तेदार |  लड़की कैसी निर्लज है , रोई तक नहीं । घर वाले दुःखी रखते होंगे जो ऐसे मौके पे चुपचाप है । चौधरन ने दमयंती की सुर्ख लाल ओढ़नी में चुपके से अपनी सूखी, कठोर कोहनी घुसा एक जोर की कोहनी दमयंती की भूखी कोख में दे मारी । चौधरन बूढी जरूर थी पर मजबूत हाड थी । 
बेचारी दमयंती की चीख निकल गयी । दर्द के मारे फ़क्फका के रो पड़ी । चौधरन ने बच्ची को गले से लगा लिया और रुँआसी होकर बोली ' रो मत लाडो , पीहर में किसका गुजारा  है , सबै ही जाना होता है ।'
दूसरी औरतो ने हाँ में हाँ मिला दी । सब फूट फूट के रोई । शायद सबको अपने दिन याद आये होंगे । मायके के दिन , अल्हड लाड दुलार के दिन । 
फिर गुजरियों ने मिलकर गीत उठा  लिया ' लाडो रोवै मत ना , धीरज खोबे मत ना........ "
 विदा हो गयी दमयंती , साथ विदा हो गया उसका बचपन । एक नन्ही जान का बचपन छिन  गया समाज ने उफ्फ तक न की । 

अगले दिन शाम के पहर ढोर डंगरों के काम से निपट चौधरन , दादी के साथ हुक्कडी गुड़गुड़ाते  हुए वृतान्त सुना सुना के खूब हंसी ।  
उस दौर में नारी जाति  का यही भाग्य था । किस्मत हुई तो अच्छा साथी मिल गया , वर्ना जिसके  साथ बाँध दी उसी की हो चली । आम बात थी बेमेल ,बाल विवाह|  और आम बातों का मलाल कौन करता है । चौधरन की कोहनी के  वार और नासमझ बच्ची की करुण चीत्कार ने रीत रिवाज़ को जिन्दा रखा था ।

                                                                                                            सचिन कुमार गुर्जर


शब्दावली :
पीहर : माँ का घर।, मायका
ढोर ,डंगर : पालतू पशु

* कहानी में पात्रों के नाम काल्पनिक है

रविवार, 2 मार्च 2014

छुटपुट जिसे है समझा


सालों बाद कॉलेज मित्र श्रीमन खजान सिंह किरोला जी से भेंट हुई , तो कॉलेज दिनों की यादें ताज़ा हो गयी ।कॉलेज में ध्रुवीकरण के दौर में जब सभी साथियों ने धुरी ताकतों का दामन थाम लिया था ,तब  हम नेहरू ,टीटो की तरह गुटनिरपेक्ष आंदोलन के अग्रदूत रहे । कॉलेज राजनीति और आधिपत्य के शीतयुद्ध में हमारी महत्वहीनता और अप्रासंगिकता के चलते हमे छुटपुट गिरोह की संज्ञा दी गयी ।गम्भीरता से विश्लेषण किया जाये तो गुमनाम,महत्वहीन  और छुटपुट समझे जाने वालो ने ही संसार गढ़ा है ।

 गुमनाम छुटपुट, चुपचाप राष्ट्रनिर्माण में लगे साथियों के नाम चंद पंक्तियाँ :

 छुटपुट जिसे है समझा  ,वो  रुस्तम बहुत बड़ा है।
 चुटकी सा छोटा दाना , बरगद  लिए  पड़ा है ।

 उगते नए सिकंदर सम्राट जिसके  दम से ,
 जीते गए पुरंदर,यलगार जिसके दम से ,
 गुमनाम सा कोई सैनिक, सीना लिए खड़ा है ।

 गौरव कथा सुनाती , फौलाद सी दीवारें।
 टकरा के लौटे कितने  ,न पड़ सकी दरारें। 
 सर्वस्य लुटा कोई पत्थर ,दबा नींव में  पड़ा है ।

गुमनाम ,छुटपुटो ने ही ,  इतिहास मिल गढ़ा है। 
गाँधी तभी बना है ,जब  गुमनाम संग लड़ा है। 
दुनिया बदल गयी है , जब जब ये चल  पड़ा है ।

छुटपुट जिसे है समझा , वो रुस्तम बहुत बड़ा है ।
 
                                                                 सचिन कुमार गुर्जर













       





गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

नानी ले चली ननिहाल





उस दिन जब लम्बे अर्से बाद मामा से बात हुई तो वो फ़ोन पे ही डांटने लगे।  क्यों रे , कुछ  ज्यादा ही बड़ा आदमी हो गया है , अब ननिहाल की  याद नहीं आती । घिसा पिटा  सा व्यस्तता का तर्क दे बात सम्भाली थी मैंने । कौन बताता उन्हें कि अब मन नहीं लगता उधर । दो  साल से ऊपर हो गए नानी को गए हुए । नानी ही न गयी एक पूरी दुनिया चली गयी किस्से कहानियो की  दुनिया , लाड दुलार की  दुनिया । 

अलग ही था वो जमाना ।  साल भर इंतज़ार होता था गर्मियों की छुट्टियों का । गर्मियां आएँगी और हम जायेंगे नानी के गाँव ।ना  फ़ोन,ना  चिट्टी पत्री का तकल्लुफ , फिर भी पता नहीं माँ और नानी में  कैसे संवाद हो जाता था कि हम  ज्येठ के फ़ला दिन पधारेंगे  । 
घोड़े तांगे में बैठ हम जाते तो मन कुलांचे मारता । तीनो भाइयो के कपडे एक से , एक ही थान  से बने । 
भाइयो में मैं सबसे बड़ा था सो माँ के कपड़ो की कंडिया (जालीदार झोला) मैं  ही सम्भालता । कपड़ो के बीच में एक दो नंदन या चम्पक या नन्हे सम्राट भी ढूंस लेता  और बाद में आराम से नीम के पेड़ तले बड़े चाव से एक एक कहानी पढता  ।

नानी पलकें  बिछा द्वारे पे बाँट जोहती मिलती , पूरा घर गौ माता के ताज़े गोबर से लीपा होता , मानो कोई त्यौहार हो । ताँगे  से हमारे उतारते ही  देर  तक पुचकारती , लम्बी उम्र की दुआए देती जाती ।
खीर पूड़ी खिलाती । उस दुनिया में हमारी सारी  गलतियाँ , सारी  शरारते माफ़ थी । नानी के सामने माँ की एक भी ना चलती थी ।


 कच्चे रास्ते पर दूर तक अमराही  थी,जामुन के दरख़त थे । पूरी दोपहर ट्यूबवेल  में डुबकी लगाने में या कानपत्ता(पेड़ से लटकने का एक देहाती खेल) खेलने में जाती ।  वैसे ननिहाल तो नानी के स्वर्गवास से पहले ही सिमटने लगी थी । सड़क किनारे के पेड़ काट लाला ने अपनी पक्की दुकाने बनवा दी ,  परचून की , टायर पंचर की , चाट पकोड़ी की । 
अब तो मामा ने भी दूकान चला ली है , खेती करना अब रसूख़ का धंधा नहीं ,हाड़तोड़ ज्यादा है और आमद कम ।  फिर धीरे धीरे दुमंजिले मकानो की कतार खड़ी  हो चली । छोटा मोटा कस्बाई अड्डा सा बन चली अपनी स्वप्निहाल  । 

नानी हमारी उस  दुनिया की  आखिरी कड़ी थी ।
नानी तुम क्यों चली गयी, क्या जल्दी थी । बाहर का मर्द तो सांसारिक ,व्यवाहरिक ज्ञान का लवादा औढ़े स्थिर प्रतीत होता है पर क्या तुम्हे पता है अंदर का बालक आज भी सुबकता है। किस हक़ से छीन चली वो दुनिया ,जिस पे हमारा अख्तियार होना चाहिए था ,आखिर उस दुनिया के राजकुमार हम थे । नानी तुम अकेली न गयी , ननिहाल भी  ले चली ।




मुचलका

मुचलका   इमारतें , ये बुलंद इमारतें , स्विमिंग पूल , जकूज़ी और जिम से सजी इमारते  इमारतें जिनमे गाड़ी के लिए गार्ड  बेरिकेडिंग हटाते हैं |  ये...