Friday, April 15, 2016

एक क्रांतिकारी मित्र


हमारे एक मित्र बहुत ही क्रांतिकारी हैं ।
हालाँकि दुनिया को  उनकी क्रांतिकारिता का बोध ज्ञान होना अभी शेष बचता है, पर वो सही राह पर है !

उन्होंने लैपटॉप के पिट्टू बैग की जगह खादी का कंधे पर किनारे से लटकने वाला झोला खरीद लिया है , लैपटॉप उसी में रखते है ।  कार्ल मार्क्स , चे गुवेरा  , अरुंधति रॉय आदि की किताबें उनके झोले से बाहर झांकती रहती है । दाढ़ी बढ़ा ली है , बाल लम्बे कर खुले छोड़ दिए है । नज़र कमजोर न होते हुए भी नज़र का चश्मा लगा लिए हैं! उन्होंने समाज हित,  देशहित के हलके-भारी , सरल-जटिल सभी मुद्दों पर अपना मोर्चा खोल दिया है , फेसबुक पर , व्हाट्स एप्प पर और ट्विटर पर । अपना ब्लॉग भी लिखते है । खुद का एक NGO भी डाल दिया है , जो फंडिंग होने पर गरीब लाचार बच्चों की पढाई का इंतज़ाम किया करेगा ।

चंदा इकट्ठा करने में उन्होंने निपुणता हासिल कर ली है , उनकी कुशलता का लोहा हमने तब माना जब उन्होंने दिल्ली के बड़े क्रांतिकारी भाई को ऐसे ऐसे लोगो से चन्दा दिला डाला जो वीकेंड पे ऑफिस सिर्फ और सिर्फ इसलिए जाते है ताकि ओवरटाइम के बहाने मुफ्त की चाय कॉफी , और लंच उड़ा पाये !  ऐसे लोगो की जेब से हज़ार रुपए निकलवाने का काम तो कोई महारथी ही कर सकता है । है कि नहीं ?

हमारे मित्र ब्राह्मण कुल से आते है , लेकिन उनकी क्रांतिकारिता अगर चल निकली  तो उसके सबसे पहले शिकार बामन ही होंगे । बोलते है " भारत में वास्तविक परिवर्तन का दौर तभी आएगा , जिस दिन ये चोटी वाले , कर्म कांडी पड़िए ,बामनो की पांत खत्म हो जाएगी । "

मोदी  और भा जा पा के धुर विरोधी है , और मोदी भक्तो को सोशल मीडिया पर हर रोज धोबी पछाड़ दे पटकते रहते है ! एक सांस में सारे बाबाओ , गुरुओं , भक्तो को गालियाँ भकोसते है । बेहद भद्दी गालियाँ !
गालियाँ और गुस्सा क्रांतिकारी होने के मूल अवयव होते है , आप अगर हर वक़्त तोड़ फोड़ के मूड में न हो ,अगर आप की भोए गुस्से में कमान न होती हों  तो आप घंटे का इंकलाब लाएंगे !

उनके पिता जी बड़े ही कर्मकांडी ब्राह्मण है , चोटी रखते है , पूजा पाठ वाले है , जात कुल को मानते है । क्रांतिकारी मित्र के विजय पथ के सबसे बड़े रोड़ा वे ही है ।
मैँ दावे के साथ कह सकता हूँ कि क्रांतिकारी मित्र पर इंकलाब की चरस इस हद तक तारी है कि कर्मकांडी पिता जी की नाक पे मक्खी बिठाने को जो बन पड़ेगा वो करेंगे। घर वालो के सामने उनकी आस्तीन हमेशा ऊपर चढ़ी रहती है , भृकुटियां तनी रहती है , हमेशा भिड़ने के मूड  में ।

शादी के बारे में उन्होंने घर वालो को साफ़ साफ़ कह दिया है " भला मानो या बुरा , करूँगा तो प्रेम विवाह करूँगा। और हाँ ,  ब्राह्मण  कुल की कन्या तो क़तई नहीं चलेगी। "
जातिवादी , मनुवादी व्यवस्था के धुर विरोधी मित्र प्रेम विवाह चाहते है वो भी अपने से किसी नीची जाति की कन्या के साथ। दलित कन्या हो तो सोने पे सुहागा ।  इससे उनकी क्रांतिकारिता को चार चाँद लगना तय हो जायेगा  और पिता जी की मनुवादी सोच पर तुषारापात होते देखने का सुनहरा अवसर भी प्राप्त होगा।

हमने पूछा " आप प्रेम विवाह चाहते है , लेकिन किसी  ब्राह्मण कन्या से ही आपका  दिल लग बैठा  तो ? "
" कतई नहीं ,  कोई आई भी तो विवाह तो कतई भी नहीं , विवाह होगा तो विजातीय " ऐसा बोलते हुए मित्र की मुट्ठियाँ भिच गयी जो उनके दृढ निश्चियी  होने का संकेत था ।

उनकी शिकायत है कि उन्हें उतनी गम्भीरता से क्यों नहीं लिया जाता जिसके वो हकदार है ।
हमने कहा "आपके विचार तो सूक्ष्म है, ओजस्वी है  , विषय पे आपकी पकड़ अच्छी है,  । जनता, व्यवस्था , शासन-प्रशासनऔर बरखा दत्त  की आपसे रुसवाई हमारी भी समझ से परे  है ! "

यकीन मानिए , कश्मीर मामले को लेकर उन्होंने कन्हैया से भी ज्यादा भीषण , फुकाउ , धुर राष्ट्र विरोधी विचार अपने फेसबुक वॉल पे लिखे है , कई बार मोदी  जी  की लुंगी उतारी है  सरेआम , पर किसी कम्बक्त राष्ट भक्त , मोदी भक्त ने गाली के दो लफ्ज़ भी लिखना गवारा न समझा, आज तक । कम्पलीट इगनोर  !

हमने जोड़ा "शायद आपकी कम उम्र आड़े आती होगी । अभी आप कुल जमा पैंतीस  के ही तो है , दाढ़ी पूरी तरह काली है , इकहरे  हाड के हैं सो उम्र और भी कम जंचती है ।  "

उन्होंने ठुड्डी के नीचे सफ़ेद होते कुछ बालों की ओर  इशारा करते हुए बड़े इत्मीनान से कहा " कोई न , ज्ञान और अनुभव की फसल शनै शनै बढ़ रही है , हमे पता है संघर्ष के फलित होने में चंद साल लगेंगे अभी , हम तैयार है !"

हमने उनसे ये कहते हुए विदा ली कि आप लगे रहे , सही ट्रैक पर है , दुनिया ऐसे ही काम करती है । वक़्त आएगा आपका । घूरे के भी दिन फिर जाते है साल में एक बार तो , आप तो इंकलाबी है !
"फर्स्ट दे इगनोर यू , देन दे लाफ एट यू, देन दे फाइट यू , देन यू विन! "

                                                 मित्र की सफलता का आकांक्षी , लो आई क्यू वाला , बेहद फट्टू                                                         -  सचिन कुमार गुर्जर


आभार :प्रेरणा स्रोत , श्रद्धेय हरिशंकर परसाई की कहानी 'क्रांतिकारी ' से प्रेरित ।


No comments:

Post a Comment

टिप्पणी करें -