Saturday, December 4, 2010

फुर्सत के विचार

शुक्रवार का दिन ,अभी अभी बारिश थमी है | ऑफिस की खिड़की से बाहर झांक कर देखता हूँ |
दिन खुशगवार है या यूँ कहिये कि महीनो के  दिन रात अनवरत परिश्रम के बाद काम से फुर्सत है !
सप्ताहांत आने का सुकून मानस पटल पे उभरते विचारो में भी नयी चेतना लाता है |
लम्बे अरसे  से लावारिश गुमसुम सा पड़ा समाचारपत्र ..उठा कर देखता हूँ|
 गुंआनज्होऊ एशियन गेम्स में भारतीय महिला एथलीटो ने उम्दा प्रदर्शन किया है ,समाचार पत्र एथलीटो को 'ग्लोरी गर्ल्स '
की संज्ञा देता है |
कोई दो राय नहीं ..दूरदराज़ के मटीले गाँव से ,गरीबी की बाधाओ को तोड़ ,अंतररास्टीय स्तर पे भारत के परचम को फेहराना
किसी गौरव गाथा से कम नहीं..
गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है |कोई भी राष्ट भले ही गरीब हो ,संसाधनों की कमी और अवयवस्थायो से जूझ रहा हो ...किन्तु जब तक राष्ट के जन साधारण का विश्वास परिश्रम से जुड़ा हो ,मैं समझता हूँ ऐसे राष्ट की जड़े सुरक्षित है ..
परिश्रम जल लवण बन वृक्ष को पोषित करता रहेगा.
 

आज  लम्बे अरसे बाद समय से घर की और प्रस्थान कर रहा हूँ !
 कभी महसूस किया है ? अगर इंसान फुर्सत में हो ,तो कैसे मन उन छोटी छोटी अनुभूतियो को महसूस करने लगता है ,जिन्हें दिन प्रतिदिन की चिंताए ,व्यकुल्ताये ,उठ्कन्था अपने गुबार में दबा देती है ..
किस प्रकार हमारा  सहज  संवेदी  अवलोकी मन जीवट हो उठता है |
  कार्यालय से ट्रेन स्टेशन जाने तक का ये रास्ता ,सब कुछ वही पुराना होने के बाबजूद आज मनमोहक क्यों लग रहा है  |
सच में , बाहर की दुनिया हमारे अंतर्मन का प्रतिबिंब ही तो है|
अंतर्मन शांत है ,स्नेही है ,संवेदी है  तो बाहर के दुनिया भी शांत है ,नीरव है |
क्योंकर अमरीका जैसे सशक्त देश संघर्षो ,विरोधो,हिंसाओ का समाधान ,ड्रोन हमलो और गोलाबरी में दूढ़ते है |
क्योंकर संवेदनाओ ,पीडाओ पे मरहम लगाने और मानस मूल के सहज संवेदी ,निश्छल स्वाभाव को जगाने की दिशा में किसी
का ध्यान नहीं जाता |
  
ट्रेन में सामने की बर्थ पे एक चीनी परिवार बैठा है |पति पत्नी अपनी दिन प्रतिदिन की व्यथाओ ,आशाओ ,शिकायतों में मशगूल है | मगर ये महाशय सारी दुनियादारी से दूर अपने पिता के दूरसंचार यन्त्र की  गुत्थिया सुलझाने में लगे है | 
बालमन का ध्यान और निर्विघ्न समर्पण देखते बनता है |चेहरे पे भागभंगिमाए बालमन में उठते हर विचार के साथ चंद्रकलाओ सी बन बिगड़ रही है | नवचेतन प्राण इंसानी व्यवस्थाओ ,बाधाओ ,अडचनों,जटिलताओ से अनभिज्ञ है |

मन में विचार उठता है ,काश कुछ ऐसा होता कि मैं भी अपने  दिमाग का सारा कूड़ा करकट साफ़ कर पाता |
काश ,अतीतके पश्चातापो,भविष्य की उत्कंठाओ से परे मन वर्तमान में लिप्त जीवनरस का आनंद ले पाता |काश सहज बालपन लौट पाता |
 

Friday, September 10, 2010

एक अनुभव

मैं बचपन से ही शुद्ध शाकाहारी रहा हूँ ,घर का वातावरण वैष्णव है और सात्विक आहार से ही
इस शरीर का निर्माण हुआ है|
मांसाहार का विचार कभी मन मैं कोंधा तक नहीं |उलटे मांसाहार करने वालो से घर्णा रही है ...
क्यों कर ,आप अपने स्वाद के लिए किसी प्राणी के प्राण हरण तक उतर  सकते है |

पर ..पिछले दिनों NGC में Man Vs Wild के एपिसोड देख देखकर ऐसा बुखार चढ़ा , कि इंसान को छोड़ सब कुछ आहार श्रंखला का हिस्सा नज़र आने लगा ..

सिंगापुर  आकर तो जैसे पर उग आये | बएर ग्रिल्स ने दिमाग को पूरी तरह हाई-जैक कर लिया और मैं अपने आपको किसी अफ्रीका के भूखे शेर की तरह समझने लगा ,जो हर किसी हिलने चलने वाली चीज़ को अपना निवाला बनाने का माद्दा रखता है..
सिंगापुर में मांसहरियो के लिए विकल्पों की पूरी श्रंखला है | आप कुछ कल्पना कीजिये ,अमूमन आपको मिल ही जायेगा ..
मगरमछ का मांस ,मेंढक,सांप, नाना प्रकार की मछलिया|
चिकन और मछली को तो लोग शाकाहार में ही गिन लेते है..

मेरी शुरुआत हुई चिकन से | धीरे धीरे मछली सुलभ उपलब्धि से मतस्यहरी बन गया |
केकड़े की प्रसिद्धी सुन कर उसका जलपान भी कर बैठा |
बेहतर होता अगर ये अनुभव लेने का बुखार यही उतर जाता..
पर नहीं ..पिछने रविवार को मेढक खाने का लक्ष्य बना  | दोस्तों के साथ पास के ही फ़ूड कोर्ट में जाकर बड़े ही चाव से
"फरोग लेग्स विद स्प्रिंग ओनियन " आर्डर कर बैठा |

बड़े ही चाव से हमने उस मरहूम मेंढक की चिली सास  में डूबी टांगो का लुत्फ़ उठाया | स्वाद कुछ कुछ चिकन जैसा ही था |
लगा एक और उपलव्धि हासिल कर ली ,जिसका गान  मैं वापस इंडिया जाकर दोस्तों में कर सकूँगा  .
पर नियति को कुछ और ही मंजूर था..
शाम होते होते ,शरीर के अन्दर प्रतिरोध के स्वर उभरने लगे |
पूरे शरीर पे बड़े बड़े लाल चिकत्ते उभर आये   और खुजली होने लगी | बुखार ने आ घेरा | सोमवार के सुबह कल तक का ये अफ़्रीकी शेर ,बिस्तर पे औंधे मुह पड़ा कराह रहा था |
ना चाहते हुए भी ,चिकत्सक का दरवाजा खटखटाना ही पड़ा...

चिकत्सक महोदय ने जांच पड़ताल की और चंद सवालात किये |जल्द ही उन्होंने ये ऐलान कर दिया ,कि ये सब उस मेंढक
भक्षण का ही नतीजा है.|मैं एक प्रकार की फ़ूड अलर्जी का शिकार हुआ था..
चिकत्सक ने मुझे समझाया कि  मेरा शरीर तंत्र इन ऊट-पटाक भोज्य सामग्री के लिए नहीं बना है ,सो बेहतर है इस सब से परहेज किया जाये..

खैर डाक्टर महोदय की बात हमे जंची और हमने ये सब एक्सपेरिमेंट छोड़ फिर से शाकाहार अपना लिया है ..
बेडोक साउथ अवेनुए -२ के फ़ूड कोर्ट में लटके मेंढक ,केकड़े,मुर्ग अब दूसरे ग्राहकों का निवाला ही बनेंगे |
मेरी भोजन सूचि से ये नाम सदा के लिए मिट चुके है ...
सात्विक प्राण लौट आया है और कालांतर में भक्षण किये तमाम प्राणियों की आत्माओ की शांति के लिए इश वंदना
में समर्पित है |

Sunday, August 1, 2010

ये झुंझलाहट क्यों है



१ अगस्त २०१० ,रविवार की सुबह .. खिड़की के बाहर बारहमासा सावन की मल्हारे है , मौसम ठंडक लिए हुए है..
सोने के लिए हर तरह से अनुकूल वातावरण ...पर मैंने अभी १०-१२ घंटे का लम्बा निंद्रा सत्र अनवरत पूर्ण किया है|
महीनो बाद आज  फिर मन   विचलित है |जीवन दिशा ,स्वप्रगति से नाखुश कई सवाल मन में उठ खड़े हुए है |

आज आत्म साक्षात्कार का दिन है..
ये भटकाव क्यों  है | क्यों कर तार्किक ,सभेद ,उपलब्ध्य सपने मुझ में नवचेतना फूकने में असमर्थ है  |
सपने ..सपना  अपना आलीशान घर होने का ,सपना अपनी महंगी गाडी का , सपना मोटी आमदनी और ऊँचे ओहोदे का,
सपना भौतिक और वस्तुजनक ऐशो आराम का..
क्यों कर ,मैं इन आम और तार्किक सपनो से अपना जुड़ाव  महसूस नहीं कर पाता | क्यों कर , इन सपनो में  जान नहीं ,जुड़ाव नहीं  ..

क्यों कर , ना चाहते हुए भी ये प्राण उस पथ पर चलने को विवश  है ,जहाँ सब कुछ  पहले से तय है |नियम ,शर्तो से बंधा है .जहाँ सब झूठन है |
अगलों के पैरों तले रुंदी जमीन पे विचरण की विवशता क्यों है |
धक्का मुक्की ,धकेलम धकाल,आगे बढ़ने की पुरजोर कोशिश के बाबजूद ,क्यों कर ये प्राण कभी ना ख़तम होने वाली भीड़ का हिस्सा है |
क्यों कर गुमनामी की रात का अंत नज़र नहीं आता 
 
क्या मजबूरी है ,जो सब कुछ जानते हुए भी बने बनाये पुराने रास्तो  पे चलने को मजबूर करती है|
क्या मजबूरी है , जो स्वछंद ,निडर उड़ान पंछी के पंख बांधे हुए है|
क्या मजबूरी है , जो हर  इंकलाबी स्वर का शमन करने को मजबूर करती है |

ये झुंझलाहट क्यों है |
 अमराही में विचरण की जगह, तपते कोलतार, सीमेंट की सडको पे पैरों में छाले  लिए चलने की  विवशता क्यों है|
नीम ,पीपल की छाया में आराम की जगह , कृतिम वातानुकूलित बंद कमरों में सिमटने की विवशता क्यों है |
कुए बाबड़ी का पानी जहरीला क्यों  है , बोतल बंद संवर्धित पानी से प्यास बुझाने की  विवशता  क्यों है |

सवालों की फेरिश्त लम्बी है , पर जबाब शुन्य में ताकने के आलावा कुछ भी तो नहीं|
पर दूर दिल के किसी कोने में ,एक आशा किरण टिमटिमा रही है | सवाल कठिन है ,पर निरातुरित तो कतई नहीं..


 
  

Saturday, July 31, 2010

मेक - रिची जलाशय और पुलाव उबीन द्वीप यात्रा



कार्यालय सम्बन्धी कार्यकलाप से महीनो के बाद कुछ फुर्सत मिली ,तो घुमंतू मन जीवित हो उठा...
मन हुआ जाऊ कही,इंसानों की भाग दौड़ से दूर..प्रकर्ति माँ की गोद में कुछ साँसे चैन की लूं ...
खोजबीन की ,तो २ ऐसे स्थानों के बारे में पता चला | पहला है मेक - रिची जलाशय और दूसरा है पुलाव उबीन द्वीप...

मेक रिची जलाशय ,१८वी शताब्दी में स्थापित हुआ  था| उद्देश्य था ,सिंगापुर वासियों की जल आवश्यकता की आपूर्ति |
जलाशय के इर्द गिर्द के इलाके को अविकसित ही छोड़ दिया गया ,ताकि जलाशय में वर्षा जल निर्वुध आता रहे|
कालांतर में यह इलाका एक सघन वर्षा वन के रूप में विकसित हो गया|

सिंगापुर जैसी छोटी और सघन बसाबत  वाली जगह में ऐसे घने और अनछुए जंगल की उपस्थिति मेरे लिए काफी रोचक और हतप्रभ करने वाली थी | कच्चे मटीले रास्ते हसनपुर की याद दिलाते वाले थे...
सिंगापुर वासियों ने इस विरासत को बड़े ही संभाल के रखा है...
मन खिन्नता से भर जाता है ,ये सोचकर कि अपने यहाँ सब कुछ होते हुए भी हम लोग क्यों नहीं उसकी कद्र कर पाते..

खैर , मेक रिची का ११ किमी की वर्षावनो के बीच की पदयात्रा काफी तरोताजा करने वाली रही...
गहरे नील वरणीय जलाशय के चहु और छितरे वर्षा वन मन को शीतलता प्रदान कर गये|
ट्री टॉप वाक् ने मोगली वाले पुराने दिनों की याद दिला दी ,जब मोगलीअपने जंगल के साथियो के साथ चट्टान के ऊपर बैठ पूरे घने जंगल का जायजा लिया करता था |


अब बात करते है पुलाव-उबीन की..
पुलाव-उबीन सिंगापुर के मुख्या धरती से थोडा हट के समुद्र में एक छोटा से सुन्दर द्वीप है |
हालाँकि मुख्य धरती से द्वीप की दूरी कुछ ज्यादा नहीं ,फिर भी जान बूझ कर द्वीप को पुल मार्ग से नहीं जोड़ा गया है...
ऐसा शायद द्वीप को इंसानी खुराफात और अन्धाधुन्ध शहरीकरण को रोकने को किया गया है..
आप २.५ डालर देकर मोटर उक्त फेरी में बैठ द्वीप दर्शन को जा सकते है...

सिंगापुर के विकास से पहले सिंगापुर भी कुछ इस तरह का ही हुआ करता था | वही घने वर्षा वन | समुद्री किनारों पे
वर्षा वनों की  जगह मंग्रोव ने ले ली है .. आप वहा जाकर साईकिल किराये पे ले कर द्वीप की सैर कर सकते है | ८-१० डालर में पूरे दिन के लिए साईकिल मिल जाती है | घने जंगल आप में नए प्राण फूक देते है..
सप्ताहांत में जाने के लिए उपुक्त जगह है ..

Friday, May 21, 2010

सिंगापुर डायरी III

अब जबकि यहाँ आये ३ हफ्ते हो चुके है..सिंगापुर की उपोषण जलवायु और चटक भड़क के बीच ये
सात्विक प्राण रमने लगा है..
हालाँकि ज्यादातर समय कार्यालय सम्बन्धी क्रिया कलाप में ही निकाल जाता है ,पर जब भी समय मिलता
है , तो मैं अपना समय यहाँ की व्यवस्था और कार्य प्रणाली के अध्ययन में लगाता हूँ |
सिंगापुर मशीनों और व्यवस्थाओ की नगरी है | मानव जीवन को सरल सुगम बनाने के तमाम ताम-झाम यहाँ एकत्रित है ...और पल झपकते ही आपकी सेवा मैं हाज़िर हो जाते है...
बस आपके पास डालर देवता होने चाहिए..

संवर्धित रोटी और पराठे: यहाँ अगर अगर किसी चीज़ की सबसे ज्यादा याद सताती है तो वो है अपने घर के खाने की| भारतीय रेस्तराओ की कमी तो नहीं , पर स्वाद को सर्वमान्य बनाने के चक्कर में,अपना मूल स्वाद छू मंतर है..
ऐसे में मेरे एक आलसी दोस्त नें मेरी घर में पराठे बना के खिलाने की फरमाइश पूरी करने की बात की, तो मैं आश्चर्यचकित रह गया ..
महाशय इस हद तक आलसी ,कि प्यास से मर सकते है पर बिस्तर से उठ कर पानी तक नहीं पी सकते...
मैं दिग्भ्रमित ,आशंकित सा कुछ ना बोला ,बस उसका किचन से वापस आने का इंतज़ार करने लगा...
ये क्या २ मिनट में वो मेरे सामने गरमा गरम आलू के पराठे लेकर हाज़िर हो गया...
ये कमाल कैसे ?? किचन में जाकर देखा , तो माजरा समझ में आया...इंसानी खुराफात की हद हो गयी..
जालिमो ने आलू पराठे और रोटी को भी संबर्धित कर पैकेट में फिट कर दिया..
पैकिट से निकालो और गरम तवे पे सेकते ही गरमा गरम रोटी ,पराठा हाज़िर है..

बहुउद्देशीय परिवहन कार्ड :
अगर आपके पास दिल्ली की ब्लू लाइन बसों में सफ़र करने का दर्दनाक और मुश्किल भरा अनुभव है , तो सिंगापुर
की चोक चोबंद बस व्यवस्था के आप मुरीद हुए बिना नहीं रह सकते ..
बसे समय की पाबंद है , बस स्टाप पे खड़े हो जाइये ..तय समय पर आकर बस आपकी सेवा में हाज़िर हो जाएगी ..ना १ मिनट ऊपर ना एक नीचे ...
बस में कोई संचालक नहीं...बस बस में घुसते ही अपना जादुई Easylink कार्ड साइड में लगे संवेदी सयंत्र पे छु भर दीजिये ..किराये का भुगतान हो गया..Easylink  card यहाँ की MRT ( कुछ कुछ अपनी मेट्रो जैसी) में भी चलता है..
बस समय समय पे अपने कार्ड को टापअप करते रहे..
सुना है कुछ departmental  stores  में भी easycard से ही शौपिंग की जा सकती है....
अच्छी व्यवस्था है ये|
पाश्चात्य की विषक्क्त जड़े : सिंगापुर का विकास तंत्र पाश्चात्य प्रणाली पे आधारित है .सो विषाख्त जड़े भी वक़्त के साथ गहरा रही है...
परिवार टूट रहे है...युवा पीड़ी का पुरानी पीड़ी के साथ टकराव साफ़ नज़र आता है...रिटायर हो चुके और जीवन के आखरी दशक में जी रहे लोग टैक्सी चलाते मिल जायेंगे ..पैसे की कमी मूल कारण नहीं..कारण है अकेलापन ..
बच्चे पंख निकलते ही स्वछंद उड़ान उड़ चुके है ..शाम के धुधलके में भी उनके पुराने घरोंदे में लौटने की आस नहीं..
तलाक का चलन अपने शबाब पे है..
बूढ़े प्राण द्रवित है और डालर भूख और आधुनिकता की आंधी को कोस रहे है..
खान पान पैकिट और डिब्बो में सिमट चूका है ..बीयर बार चलन में है ..रात्रीचर प्राणी बढ़ रहे है ..
मूल संसकृति सिसक रही है , आधुनिकता के बड़े झाड के नीचे कही दम तोड़ रही है.
ये सब बातें मेरे मन की नहीं ,उन पचासों टैक्सी चालको से बात्चीत पे आधारित है ,जिनके साथ मैंने ऑफिस से होटल और होटल से ऑफिस के यात्राये की है..

Wednesday, May 12, 2010

सिंगापुर डायरी II

ठीक ही कहा  जाता है कि अपने लोगो का और अपने से जुडी चीजो का एहसास हमे दूर जाकर ही होता है...
भले ही आपको तर्कसंगत लगे या ना लगे , पर सिंगापुर आके अपने भारतीय होने का एहसास और गर्व बढ़ा  है .
भले ही मेरा योगदान नगण्य हो , पर अपने प्यारे भारत वर्ष की शान के कसीदे पढने में में कोई कसर नहीं छोड़ता ..

सिंगापुर में ऑफिस का पहला दिन , मेनेजर ने मध्यांत के समय पूछा ...
' So Sachin , how you getting our singapore?'
बाकि लोगो ने कौतूहलता वश मेरी ओर देखा ...शायद अपेक्षा की होगी ,कि मैं सिंगापुर की शान शौकत और चकाचौंध से मंत्रमुग्ध कोई अपेक्षित सा जबाब ही दूंगा ..
मैंने गहरी सांस ली और सरसरी नज़र से गगंचुभी इमारतों को देखा .
फिर अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ अपने मेनेजर के चेहरे पे देखता हुआ बोला...
'Not up to my expectation sir'

'Whaat???'
एक साथ कई आवाजों गूंझ उठी...
"Yes , Gurgaon is going to be Singapore in next 10 years."
"oh is it?' आश्चर्य और कौतुहल से भरे मिश्रित स्वर सुनाई दिए.....
"  yeah , it's fact . We have Broader highway, similar skyscrapers are coming up.Everything going to be very similar soon."
बड़ा मेनेजर जो अभी कुछ दिनों पहले ही भारत यात्रातन कर के लौटा था ,उसने मेरी हां मैं ह़ा भरी....|

मैं जानता हू,गुडगाँव के तमाम बड़ी बड़ी निरमाण कारी परियोजनायो और सपाट चौड़े हाई वे का मेरे जीवन
से जुड़ाव कम ही है....
बड़ी निर्माणकारी परियोजनाए DLF और दूसरी लाभ आधारित संस्थाओ की है  ...हाई वे भी सरकार और दूसरी संस्थाओ का धनधान्य करने के लिए है...
पर फिर भी इन सब चीजों को लेके जुड़ा गर्व मेरा अपना था|
घटना भले ही छोटी सी  है , पर कम से कम चंद विदेशियों के दिमाग में मैं अपने उभरते भारत की तस्वीर साफ़
करने में सफल रहा..

अपने आपको सांसारिक और भौगोलिक मामलो का श्रेष्ट ज्ञाता समझने वाला एक दूसरा सहकर्मी मेरे से बोला
"Ofcourse , India is progressing fast .But you know,progress there is not very sustainable..Poor getting Poor and Richer getting more and more richer"
मुझे लगा ,जैसे उसने गेंद मेरे पाले में फेक दी हो....
Sustained growth का मैं जीवंत और सापेक्ष उदहारण था ....
साफ़ कर दू ,मन मैं लेस मात्र भी अपने कसीदे पढने का विचार ना था .....
मैंने बड़े ही धैर्य से उस सज्जन को समझाया के भाई साहब आपके चेहरे पे लगा ये चश्मा दशको पुराना है...
मैं छोटे से गाँव से हू ....जहाँ से कोई बिरला ही दिल्ली दर्शन को आता है..आज भी गाँव में बिजली नहीं आती ..
गाँव का सबसे नजदीकी महाविध्यालय गाँव से २५ किमी दूर है और उसके  लिए घंटो  खचाखच भरी बसों में लटक के
जाना होता है..
पर मैंने आविचल ,आविलम्ब हसनपुर से सिंगापुर का सफ़र तय किया है ...
और मैं अकेला नहीं हु, मैं उस आपार असीमित , आथ्हा ज्ञान और सपनो के समंदर का अदना सा पिस्सू ही हु..
मेरे जैसे ना जाने कितने कर्मयोगी अपने प्रगतिपथ पर अपनी अपनी छमता के अनुरूप बढ़ रहे है..
उनके अडिग विश्वास को ना तो 'मायावती सरीखी तुगलकी सरकारे हिला पाती है , ना ही आर्थिक मंदी और ना ही
आसमान छूती महगाई '

कर्मयोगी प्रगतिपथ पर आग्रसर है और रहेंगे ...आने वाले भारत की तस्वीर और समर्धि इन नवोदित नायको के खून पसीने से ही अवतरित होगी..
सरकारे आएँगी ,जाएँगी ...भारत का विकास पुरुष अपने मजबूत कदम बढाता जायेगा .
ऐसा मेरा विश्वास है...
                                                                                       जय युवा , जय भारत...

Saturday, May 8, 2010

सिंगापुर डायरी 1

सिंगापुर आये मुझे एक हफ्ते से ऊपर हो चला है | अभी नयी दुनिया के तौर तरीको को समझने की कोशिश
चल रही है | चारो तरफ ऊँची ऊँची गगनचुम्बी अत्त्तालिकाएं ,करीने से सजाये पार्क,साफ़ चिकनी सडको पर हुंकारती महंगी गाड़िया |
मायानगरी है सिंगापुर | भांति भांति के लोग .. चीनी , मलय,तमिल ,श्रीलंकन ,अंग्रेज़ |
हर कोई अपने सपनो को सवारने में लगा है |
सिंगापुर की छटा मनमोहक है | हालाँकि मुझ जैसे प्रकर्ति प्रेमी को थोड़ी सी हताशा भी होती है| कुछ भी प्राकर्तिक नहीं |
इंसानी छेडछाड साफ़ दिख जाती है...बीच नकली है ,बीच पे बिखरी सफ़ेद रेत मलेसिया से लाकर बिछाई गयी है ..
कतारबद्ध खड़े नारियल के पेड़ भी वही से लाकर प्रत्यारोपित किये गये है |
बिजली , पानी,घास , मिट्टी सब कुछ मलेसिया से आयातित ...|
यहाँ आकर जिंदगी इंसानी कायदे कानूनों में बंध  जाती है..नियम तोड़ने पे भारी भरकम जुरमाना ...
अगर आप भारत की तरह उन्मुक्त जीवन जीने के आदी है ..जहा आप जब मने करे ,भाग के सड़क पार कर सकते है ,खुलेआम सार्वजनिक स्थानों पे धुएं के छल्ले उडा सकते है ..कुछ भी गलती करने पर पुलिस वालो को १०० रुपए देकर छुट सकते है...तो यहाँ आकर आपको हताशा होगी ....घुटन होगी...

सिंगापुर सभ्रांत लोगो के लिए है | आबादी का बड़ा हिस्सा चीनी लोग है ..सो आम जनजीवन पे चीनी रीतोरिवाज़ की गहरी छाप है ..
मैंने यहाँ के चीनी लोगो के बारे में कुछ अध्ययन किया है...
१. चीनी मूल की लोगो के घने काले बाल है और भारतीय मूल के लोगो की तुलना में कम लोग ही गंजे होते है..
    शायद इसका रहस्य उनके भोजन चयन में छिपा है ...चीनी मूल के लोग sea food पे ही पलते बढ़ते है .
२. चीनी लोगो का फिटनेस लेवल भी भारतीयों से अच्छा है ..बहुत ही कम लोग तोंदीले है...
३. भारतीयों की तरह इनका जुगाड़ तकनीकी पे भरोसा कम ही है..जहा भारतीय मूल के लोग बस किसी तरह काम निपटाने में भरोसा रखते है ..चीनी मूल के लोग काम को बने बनाये तौर तरीको से करने में ही यकीन करते है..

हालाँकि जनजीवन पे भारतीय मूल के छाप भी दिख जाती है ..little india , mustafa जैसी जगह आपको काफी हद तक भारत में होने का अहसास कराती है..
कुल मिला के जगह रोचक है...कोशिश कर रहा हू कि कुछ अच्छे ,समान विचारो के कुछ दोस्त बना पाऊ...
देखते है आगे जीवनयापन कैसा होता है..
                                                      क्रमश...................
         

Monday, April 26, 2010

मैं और अंधी दौड़

चला  जा  रहा  हूँ   धुंधले   जीवनपथ   पर
आशाओं   के  घोड़ो  पर  ,इच्छाओ  के  रथ  पर
बह  रहा  हूँ ,  बिना  किनारे  की  नदी  में
दौड़  रहा हूँ,   बिना  मंजिल  की  दौड़  में |

 पर  मन  कहता  है  रुक  बाबरे ,महसूस  कर  सर्द  दूब  को
छू  किसी  जीवन  तार  को  , महसूस   कर  प्रकृति  रूप  को
चल  छोड़  भाग  मिथ्या  जीवन  को , लौट  चल  अपने  गाँव  में ...
सुबह  सुहानी  ,शाम सुरीली , नीद  ले  रात   की  बाँहों  में |

छोड़  दे  मशीनों   की  नगरी  , लौट  जा  इंसानों  में ..
चल  उतार  नकली  मुखोटा  , वापस  जा  जाने  पहचानो  में ...
भाव  जहा  दिखे  चेहरों   में , फूल  खिले  सच्ची  मुस्कानों  में |

चलते  चलते  सांझ  हो  जाएगी  , मंजिल  उतनी  ही  दूर  रहेगी |
ढलते  ढलते  शाम  आएगी , खुशी  उतनी  ही  दूर  रहेगी |

ये  मृग त्रष्णा   है  अरे  बाबरे  ,इतना  नहीं  समझ  आता
जो  उलझा  है  उलझ  गया  है , निकल  ना  इससे  कोई  पाता
लौट  जा  गाँव  अपने ,जीवन  तुझे  जहा बुलाता
सुबह  का  भूला  लौट  आये  तो  ,बुद्धू  नहीं  कहलाता |

Friday, April 16, 2010

जाने वो कैसे लोग थे , जिनके प्यार को प्यार मिला..

जाने वो कैसे लोग थे , जिनके प्यार को प्यार मिला..
हमने तो जब कलिया मांगी, कांटो का हार मिला....
आजकल रह रहकर ये गाना दिलोदिमाग में घूमता रहता है...

प्यार का जो खुमार फरबरी मार्च के महीने में किसी  नवचेतन  बेल  की  तरह   परवान  चढ़ा   था ..
अप्रैल  के  गर्म  शुष्क  मौसम  में मुरझा  गया  है|
आज  पिछले  3 महीनो  के अठखेलियो  और  अट्टहास  से  भरे  उन  तमाम  प्रयासों  पे  नज़र  डालता  हूँ   , जो अनजाने  ही  मैंने प्रेमपाश  में जकड़े  होकर  किये  ...तो प्रयास  कम  दुसाहस  ही  ज्यादा  लगते   है|
किसी  अनजान  लड़की  की  सीट  पे  जाकर  उससे  अपना  स्नेह  व्यक्त  करना  ,अपनी  उलजुलूल  फिलोस्पी  से  भरी  मेल  लिखना  , उसकी  सहेली  से  उसके  बारे  में बात करना ....क्या  क्या  नहीं  कर  डाला|
पर  वो तस  से  मस  ना  हुई| हालात  पक्ष  में ना  जाते  देख  धीरे  धीरे  आखों  पे  चढ़ा   प्रेम  चश्मा  उतरने  लगा  है |
और  जीवन  की  कड़बी  सच्चाई   एक  बार  फिर  से  समझ  में आने  लगी  है|

प्रेम  एक  ऐसी  अनुभूति  है , जिसका  अनुभव  तो आप  अपनी  मर्ज़ी  से  कही  भी , कभी  भी  दिल  की  रों  में बहकर  कर सकते  हो |इसमें  कुछ  बुरा  भी  नहीं |
जब तक  आप  दूसरे  से  भी  अपनी  अनुभूति  के अनुरूप  चलने  की  उम्मीद  ना  पाले |
यही  पे  हमसे  गलती  होती  है|
प्रेम  को हम  अपेक्षा  से  भर  देते  है|प्रेम  होना  चाहिए  निश्वार्थ , निष्काम,  बिना  शर्त ....
नहीं  तो वो प्रेम  प्रेम  नहीं  , एक  महज  सांसारिक  लेनदेन  का नाता  है|
अप्रैल  की  गर्मी  सूखी  सूनी  पड़ी  जमीन  को सुलगा  रही  है..ऐसे  में सड़क  किनारे  कतारबद्ध  खड़े  नीम  के पेड़  गर्मी  से  राहत दे  रहे  है|
और  मुझे  निश्वार्थ  सेवाभाव , निष्काम  प्रेम  का पाठ  पढ़ा  रहे  है|
मन  शांत  है , अपेक्षित  प्यार ना  पाकर  मन  में जो झुझलाहट   थी ..वो जा  चुकी  है...मन  आज  फिर  मनमौजी  है|
खुला  है, स्वतंत्र  है , इच्छाओ  से  मुक्त,  उन्मुक्त  उड़ान  भरने  को आतुर  है...
कल  तक  ऑफिस  की  कैंटीन   में  जो चेहरा  मुझे  ख़ास  लगता  था ,खीचता  था  , अब  आम  लगने  लगा  है|
सात्विकता लौट आई है |

Monday, April 5, 2010

सपनो की दुनिया

इस बार अप्रैल का महिना बड़ा ही रूमानी है|
जहाँ एक तरफ सुदूर पूर्व सिंगापुर जाने के सपने लेकर मन का तार तार गा रहा है|
वही दूसरी और बरसो से सूने पड़े हृदय में प्रेमबीज का अंकुरण हो जाने से समां और भी रूमानी हो चला है ....

हकीकत  से  दूर  आजकल  ख्वाबो  की  दुनिया  में  जी  रहा हूँ|
सब  कुछ  अच्छा  अच्छा सा  लगने  लगा  है,जीवन रस लौट आया है , प्राण रसमय है |
बरसो  बाद  मन  कल्पनाओ   की  लम्बी  लम्बी  छलांगे मार रहा है |

सिंगापुर परियोजना के बारे में:
सोचा  सिंगापुर  जाने  से  पहले  एक  बार  गाँव  हो  आऊ|
गाँव  पहुचने  से  पहले  ही  मेरे  सिंगापुर  जाने  की  खबर  जंगल में आग की तरह फ़ैल चुकी थी|
हमारे  पूज्य  पिता  जी  और  माता  जी  ने  कोई  कसर  नहीं  छोड़ी  और  ये  सुनिश्चित  किया  कि  गाँव  का
हर  व्यक्ति  इस  बात  से  वाकिफ  हो  कि  उनका  बेटा सिंगापुर  जा रहा है|
उनकी  आँखों  की  चमक  देखते  ही  बनती  है |
उन्हें  इस  बात  से  कोई  मतलब  नहीं  कि  इस सिंगापुर परियोजना कार्य का मेरे career को  लेके  क्या  महत्त्व  है
या  इसका  कुछ  धन  सम्वन्धी  लाभ  भी  है|
उनका  एक  मात्र  लक्ष  ये  सुनिश्चित  करना  है  के  प्रसिद्धी  के  मामले   में  गाँव  में  उनके  बेटे सबसे  ऊपर  रहे ...

पर  गाँव  वालों  के  सीमित  ज्ञान  के  चलते  इस  बड़ी  खबर  का  वो  प्रभाव  नहीं  दिखाई  पड़ा  ,जिसकी मैंने  कल्पना  की  थी |
गाँव  के  काफी  लोग  ये  समझ  बैठे  है  कि  मेरा  ट्रान्सफर  हो  रहा  है  और  मैं  गुडगाँव  से सिंगापुर  नाम  की  किसी  दूसरी  जगह  पे  जा  रहा  हूँ  ..
उनका  सहज  ज्ञान  सिंगापुर  को विदेश  नहीं  मानता |उन्हें  लगता  है  कि  सिंगापुर  कही  हिन्दुस्तान  में  ही  है  ,जैसे  अपना  हसनपुर  वैसे  ही  सिंगापुर :).
नाम  के  अंत  में  लगा  "पुर" उनकी  सहज्व्रती  को  सिंगापुर  के  हिन्दुस्तान  में  ही  होने  का एहसास  कराता  है |
मुझे  कई  लोगो  को  बताना  पड़ा  कि  सिंगापुर  समंदर  के  पार  है  और  हवाई  जहाज  से  जाना  पड़ता  है  , तब  कही  जाके  में  उनके  चेहरे  पे  उभरे  वो  रोमांचकारी  भाव  देख  पाया  , जिनकी   मैंने  सदा से  ही  कल्पना  की  है ..
गाँव  वालो  के  सरल  सहज  स्वभाव  और  सिंगापुर  को  लेके  टिप्पड़ियो  से  मन  गदगद  है|
खैर,  देखते  है  , मिशन  सिंगापुर  में  आगे  क्या  क्या  होता  है ...

बाबरा मन:
अपने लगभग तीन साल के IBM  के कार्यकाल में , लंच ब्रेक की भीड़ में मैंने उस मासूम चेहरे को ना जाने कितनी
बार देखा होगा...
पर पिछले महीनो से ना जाने ऐसा क्या हुआ , के वो चेहरा कुछ ख़ास लगने लगा है..
मन तरंगित है और झूम झूम के गा रहा है " सैया , तू जो छु ले प्यार से .आराम से मर जाऊ.."
हालाँकि मन के किसी कोने से बड़ी ही तार्किक आवाज़ आती है , कि बेटा इस इकतरफा प्यार का हश्र भी वही
होगा जो हमेशा से होता आया है...यानि की शुन्य ..
पर मन है कि रमता जोगी बनने को आतुर है..
उस श्वेतवरनी , मनहरनी बालिका ने मन के जंग लग चुके तारो को झंकार दिया है |

तमाम एक्सपर्ट्स की राय ली जा चुकी है..किसी ने हर रोज़ "गुड मार्निंग" मेल भेजनी की राय दी है ..
तो किसी ने हमारी पर्सनालिटी को आकर्षक बनाने को ढेरो नुक्शे सुझाये है...

खैर , हमने सभी रायो को दरकिनार करते हुए अपने पागल मन को यु ही अपने सपनो के रथ पे बेलगाम छोड़ दिया है|
सपनो की दुनिया हकीकत की बोरियत और तनाव से भरी दुनिया से कही बेहतर जो है...

Tuesday, February 16, 2010

उड़ने दो निराकार गगन में

अपनी पहली उड़ान पर कवि हृदय से फूटी कुछ पंग्तिया ..

उड़ने दो निराकार गगन में
श्वेत श्याम बदली के ऊपर
बिना राग फैली लाली पर
बिना वृक्ष ऊगी बादल-डाली पर
फूला  नहीं समाता तन में
उड़ने दो निराकार गगन में!
स्मृति के पंखो को फैलाकर
सुख-दुख के झोंके खा-खाकर
ले अवसर उड़ान अकुलाकर
हुआ  मस्त ये प्राण  लगन में
उड़ने दो निराकार गगन में!

जाने दो पर्वत से ऊपर
लौटू मैं तारो को छूकर 
मिल आऊ सागर से जाकर
लौटू मस्त बादल सा इतराकर
रह न जाये प्राण किसी बंधन में
उड़ने दो निराकार गगन में !

Monday, February 15, 2010

सपनो की उड़ान

बचपन में मैं और मेरे दोस्त , गाँव के ऊपर से उड़ते हुए हवाईजहाज को बड़ी ही कौतुलता से देखा करते थे ....बड़ा ही रोमांचकारी होता था ...जब तक हवाईजहाज नज़रो से ओझल न हो जाता , तब तक टकटकी बांधे रहते |
.हवाईजहाज बड़े लोगो के लिए हुआ करते थे|कभी हवाईजहाज में सवार हो पाऊंगा उन दिनों ये खव्वाब भी न आता था|

खैर ,वक़्त का चक्का घूमा ,बचपन पंख लगा के उड़ गया|बचपन और बचपन की बातें ,बचपन के सपने , पीछे छूट गये|रोजी रोटी के चक्कर में मैं भी दूसरो की भांति जीवनचक्की में पिसने लगा |
पर स्वभाव हमेशा से ही घुमंतू रहा है|नए नए जगहों पे जाना ,वहां के 'जमीन से जुड़े' लोगो से
मिलना ,प्रकर्ति के बीच जाना ,हमेशा ही मुझे पसंद रहा है|
सो इस बार , जैसे ही मुझे किसी कार्यालय सम्बन्धी काम से केरल जाने का अवसर प्राप्त हुआ,मैंने अवसर को हाथो हाथ लिया|

केरल 'land of gods ' कौन नहीं जाना चाहता|
12 फरबरी को 1:45 PM पे मैं जेट की उड़ान से केरल के लिए उड़ चला|
विमान में सवार होना बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था , जिसका मुझे न जाने कब से इंतज़ार था|
दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 पे बोअर्डिंग पास जारी करने वाली महिला कर्मी से मैं बोला ' window seat please"
"विंडो सीट ही है सर " कर्मी ने हंसमुख जबाब दिया|
मैं अपनी प्रथम रौमान्चक उड़ान के एक एक पल को संजो लेना चाहता था |पल पल का साक्षी बनना चाहता था|

जेट के इंजिन ने धडधडआते हुए रनवे पे दौड़ लगानी शुरू की| Takeoff करते समय विमान की थरथराहट से थोड़ी घबराहट जरूर हुई ,पर ये घबराहट मेरे रोमांच के सामने बौनी साबित हुई|
उन्मुक्त पंछी उड़ चला|रेखाओ से आगे , सीमओं से परे| लगा ,मेरे खुद के पंख निकल आये है !
बाबरा मन उड़ चला अपने सपनो की उड़ान!उन्मुक्त ,मदमस्त उड़ान!

याद नहीं पड़ता , इतनी ज्यादा ख़ुशी मुझे पिछली बार कब हुई होगी?
बादलो के ऊपर एक अलग दुनिया थी |दूर दूर तक श्वेत ,दुग्ध धवल , रूई के फाहे जैसे बादल
अनंत, विशाल ,विराट , आविरल !....

क्या नज़ारा था , लगा ,स्वर्ग में आ गया हूँ ....
मन किया , विमान से बाहर निकल जाऊ , और खो जाऊ इन घने कुहासे बादलो में|
दुनिया दारी की सभी हाय तौबा से दूर ...विशाल शुन्य में ...दुनिया की गला काट प्रतियोगिता से दूर
बहूँ स्वछंदता की हवा में , बहूँ अपने मन के अनुरूप!
बरसूँ दिलो के सूखे मरुस्थल में , सीचू भावशून्य हो चुकी जमीन को!

मैं मंत्रमुग्ध घंटो तक शुन्य में ताकता रहा ,कभी नीचे देखता ,और नाचीज़ इंसान की जमीन
पे खीची आड़ी-तिरछी लकीरों को देख के हंस पड़ता |
एहसास हुआ , कि भले ही इंसान अपनी विकसित तकनीक के बल स्रष्टि का नायक होने की हुंकार भरे , प्रकर्ति के आगे अदना है , बौना है , और रहेगा..
बीच बीच में स्वर्गलोक की अफ्सराओ से सुन्दर एयर हास्टेस , अपनी मधुर आवाज़ और तीखे नैन नक्श से सांसारिक लोक में खीच लाती ,पर मन तो आज अपनी ही रौं में बह रहा था |
कब कोच्ची आ गया , पता ही न चला |पायलट ने बेल्ट कसने की घोषणा की |
विमान नीचे आने लगा |बाहर क्या नज़ारा था....
चहु ओर हरितमा,नारियल के कतारबद्ध वृक्ष,धरती माँ का धानी रूप !
सुन्दर आलोकिक है कोच्ची , हरी चादर में लिपटा,चरण पखारता अरब सागर |
सीधे सादे लोग ,फैशन -फूहड़ता के बुखार से कुछ हद तक दूर !
ताज होटल में आगंतुक तल पे बला की सुन्दर नव्योवना ने पलक- फावड़े बिछा के स्वागत किया |

आज मैं किसी राजा महाराजा से कम महसूस नहीं कर रहा था |
दुसरे होटल कर्मी ने मेरा बैग ले लिया ओर तीसरे ने सुगन्धित गीला तौलिया लेकर मेरे सामने हाज़िर हो गया
ताकि मैं अपनी सफ़र की थकान के निशान अपने चेहरे से मिटा सकूँ|
पैसे की  ताक्कत का एहसास हुआ|
लोगबाग सही ही कहां करते है " पैसा भगवान् तो नहीं है , पर भगवान् से कम भी नहीं है"

सुबह का नास्ता कर मैं केरल भ्रमण पे निकल पड़ा|
बचपन से अब तक समंदर खाली फिल्मो मैं ही देखा था..साक्षात दर्शन कभी प्राप्त न हुए|
सो समंदर दर्शन भी अपने आप मैं एक बड़ा अनुभव रहा |
"बीच" को मलयालम में "कडापुरम" बोलते है , आलपी कोच्ची का सबसे नजदीकी बीच है|
ऑटो से उतरते ही मैंने समंदर की ओर दौड़ लगा दी |
समुद्र की विशालता ने मन मोह लिया..दूर दूर तक पानी ही पानी ,हुंकार मारती लहरें , हिचकोले खाती इक्की दुक्की नौकाये ..

आलोकिक , भव्य नज़ारा था, मेरी कल्पना से कही ज्यादा मनमोहक निकला खुले समुद्र का नज़ारा ..मैंने बैग एक तरफ उतार फैंका , ओर एकटक उस अथाह जलराशि में शुन्य होकर निहारने लगा..

समुद्र की विशालता , इंसान को उसकी तुच्छता का एहसास कराती है
घंटो में बैठा रहा , समंदर का तिलिस्म टूटने का नाम ही नहीं ले रह था ...

समंदर में नहाते कुछ युवको की टोली में मैं भी शामिल हो गया , खूब जम के धमाचोकड़ी की..लहरों से घंटो हम खेलते रहे |फोटो खीचते रहे ...
शाम कब हो गयी , पता भी न चला|अगली सुबह मैंने मुन्नार का रुख किया , मुनार वहा का हिल स्टेशन है , थोडा सा ऊपर जाके एक पुराना जल विधुत संयंत्र भी है|
सुन्दर जगह है..पूरा दिन चाय के बागानों मैं , इलायची की बगीचों मैं घूमता रहा|
स्थानीय लोगो से मिला , उनके साथ समय बिताया|
उस परम परमात्मा का धन्यवाद करता हू जिसने केरल जैसे सुन्दर ,विस्मयकारी, मनोहारी स्थलों की रचना की |
सोमबार की सुबह १०:३० प्रात , दिल्ली की धरती पे एयर इंडिया के विमान से उतरने के साथ ही मैं सपनो की दुनिया से निकल कर , वही पुरानी इंसानी भाग दौड़ मैं शामिल  हो गया...

Monday, February 8, 2010

एक नया अध्याय

महीनो से चली आ रही काम की हाय-धुन से आज कुछ राहत मिली, तो मन में कुछ नए विचार अंकुरित हुए....
सोचा , क्यों न मन में उथल पुथल करते विचारो का संकलन किया जाये..क्यों न अपने विचारो का , मेरे अपनों के विचारो के साथ मन-मंथन किया जाये..सो blogging शुरू कर दी.

अपने ऑफिस के फ्लोर से नीचे हाई-वे पे एकटक देखता हूँ |.
सरपट दौड़ती कारे, बसे, ट्रक ,मशीन ,इंसान ...हर कोई भाग रहा है..हर कोई बदहवास है. एक दुसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में लगा है..लाइफ का सीधा सा फंडा है , जो जितना तेज भाग रहा है वो उतना ही आगे है..
साइकिल सवार  पैदल से आगे है | मोटर सवार  साइकिल सवार से आगे , लम्बी लम्बी रपटीली कारो में चलने वाले उनसे भी आगे|..
आखिर सब क्यों भागे जा रहे है?...
एक ही जवाब है ..ख़ुशी के लिए ..खुशहाली के लिए...जो जितना तेज भाग रहा है वो तथाकथित रूप से उतना ही सफल है|
पर क्या वो उतना ही खुश है? ये सवाल दुबिधा पैदा कर देता है...
शायद नहीं ...महंगी गाडियों में घूमने वाले ,नींद की गोलिया खाते मिल जायेंगे  और रिक्शा खीचने वाले मीठी गहरी
नींद सोते मिल जायेंगे|
इंसान की इच्छा ,कस्तूरी मृग की कस्तूरी की तरह ही है..जिस तरह कस्तूरी मृग ,कस्तूरी नाभि में होने के बाबजूद
उसे पाने को व्याकुल रहता है | वैसे ही इंसान अपनी इच्छाओ का शमन करने को जिन्दगी भर भागता है...
और इस कदर इच्छाओ के जाल में फ़सा रहता है, कि उसे कभी अपनी खुशियों का पिटारा खोल के देखने का
मौका ही नहीं मिलता |
पिछले दिनों में किसी Knowledge Talk Seminar में गया हुआ था| सभा में से किसी सज्जन ने वक्ता से पूछा .
"How to make life full of happiness , how to persue happiness?"
वक्ता का जबाब सुनने लायक था ..
"Your answer is in your question itself.If you make your life presuasion of happiness , you can't achieve
happiness in your life. Make your life expression of happiness. Every moment express happiness for what you hold. There lies the happiness"
बात सोलह आने सच है . भबिश्य के गर्भ में छुपी खुशियों की चाह में हम इस कदर अंधे है ,कि वर्तमान का पिटारा खोल कर कभी देखते ही नहीं...
जिसने अपना पिटारा खोल लिया , वो खुश है और रहेगा | बाकि लोगो की लाइफ "Presuasion of happiness" ही
बनी रहेगी...