Wednesday, May 12, 2010

सिंगापुर डायरी II

ठीक ही कहा  जाता है कि अपने लोगो का और अपने से जुडी चीजो का एहसास हमे दूर जाकर ही होता है...
भले ही आपको तर्कसंगत लगे या ना लगे , पर सिंगापुर आके अपने भारतीय होने का एहसास और गर्व बढ़ा  है .
भले ही मेरा योगदान नगण्य हो , पर अपने प्यारे भारत वर्ष की शान के कसीदे पढने में में कोई कसर नहीं छोड़ता ..

सिंगापुर में ऑफिस का पहला दिन , मेनेजर ने मध्यांत के समय पूछा ...
' So Sachin , how you getting our singapore?'
बाकि लोगो ने कौतूहलता वश मेरी ओर देखा ...शायद अपेक्षा की होगी ,कि मैं सिंगापुर की शान शौकत और चकाचौंध से मंत्रमुग्ध कोई अपेक्षित सा जबाब ही दूंगा ..
मैंने गहरी सांस ली और सरसरी नज़र से गगंचुभी इमारतों को देखा .
फिर अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ अपने मेनेजर के चेहरे पे देखता हुआ बोला...
'Not up to my expectation sir'

'Whaat???'
एक साथ कई आवाजों गूंझ उठी...
"Yes , Gurgaon is going to be Singapore in next 10 years."
"oh is it?' आश्चर्य और कौतुहल से भरे मिश्रित स्वर सुनाई दिए.....
"  yeah , it's fact . We have Broader highway, similar skyscrapers are coming up.Everything going to be very similar soon."
बड़ा मेनेजर जो अभी कुछ दिनों पहले ही भारत यात्रातन कर के लौटा था ,उसने मेरी हां मैं ह़ा भरी....|

मैं जानता हू,गुडगाँव के तमाम बड़ी बड़ी निरमाण कारी परियोजनायो और सपाट चौड़े हाई वे का मेरे जीवन
से जुड़ाव कम ही है....
बड़ी निर्माणकारी परियोजनाए DLF और दूसरी लाभ आधारित संस्थाओ की है  ...हाई वे भी सरकार और दूसरी संस्थाओ का धनधान्य करने के लिए है...
पर फिर भी इन सब चीजों को लेके जुड़ा गर्व मेरा अपना था|
घटना भले ही छोटी सी  है , पर कम से कम चंद विदेशियों के दिमाग में मैं अपने उभरते भारत की तस्वीर साफ़
करने में सफल रहा..

अपने आपको सांसारिक और भौगोलिक मामलो का श्रेष्ट ज्ञाता समझने वाला एक दूसरा सहकर्मी मेरे से बोला
"Ofcourse , India is progressing fast .But you know,progress there is not very sustainable..Poor getting Poor and Richer getting more and more richer"
मुझे लगा ,जैसे उसने गेंद मेरे पाले में फेक दी हो....
Sustained growth का मैं जीवंत और सापेक्ष उदहारण था ....
साफ़ कर दू ,मन मैं लेस मात्र भी अपने कसीदे पढने का विचार ना था .....
मैंने बड़े ही धैर्य से उस सज्जन को समझाया के भाई साहब आपके चेहरे पे लगा ये चश्मा दशको पुराना है...
मैं छोटे से गाँव से हू ....जहाँ से कोई बिरला ही दिल्ली दर्शन को आता है..आज भी गाँव में बिजली नहीं आती ..
गाँव का सबसे नजदीकी महाविध्यालय गाँव से २५ किमी दूर है और उसके  लिए घंटो  खचाखच भरी बसों में लटक के
जाना होता है..
पर मैंने आविचल ,आविलम्ब हसनपुर से सिंगापुर का सफ़र तय किया है ...
और मैं अकेला नहीं हु, मैं उस आपार असीमित , आथ्हा ज्ञान और सपनो के समंदर का अदना सा पिस्सू ही हु..
मेरे जैसे ना जाने कितने कर्मयोगी अपने प्रगतिपथ पर अपनी अपनी छमता के अनुरूप बढ़ रहे है..
उनके अडिग विश्वास को ना तो 'मायावती सरीखी तुगलकी सरकारे हिला पाती है , ना ही आर्थिक मंदी और ना ही
आसमान छूती महगाई '

कर्मयोगी प्रगतिपथ पर आग्रसर है और रहेंगे ...आने वाले भारत की तस्वीर और समर्धि इन नवोदित नायको के खून पसीने से ही अवतरित होगी..
सरकारे आएँगी ,जाएँगी ...भारत का विकास पुरुष अपने मजबूत कदम बढाता जायेगा .
ऐसा मेरा विश्वास है...
                                                                                       जय युवा , जय भारत...

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