Thursday, October 27, 2016

एक था पिन्टू


उसके पैरो में इस्पात की  स्प्रिंग लगीं  थीं शायद ,जिनकी मदद से वो दौड़ता नहीं  ,बल्कि उड़ता था ।
मौहल्ला क्या ,पूरे गाँव में उसकी टक्कर का धावक ना था ।
चोर सिपाही के खेल मे वो हमेशा सिपाहियों का नायक माने दरोगा बना करता। नाम होता दरोगा 'जालिम  सिंह' !  तगड़े से तगड़े चोर को वो फर्लांग भर में धर दबोचता और सचमुच जालिमो जैसे धुलाई करता ।
लकड़ी  के तख्ते  वाले स्वनिर्मित  बैट से उसने जो छक्के मारे , आज तक उस गूजर टोले में कोई धुरंधर उसका रिकॉर्ड ना तोड़ पाया ।
उसका सीना फौलाद का था ,जिसका मुजायरा वो कई बार साथ  के लड़को से अपने सीने पे पुरजोर मुक्के बरसवा कर किया करता था ।
पिंटू  ने अपने खडूस बापू से कई बार मार खाई थी पर उसे अपनी शर्ट के ऊपरी बटन लगाने मंज़ूर ना थे ।
वो कुछ भी पहनता , इस  बात का जरूर ख़याल रखता कि उसका नंगा सीना नुमाया होता रहे !

उस चांडाल चौकड़ी में हालाँकि  वो सबसे बड़ा था , पर इत्ता बड़ा भी नहीं । हमउम्र ही माना जायेगा ।  हाँ  शरीर  उसका ड्योढ़ा था  और जैसा वर्णित है ' जिगर से भी जबर'  था । सही मायनो में वो उस  चांडाल चौकड़ी का 'अल्फ़ा मेल ' यानी ' सबसे जबर मर्द' था ।
एक बार लाला की दुकान की आधा दर्जन  संतरे वाली टॉफियाँ खिला कर झुंड  के सबसे पिद्दी लड़के ने बड़ी लगन से पूछा था "यार पिंटू ,आड़ी ! ,  सच सच बता, तेरे फौलादीपन का राज क्या है ?"

गहरी साँस ले और सच्चे दिलदार की भाँति पिंटू ने दिल खोल के राज उगला था " यार मैं सुबह खाली पेट ,अपनी काली  गाय का कच्चा दूध निपनिया (बिना पानी की मिलाबट  ) मिश्री की डली के साथ पिया करूँ हूँ। वो भी नाक बंद कर , एक साँस में !  "

पिद्दी लड़के ने जब ये वृतांत अपने दादा को  उबाचा वो दादा ख़ुशी ख़ुशी अपने प्यारे पोते को  सेर भर निपनिया , कच्चा दूध ,मिश्री की डली डाल  पिलाने लगे । हफ़्तों गए  ,फिर महीने चले गए , काली गाय  का कच्चा दूध गटकने के बाबजूद भी पिद्दी  पिद्दी ही रहा ! पिन्टू  की परछाई जितना फौलाद भी ना बन पाया ।मरियल शरीर और कमजोर फेफड़ो के चलते चोर सिपाही के खेल में पिद्दी का किरदार हमेशा छोटे चोर या फिसड्डी हवलदार का  ही रहा । लकड़ी के तख्ते के बैट से वो इकड़ी दुकडी  ही ले पाया या उसे बाउंड्री  पे इस उम्मीद साथ लगाया गया कि उधर विरले ही कोई शॉट  जायेगा !

 उस उम्र में जब बाकि लड़के इंजेक्शन के डर से रोने के बजाय मुँह फेर ऊँगली मुँह में दबाना सीख रहे थे ,पिन्टू   अपने सीने  पे बड़ा बड़ा , स्पष्ट अक्षरो में 'मर्द' गुदवा के आया था ।

हाँ  जी , उस उम्र में! किसी मेले में गुदवा के आया था ।

मोहल्ले  के फौजी काका ने बड़ी जांच पड़ताल  के बाद ये ऐलान किया था कि गाँव  तो क्या  सात गाँवो  में भी पिंटू जैसा धावक नहीं हो सकता । ऐसा  उनके अनुसार , उसके पैरो की ख़ास बनाबट की वजह से था । पिंटू  के पैर  के पंजे और ऐड़ी  के बीच में इत्ती  ज्यादा खाली जगह थी कि मोटे से मोटा नाग भी आराम से निकल सके था ।और ये ख़ास बनावट उसे ख़ास बनाती थी ।

फिर क्या हुआ ? वही जो होता आया है , लड़के ज्यो ज्यो समझदारी की ओर कदम रख रहे थे , जिंदगी की जद्दोजहद उनपे पकड़ बना रही थी । जो पढाई में थोड़े बेहतर थे उनपर किताबे रटने का दबाब , बाकि पे काश्तकारी में गंभीरता से हाथ बटाँने का दबाब । पर हिचकोले खाती जिंदगियों में यारियाँ कायम रही ।

पिंटू बड़ा था , तेजी से गवरू हो चला था । ऊपर से उसके हिस्से छः एकड़ मोटी उपजाऊ जमीन थी , उस पर पढ़ने का दबाब ना था । सो उसका बिहा सबसे जल्दी हुआ ।कम उम्र ही थी बेचारे की । मसे भीगी ही थी , शौकिया ही वो नाई से उस्तरा लगवा  दाढ़ी मूछे  साफ़ कराने लगा था ।

हाँ , बिखरती यारियों का पहला लक्षण पिंटू की शादी के तुरन्त बाद ही परिलक्षित हो गया था,  जब  तमाम वादों को जुठलाते हुए उसने अपने खासम ख़ास दोस्तों को सुहागरात की कहानी सुनाने से साफ़ साफ़ इनकार कर दिया था । पिंटू अब सिकुड़ रहा था उसकी जगह प्रभास नाम का व्यक्ति उदित हो चला था ।

बाकि के दोस्त उसका उपहास करते । टीस भरा  उपहास । दोस्त को खो देने का उपहास ।
पर बदल तो वो भी रहे ही थे । उनके व्यक्तिव  भी आकार ले रहे थे । पिद्दी अब अपने को पिद्दी ना समझता था ।
उसे लगता था कि उसका शरीर भले ही दुर्बल हो , उसका दिमाग मित्र मण्डली में सबसे बड़ा है ।  वो सबसे बेहतर स्कूल में जाता था ।
जिन्दिगियाँ और भी तेज़ रफ़्तार  से भागने लगीं , चौकड़ी  तितर बितर  होने को विवश हुई, तो पिद्दी को मुहल्ले  की रिपोर्टिंग के लिए अपनी माँ  का सहारा लेना पड़ा ।
माँ की  कहानियों में रंग बिरंगे , छोटे बड़े वृतांत  होते ।

पिंटू अब दो ही जगह दिखाई पड़ता था , खेत के मेंड़ पर या अपनी पत्नी के दुप्पटे के सिरे पर ।
बिहाता ऐसी तेज कि साल भर में ही घर के बर्तन खटकने लगे । और दूसरा साल पकड़ते पकड़ते पिंटू के बापू को जमीन आनाज सब अलग करना पड़ा ।     

एक दिन खरसाह ( गर्मी के दिन) की शाम को पिद्दी को पिंटू खेत से लौटता  दिखा । धूल धूसरित , कंधे लटके हुए , चाल सुस्त ।
बचपन के आड़ी को देख उसने निगाह  बचा ली  । किसी अपराध बोध वश नहीं , किसी शर्म की वजह से नहीं ।  उसकी जिंदगी  की व्यस्तता ही इतनी थी शायद ।

'इसे क्या हुआ ? " पिद्दी के मुँह से निकला था ।
' गृहस्थी  में पड़ गया पिंटू ' किसी ने बताया था ।  फिर उस शाम को उस नुक्कड़ वाले चबूतरे पर पिंटू  और उसकी बीवी का चर्चा चला ।
परते खुली कि किस तरह उसकी बिहाता ने सास ससुर के लिए खाना दाना करने से इनकार कर दिया और पिंटू चुप रहा ।
कि किस तरह उसकी बिहाता ने सारे जेवर अपने मायके में रख छोड़े और पिंटू चुप रहा ।
कि किस तरह पिंटू की पिता की मन्नतो के बाबजूद उसने अन्नागार का दरवाजा खोल सारा आनाज आँगन में ला उड़ेला  और अपने हाथों ही बटबाँरा करने बैठ गयी ।
किस तरह घर रिश्तेदारो के समझाने के बाबजूद उसने घर के आँगन को दो फाख  कर दीवार खड़ी कर दी ।

' बुजदिल साला, कम दिमाग ' पिद्दी ने मुँह भीच इतना भर कहा ।
उसका मन पिंटू के रूपांतरण से दुखी हुआ , झुंझलाया ।

'अरे , पिंटू बुरा नहीं है भईया , इसकी बिहाता राड रखा करे है ' एक काकी ने समझाया था ।
पर  पिद्दी अपने बचपन के यार को माफ़ करने के मूड में ना था ।
' काकी  , मर्द अपनी जमीन पे मजबूती से रहे तो औरत उसे डिगा सके है भला ? क्यों ? '
' गुलाम साला , सीने पे मर्द लिखाये घूमता है '
' मज़बूर हो जाता है आदमी लल्ला , जो भुगते वो ही जाने " ताऊ बोले थे धीमे से पर बड़े अनुभव से ।
पर पिद्दी अपनी बात पे अड़ा था , उसकी मुट्ठियाँ जकड़ी थी , वो अपने पुरषार्थ से दिशाएँ बदलने का माद्दा रखने वाला जान पड़ता था ।
और पिंटू , हवा में तिनके सा  कमजोर जान पड़ता था ।

समय का चक्का और भी घुमा । कल के बन्दर  से छोकरे अब कमाते  आदमी थे ।
सब की गृहस्थियाँ  , जिम्मेदारियाँ , अपनी अपनी जिंदगियाँ ।


महीनो से भी ज्यादा चलती दिन रात की महाभारत से तंग पिद्दी ने अपनी बीवी से गहरी साँस ले  बोला " ठीक है , आगे से जो भी जमा पूँजी होगी उससे हम अलग का अपना , शहर में १००  गज भर का प्लाट ले  लेंगे । बच्चो की इंग्लिश मीडियम की पढाई खातिर ! "
" पर सुनो , मैं  पिता जी से कुछ नहीं लूँगा , अपनी कमाई से ही । "

" हम्म , जैसा सही समझो " पत्नी इतना भर बोली ।
पत्नी  की जद्दोजहद में ये एक पड़ाव भर था शायद  ,मंजिल अभी दूर थी ।  उसे गृहस्थी को और पति को सही दिशा  में निर्ममता से धकेलते जाना था ।  ममता  और निर्ममता में कितना फर्क होता है । ज्यादा नही शायद । शायद माँ और पत्नी होने भर का ।
पुराने घरो की उजड़ी नींव पर नए मकान बनते आये है । पुराने नीड के तिनके नए घरोंदो की तुरपन में लगते आये है ।
पिद्दी बहुत कुछ सोच रहा था । इंसान बुरा होता है या उसका किरदार कराता है सब । पता नहीं ।  सवाल है , जबाब सबका अपना अपना होता है । अपने अपने अनुभव के हिसाब से ।


पता  नहीं क्यों , सालो बाद उस दिन उसका मन पिंटू के साथ संतरे वाली टॉफियाँ खाने का था ।
 दिमाग में सालो से पिंटू के लिए भरा द्वेष धीरे  धीरे पिंघल रहा था ।
उसने माँ से पूछा था " ये प्रभास नहीं दिखता आजकल गाँव में ?"
माँ ने बतलाया था " वो तो पिछले साल ही चला गया शहर । वही मकान बना लिया । आधी जमीन बेच दी , आधी बटाईदार पे रख छोड़ी है ।  अपने बच्चो को इंग्लिश मीडियम स्कूल  में पढ़ाने की खातिर  वो  शहर में जा बसा है !"

उसारे से सब सुनते हुए उसकी बीवी ने बोला " चाय पियोगे क्या ?"

                                                                                -- सचिन कुमार गुर्जर