Monday, December 24, 2012

पुरुषत्व का बोझ




मेरे गाँव के एक सिरे पे मूला बागवान का एक भरा पूरा परिवार बसता  है । हालाँकि मूला  को दुनिया छोड़े  एक दशक से ज्यादा बीत गया है , पर ये उसके रोबीले व्यत्कित्व का ही कमाल है कि  आज भी लोग उस कुनवे को मूला के नाम से ही जानते है ।

मजबूत व्यतित्व था मूला का । कद तो मझला ही था । पर बड़ी बड़ी घुन्दीदार मूछे , बड़ी बड़ी आँखे ,गठीला बदन उसे मजबूत व्यक्तित्व का स्वामी बनाते थे ।
जेठ आषाद  की तपती दुपहरी में हल चला चल कर लोहे जैसा फौलादी जिस्म बना लिया था मूला ने ।
सीना चौड़ा करके चलता , सफ़ेद फ़ैत  की गांधी धोती में निकलता ,तो किसी दंगल के पहलवान से भी अब्बल दीखता था ।आवाज़ ऐसी कड़कदार, कि सामने वाला कुछ भी बात करने से पहले दो बार सोचता ।

बड़ी बिरादरी के लंबरदारो का मूला पे तिल में सफेदी के बराबर भी असर न था ।
स्वाभिमान तो उसमे कूट कूट के भरा था ।खुद की  पांच  एकड़ उपजाऊ ,सिंचित जमीन थी । तीन तीन जवान हट्टे कट्ठे बेटे थे ।ऊँची ठाट के बैलो का जोड़ा , खेती बाड़ी का सारा  साजो सामान था । सूदखोर बनिए से दूर दूर का वास्ता भी न था । कुल मिला के सम्रद्ध  था मूला ।
सम्रदी ,सम्पन्नता स्वाभिमान पैदा करती है । मूला में स्वाभिमान  ठसाठस  भरा था ।
अपनी मूछो  की खातिर मूला जान ले भी सकता था , दे भी सकता था ।


बड़े लड़के की शादी तो हमारी याद से पहले ही हो गयी थी । हाँ , मझला लड़का हमसे कुछेक  साल ही बड़ा था ।
उसकी शादी हमारी याद में ही हुई थी ।इकहरे हाड का होता था मंझला डोरीचंद ।
शादी के समय पे मुछे भी ढंग से न उगी थी ।गाँव के ही एक बुजुर्ग  ने पास के कसबे में अपनी जान पहचान वालो के यहाँ से शादी करा दी । लड़की डोरी से उम्र में बड़ी थी । कद काठी में भी भरपूर । डोरी तो एकदम बबुआ लगता था उसके सामने ।
शादी के दो चार महीने तो सब ठीक ठाक चला , पर उसके बात कुछ खटपट सी रहने लगी ।
लड़की का बाप कसबे में दुकानदार था , लड़की ने कभी खेती बाड़ी  का काम छुआ भी न था ।

कई बार  डोरी की पत्नी रूठ के  मायके भी चली गयी , पर बाद में डोरी  मना लाता ।

मूला ने पति पत्नी की छोटी मोटी  लड़ाई समझ कभी ध्यान न दिया । पर गारे इंट  के छोटे कोठरे में डोरी और उसकी पत्नी का झगडा आम हो चला था ।हाथापाई हो जाया करती थी । बात किसी तरह दबी रही ।

पर एक दिन इसी रोज की  खटर पटर के बीच डोरी की  माँ  ने डोरी की चीख सुनी । लपककर पहुंची तो देखा कि  दोनों कुश्तम्कुश्त  हुए है । डोरी शरीर का हल्का था । उसकी पत्नी उसके  ऊपर चढ़  उसका गला दबा रही थी ।
डोरी की माँ  ने उसे टांग पकड़ कर खीच अलग किया ।मूला को पता चला तो किसी तूफ़ान की तरह फट पड़ा । डोरी  को जोरदार तमाचे रसीद किये।
हर दिन की ये रार अब उसकी बर्दास्त   से बाहर  हो चली थी । बहू  को सुबह  मायके जाने को तैयार होने का हुकम बजा अपना हुक्का गुडगुड़ाने   चला गया ।उसे लगा , दो चार दिन मायके में रहेगी तो अपने आप अकल  ठिकाने आ जायेगी । अगली सुबह  डोरी उसे मायके छोड़ आया ।

कुछ दिन बाद डोरी की माँ ने उसे बहला फुसलाकर बहु को लाने भेज दिया ।  डोरी से बहुत पैर पीटे , वो नहीं जाना चाहता था, पर मूला के डर  के मारे चला गया ।
ससुराल में डोरी की खातिर तबज्जो की वजाय जूते चप्पलो से आव भगत हुई । उसकी पत्नी की  कच्ची बातें सुन डोरी का साला  अपना आपा खो बैठा  और डोरी की जमकर पिटाई की ।
पिटा हारा   डोरी लौटा आया । मूला गुस्से के मारे आग बबूला । इज्ज़त में गुस्ताखी उसे मंजूर न थी ।
पर लोक लाज  बस सब्र का घुट पीकर बैठ गया ।
घर वालो को धमकाते हुए बोला " खबरदार जो किसी को कानोकान भी खबर हुई  , अपने काम काज पे ध्यान दो ।'

डेढ़  दो माह पीछे  मूला ने  शादी के बिचोलिए  रिश्तेदार को लानतो के साथ डोरी की ससुराल भेजा ।
पर ये क्या , माफ़ी की वजाय  लड़की का बाप आग बबूला हो  मूला को ही खरी खोटी सुनाने लगा ।
कहेलवा भेजा  ' मूला खुद आये । चार पंचो  के  सामने नाक रगड़ माफ़ी मांगे , तब लड़की को भेज सकते है , नहीं तो मुकदमा करेंगे "
सन्देशा मूला तक पहुंचा । मूला रौबीला , जुझारू जरूर था पर जानता था कि  घर  गर्हस्ती  के मामलो को आपसी बातचीत से ही सुलटाया जा सकता है ।
गाँव  के सरपंच के यहाँ  पंचायत जुटी । दोनों पक्ष के लोग एकत्रित हुए । पंच  परमेश्वर होता है , जो फैसला होगा, दोनों पक्ष मानने को तैयार हो गए ।
आरोप प्रत्यारोप लगे । कई बार हाथापाई की नौवत भी आई , पर पंच  मुद्दे को गंभीरता से सुलझाने में लगे रहे। डोरी से पुछा गया , तो वो फफक पड़ा । ' मैं  नहीं रहूँगा उसके साथ , वो मुझे पीटती है ।"
सभा में पीछे खड़े कुछ लफंदर जोर जोर से हंस पड़े । कोई जोर से बोला ' अबे साले , मर्द होके औरत से मार
खाता है ।
'नहीं रखूँगा मैं उसे , चाहे जान भी देनी पड़ जाए ।' डोरी की बर्दास्त  का घड़ा भर चूका था । आज उसके सामने
मुसीबत से जान छुड़ाने का मौका था ।

मूला को काटो तो खून नहीं । भरी सभा में  डोरी ने उसका पडला हल्का कर दिया था ।
मर्द के कंधो पे मर्दानगी का बड़ा भार होता है । अपेक्षाये होती है , मिथक होते है ।  मर्द को दर्द नहीं होता ।
जोरू से पिट जाने का कबूलनामा  जहर का प्याला पीने से भी ज्यादा कठिन और दुखदायी होता है ।
डोरी की सुबकियो ने मर्दानगी के उस मिथक पे गहरी चोट कर दी थी । किसी ने कह दिया ' डोरी का इलाज़ कराओ ,बहु बाद में लेके आयों '।

मूला को तो मानो सांप सूंघ गया हो । अहम् पे चोट हुई थी ।बस कुछ न बोला , पंचो  की हाँ  में हाँ  मिलाता चला गया ।
बहु आने को तैयार न हुई । कुछ रास्ता न देख पंचो  ने विवाह का सारा सामान  मय  जुर्माने के लौटने का हुक्म दिया । मामला निपट गया ।


 घटना के बात डोरी बदल गया । गाँव के रास्ते से निकलता तो किसी से भी बात न करता । गर्दन झुकाए निकल जाता । उस पर मर्दानगी की फजीहत  करने का आरोप जो लगा था ।
पर वो मन में ठान चूका था की वो एक मर्द बनके रहेगा ।गाँव के लफंगों ने उसे दारु और मुर्गा मछली खाने की सलाह दी । आये दिन वो मांस मछली खाने लगा ।
जुमे की पैठ के  हकीम से बल बर्धक चुरन का सेवन  करने लगा । घर में घी दूध की कमी न थी । खूब दबा के खाता  और पेड़ के नीचे खाट  बिछा  सोया रहता । बड़े सदमे के बाद घर वालो ने भी काम कराने  में ढील दे दी थी । कभी कभार पास के कसबे की फैक्ट्री  में काम कर कुछ नकदी कमा  लेता और मदिरा पान कर लेता ।
चेहरे को रोबीला बनाने के लिए मूछें  मोटी  मोटी  रख ली ।
भगवान् जाने , ये मांस मदिरा का कमाल था या हकीम के चुरन का या निठल्लेपन का , पर एक साल में ही डोरी का काया कल्प हो गया । तोंद निकल आई थी । चेहरा बड़ा लगने लगा था । मुहँ में गुटका भरा रहता  तो उससे  गाल और भी सूजे सूजे लगते ।
शराब पीने में तो वो अब गाँव के बदनाम बड़े बड़े नशेड़ियो को टक्कर देने लगा था ।
शायद  ,मर्दानगी की फजीयत के  दर्द की दवा  ढूँढता  फिरता था ।  कल तक का शर्मीला डोरी अब किसी से लड़ाई झगडे से भी न डरता । अपने पड़ोसियों के साथ कई बार गाली गलोच कर चूका था ।

मूला की फजीयत भले ही हुई हो , पर बिरादरी में अभी भी उसके नाम का सिक्का  चलता था ।
समय बीता । डोरी की दूसरी शादी का प्रवंध भी हो गया ।इस बार बड़ी जांच परख कर सीधी  साधी मरियल सी  लड़की को ढूँढा । काल चक्र के थपेड़े झेल और मर्दानगी की फजीयत का दाग लिए घूमा डोरी अब बदल चूका था । एक साल बाद ही डोरी की पत्नी ने बच्चे को जनम दिया । मूला ने सारे गाँव में लड्डू  बंटवाये ।
दाग धुल गया था । मूला और डोरी के कंधे पे लदा  पौरुष  का  भार हल्का हो गया था ।

मूला अपना  कर्त्तव्य निभा परलोक चला गया । डोरी का आज भरा पूरा परिवार है । पास के कसबे में जाकर
नौकरी करता है । कभी कभी शराब में धुत  अपनी पत्नी की पिटाई भी कर देता है । पड़ोसियों को गाली बक लेता है ।आखिर वो अब सच्चा मर्द जो बन चूका है ।


 डोरी की कहानी इस बात का ऊधारण है की किस प्रकार पुरुष प्रधानं समाज एक व्यक्ति को  मर्दानगी के बोझ तले  दबा ,उसे अपने मूल स्वभाव को बदलने पे मजबूर कर देता है ।
'मर्द को भी दर्द होता है , मर्द की भी संवेदनाये होती है , कमजोरियां होती है । पर  मिथक और अपेक्षाओ तले दबे लोग पुरुषत्व  का  भ्रम ढोए चले जा रहे है  । मर्दानगी का बेताल कंधो पे उठाये पुरुष जाने अनजाने घरेलु हिंसा , नारी उत्पीडन , बलात्कार जैसे घनोने कुकृत्यो को अंजाम देता है ।


 * कहानी के पात्रों  के नाम काल्पनिक है ।










Sunday, December 23, 2012

Those were the days..



Few days back , my school organized Annul alumani meet.
I was in Navodaya Vidhayalaya , a boarding school scheme launched by central  government, especially  designed  for the children coming from rural background and for those who could not avail  good education otherwise..

Few of my school friends set up facebook page on that event and put very emotional, heart-touching messages refreshing memories of those golden days.

I felt so compelled to join the meet. If my responsibilities could have allowed me then I must had joined the event.After all, that was one of the rare opportunities to relish the fading memories of school days..
But you know the harsh reality of life ..Reality to put everything behind and to earn livelihood first.

I had to console myself with facebook updates and pictures of the event ,posted by my friends.
A much of water has flowed under the bridge since schooldays but those pictures of  friends were enough to pull my thought engine into deep recesses of my memories.

Ahhh..those were the days.. 
Those were the days when there were friends all around . Those were the days when there were no tensions
of making money, buying home.Those were the days when life was happy and blossoming at it's own and there was no need of smart phones , Facebook , twitter to feel lively.
Ahhh..I get nostalgic thinking about this all .

But wait a minute here...Were those really the best days of my life?..
How those could be?
There i was . A thin, small boy , forced at that tender age into strange and unknown tiny world of hostel.  
I was trapped,deprived of my freedom . I was forced to spent my childhood away from my near and dear ones.I was away from my mother .



While my village buddies were making most of their childhood playing 'chor sipayi' in open fields and eating all those delicious plums from those far away plum shrubs , i was forced to mug up books in congested  dormitories.Discipline of school was sickening. Every day our physical education teacher used to whistle at sharp four am and within fifteen minutes, we all small, delicate souls had to line up for daily exercise in open fileds...

Breakfast was rationed on equal basis and even if you had hunger for more , you had to do with 2 pieces of aaloo paranthas or other item on the menu of the day.
There were good,loving teachers but devils were also there to shake us to the bones.

Going back to school after summer and winter breaks was like going to hell..
And those were the moments when i'd committed heinous sins of wishing disastrous things to happen.

Yes, i used to pray to God to give heart attack to my principal so as I could go back to my home and had free life.I'd pray to God to send most horrifying flood to my school area to swallow school building and to relieve me from that bondage.I'd pray to God to send most powerful earthquake to my school  to collapse  the building  and to set me free.
Thank God, Thanks to you for being so mature and for not listening to those prayers.

Don't demonize me here. I was not the only one cursing there..I am sure most of my school friends must had committed such thought crimes...

I was shy and hesitant so never tried to run away . But there were those who were bold and brave enough and who literally made successful-unsuccessful  attempts to run away.

What surprises me here, is unequivocal rosy description of those days by all of my friends.
And I am not an exception here.All praises those days of hostel life. All go nostalgic. Not a single word of regret of missing childhood.


What exactly is this? Why this contradiction?...
Why my mind who was totally against that situation and was in constant conflict , how the same mind percieves those memories as something to cherish now,...something so memorable...
What lead to this radical shift ?Ideally it shold have stored those memories as bad memories . something to forget.But no...It twiseted...

Over the time my mind retouched those memories of childhood.Those memories got edited . Labels got changed.Most of my village chums didn't perform as good as i did in my later part of life.
At least in the eyes of my society . I made better and more promising career. My tougher schooling gave me comparatively better foundation to lay the bricks of future.
Over the time  my subconscious compared me and my village chums and out of that  comparison came a sense of fulfillment . As this sense of fulfillment and satisfaction came from my schooling ,tags on previous bitter memories of school days got changed. Bad became good.My subconscious also compares my current life with those old twisted memories.Mind seeks some solace in always rushing ,stupidly serious life. Twisted view of past memories give it much needed high.


I am sure twenty years down the line ,this same stupid mind would turn my not -so- exciting present into a fairy tale and then will follow the nostaliga that will boast of my youth and will make my old , deteriorating self moan in depravity of  golden days which in real  never do exist...






 

Wednesday, August 8, 2012

Land of pure Gold

As much hyped drama of Olympics is coming  to an end , an  unprecedented shift in world order is unfolding.
The myth of rich and prosperous West and  rising China is shattering.All propaganda of so-called-developed nations, mighty United States and new super power China, is exposed now.Fog is settling down and ground realities are becoming clearer day by day.

As a rule of nature , deprivation always leads to desperation.Olympic games have exposed gold deprivation in these so-called rich and developed nations.They are torturing their children for earning gold. They are snatching their childhood,pushing them into rigorous training camps , making them sweat ,just to churn out few gold medals.This is really too much for these gold plated, non-gold gold medals. 


We Indians , we the people of  'Land of pure Gold' ,are really lucky.We must be proud of our  visionary leaders, our bureaucrats who have worked hard and have collected huge cache of 24 carat pure gold. Yes ..pure gold !. Not tiny round shaped medals but thick rectangular solid bricks of pure gold.

Oh! great Andimuthu  Raja , I feel ashamed of those fellow Indians who dragged you , who blamed you.
You have done a great service to our 'Land of pure Gold'.I know you have bought all the gold from US and Europe and China.They all are gold-less now.They are all desperate now. They dream gold,they lust gold .

I know you have bought all gold of Arabia as well.Otherwise , what could have pushed  Arabs to send their females to this shameless , vulgar,  dishonorable drama of Olympics.
    







Some biased ,twisted heads criticize " How govenment of  'Land of pure Gold'  can take pride
when millions and millions of fellow citizens defecate in open?".

Now see , this is all propaganda. Propaganda of those, who can not digest our prosperity.
Propaganda of pseudo-democratic West. Propaganda of West enslaved people.India is pure democracy , as pure as 24 carat gold.Can you even imagine of releasing your pressure on railway tracks in any of these jealous countries?Can you do a  stress endurance test on any government building walls in any of these countries?Only our 24 carat democracy allows it's people to express their emotions , feeling and pressures anywhere,anytime.It's our culture and it's our government's duty to preserve this culture.








A handful of  pseudo- progressive people are not happy with our intentions to preserve freedom of expression.But  24 carat gold democracry  takes care of all.Our great visionaries have come up with out-of-box solution for such people.In next 5 years plan , govenment is going to launch a revolutiony solution to this not-a-problem problem.Our world class mobile tiolets will make our critics hush.



Our visionary government has decided to provide free mobile phones to all indians living under BPL.
This idea of facilitating free mobile phone has come up after massive grid failure throughout northern India.
This mobile phone is going to be a revolutionary product.It is going to be magical tool in the hand of most deprived people.This solar powered device with embedded tourh bulb can illuminate house for an entire week.With attachable fan , this revolutionay product can relieve whole family from sweltering heat.
Scientists in DRDO are working on an ultra-advance model of this mobile. In future this magical device will do all jobs from running  tubewells to power cars.Just attach solar power mobile phone with any motor device and goooo..Electric power consumtion will fall drastically.All surplus power will be transmitted to Pakistan and Bangladesh to build a better neighborhood.







Saturday, July 28, 2012

Rise of mob culture in Uttar Pradesh

Hasanpur is a small town in my home district. With a population of over 50 thousands , this town is similar to other typical towns in Uttar Pradesh.
Sugar mill and other agro-based small industries provide local buy and sell facility to surrounding cluster of farmer villages.Problems here also resonate to the typical problems faced by other towns,cities.Interrupted,insufficient electricity, water supplies, lack of other public amenities are prime issues. Like story of other towns in Uttar Pradesh , these genuine issues have never got serious consideration in elections .People are divided on caste-religion lines and vote on these lines.

Failed monsoon this year has aggravated electricity insufficiency woes all over India.
Few days back people in this town took to the roads in frustration to protest against failed power supplies.But what started as protest turned into violent exhibition of madness.


 A frenzied mob broke loose on road in Hasanpur. Roads were blocked, all covered with stones and burning rubber tyres.Buses and other vehicles were burned.
A few cops rushed out with batons trying to push the mob back that by now had grown to over a hundred enraged men with an audience of another hundreds or so onlookers.
Somehow this direction-less mob ,whose only purpose seemed destruction,this mob got a new target in police.Policemen were bruised , directly challenged by mob. Their patrol jeeps , bikes were burned in front of their eyes.Several audacious criminal minded youths whom political affiliations were revealed later , climbed on police vehicles and set vehicles on fire.
Mob grew so audacious that policemen have to run for their lives.Several policemen were injured.


When smoke cleared , property of crores was gutted into fire . Roads had filled up with bricks, stones.




But what happened next was more sickening.
Illiterate local politicians blamed police for not handling case properly.
I fail to understand how police can be held responsible for disruption in electricity supply.
One of local politicians went to the extent of threatening police not to disturb his followers with any probe in the matter or to face consequences.Local Police ASI was suspended.

In an another incident in nearby town , a mob blocked highway for some demand.
Two policemen were send to disperse crowd and clear highway.As they approached on the scene , a group of weapon wearing men surrounded them.Policemen's rifles were snatched. Policemen literally pleaded these criminals in mob to return their rifles.After much pleading and kneeling down , those criminals hidden in never-held-responsible mob returned policemen's rifles. Criminal faces hidden in mob remains unknown and there is no news of any action against anybody.


 These two incidents happened in my home district and nearby district in this month itself. If i go by compiling list of such incidents happened in whole state this month , then i can definitely have a long list. 
These are not good indicators for Uttar Pradesh law and order health. No matter what blames, true or false, can be thrown upon police,  still by large police is a barrier between these anti-social, criminal , mafia elements and general people.Erosion of police power and authority is definitely detrimental for peace loving common men. Unfortunately, cases involving mobs attacks are on rise in Samajwadi government in U.P.

Ever since Uttar Pradesh politics started revolvoing around local parties with no agenda but to capture power somehow, since then whole of the state is going through a  metamorphosis of sorts that is seeing a rise mob culture and power exhibitionism.Police and other state institutions seem almost helpless to stem out this rising tide of power exhibitionism and mob culture fearing retaliation from illiterate, power hungry politicians.

What has lead to this sorry state of Uttar Pradesh?It's not hard thing to unlock.
Criminals and politicians have increasingly colluded and evaded  police and law enforcement agencies hampered by “severe deficiencies” in technology and training.It has become a trend to shift all the blame on police force or on other small officials whether done by public or some political outfit or by some other groups with sinister plans.

Government after goverment in Lucknow have remained insensitive to any major reform in corroding state mechaniry. Major reforms in system were never considered seriously.
Lack of resources, lack of training and lack of government support is pushing police system on back foot.Only God know when this vicious cycle of political power exhibitionism and petty politics is going to relieve Uttar Pradesh.Only God know when  people of Uttar Pradesh going to awaken from this deep slumber and rise above 'caste religion politics'.Only God knows when this land of Lord Ram , Lord Krishna and Buddha going to transform and going to regain its lost pride.

Saturday, July 21, 2012

What makes them stand tall when others fall?

If this world were mine , i would make it free from all sufferings ,free from all tragedies,adversities.
But  real world is cruel, full of miseries, full of sufferings.

What's more painful here is the fact that most of horrendous acts of sufferings, tragedies which mankind faces today are self inflicted, inflicted by human beings on fellow human beings.
Man is man's worst enemy.

If we peep into some old pages of modern Indian history then atrocities committed during partition of India in 1947, are definitely most horrific acts of madness in modern Indian history .
Millions were massacared in broad day light and thrown out in open.
Others who were lucky to survive were forced to migrate. Partition is black chapter in India's history filled with horror, masaccares,rapes, plunders.  
 Six decades have passed  but  psychological scars of those atrocities are still very much visible in nations's psyche.


Though partition devastated  millions of lives but it gave birth to a big number of heroes as well.
Real life heroes ,whose life stories are inspiring millions today and will keep on inspiring.
Heroes who lost  all but didn't surrender.
Heroes who never  lost hope ,who never turned numb.

Milkha Singh is one such living legend of Human will and strength.We all know him as 'Flying Sikh' , one of the most appreciated athlete in India but a very few of us know what this 'Flying Sikh' endured in his childhood.I came across to one of his  interviews on Youtube.
What a man he is . Only a brave-heart like him could stand tall in such horrific conditions.

Milkha Singh was born in 1935 in Lyallpur ,now in Pakistan.Fire of madness during partition engulfed his family.He saw his parents and relatives being killed in front of his eyes.
Family slaughtered , no money in hand , wearing a single blood shocked shirt , he spent days on Delhi railway station,crying in despair .
Even a vision of such disaster in your deep dreams can make you sweat but Milkha Singh endured this all in real life.He survived . Not only survived but soared high.
He flew high ,very higher than a normal man can even imagine.

He represented India in the 1960 Summer Olympics in Rome and the 1964 Summer Olympics in Tokyo.
He won gold medals in both the 200m and 400m events at the 1958 Asian Games
He progressed to win a gold medal in the 400m competition at the 1958 Cardiff Commonwealth Games.
Government of India honoured him with Padam Shree.

Video clip of interview with Milkha Singh:



Who doesn't know Sunil Dutt.
A very successful actor ,a successful politician as well.
He was elected to Parliament for five terms,held cabinet ministry as Youth Affairs
and Sports minster .He was honoured with the Padma Shri by the Government of India.
This was his strength only that pulled Sanjay Dutt out of dark cells of prison and revived his career.

Sunil Dutt was born in 1930 in the city Jhelum situated on the right bank of the Jhelum River, now in Pakistan.
Madness of Partition took great toll on his family . Everything was snatched away. With no penny in pocket , separated from his family, that child was left all on his own.
He bagged in streets of Delhi to survive.
Then something sparked .Something which gave him courage . Courage to face the brutalities of life head on.
Courage to walk head held high, will to work hard and excel .A helpless child turned into Bollywood mega star .

I can put more examples here,but what's important here is to identify special ingredients in these great  lives that made them rise above adversities.
Important here is to nourish and preserve those special ingredients in our lives, ingredient of  courage, will and  passion for life.Important  here to get inspiration that no matter what happens in life , life must go on.
Inspiration that no matter what situation you face in your life ,no matter how deep you are thrown into depth of misries, courage and will power can always propell you to the pinnacle .

  



Friday, July 13, 2012

जनसँख्या पर चुप्पी क्यों ?



हर साल की तरह इस बार भी ११ जुलाई  को विश्व जनसँख्या दिवस आया और चला गया |
अखबारों के पिछले पन्नो पर कुछ छोटे मोटे लेख छपे , कुछ खबरे छपी , कुछ तस्वीरे प्रकाशित हुई | पर कोई बड़ी हलचल ना हुई |
दूसरी  बड़ी खबरे, जिनसे आदमजात रूबरू है , सुर्खियों में छाई रही |

मन व्यथित होता है अपने देश के कर्ताधर्ताओ , बुद्धिजीवियों , समाज सेवी संगठनो  के दोगले व्यवहार पर |
इतनी बड़ी समस्या से इतनी ज्यादा बेरुखी | क्योंकर  सब के सब आखे मूँद दूसरी उधेड्बुनो  को सुलझाने में लगे है , जबकि सभी विकराल रूप धारण करती समस्याओं के मूल में कही ना कही  बेहताशा बढती आबादी का सीधा हाथ  है, योगदान है |

मैं पूरी दुनिया की बात नहीं करता | दुनिया बहुत बड़ी है , दूसरे देशो की अपनी अपनी प्राथमिकताएं  है , भिन्न समस्याएँ  है |
भारतीय होने के नाते मुझे फ़िक्र है , अपनी धरती से जुडी समस्याओं की और मेरी नज़र में बेलगाम , सुरसा के मुहं की तरह बढती आबादी विकटतम समस्या है |
जरा सोचो , पूरी दुनिया के भूभाग का  ढाई फीसद से भी कम भूभाग है हमारे पास और आबादी है  दुनिया की कुल आबादी का १७ फीसद |
ये सीधा साधा आंकड़ा अपने आप में बहुत कुछ कहता है |  गरीबी , भुखमरी ,कुपोषण , बिजली पानी की  किल्लत ,प्रदुषण ,  जलवायु परिवर्तन  और  ना जाने ने कितनी समस्याए सीधे या घूमफिर कर
इस आबादी के दानव से जुडी है |

पर कौन सा ऐसा शिक्षित , थोडा सा भी जानकार नागरिक है  जो नहीं जानता कि जनसँख्या का ये दानव कही ना कही उसकी रोजमर्रा  की तकलीफों से जुड़ा है |
सवाल ये उठता है कि सब जानकार है तो समस्या निवारण, रोकथाम के कोई भी कारगर कदम क्यों नहीं उठाये जा रहे |

अपने पडोसी चीन का उदहारण ले लीजिये | ५० के दशक में  ही वहां  के दूरदर्शी नेतृत्व ने भाप लिया था कि सम्रद्ध , संपन्न होना है तो इस आबादी के दानव को रोकना पड़ेगा |
नतीजा सामने है , चीन दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसने इतने बड़े  स्तर पे परिवार नियोजन प्रोग्राम को मजबूती से लागू किया | चीन की 'वन चाइल्ड पॉलिसी  ' सफल रही |
दिक्कते आई | विरोध भी हुआ | परियोजना में कुछ फेरबदल भी करने पड़े ,पर चीन ने मूल मुद्दे से नज़र नहीं हटाई |

योजना बनाने वालो की कमी भारत में भी नहीं है | ना जाने कब से ' हम दो हमारे दो ' , 'लड़की हो या लड़का , बच्चे दो ही अच्छे ' जैसे नारे  प्राथमिक  चिकित्सालयों  , स्कूलों , सरकारी दफ्तरों की दीवारों की शोभा बढ़ा रहे है |
पर नतीजा , वही ढ़ाक के तीन पात | दूसरी योजनाओ की  तरह ये योजना  भी सरकारी फाइलों में दौड़ती रही , हम अपने राष्ट्रीय मनोरंजन में  मुग्ध आबादी का पहाड़ खड़ा करते चले गये |

अब हम रोना रोते है मुहँ   फाड़ती महंगाई का , सूखते पानी के नलकों का , गर्मी की रातो में गायब बिजली का , महंगे पेट्रोल का | कहां से और कब तक आयेंगे संसाधन |
आखिर क्यों  इस समस्या से लड़ने , जीतने की  इच्छा शक्ति  नहीं दिखाई पड़ती | इसके बहुत से कारण है |

पूंजीवादी व्यवस्था :
आजादी से अब तक के समय में देश की दिशा में जो एक बड़ा बदलाव आया है वो है समाजवाद से पूँजीवाद की तरफ रुझान |यहाँ मैं  समाजवाद की प्रशंसा  नहीं कर  रहा है , किन्तु ये सत्य है कि पूँजीवाद उपभोगताओ की भीड़ पे उपजता , फलता फूलता है |
पूँजी की बढ़ोतरी के लिए चाहिए तैयार माल की ज्यादा  खपत | ज्यादा खपत के लिए चाहिए ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता | और ज्यादा उपभोगताओ का सीधा साधा मतलब है ज्यादा भीड़  |
मतलब जितनी ज्यादा भीड़ , उतना ज्यादा  पूँजी लाभ |
अब भला सोचे , बड़े बड़े पूंजीपति, बड़े बड़े पूंजीवादी संस्थान क्यों चाहेंगे कि इस उपभोगताओ के हुजूम में कोई कमी आये या कोई ठहराव आये |
नतीजन देश के सशक्त, समृद्ध  लोगो की तरफ से कभी  कोई ठोस पहल नहीं की  गयी |

 वोट बैंक की राजनीति :
सही मायनो में अगर लोकतंत्र हो तो उसे तो जनसंख्या रोकथाम से कुछ हानि ना हो , पर जिस तरह की राजनीतिक व्यवस्था भारत में उभर के आई है , उसके लिए तो भीड़ चाहिए  |
जिसके पीछे जितनी ज्यादा भीड़ , उतनी ही मजबूत उसकी पार्टी, उतनी ही मजबूत उसकी गद्दी की उम्मीदवारी |
अब भला नेता लोग क्यों चाहेंगे कि भीड़ कम हो | उन्हें चाहिए भीड़ के हुजूम ,गरीब  , अशिक्षा के अँधेरे में डूबे, जाति धर्मं के आधार पे बटे लोगो के  हुजूम |
जिसका हुजूम जितना बड़ा वो उतना ही मज़बूत |
अब भला कोई सिर फिरा नेता ही होगा जो चाहेगा कि उसके पीछे चलने वाला हुजूम कम हो |
दशको से ये ही सोच है और नतीजा सामने है |

धार्मिक आस्थाएं  , रिवाज ,लिंगभेद,अशिक्षा   :

हम धार्मिक लोग है | धर्म ग्रंथो में लिखी बातें और सदियों से चले आ रहे रीति रिवाजो में हमारी बड़ी आस्था है |
बच्चे ईश्वर की देन है , ईश्वर का आशीर्वाद है | अब भला एक धर्म भीरु इंसान क्यों चाहेगा कि आशीर्वाद में कुछ कमी हो  |
सो लिहाजा लगे है लोग-बाग दोनों हाथो से आशीर्वाद बटोरने में|
उस पर धर्म के ठेकेदार परिवार नियोजन के साधनों के इस्तेमाल को पाप करार देते है |
लिंगभेद भी जनसंख्या बढोतरी का एक बड़ा कारण है | जरा अपने आस पास देखिये , आपको ऐसे लोग मिल जायेंगे जो जब तक कन्याये पैदा करते रहते है जब तक उन्हें
घर का कुलदीपक लड़का ना मिल जाये  |
शिक्षा का अभाव आदमी को अन्धानुयायी  बनाये रखता है । ऐसा इंसान परम्पराओं , रिवाजों , कुरीतियों की जंजीरे कभी तोड़ ही नहीं पता ।

धार्मिक आधिपत्य की होड़ :
अलग अलग धर्म , सम्प्रदायों का घालमेल है भारत  |
धार्मिक आधिपत्य ज़माने की एक होड़ सी मची हुई है | धर्म कोई भी  हो , अनुनायियों की भीड़ पे ही फलता फूलता है |
जिस धर्म के अनुयायी  जहाँ ज्यादा तादात में होंगे , उस धर्म के लंबरदारो का उस भूभाग पर  उतना ही ज्यादा वर्चस्व होगा , आधिपत्य होगा |
 अब धर्मं वृधि  के दो ही तरीके हो सकते है धर्म परिवर्तन या फिर जनसँख्या वृधि   |
एक मौन युद्ध सा चल रहा है | अगर आप में जरा सी भी विश्लेषण अवलोकन  क्षमता  है तो आप इस मौन युद्ध के किरदारों और अखाड़ो  को साफ़ साफ़ देख सकते है |
धर्म के पहरेदार कभी नहीं चाहेंगे कि कोई ऐसी नीति बने या जनमानस में कोई  ऐसी चेतना आये जिससे जनसँख्या विस्फोट थमे  |
रीढ़  विहीन  सरकार से इस दिशा में कोई ठोस पहल की उम्मीद  पाली नहीं जा सकती |
चीन समान 'एक बच्चा पॉलिसी '  का परिपालन करना सरकार की बस से बाहर है |
वोट बैंक और वर्ग विशेष के तुष्टिकरण  की नीति के चलते  आती जाती सरकारों ने कभी जनसँख्या नियंत्रण को ठोस कदम नहीं  उठाये  |

नेतृत्व का अभाव , चेतना की कमी:

भारत कभी पूर्णता भ्रष्टाचार  से मुक्त हो पायेगा या नहीं , ये  बहस का मुद्दा है |
पर इसमें कोई दो राय  नहीं कि अन्ना हजारे के आन्दोलन से समाज में एक चेतना आई है | लोगो ने सरकार को कटघरे में खड़ा किया है |
जन साधारण तक पहुंचा है ये मुद्दा |चलो भ्रष्टाचार को अन्ना  जी मिल गये  | 
सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ सैकड़ो समाजसेवी संस्थाएं  काम कर रही है | पर्यावरण बचाने को बड़े बड़े नाम वाले लोग जुटे है |मीडिया सक्रिय भूमिका निभा रहा है | सुधार हो रहे है | धीमे ही सही , इन मुद्दों को लेके समाज में एक चेतना आ रही है |
पर जनसँख्या विस्फोट जैसे गंभीर मुद्दे से  लडती हुई एक भी आवाज़ नहीं सुनाई देती | समाज में इसे लेकर एक स्वीकार्यता सी है |

सरकारे आएँगी , सरकारे जायेंगी | जब तक हम इस मुद्दे से नज़र चुराते रहेंगे , समस्यों के अम्बार लगते ही रहेंगे |आन्दोलन होंगे , धरने होंगे | संसद में हंगामे होंगे |
पेट्रोल के दाम यूँ ही बढते रहेंगे | बिजली यूँ ही रुलाती रहेगी | महंगाई आसमान की ओर जाती रहेगी | लोग गला फाड़ फाड़ टीवी चैनलों पर पानी की किल्लत की शिकायत करते रहेंगे |
समस्याएँ जस की तस बनी रहेंगी , बल्कि विकराल होती जाएँगी  |

Sunday, July 8, 2012

Singapore Gardens by the Bay Trip

When you think of Singapore , what picture pops up in your head?
A small City country ,highly urbanised, densely populated , covered with man made concrete structures?
Or if you have better perception then you may think of this place as perfect family holiday destination offering variety of food, cheaper electronic goods, shopping, good hotels,service industry and lot of urban places of tourist attraction.

However when it comes to forestry and nature , then least is expected from this tiny country.
But you will be surprised and impressed  witnessing meticulous job done by this country in maintaining forest fragments and adding lots of  well manicured gardens to make Singapore jewel of Asia.

Singapore is full of gardens.Garden By the Bay is the latest addition to Singapore's beauty.
Recently open to public, located at prime location next to the Marina Bay resort, place is already a big hit among tourists and locals. This lively and vibrant garden showcases the best of  horticulture and garden artistry, with a mass display of  flowers and plants from all over the globe. 


Signature features of Bay South Garden include the Flower Dome and Cloud Forest cooled conservatories, Supertree Grove,Skywalk,the Heritage Gardens,The World of Plants; and the Dragonfly and Kingfisher Lakes.


This weekend,I got opportunity to visit this beautiful garden.Sharing some pictures .

In View : Dragonfly Lake:





Super Tree Grove:
Supertree Grove is a collection of artificial supertrees in the garden. These are tall tree-like structures  containing vertical gardens with various plants  planted on side walls.  These supertrees contain photovoltaic  cells at their top to collect solar energy in the day and power the Supertrees’ lights at night.







Flower Dome:
Flower Dome is huge glass structure showcasing  a large variety of flowers and plants from far distant corners of planet like Austraila, latin America,Africa , Europe.
If you wish to witness nature's artistry at its best then this is the place to be.

In Pics: Variety of flowers @ Flower Dome










In Pic: Geometric patterns of cactus @ flower dome





Cloud Forest:
This glass structure contains 35 meters tall indoor waterfall covered with lush vegetation.
A perfect display of bio-diversity and geology of cloud forests.
Sides of tall wall structure are planted with dense moisture-loving plants,delicate ferns and pitcher plants.












OCBC Skywalk:
OCBC Skywalk is a 128m-long walkway suspended among the Supertrees at a height of about 22m above the ground.
360 degree view from skywalk is simply awesome.


In Pics: View of/from OCBC Skywalk:

















  

Friday, June 29, 2012

प्यास

बात जून 2006 की है । गर्मी अपने पूरे शबाब  पर थी । लू के थपेड़े तन बदन को झुलसा रहे थे ।
सूर्यदेव अंगारे बरसा रहे थे ,मानो इंसानों के सारे पापो का बदला समस्त  सृष्टि को जला कर लेना चाहते हो । धरती सुलग रही थी , जनमानस व्याकुल था । दूर दूर तक आसमान में बादल की एक थेकली  तक न थी ।
 
सप्ताहांत की छुट्टियाँ  काट कर मैं  दिल्ली लौट रहा था ।
कंधे पे बैग लटकाए मुरादाबाद के सरकारी बस अड्डे के द्वार पे दिल्ली जाने वाली बस का इन्तेजार कर रहा था ।खैर बस आई । उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस ।  टूटी फूटी जर्जर अवस्था में । कराहती , हिचकोले खाती आधे अधूरे मन से निकास द्वार पे आकर खड़ी  हो गयी ।
बरसो से बेचारी बिना किसी मरम्मत , बिना किसी आराम  आदम जात की सेवा में लगी थी ।
बेचारी की हालत देखकर दया आती थी , पर फिर सोचा निष्प्राण है सो भावनाओ का क्या मतलब ।

लपककर मैंने खिड़की वाली सीट हथिया ली । इतनी भीड़ को चीरकर बस की सीट हासिल करना किसी ट्राफी से कम नहीं होता ।
सामने की  सीट पे एक एक बुजुर्ग देहाती दम्पति बैठा  था । उनके साथ दो छोटे छोटे बच्चे थे । पोता पोती रहे होंगे । सफ़ेद टेरीकॉट का नील लगा कुरता , दुधिया सफ़ेद फेट वाली  धोती , पैरो में चमड़े के नौकदार जूते पहने दादा को देखकर किसी स्वतंत्रता  सेनानी की याद आती थी , मानो  गाँधी जी के कोई निकट अनुयायी अभी अभी किसी स्वतंत्रा  संग्राम के संभासन से लौट रहे हो ।

अब बच्चो की मनोवृति तो आप जानते ही है । बस अड्डे पर बस खड़ी रही तब तो कुछ न बोले ।
ज्यों  ही बस ने अड्डे से बाहर आकर ट्रैफिक  के साथ रेंगना शुरू किया , पोते ने पानी पीने की जिद पकड़ ली ।
दादा ने समझाया । बस अड्डे पर क्यों नहीं बोला , ऐसा कहकर लताड़ा भी ।
पर बालमन क्या जाने लताड़ । उसका मकसद पूरा होना चाहिए । पानी की जिद पकड़ ली ,बच्चा सुबकने लगा ।
घने ट्रैफिक में फंसी  बस , अड्डे से कुछ दूर आगे खिसककर  थम गयी।
चलता फिरता रोजगार का अवसर देख खीरे , चने ,मूंगफली वाले बस की खिडकियों पे ग्राहकों को रिझाने लगे ।अचानक बुजुर्ग दम्पति की खिड़की पे पानी की ठंडी बोतल लिए एक  इकहरे बदन के युवक ने आवाज दी । उसने बगैर पूछे ही एक पानी की ठंडी बोतल बुजुर्ग के हाथ मे थमा दी ।
प्यास से बिलखते बच्चो को मानो अमृत मिल गया हो । बच्चो की दादी ने पानी पिलाने वाले युवक के लिए दुआओ की झड़ी लगा दी । एक सांस में ही  लम्बी उम्र से लेकर सुखद दाम्पत्य जीवन और संतान सुख तक की दुआए  कर डाली ।

पानी की बोतल थमा युवक अपने नए ग्राहकों की तलाश में बैगर कुछ बोले ही पीछे वाली खिडकियों पे बढ़ गया ।बच्चे जब ठन्डे पानी की अमृतधारा गटक चुके , तो दादी ने पानी की खाली बोतल अपने पास सहेज के रख ली और युवक के वापस खिड़की पे आने का इंतज़ार करने लगी ।
रह रह अपनी पूरी आत्मा से युवक को आशीष देती जाती । देहाती लहजे में अपने पति से बोली ' खैर कुछ भी कहो , अच्छे , समाज सेवी लोग आज भी है । बेचारा कैसी कुपहर दुपहरी में पुण्य का काम कर रहा है "

खैर पिछली खिडकियों पे आमद कर युवक दादा दादी की खिड़की पे लौटा । इससे पहले की कुछ कहता , बुढ़िया ने खाली बोतल खिड़की की ओर बढ़ा  दी ।
 'क्या  करू में इसका , अपने पास रखो , और सात रूपये निकालो जल्दी से ।'
 'सात रुपए , पानी बेच रहा है क्या ?' दादा की आँखे अचरज से फ़ैल गयी ।  पानी बेचने का विचार दादा को हजम न हुआ ।

' भले मानस , पानी भी कोई बेचने की चीज़ है । ऐसे ही पिलाओ लोगो को , शबाब का काम है आशीष मिलेगा ।'
'कुछ और काम करो भैया "

वो पानी बेचने वाला युवक दादा पे बिफर उठा ' ताऊ , पहली बार गाँव से बाहर निकले हो क्या , कौन सी दुनिया में रहते हो, सात रुपये निकालो फटाफट  ,आ जाते है न जाने कहाँ कहाँ से '।

' अरे भैया , पानी बेच रहा है या दूध ? है जी बताओ , कतई कलयुग ही आ गया, राम जी के यहाँ हिसाब देगा कि  नहीं   '  दादा ने मेरी ओर देखते हुए, समर्थन बटोरने की आस में , ऊँची आवाज़ में कहा ।


मैं भला क्या कहता , सचमुच दादा दादी किसी दूसरी दुनिया में जी रहे थे , जो शायद एक दो दशक पहले तक बसती  थी ।
वो दुनिया जहाँ पानी पिलाना व्यवसाय  नहीं हुआ करता था , लोग ये शुभ काम पुण्य पाने को करते थे ।
शहर के रईस अपने नाम से सार्वजनिक प्याऊ  लगवाया करते थे । द्वार पे आये दुश्मन को भी पानी के लिए पूछ लिया करते थे । पानी बेचकर मुनाफा कमाने का विचार तो जन मानस पटल के किसी कोने में भी न था ।

वो  पानी का व्यवसायी युवक सात रुपए  लेकर ही खिड़की से टला ।
 हाय री आधुनिकता की अंधी दौड़ , पानी जैसी मूलभूत चीज़ भी बोतलों में बंद हो गयी ।
रेंगती , खटखटाती  उत्तर प्रदेश परिवहन की हमारी बस शहर के छोर  पे गांगन  नदी के पूल  के ऊपर आ पहुंची ।
खिड़की के बाहर  झाककर देखा , नदी के नाम पर एक काले , बदबूदार पानी की एक पतली रेखा दोनों सिरों
पे बसे आदमजात के  बेहतरतीब घरोंदो के बीच सिसकती हुई दम तोड़ रही थी ।दादा ने जेब से निकाल कर एक  रूपए  का सिक्का अपने पोते पोती के ऊपर से घुमा कर नदी में फेक दिया ।
दम तोडती  गांगन  कुछ न बोली । अब उसमे आशीष देनी की छमता  न थी ।
मानव बलात्कार की पीड़ा लिए , जीवन चक्र से मुक्ति की आस लगाये ईश प्रार्थना में लगी रही ।

जीवन रस पानी को  मानव मूल का निशुल्क अधिकार समझने वाली विचारधारा, परंपरा  ऐसे दादा दादियों  के साथ जीवन के आखिरी पहर में है ।
जनसंख्या दबाब , प्रदूषण , लालच ,पानी के स्वछ ,निशुल्क ,सर्वुप्लाब्ध्य होने  पर प्रश्नचिन्ह  लगा  चुके है ।






 
 





Sunday, June 24, 2012

Great Indian television drama




As generally happens to me over weekends ,today also I woke up to noisy background music of Indian daily soap.Colors channel do play marathon episodes of these 'Saas bahu' centric daily soaps over weekend.
A real torture for me.
I am not active viewer of any of these 'Saas Bahu' serials but as universally accepted rule for happy married life ,you have to , not only tolerate this all but have to restrain any emotional outburst against these unwanted super emotional dramas.
After all it's better to tolerate reel life emotional game than real life emotional drama.






Gone are the days when Indian television showcased great serials like Ramayan , Mahabharata.
Gone are the days when serials were character oriented , message driven, factual,full of solid content.
It's a big money business now.
In today's serials everything meaningful has evaporated . Things that rules now are drama, sensation,violence, conspiracy.  






Let me take example of  today's marathon episode of one such daily soap running on colors.
'Sasural Simar Ka' is a female centric drama ,in which story revolves around Simran who is Bahu to some middle class family. 
Now this Simar who is in the center of this daily soap, this newly married girl is working really hard to keep her in-laws safe from never ending conspiracies.
She is really overburdened  and i feel sorry for her. Only support she gets in her tireless fight is from her younger sister who also got married into same family.

She is firefighter and any negligence at her end in sensing  lurking dangers, may turn into calamity for her family.A bar girl has intruded into their heaven like family and trying to  marry Simron's young brother-in-law.
This bar girl wants to take some revenge.Some how , may be due to strong instincts which Simran has developed by the grace of God, Simran has sensed that this new girl is some evil spirit and trying to destroy her family.Sense of duty kicks in and here she is ready to do anything to keep trouble at bay.

Problem is that she can not explain this to her family in any human language. Male family members are so dumb. They lack intellect to sense,judge things and no problem solving is expected from male characters. Only expectation from male characters is to be well groomed, clean shaved, to have well chiseled body and to wear nice shervani.
Their duty is to follow what their female masters ask them to do.
Only person who can take decisions is Simran's Saasu but problem is that she lacks grey matter.
Her all decisions come very late. Her senses are not as developed as Simron's.
Most of the time this Saasu depends on 'Mata Rani ki Kripa ( Goddess grace).

Simron is all alone , a lone warrior.See her height of bravery.
In the depth of dark night in typical indian setup she dares to venture out of her house , just to catch this new evil girl red handed who has gone to some dance bar.
In these times when gold is red hot ,Simron dares all goons of her area by wearing kilos of gold jewellery and stepping out in the depth of dark  night and going to a bar where all
evil , morally bankrupt, mean, sexually deprived male souls are lurking in each and every corner.
Air is thick with alcohol vapor and smoke and you can not expect even a single moral soul in that setup.
You need a heart of lion to match Simron's courage.To take this endurance test to extreme,Almighty adds more dilemma.

Police raids the bar and in hurry while trying to escape Simron's mobile phone slips out and acts as strong evidence for evil police to implicate Simron in case of flesh trade.
As happens in every soap,movies , police here is totally heartless , brainless,corrupt and stubborn to lock up Simron alleging her for illegal activities.

Everyone in family pleads  to Simron open mouth and to tell the truth.
But to my dismay and utter frustration, our lionness Simron fails to utter a single word in support of her innocence.Some black magic has turned this lioness into cow who can not moo and now she can not raise her gaze up and can not utter a single word.She ends up in cruel police custody.

I see at my wife's face who is totally engrossed in this drama and has ignored my request to
bring a glass of water for me to kick off my body into active day mode.
Every dialogue , every change in scene brings a whole range of emotions on her face.
She is very concerned and in pain at Simron's despair.

How good is this fake, external stimulation of emotions?
It drains emotional energy. Is it entertainment or emotional drainage in the name of entertainment leaving less energy behind to tackle real life scenarios which require calm,balanced approach.

Fake over-stimulation of emotions can lead to impulsive behavior or to sudden,unexpected outburst of emotions.It may cause attention deficit and can alter behavior. In long run such regular exposures to emotional dramas may be detrimental.I have a number of discussions over this topic with my wife and have tried to influence her to stuff her neurons with something better.
But so far BBC knowledge, Net Geo, Animal planet all these channels have failed to come anywhere in arena and 'Saas bahu' dramas are in lead.

My male ego may not allow me to acknowledge myself as viewer of these illogical, never ending dramas but fact of the matter remains that i am a reluctant viewer of these all dramas, who is tortured everyday with non-sense and who have to swallow daily dose of these so called great Indian dramas.













Saturday, May 26, 2012

Phuket trip


Phuket is the largest island in Thailand. At 540 km sq, it's about the same size as Singapore. Just about one and half hour from Singapore.
Place is very spectacular and scenic. Phuket definitely has some of the best beaches i have visited so far.
We were on  3 day trip to this beautiful island  from 10th May 2012 to 13th May 2012.
Thanks Ajeet ,thanks Asmita , We enjoyed your company. 


Towel Art : Hotel room @ Patong beach:




First elephant riding experience:
This was my first elephant ride.Very nice, memorable experience.
View from hill top was really awesome. There are a few elephant riding spots. Don't miss this experience while in Phuket.  












Awesome view from elephant ride hill top:





A small road side gasoline shop in Phuket:
If you have internationally valid driving license, then better pick up scooter or car on rent for whole day.
You can get scooter for as low as 150 baht per day.
Hiring taxi on trip to trip basis is expensive and can burn hole in your pocket.
Small roadside gasoline outlets are very common. 




Trip to Maya Beach, Phi Phi Island:
The full day speedboat tour to Phi Phi Island is really enchanting experience.
Visit few tour agents before finalising ticket booking. Phuket is place where you get ample opportunity to sharpen your bargaining skills. 
Compare offer prices from several tour agents and bargain hard.You can definitely save some money. 
Whole day speed boat tour gives spectacular views of cliffs, reefs and a number of beaches.
An unforgettable experience. 
Places we visited on our one day speed boat tour were Maya Beach, Viking caves,Phi Phi Island, Khai Island.






Maya Beach:
'The Beach' was filmed here.
Very scenic , very calm.
I wish i could have spent more time on this beach.













Snorkeling @ Khai island:
The tropical waters of the Andaman Sea are ideal for snorkeling - clear, calm, balmy and bursting with brilliant marine life.












Buddhist Temple on the way to Big Buddha:
Phuket is full of Buddhist temples.Don't miss to visit.
We are living in a world full of violence and sufferings.
No matter how hard you work , no matter how thick pay cheque you carry home , happiness , self-fulfilment is distant dream.
Teachings of Buddha come as shining rays of hope. A hope to relieve humanity from all miseries.




Big Budhha :
Big Buddha is one of the important , not to miss landmarks.
Huge image of Buddha in meditation posture is sitting on hill top.
This 45 meters high statue is still under construction and already pulling huge crowd.
On the way to hill top , we stopped for sight seeing.
This place offers some of the best sight seeing. Whole hilly area is filled with lush green jungles.
A must visit for everyone visiting Phuket.


On the way to Big Buddha:



At some sight seeing spot on the way to Big Buddha.







Kata View point:
Kata view point is famous view point in Phuket.
From here you can have view of Kata noi , Kata yai and Karon beaches.





Banlga Road, Patong Beach:
If you wish to get taste of night life in Phuket, then Bagla Road is place to be.
Whole place around Patong beach comes to life after sun sets.
Streets are jam packed with foreigners.
Place is famous for raunchy night life , filled with exotic bar girls, beer and loud music.   




Patong Beach: