Monday, December 30, 2013

बदलाव की हवा बह चली है

लम्बे , निष्ठुर , अंधियारे शीत के थपेड़े झेल निष्प्राण लता  बसंत के पहले सूरज को देख बलबती  हो उठती है । बसंत के पहले सूरज में शीत की निष्ठुर ठिठुरन को काटने का माद्दा  नहीं होता , सूरज का तेज लौटने  में अभी समय होता है  । लता  में नवप्राण बदलाव के  विश्वास और भरोसे ने फूँके  होते है । बसंत की  पहली किरण उस बदलाव का अग्रदूत होती है|

अथाह समुद्र में भटकी नाव के सवारो को दूर क्षितिज के जोड़ पर जमीन की  रेखाएँ  दिखने भर से किनारा हाथ नहीं लग जाता । हाँ , दूर जमीन की  लकीरे उनकी  बाजुओ में फिर से बल विद्दुत जरूर भर देती है ।किनारा अब दूर नहीं ।

पहली बार राजधानी की  सर्द हवाओं में बदलाव की गर्माहट  का अंश है । एक आस है , एक किरण है जो आने वाले बसंत की अनुगामी जान पड़ती है । निर्बल को संबलता का अहसास हुआ है , बाहुबलियों को भेद्यता का आभास हुआ है । सिंहासन हिले है ।
'आप ' की सरकार अपने चुनावी घोषणापत्र का अक्षरशः  पालन कर पायेगी या नहीं , ये तो भविष्य के गर्भ में है । हाँ ,बदलाब की हवा अब निश्चित बह चली है ।


हे परमेश्वर , बदलाव की हवा को दिल्ली तक न सीमित रखना । इस हवा को  आँधी कर देना , झंझावात कर देना और बहाना यमुना के उस पार, दूर दूर तक खुले मैदानो में ।
बहाना मेरे गाँवों  के खलियानों में, मेरे शहरो के गलियारों में और उड़ा ले जाना उन सब सत्ता लोभी ,स्व अनुशंसा में डूबे बाहुबलियों को जिन्होंने हमे बना छोड़ा  है  सिर्फ अगड़ा और पिछड़ा ,  ऊँचा और नीचा , हिन्दू और मुसलमान ।

"हो  गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए , इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज ये दीवार परदो की तरह हिलने लगी , शर्त थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर ,हर गली में , हर नगर हर गाव में , हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए 
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं , मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए 
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कही भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए।  "

 
ध्रुव को बेहतर सामाजिक परिवेश में बढ़ता देखने की अभिलाषा में कुछ गलत तो नहीं ।









Thursday, October 31, 2013

तेज का तेज जा चुका है |


 गढ़वाल  की  पहाड़ियों में भागीरथी  के किनारे भरा पूरा टिहरी  शहर बसता था ।
विकास की  दौड़ में जब सरकार ने टिहरी बाँध  बनाया तो बाँध के पानी में इस अलसाये शहर को भी अपनी बली देनी पड़ी । आन्दोलन हुए , धरने प्रदर्शन हुए पर आखिरकार नगरवासियों को झुकना पड़ा ।  पास की  ऊँची पहाड़ी पे सरकार ने नए घरोंदे बना दिए और भारी दिल लिए नगर वासी  पलायन पे  मजबूर  हुए ।
 टिहरी ने  जलसमाधि  ले ली और उसके साथ दफ़न  हो गए हज़ारों सपने , अनगिनत कहानियाँ , अनोखें वृतान्त । विस्थापित  लोग  वो सामाजिक ताना बाना  शायद कभी न बुन  पाये ।




उजड़ी यादों में खो चला एक वृतांत है , टिहरी के आजाद मैदान में उतरी उड़नतस्तरी का ।
सैकड़ो की तादात में लोगो ने अपनी खुली आँखों से उस चमकीली तस्तरी को देखा । पर किसी कि हिम्मत न हुई कि पास में जाकर उस रहस्यमयी वस्तु की पड़ताल कर पाये ।

उसी रात कटकन्डा वालों के यहाँ उनके कुलदीपक का जनम हुआ था ।
कहने वाले तो कहते है कि वो तेजस्वी बच्चा उस उड़न तस्तरी से किसी दुसरे ग्रह से आया था ।
सच क्या है ये तो भगवान् ही जाने , पर हाँ  वो बच्चा था जरूर चमत्कारी। कुछ ख़ास था उसमे ।
 छह माह के बच्चे को जहाँ  अपने पोतड़ों तक की सुध  नहीं होती , चमत्कारी बच्चा आदमजात की भाषा में पारंगत हो चूका था ।  पिता के कंधे पे बैठ दुनिया जहाँ की  बाते करता ।बच्चे की चपलता देख , राहगीर दांतो तले ऊँगली दबा लेते ।

बालक का नाम तेज़ रखा गया ।  परिवार उसे छुपा के रखता ।कभी कभार चोरी चुपके वो निकल पडता  । सर्पीली ,टेढ़ी मेढ़ी सड़को पर हवा की  रफ़्तार से दौड़ता । उससे उम्र में बड़े बच्चो में भी  उसके कदमो से कदम मिलाने की  कूबत न थी ।  साइकिल सवार भी पीछे छूट जाते  । उसके घुटने शुद्ध इस्पात के बने थे । उसकी ऐड़ियों में मानो स्प्रिंग लगे थे ।

भागीरथी  के किनारे  जोर की  हुंकार मार वो हुडी भरता और मीलों पानी के ऊपर सरपट दौड़ता  ।
दोस्तों को उसने  विद्या माता की कसम दे  रखी थी , बेचारे परीक्षा में फेल होने के डर  से किसी से कुछ न बताते । टिहरी का रहस्मयी बालक य़ू ही  पलता बढ़ता रहा । 

बिलक्षण बुद्धि  वाला बालक था तेज । दिमाग तो चाचा चौधरी से भी तेज चलता था ।
घर में बड़ो की फिजिक्स ,केमिस्ट्री की  किताबे यूँ  ही हंसी खेल में पढ़ डाली । एक एक शब्द कंठस्त , वो भी महज ७ साल की कच्ची उम्र में ।

घर वालो को लगा कि बाहर  वालो को विलक्षण बच्चे का पता चलेगा तो न जाने दुनिया उसे क्या समझेगी ।
पता नहीं वो नन्ही उम्र में दुनिया की काली  परछाइयों से लड़ पायेगा कि नहीं , सो उन्होंने वही  किया जो सुपरमैन के पृथ्वी  वाले माँ बाप ने किया था ।
तेज़ को शपथ दिलायी कि वो अपनी रहस्यमयी  ताकत की कही भी नुमाईश नहीं करेगा । कभी भी स्कूल की परीक्षा में शतप्रतिशत अंक  नहीं लाएगा  । बच्चो के सामने हवा की गति से नहीं दोडेगा ।
कभी भी निक्कर पहन स्कूल नहीं जायेगा ताकि उसके इस्पात के घुटने जग जाहिर  न हों ।
कभी भी जूते नहीं उतारेगा ताकि उसके पैरों के स्प्रिंग न दिख पड़े ।

माँ बाप के डर  ने उसे कभी शहर के बड़े कालेजो में नहीं जाने दिया । पहाड़  के इंटर कॉलेज से ही बारहवी जमात की  परीक्षा दी । सारे सवाल सही सही लिख अपने चेलपार्क की  इंक वाले पेन से उत्तर कापी में इंक के छींटे मार दिए ताकि उत्तर कापी जांचने वाला एक आध नंबर कुलेख ,सफाई के आधार पे काट ले…

बिलक्षत तेज़ ने जिला टॉप किया । उपरान्त  गढ़वाल  के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से परास्नातक की उपाधि धारण की और एक नामचीन बहुराष्ट्रीय फर्म में जॉब करने लगा ।


कभी भीमकाय हाथी को मामूली सी रस्सी से बधे देखा है । रस्सी गजबल  के सामने तिनका है , चाहे तो पलक छपकते तोड़ फैंके , पर उसका दिमाग बंधा होता है । हाथी के बच्चे को लोहे की मजबूत जंजीर से बांधने का प्रयोजन ये होता है कि बचपन में ही उसके दिम्माग में ये भर दिया जाए  कि वो  जंजीर अटूटनीय है , कभी तोड़ नहीं सकता । बड़े होकर हाथी का शरीर भले ही  दीर्घ हो जाये, बचपन से छमता पे लगी शंका उसका हौंसला तोड़ चुकी होती है ।


गढ़वाल का सुपर हीरो तेज़ आज आई टी  मज़दूर की नौकरी कर जीवन यापन कर रहा है ।
रफ़्तार जा चुकी है । जीवन और गृहस्त  की  जिम्मेदारिओं ने एक सुपर हीरो को आम आदमी बना छोड़ा है ।
सुना है आजकल नौ से छ्ह की नौकरी के साथ 'आम आदमी पार्टी ' का फेसबुक प्रचार-प्रसार कर दिल बहला  रहा है । जो खुद समाज की बुराइयों को उखाड़ फेंकने का माद्दा रखता है , अपनी  छमता  भूल दूसरों की महत्वाकांछा की जड़े सींच रहा है ।

तेज का तेज जा चुका है ।








 


Saturday, October 26, 2013

ध्रुव बना सुपरमैन


आज सुबह ध्रुव से वार्तालाप के दौरान ज्यो ही उसने अपना फोफ्ला मुँह खोला , तो पाया कि मुँह  में  दो  छोटे छोटे श्वेत  बिंदु नज़र आ रहे है ।
'प्रीति , ध्रुव के दाँत  निकल आये है ,मैं  खुशी  से चिल्लाया । '
बड़ी सुखद अनुभुति है । अपने नवप्राण को जीवन पथ पर बढ़ता, मानव जीवन के दाव पेच सीखता देख जो अनुभव होता है , उसे शब्दो  में बांधना मुश्किल है ।

ध्रुव अपने शब्द कोष का तेजी से विस्तारीकरण कर रहा है । हालाँकि अभी जो शब्द स्पष्ट रूप से कंठस्त  हुआ है । वो है 'मम्मा' ।
मुझे सबोधन अभी अस्पष्ट  है । कभी 'पापा' तो कभी 'बापा ' तो कभी सीधे 'बाप' कहकर ही संबोधन होता है ।
शब्द  कुछ भी हो हम तो नवचेतन के प्रयास के कायल है ।
मेहनती बालक है ध्रुव । लगन और अनवरत परिश्रम की साक्षात्  मूरत ।
सुबह  से शांम तक शब्दों का उच्चारण चलता ही रहता है । स्वत : खड़े होने में तो पारंगत प्राप्त कर ली है अब सारा ध्यान चलने पर  है ।
सुबह  से शाम तक महाशय दस बीस बार तो गिरते ही होंगे , पर मजाल है कि  हौंसला जरा भी तस से मस हुआ हो ।

कल शाम को ध्रुव के लिए सुपरमैन वाली ड्रेस खरीदी गयी ।
पेश है उसी ड्रेस के कुछ चित्र ।









































Wednesday, October 23, 2013

जरा सोचे ...


काफी लम्बे समय से इस बारे में लिखने का सोच रहा था ।
मेरे काफी सारे मित्र और परिचित है जो अपने सामाजिक कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए अपनी अपनी छमता अनुसार , राजनैतिक दलों और अन्य प्रख्यात संस्थानों को धन अनुदान करते है ।
 अच्छा है , सराहनीय है । समाज और राष्ट्र निर्माण में हर नागरिक का योगदान  होना चाहिए ।

गाढ़ी मेहनत की कमाई समाज कल्याण के लिए देना नेक काम है , ये तो निर्विवादित है ।
दान कर्ता की मंशा और आकांशा पे लेस मात्र भी शक नहीं किया जा सकता।

मेरा प्रयास मंशा तोलने का नहीं अपितु उस राशी के सही और निश्चित प्रयोग पर है ।
जरा सोचे , पांच हज़ार की रकम राजनातिक दल के फण्ड में पहुंचकर ज्यादा असरदार होगी या किसी मटयाले गाँव के उपेक्षित घर में एक सोलर लालटेन के रूप में ।

 बूँद सागर में गिरे या नवांकुर की जड़ में , दोनों ही दशा में बूँद के समर्पण को किंचित कम नहीं आंक सकते ।
हा , बूँद का समर्पण नवांकुर की जड़ में जो रंग ल सकता है , वो  विराट सागर में नहीं ।

राजनैतिक दलों के अपने तरीके होते है । विभाग होते है जो धन एकत्रीकरण के जरिये जानते है ,  सुझाते है । बड़े बड़े उधमी खुले हाथो से फंड जमा करते है। धन के अछय स्रोत उनके पास होते है ।
तर्क और सच्चाई के धरातल पे देखे तो आपकी चार पांच हज़ार की रकम किसी राजनितिक दल के लिए कोई बड़ा मायने नहीं रखती ।

 हाँ , ये रकम एक गरीब के बच्चे के  सपनों को पंख  जरूर दे सकती है।
बाजार में   तीन  हज़ार से चार हज़ार मे  अच्छे  सोलर लालटेन मिल जाते है । किसी परिवार को  रोशिनी का जरिया दे । बच्चो को पढने का होंसला दे । एक पढ़ा लिखा बच्चा , एक परिवार का काया कल्प कर सकता है ।
गरीब का बच्चा पढ़ेगा  , परिवार खुशहाल होगा । गाँव खुशहाल होगा । गाँव खुशहाल होगा , तभी देश खुशहाल होगा ।
 जरा सोचे ।










 




    


Friday, September 6, 2013

How simple ,how complex

It's lovely morning today. It has rained all night and is still pouring incessantly.
We are at our breakfast table in our hotel's dining area .
 Priti is busy with her noodles and I am munching on wholegrain bread and sipping my tea.

Dhruv is happing in his baby chair and requires no attention from our side.

On our adjacent table, a caucasian couple is busy with their breakfast.
Their conditioned hands are doing their  job with cutlery and allowing them to focus more on their talk rather than attending slippery meat slices and freshly baked bread pieces.

Their talk is not very audible to me but the tone and the gestures indicate that nature of the talk is little argumentative.
Man is trying to make a point to his partner which she doesn't find very convincing.
Like other wives on this planet earth,she has  a counter point and would like to make a correction there.

Somehow, Dhruv finds them interesting.
He squeaks and thumps into the table to get their attention. He bounces in his baby chair and waves his delicate hands in the air.

His effort pays off .Eyes are met and communication starts .Smiles are exchanged ,presences are welcomed and Dhruv is complimented for his cuteness.

I wonder how redundant and how counter-productive , is the wordy, verbal communication in our day to day life. Our words are generally laced with anger, fear and all other negative emotions and do more harm than good.
Dhruv's squeaks, babbles and unconditioned giggles convey message far far better.

That Interaction was brief but that brief interaction with this tiny, unconditioned soul left that couple drenched in happiness that no book , no motivational speaker can instill.

Life is simple. We have complicated it. We have overburdened it.
There are things that a baby knows far better than us.
Our leaning of life comes with unlearning,overwriting of something very intrinsic,very natural to us.







Saturday, April 20, 2013

Walking on the fringe


 Three weeks back , while on my routine weekend walk , this thought struck to me.
Would that not be nice to walk on new , unknown track every time then walking on this boring , redundant track every time?
I thought to walk around on the fringe of Singapore Island. With this idea I started to walk. Every weekend I start from the finish point of last week. Reaching on my first start point after covering outer-line of entire island will be considered as 'mission accomplished'.

Today, in my third week , I have reached here in Sembawang park, located in northern part of Singapore ,facing Johore straits.Malaysia is hardly a kilometer away from here, just across the Johore straits.


First Weekend:

I started my walk from Pasir Ris MRT station and started to walk towards Punggol.
Outer part of Pasir Ris is lush green with thick cover of trees.

As I walked towards Punggol Serangoon reservoir , I witnessed more and more of nature and virgin lands.






Pat farms and farm houses on Pasir Ris Farways :





Punggol Serangoon Reservior is a fine example of Singapore's meticuluos planning and sincere efforts to use precious water resource effectively.






Water treatment unit at Punggol Serangoon reservior.




To be continued....

Friday, March 15, 2013

An early morning walk



Today , I woke up long before my usual time, 5 AM in the morning.
I flipped , I tossed,I  spread on to my bed ,to put myself into another spell of hibernation.
But then came a thought. What this world looks like at 5 AM in the morning?
It has been long time,years indeed. Early riser in me is gone.



So I decided. to walk, to walk in today's sleepy morning.
Lazy in me, contrived. Body tried to defy,  legs pretended  fatigue, head connived with phoney head-ache.
But at last,Will triumphed over the laze.




So I got up and I walked.I walked beyond this concrete. I walked beyond this mankind.
I walked into solitude. I walked very light, without any thoughts , without any burden.
I walked empty, leaving my desires , my lusts back in my bed...



And there I was, where every thing was green.
I met some of my old friends.They welcomed me with their melodious songs. 
Songs of the life all around. Song of the life,emanating from tree tops, pulsating from sleepy side-way hedges.
And I was overwhelmed.
And I walked tiptoe,as slightest disturbance would be a crime.






 And then,there I sat .Trying to absorb something,trying to demystify something.
Morning breeze blew over my face. Morning breeze blew over lawn, sweeping away dead leaves.
And there I sat , pondering and wondering.





Then came the sun,glittering over tree tops,shining over morning mist...
It rose above in the horizon . It rose high in the sky , making a gloden path.
It was extraordinary to see that light , light filling the earth, light invigorating every leaf, light shining on thousand blades of grass..
It was extraordinary...






And with the sun light, came the people. People from all walks of life.
People who were young and full of vigor, people who were old and fragile..
People who were happy  and joyous. People who were sad and angry...
People who  liked my presence and  gave me smile.
People who pretended as if I do not exist.
I knew that was the time to return.






*Memoirs from my early morning  walk in Tampines eco green park.

Friday, March 1, 2013

Am I really an individual?




Question comes to me. Am i really an individual or two individuals interwoven into a single body ?
If I go by literal meaning of term 'individual', individual is someone beyond further division,it's singular and distinct from others.No split is possible without destroying intrinsic nature of  an individual. 

So, if I want to qualify as an individual, I must be singular.
Singular in my thoughts , in my actions , in my all deeds.There is no scope for duality within an individual.
There should be no conflict within ,no self thrashing, no self criticism,no regrets.
How I react , how I talk ,how I respond , should never come under my self criticism.All my actions should be in full accord with my whole being.

But this is not the case.My learnt self or say idealistic self is in constatnt conflict with my ego self.
 


My ego is hurting me since yesterday. It's blaming me for being submissive , for being timid and for not being able to rise above situation.I am accused of being servile. The situation demanded aggression to preserve self-worth. It expected counter-aggression.

Narrative is strong. ''Sachin, you must guard peripherals of  this being with full attention.
How can peace of mind prevail when sphere of  your being is intruded and challenged by negative energies?''
It advocates use of  animal behavior to guard dignity.Handle aggression with aggression. Throttle anger with anger.
  
On the other hand, this idealistic self of me ,says to renounce aggression . Subjugation of ego is must for emancipation. Negation of ego is must to transcend beyond misries of ordinary life.
Energy must not be wasted in gurading phoney orchards of ego.
Animal within me ,must be subdued.
Idealistic is against tit-for-tat tactics and have high regards for humbleness.My behavior must not be driven by others conduct. Idealistic recommends regulation of every thought , every emotion and reactive behavior is something to be discouraged.

 Whether i am awake or asleep, these two individuals inside me , are in constant struggle.
I am battle field for these two creatures , each trying to prevail over other.



 
 

Monday, February 18, 2013

Dhruv Kapasia from Hasanpur Kalan




What? Could you repeat your question?
Oh, why am I smiling ?
Nothing .. just like that...No no , there is nothing running in my mind....
Why I need to have something in my mind to make me smile? Is it obligatory?
It's my nature ... very intrinsic nature...Whenever i am not hungry and not sleepy...I do smile.
Yes! Like that only.
 Doesn't sound logical?... I don't care if your logic says that there must be some reason behind my smile...
You be happy with your logic..





 Wait..What is this moving object in front of me?
Let me search my visual memory. Ohh yes!.. A known pattern ..
Huh..Coordinates say it must be a human being .
Mother ? No ...
Gramdma ? No.
Grandpa? No.
A new face. Ok, storing for future references...
What they calling him? Photographer uncle...hmm...Noted with thanks...

But what is this small ,funny object facing me and flashing again and again...
No matching pattern found.. New coordinates saved for future reference...





Tell you one thing..I really don't like my hair style much.... It's kinda old-fashioned,something of my Papa's generation..
What to do ? My mom knows to comb this way only.
Yes Yes! ..off course!..I'd prefer spikes, with bit of nice,macho gel...
How to tell my mom that this is old fashined and suits on Papa only..

Hmm.. but i like this trishul on my forehead.It's kinda cool and looks different..
Thanks mom !

 


 How is my cap? Cool na?
Do you feel my cloths are bit over sized,ill fitting?
How you define something as ill fitting?
For me something that keeps me safe from this shivering cold,something comfy is always cool...
No worry baba.Time to impress girls is far ahead in future :).Outfit is soft and warm..Let me enjoy it...




Okay ,enough for the day. Please close this funny flashing thing...
Time to catch up some sleep...Bye..Enjoy...


Dhruv Kapasia
Hasanpur Kalan
18th Feb 2013