शुक्रवार, 16 मई 2025

नोमैड जंगल कैफे

सोचो , इन काँच की ऊँची इमारतों से दूर,
डेडलाइनस  , टारगेटस  , फॉलोअपस  की बिसातों से दूर ,
कहीं नहर के किनारे , पीपल की एक छतरी है | 
छितरायी है बेशुमार किताबें , कुछ अखबार हैं , मेरी चाय की एक टपरी है | 

शीशे के कुछ मर्तबान हैं | 
पापे , मटठी , खस्ता बिस्कुट, कोयले की भट्टी पे चढ़े चायदान हैं | 
डामर की एकहरी ,वीरान सड़क, सड़क किनारे यूकेलिप्टीसों की क़तारें | 
एक्का दुक्का पैदल , कुछ जंगल के चौपाये  , ना बाइक ,ना मोटर कारें |
  
तुम्हारे बच्चे अब कामयाब हैं |  अमरीका, यूरोप में बसते उनके ख्वाब हैं |   
बदरंग अपार्टमेंट्स , अपार्टमेंट्स में बने मुर्गी के दड़बे , दड़बो के सीखचे तुम्हे अब भींचते हैं | 
शहर के उस पार जहाँ  सड़कें छोटी हो जाती है , जिंदिगियाँ बड़ी ,वो बचपन के दिन तुम्हे अब खींचते हैं  | 

और तुम आये हो | 
शहर से कुछ डार्क चॉकलेट के टुकड़े , रात की बची कुछ बासी खीर लाये हो | 
हम बस बैठे हैं | चाय आधी पीकर छोड़ दी है | 
 ना गिले, ना  शिकवे , न तारीफें , ना कोई जूनून | 
बस पीपल के हिलते पत्तों की पीपनी और  मौन का सुकून | 
अमराही के पीछे डूबता सूरज, नहर के पानी की तरंगो में सिंदूरी रंग |  
और वहाँ बस हम हैं, हम और हमारा बचपन |  

                                       सचिन कुमार गुर्जर 
 

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