तब तक , जब तक तीन टांगी वाले एलियंस धरती पर नहीं आ जाते और इंसानो को एक साझा दुश्मन नहीं मिल जाता |
जैसे प्रेम है , भूख है , लालच है , वैसे ही इंसान के वजूद में नफरत भी है |
आदमी का एवोलुशन एक कबीलाई प्राणी के तौर पर हुआ है | और हर एक कबीले वालो को दूसरे कबीले वाले बतौर दुश्मन लाजिमी ही चाहिए |
सो , सहूलियत के हिसाब से , कहीं हिन्दू मुस्लिम के नाम पे, कही अरब यहूद के नाम पे , अमीर गरीब के नाम पे , काले गोर के नाम पे , कम्युनिस्ट कैपिटलिस्ट के नाम पे , इंसान लड़ते ही रहेंगे |
लड़ते रहना ही इंसान के वजूद को पूरा करता है |