गुरुवार, 9 जनवरी 2025

अंग्रेजी

मित्रों, जिन्दगी मे तीर मारे हो या ना मारे हो, इंग्लिश मीडियम स्कूल मे पढ़ने की वजह से अपना बचपन मे रुतबा तो रहा l मुझे अच्छे से याद है जब नवोदय स्कूल से एक बार छुट्टी मे लौटकर मैंने जंगलपानी को ‘टॉयलेट्‘ कह कर सम्बोधित किया था l पिता जी ने सही से समझने क़े लिये दोबारा कहलवाया l शाम को बैठक मे उन्होंने हुक्के की चौकड़ी क़े बीच ऐलान किया कि जिस बालक ने अंग्रेजी पकड़ लीं,. समझ लो उसका जीवन सुधऱ गया l पिता जी क़ी बात मैने गांठ बाँध लीं l मैंने हमेशा अंग्रेजी ही पकड़ी l कच्ची को हाथ नहीं लगाया l
सचिन कुमार गुर्जर, सिंगापुर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

टिप्पणी करें -

ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं

 "ये ऊंचे औहदों पर बैठे लोग इतने क्रूर क्यों होते हैं? इसलिए... क्योंकि तरक्की की सीढ़ी के पायदान लकड़ी के नहीं होते, ज़िंदा आदमियों के...