मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

सेरेंडीपिटी

नाम 'गेन किम लिन' था वैसे उसका , पर मेरी सहूलियत के लिए उसने बताया कि मैं उसे केटी पुकार सकता था |  छोटे कद की , औसत से सुन्दर मंगोल नैन नक्श थी केटी | तीस साल की रही होगी | हो ची मिन्ह सिटी में एक रविवार की सुबह को मिले थे हम | एक बुक फेयर में | वियतनाम में लोकल लोगो का अंग्रेजी में हाथ काफी टाइट है | पिछले दो दिन से मैं गूगल ट्रांसलेटर के सहारे काम चला रहा था | ऐसे में धाराप्रवाह अंरेजी बोलती लड़की का मिल जाना जिसका लिटरेचर टेस्ट भी मेरे जैसा ही था , सोने पे सुहागा वाली बात थी | 

बिलिंग काउंटर से बाहर आते हुए मैंने उससे पूछा कि क्या वहाँ आसपास कोई अच्छा कॉफ़ी हाउस है | "मिस्टर, आप कॉफ़ी हाउसेस के शहर में है | वेलकम टू हो ची मिन्ह सिटी |" उसका जबाब था | और फिर हम घंटा भर एक कॉफ़ी हाउस में जमे रहे | हमारी कुछ ऐसी जमी कि जब वह  गयी तो अगली शाम मेरे से मिलने का वादा करके गयी |  

सैगोन नदी के ऊपर बने कैंटीलीवर ब्रिज के उस पार आसमान में चाँद उभर आया था | सैगोन नदी में एक्का दुक्का मोटर बोट धीमी रफ़्तार से बह रही थी | कॉफ़ी हॉउस के बाहर बैठे हम दूर तक रिवर फ्रंट को देख सकते थे | रिवर फ्रंट के आखिरी सिरे पर वियतनाम के महानायक हो ची मिन्ह का स्टेचू दूधिया रोशनी में नहाया हुआ था |पुरबा बह रही थी | 

केटी ने कॉफ़ी मग किनारे रखते हुए मुझसे पूछा " तुम्हे क्या लगता है , हमारा मिलना एक  कोइंसिडेन्स भर है ?"

"तुम्हे क्या लगता है ? " मैंने कहा | 

"देयर इस नथिंग लाइक कोइंसिडेन्स "

"मै उन सारे इवेंट्स का खाका खींच सकती हूँ , जिनके चलते तुम मुझे कल  बुक फेयर में मिले | " 

"मेरा इंग्लिश टीचर होना, हमारा किताबो में रूचि लेना  , मेरा तलाकशुदा अकेले होना , सिंगापूर का हो ची मिन से नज़दीक होना , तुम्हारा कम्युनिज्म में दिलचस्पी लेना , दोनों का कॉफ़ी का दीवाना होना , इतिहास , आर्किटेक्चर में हमारा इंटरेस्ट .....   "

"अहह , इनमे से कुछ भी इधर से उधर हुआ होता तो हम आज यहाँ साथ न बैठे होते | "

सामने वाले की हर बात से सहमत हो जाना भी एक कला है जिसे मैंने सालों की हुज्जतों , बहसों , झगड़ो के बाद सीखा है | 

"हम्म , तो क्या हम इसे सेरेंडीपीटी कह सकते है केटी | मतलब एक तरह का अचानक से जिंदगी कुछ बहुत अच्छा हो जाना | कोई अच्छा सा मिल जाना | " मैंने कहा और जबाब में वह  मुस्कुराई भर | 

मैं चुप ही रहा ,बस अपना दायाँ हाथ उसके बाये हाथ पर रख दिया | केटी ने कोई विरोध नहीं किया और वह शाम  हमने ख़ुशी में गुजारी | 

रविवार, 16 फ़रवरी 2025

लास्ट एटेम्पट

एक वो पालतू कुत्ता होता है न , जो मालिक के हाथ में जंजीर होने तक पूरी दुनिया पर भौकता है और जंजीर खोल देने पर दुम  दबा के  घर में घुस जाता है , कुछ वैसे ही हालत हो गयी थी मेरी , जब माँ ने कहाँ " तुझे गोबर कूड़ा ,खेत क्यारी करने वाली ना  चाहिए ,तो जा देख लूंगी मैं बिरादरी कू , तू  लाके दिखा मुझे किसी भी जात की  कोई सेहरी मैडम !""इतना जरूर करिये कि सुन्दर इत्ती होय , कि कोई कुछ बोले कि तेरे जाये ने बिरादरी से बाहर रिश्ता कैसे कर कर लिया तो मैं सेरदिल होके मुँहनोंच लूँ उसका !"  


मैं उन दिनों 'ऑय बी ऍम'  गुडगाँव में चाकरी करता था | ऑफिस की लिफ्ट लॉबी में देखा था मैंने उसे पहली बार | आँचल नाम था उसका | साँवले रंग की साढ़े पांच फुट की लड़की थी | शरीर इतना भरा पूरा था कि कहीं भी हाथ मारो तो किलो ढेड़ किलो गोश्त हाथ में आये |' सुशील, शर्मीली |  बच्चों के चेहरे पे जो मासूमियत होती है न ऐसी मासूम |"

एक दिन हम एलीवेटर में अकेले थे ,सो मैंने मौका भाप उससे कहा " ये जो तुम्हारे आशीष त्यागी सर है न , ये स्कूल में मेरी कॉपी से टीप मारा करते थे !"

"व्हाट !!" वो सकपका गयी | चेहरा लाल हो गया उसका | 

मैंने कहा " जोक्स अपार्ट , हम क्लास फेलो रहे हैं | "

और अगली शाम वो मेरे साथ चाय पर आ गयी | 

हमने एक दूसरे के परिवारों को जाना | उसने पूछा कि आपकी हॉबी क्या है तो मैंने कहा " टॉकिंग टू फ्रेंड्स एंड रीडिंग न्यूसपेपर !!!"

यहाँ तक सब कुछ रटा रटाया ही था | अचानक उसने पैतरा बदला, चाय का कप किनारे किया और बोली " तुम शादी के बाद भी गांव में ही रहना पसंद करोगे या शहर में ?"

मेरा प्रारब्ध जोर मार रहा था , मैं इमोशनल हो बोला " गाँव छोड़ने का सवाल ही नहीं | कुछ पैसे हो जाए तो मैं गाँव से अलग मचान बनाकर रहना चाहूंगा |  "

"मचान , यू मीन ट्री हाउस ?" वो एकटक मुझे देखती रही | उस पल में उसने मेरी आखों के रास्ते जाकर मेरी आत्मा को पढ़ लिया था | 

मैं भी भांप गया था सो मैंने डैमेज कण्ट्रोल को कहा " सॉरी , मैं थोड़ा गावड़ू किस्म का हूँ !"

"व्हाट इस गावड़ू ! " 

"मेरा मतलब है , गाँव देहात से जुड़ा आदमी "

 "ओह , कूल " उसने ठन्डे लहजे में कहा |  उसके व्यवहार में आये ठण्डेपन को मै भाप चुका  था | 

जब वो वापस वर्क फ्लोर जा रही थी तो मैंने उसे रोका " सुनो , आशीष सर से कुछ मत कहना , मैंने मज़ाक में कहा था , उन्होंने कभी मेरी कॉपी से नहीं टीपा !"

उसने फेक प्लास्टिक स्माइल दी , मुझे एक बार फिर से नीचे से ऊपर तक निहारा और बोली " इस बात को अगर तुम  ना भी कहते , तब भी मैं समझ ही गयी थी !"

और उस रात मैंने माँ से फ़ोन पर कहीं  से भी बिहा करा देनी की रजामंदी दे दी |   


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2025

प्यार का फाख्ता

 

रुतबा ऐसा था उसका कि जब वो गर्ल्स हॉस्टल से 'इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन ' डिपार्टमेंट में अपने क्लास रूम के लिए चलती तो चार पाँच सिपाही लड़कियों की टुकड़ी हमेशा चलती उसके साथ | कैंपस के बॉयज हॉस्टल के उसकी क्लास के दो तीन अर्बन , स्मार्ट, लड़कियों की तरह मुलायम लड़के उसके 'अनटूराज' से जुड़ते और फिर ये काफिला हमारे हॉस्टल के सामने से गुजरता |  


हमारे हॉस्टल के बगल में एक छोटे  से टीले पर चाय की एक टपरी हुआ करती थी , जिसके बाहर सीमेंट की एक कामचलाऊ पटरी बनी थी | ठीक वहाँ मैं एक हाथ में चाय का गिलास, दूसरे में मटरी का चूहे-कुतरा टुकड़ा लिए बैठा होता |   

सीना जरूर सपाट था उसका ,पर नैन नक्श इस कदर रौबीले थे कि पटरी पर बैठे , खुद को अल्फा मेल नापते लड़के सड़क के कोने आ खड़े होते | कुछ ऐसे जैसे सड़क के किनारे फड़ पर लगे सस्ते कपडे , के छाँट लो जो अच्छा लगे |  सफ़ेद झक रंग था उसका , इंदिरा गांधी कट बाल रखती थी | बटुए जैसा छोटा मुँह  | हंसती तो अनारदाने से छोटे दांतो की लड़ी दिखती | नाक रोमन , ऐसी जैसी कॉकेशियन लड़कियों की होती है | और मैं इस कदर जानता था उसे  कि उसकी बालिश भर लम्बी गर्दन से होती हुए गालों पे   खत्म होती धमनियों को ऊँगली पे गिन सकता था | 

कायर का मन फैंटसी में बसता है | ये उसका एक तरह से सच्चाई से एस्केप करने का तरीका होता है | मैं सोचता कि काश ऐसा हो कि इस साल मैं कंप्यूटर डिपार्टमेंट का टॉपर हो जाऊँ , फिर आसान हो जायेगा | या ऐसा हो कि कॉलेज के एनुअल फंक्शन 'गूँज ' में मैं कुछ ऐसा गा दूँ कि वो मेरी फैन हो जाये | कुछ इस तरह बसर हो रही थी अपनी जिंदगी उन दिनों | 

फिर एक बार ऐसा हुआ कि पता लगा कि किसी कल्चरल फेस्ट  की तैयारी के लिए सभी ब्रांच के लड़के लड़कियाँ  लंच के बाद किसी क्लास रूम में जमा होते हैं  | मैं रुक पाता भला ? काश मैं रुक गया होता !

उस दिन क्लास रूम में बमुश्किल बारह पंद्रह लड़के लड़कियाँ जमा थे | कुछ कुर्ता पायजामा छाप  , कम्युनिस्ट से दिखने वाले लड़के बोर्ड के नीचे स्किड की प्रैक्टिस कर रहे थे | वह तीन बेंच छोड़ चौथी बैंच के कोने में बैठी थी | अकेले | 

मैं तीन बैंच औऱ भी पीछे जा इस कोण के साथ बैठा कि जहाँ से वो तो मुझे पूरी दिखे पर मैं उसकी दृष्टि में न आऊं | दोपहर के भोजन के बाद सब उबासे थे | 

अचानक ,उसने जोर की जम्भाई ली | फिर अपने दाएं हाथ की तर्जनी को नाक के बाएं नथुने में वहाँ तक घुसेड़ा , जहाँ तक ऊँगली जा सकती थी | फिर घुमाती गई , घुमाती ही गयी | क्लॉक वाइज , एंटी क्लॉक वाइज !क्लॉक वाइज , एंटी क्लॉक वाइज !

जब तर्जनी बाहर आई तो उसके सिरे पर एक मोटा चूहा विराजमान था | उसने उस चूहे को हिकारत से देखा | फिर तर्जनी और अंगुष्ट के बीच कुछ ऐसे भाव से दबा दिया जैसे उसे बड़े गुनाह की सजा देती हो | 

क्लॉक वाइज , एंटी क्लॉक वाइज ! क्लॉक वाइज , एंटी क्लॉक वाइज ! उसकीऊँगली व् अंगूठा  उस चूहे को दलते  ही गये   , दलते ही गए  | और तब तक दलते गए , जब तक उस बेचारे ने ठोस , मटमैली गेंद का आकार ना ले लिया | 

इस क्रिया के बाद उसने सरसरी निगाह से चूहे का मुआयना किया | फिर बड़ी फुर्ती से उसे घुमा तर्जनी के नाखून पर ले आयी | अँगुली पर अंगूठे की कमान चढ़ाई और धड़ाककक  ! क्लास रूम की रंग छोड़ती दीवार पर चूहा कुछ देर जमा रहा | फिर धीमे से धरती के गुरुत्वाकर्षण के चलते फर्श पर लुढ़क गया | 

और उस लम्हे में , ठीक उस लम्हे में मेरे प्यार का फाख्ता उड़ गया ! और ऐसा उड़ा गया ,कि कभी वापस नहीं  लौटा | 

                                                             सचिन कुमार गुर्जर   

                                                              सिंगापुर द्वीप 

                                                               

शनिवार, 18 जनवरी 2025

इमोशनल फूल

 बात नाश्ते में मिलने वाले कीड़े वाले दलिए से ज्यादा ब्रदरहुड की थी | बिगुल था कि हड़ताल होगी ! किसी ने कहा कि रुद्रपुर में विद्रोह हुआ , सफल रहा | किसी ने कहा कि वादा रहा ,चिंगारी में छप के रहेगा | किसी ने कहा कि कलट्टर से जान पहचान है , स्कूल प्रशासन की चूलें हिलेंगी | देखना | 

वे जो दिखा रहे थे , छपा रहे थे , चूलें हिला रहे थे , वे  ही किरतपुर की हडताल के अगुवाई थे | 

पी टी सर ने एक एक को तोड़ने के लिए अलग अलग में काउंसलिंग की |  "कितनी जमीन है ? " मेरे से कहा | 

"एकड़ भर" मैंने कहा | 

"गैय्या चराओगे जीवन भर।सोच लो | "

"सोच लिया सर !" मेरी  टाँगे और आवाज़ दोनों में कम्पन था | चेहरा लाल था | साँस धोकनी सी चलती थी | 

डॉर्मेटोरी में हमने एक एक दूसरे के हाथ थामे | जो पहले नौकरी लगा वो दूसरो को आश्रय देगा ,ऐसे वादे हुए | और हम सामान उठा गेट से बाहर आ गए | दर्जन भर ही होंगे | 

और फिर हमने देखा | बड़े गेट के झरोखो से देखा| देखा कि जो अगुवाई थे वे नल के आगे कतार लगा अभी तक अपनी चार खानो वाली प्लेट से नाश्ते की कुतरने खोद कर खा रहे थे | 

उस दिन , ठीक उस दिन हमने जाना कि गेट के उस पार वाले लोग बहुत आगे जायेंगे | और वे गए | हमारा गर्व हैं | 

और हम ? हम आज भी किसी रैंडम सी इमोशनल रील पर टेसू बहा देते है !  आज प्रौढ़ावस्था में भी सोचते हैं कि उस दौर में  इंट्रोवर्ट न होते और किसी से कुछ कह दिए होते तो क्या वो मान गयी होती !


गुरुवार, 9 जनवरी 2025

अंग्रेजी

मित्रों, जिन्दगी मे तीर मारे हो या ना मारे हो, इंग्लिश मीडियम स्कूल मे पढ़ने की वजह से अपना बचपन मे रुतबा तो रहा l मुझे अच्छे से याद है जब नवोदय स्कूल से एक बार छुट्टी मे लौटकर मैंने जंगलपानी को ‘टॉयलेट्‘ कह कर सम्बोधित किया था l पिता जी ने सही से समझने क़े लिये दोबारा कहलवाया l शाम को बैठक मे उन्होंने हुक्के की चौकड़ी क़े बीच ऐलान किया कि जिस बालक ने अंग्रेजी पकड़ लीं,. समझ लो उसका जीवन सुधऱ गया l पिता जी क़ी बात मैने गांठ बाँध लीं l मैंने हमेशा अंग्रेजी ही पकड़ी l कच्ची को हाथ नहीं लगाया l
सचिन कुमार गुर्जर, सिंगापुर

शनिवार, 19 अक्टूबर 2024

अच्छा और हम्म


" सुनते हो , गाँव के घर में मार्बल पत्थर लगवाया जा रहा है , पता भी है तुम्हे ? " स्त्री के स्वर में रोष था | 

"अच्छा " पुरुष ने इतना भर कहा बस |  और ये 'अच्छा ' पत्थर लगाए जाने की क्रिया का स्वागत भाव न था | बनिस्बत इसके ये  इस बात की तसदीक था कि वह बेचारा अनभिज्ञ था | 

"मैं  पूछती हूँ कि भला क्या जरूरत है इस बर्बादी की | माँ बाबा के बाद वहाँ कौन रहेगा | " स्त्री का स्वर तीव्र से मध्यम की ओर चला गया था | उसके रोष में अब दर्द था | बिलाबजह , फिजूल की बर्बादी का दर्द | 

"हम्म " कुरेशिये की बुनाई के मेजपोश पर चाय का कप वापस रखते हुए पुरुष ने हामी भरी | 

"तुम्हे क्या लगता है , माँ बाबा के पास पैसा नहीं है | लाख दो लाख से कम लगेंगे क्या | देखते रहियो , सब का सब छोटे को जायेगा ! " 

"हम्म्म्म " पुरुष का जबाब पहले जैसा ही था , बस पहले से थोड़ा लम्बा | 

आप सोचेंगे , कि शायद पुरुष का कलेजा चूजे का है | स्त्री के तर्क की काट हो सकती थी | 

माँ बाप बूढ़े है तो क्या हुआ | जब अगड़ पड़ोस के सब घरों के आँगन में पत्थर लग गया है वे  भला कच्चे आँगन में क्यों रहे | फिर वे ये सब अपनी फसल की कमाई से ही तो कर रहे , हमे क्या हर्ज़ ? 

सब उनका ही तो है | और फिर उनके बाद गांव के मकान का मालिकाना हक़ में हम भी तो हिस्सेदार होंगे | 


लेकिन वजुआत दूसरी भी हो सकती हैं | हो सकता है इस तर्क वितर्क के खेल को पुरुष ने कई मर्तबा खेला हो और अब मन उकता गया हो | ये एक ऐसा खेल है जिसमे जीत हो ही नहीं सकती  | चीन के प्रसिद्ध मिलिट्री स्ट्रैटिजिस्ट 'सुन ज़ू' ने अपनी किताब 'आर्ट ऑफ़ वॉर ' में लिखा है , जिस युद्ध को आप जीत नहीं सकते , उसमे उतरिये ही मत |  

पुरुष के हाथ में 'हम्म ' और 'अच्छा ' ऐसी दो ढाल है जिससे वह युद्ध से बिना लड़े समूचा बच निकलता है | 


आप कितने गाँव खेड़ो से गुजरते हैं | जहाँ अब पक्के रंग रोगन किये हुए , ऊँचे चबूतरों के मकान पाते हैं | चबूतरे जिन पर संगमरमर के  पत्थर बिछे होते है  | दो चार कुर्सियां रखी होती हैं, कुछ गमले लगे होते हैं  | ये ऊँचे सजीले  चबूतरे इस बात का उद्धघोष होते हैं  कि परिवार अच्छा कर रहा है | 

इन ऊँचे चबूतरों के शहरी मॉडल पर बने मकानों के बीच में आप कोई जर्जर पुरानी हवेली पा जाएं , जिस पर सालों से पुताई न हुई हो , जिस के कंगूरों पर पीपल उग आये हों , जिसका आँगन कच्चा हो , तो आंगन में बैठे बूढ़े बूढी की  गरीबी पर तरस जाँच पड़ताल के बाद ही खाइयेगा | 

बहुत मुमकिन है उस घर का बेटा गाँव का सबसे होनहार लड़का हो | सबसे धनाढ्य भी | लड़का जो दुबई में प्रोजेक्ट मैनेजर हो और जिसके मुंबई और पुणे में दो दो फ्लैट हों |  लड़का जिसने इंजिनीयरिंग , मैनेजमेंट के गूंठ  तो सीखे हों पर 'हम्म' और 'अच्छा ' कह बच निकलने की कला से अनभिज्ञ हो | 


                                                                                         सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                                         सिंगापुर द्वीप 

                                                                                          २० अक्टूबर २०२४ 

 

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2024

सैडिस्टिक सुख


लिंडा से मेरी मित्रता बहुत लम्बी नहीं रही |वो यूँ कि हमारे परिचय के बाद बमुश्किल दो महीने भर ही तो वह सिंगापुर में रही |  चुनांचे कसीदे पढ़ने के लिए बहुत कुछ नहीं है | लेकिन कई बार थोड़े समय की मित्रता भी कुछ ऐसे लम्हे दे जाती है कि संस्मरण मात्र से आदमी मुस्कुरा उठता है | 

लिंडा वियतनामी मूल की लड़की थी | बिहेवियरल साइंस में विदेश से मास्टर डिग्री कर बेहतर करियर की आस उसे सापा की पहाड़ियों से सिंगापुर तक खींच लायी थी | साउथ पूर्व एशिया के मानक के हिसाब से लम्बे कद की लड़की थी लिंडा | चेहरा मोहरा औसत था | दुबली , सपाट वक्ष स्थल , दाग रहित पीत वर्ण | गर्दन बालिश भर लम्बी थी , जिसमें हमेशा एक महीन तार का सिल्वर पेन्डेन्ट लटका रहता था |  कार्गो पैंट , लूस टीशर्ट , ट्रैकिंग शूज, विंटेज स्टाइल गोल्डन घड़ी  ,अमूमन यही परिधान होता था उसका |  

उसे फिक्शन पढ़ने का शौक न होता तो शायद हमारी मुलाक़ात ही न हुई होती | सिंगापुर सिटी की  बुगिस सेंट्रल लाइब्रेरी के रीडिंग लॉउन्ज में जब मैंने उसे पहली बार देखा तो  उसके हाथ हरुकी मुराकामी की 'नॉर्वेजियन वुड' थी | मुराकामी के बारे में मैंने काफी सुना था लेकिन इस जापानी लेखक का कुछ भी पढ़ा नहीं था |  मैंने उससे पूछा कि क्या इस लेखक की कोई और रचना भी लाइब्रेरी में मौजूद है?

मैं लाइब्रेरी के फिक्शन सेक्शन का चक्कर लगाकर वापस आकर बैठा तो हमारी बातचीत चल निकली | फिर हम घंटा भर रूस   ,फ्रांस  से लेकर जापान तक के फिक्शन , नॉन-फिक्शन पर गपियाते रहे | लाइब्रेरी गप्पें हांकने के लिए माकूल जगह नहीं होती  सो उसके बाद हम जब भी मिले , पास के स्टारबक्स कॉफ़ी हाउस में बैठने लगे | कुछ लोग होते हैं ना, जो तुम्हारी हर छोटी बड़ी बात में ऐसे दिलचस्पी लेते है कि यूँ लगने लगता है कि तुम कुछ तो हो | बस कुछ ऐसे ही एहसास से तरबतर कर दिया था लिंडा ने मुझे | 

हम परत दर परत गहरी दोस्ती में उतरते जा ही रहे थे , कि तभी उसके वापस वियतनाम लौट जाने का समय आ गया | 


मुझे याद है , उस रविवार लिंडा ने भारतीय परिधान पहना था | पीले कलर का लखनवी करी वर्क का सूट ,सफ़ेद रंग की पेंट , लाइट ग्रे हाई हील शूज | हफ्ते भर में वापस लौट रही थी, सो भारतीय परिधान में सजकर, अलविदा को थोड़ा खुशनुमा बनाने का विचार उसके जेहन में रहा होगा |  

और क्या ही लग रही थी | भारतीय परिधान इन मंगोल कुल की लड़कियों पर क्या खूब फबते हैं | सुतवा शरीर और गोरा रंग इन्हें  विरासत में मिला होता है | ग़ज़ब का कॉकटेल बन पड़ता है !

 मेट्रो ट्रेन स्टेशन के एस्केलेटर वह अचानक पीछे मुड़ी , ऊँगली से अपनी ड्रेस की ओर इशारा किया और बस इतना बोली "सो हाओ ?"  जबाब में मैंने दायाँ हाथ अपने सीने पर हाथ रख दिया और देर तक आँखें झपकाता रहा | ट्रेन में चढ़ते हुए हम बेहद खुश थे | 

मैं एक अदृश्य आदमी रहा हूँ | 'मिस्टर इंडिया' फिल्म के नायक जैसा अदृश्य नहीं ! मेरा मतलब  हील-डोल, रूप-रंग , चाल-ढाल  , इन सब मानकों के लिहाज से इस कदर मामूली कि अमूमन गली कूँचे से गुजरते हुए मैं लोगों के विसुअल फील्ड में हाज़री ही दर्ज नहीं करा पाता | गैरदिलचस्प वस्तुओं को नज़रअंदाज करने की प्रवर्ति इंसान की लाखों साल में विकसित हुई चेतना का हिस्सा है | यह  प्रवर्ति उसे उसके लिए महत्वपूर्ण चीज़ों पर ही फोकस करने के लिए ऊर्जा संचय में मदद करती है |   

लेकिन उस रविवार को ट्रेन  में लोगों ने मुझे देखा ! मैं और लिंडा बंद दिशा वाले दरवाजे से सटे खड़े थे | सामने की सीट पर बुजुर्ग चीनी मूल की महिला ने मुझे देर तक नापा | फिर लिंडा को निहारती रही | तिरस्कार के गहरे भाव थे उस महिला के चेहरे पर |  मंगोल जीन पूल की लड़की का एक अधेड़ भारतीय पुरुष के साथ होना उसे कुकृत्य जैसा लगा हो  शायद |  लिंडा किसी कॉकेशियन नस्ल के पुरुष के साथ होती तो स्थिति ज्यादा स्वीकार्य होती ! नस्लीय श्रेष्ठता की अघोषित सूचि में भारतीय पुरुष कॉकेशियन और मंगोल कुल से नीचे माने जाते हैं ! भारतीय पुरुष की इमेज एक कामगार की ही है | समय के साथ स्वीकार्यता बढ़ी है, लेकिन पुरानी पीढ़ी के लोगों के दिमाग में वह लोच नहीं बचती कि वे ये सब श्रेष्ठ-हीन मिश्रण को स्वीकार करें ! 

उस दिन भारतीय मूल के पुरुषों की अचानक मुझ में बढ़ी दिलचस्पी काबिले गौर थी |  वो यूँ , कि भारतीय पुरुष एक दूसरे को देखते ही कहाँ हैं | पार्क के फुटपाथ पर आमने सामने आ जाएँ तो एक आसमान को ताकेगा , दूसरा आसपास के सारे पेड़ पौधों की गिनती कर डालेगा |  उनकी थोड़ी बहुत 'हाउ डू यू डू ' दूसरी नस्ल के लोगों को देख कर ही निकलती है !  पर उस दिन उनमें से कई अपनी पत्नियों से नज़रें चुरा मुझे देख रहे थे | 

लिंडा पर या तो  विदा लेने का इमोशन हावी था या फिर अचानक से यात्रियों की बढ़ी दिलचस्पी को उसने भी भाँप लिया था |  वह बड़ी ही नज़ाकत से पूरे सफर मेरे साथ खड़ी रही | कुछ यूँ करके , कि जैसे हमारे अकेले में एक दूसरे से साथ जीने मरने के वादे हुए हैं !  

लेकिन मुझे सबसे ज्यादा भौंचक्का किया भारतीय स्त्रियों के व्यवहार ने | निगाह भर कर आदमी को देखने की उनकी तरबियत नहीं रही होती | लेकिन मैंने पाया कि उनमें से कई मुझे रह रहकर निहारे ही जा रही थीं | कुछ जो डिब्बे के स्पोर्ट हैंडल पकडे खड़ी थीं , वे बड़ी बेचैनी से पैर बदल रहीं थीं  | अजी सिर से पैर तक मुझे दर्जनों बार नापा गया | मैं क्या बोल रहा था,  ये सुनने को कान लगाए गए | न जाने कितनी मुस्कुराहटें यूँ ही मुफ्त में मुझे नजर कर दीं गयीं  | 

मैं तो जैसे खुमार में था | नयी नयी क्षणिक मशहूरियत का अहसास मुझे शराब सा चढ़ने लगा था | माहौल को थोड़ा अधिक  दिलचस्प बनाने की नीयत से मैं बार बार लिंडा के कान के पास जाता और कोई बेफिज़ूल सी बात कहता | 

जैसे "देखो न , मौसम कितना अच्छा है | "

"तुम्हे क्या लगता है लिंडा , क्या आज बारिश होगी ?"

"तुमने अभी तक एंटोन चेखोव को क्यों नहीं पढ़ा है ?" वैगरह वैगरह | 

मैं सोच रहा था कि जब मैं अपनी जवानी के गुलाबी सालों में था , तब क्यों कर मेरी नस्ल की स्त्रियों की मुझ में कोई दिलचस्पी नहीं रही |अब मैं उम्र के ढलान पर हूँ | क्या मैं समय के साथ बेहतर हुआ हूँ किसी पुरानी शराब की तरह ? कुछ ऐसे ख्याल मेरे मानस में कौंध रहे थे | 

फिर यकायक मुझे इल्म हुआ | और कुछ इस फुर्ती से हुआ कि ऐसे लगा कि मानों आसमान से बिजली आन गिरी हो !

ओह माय गॉड ! | मैं किस हद तक उन भारतीय महिलाओं के पतियों जैसा दिख रहा था | कमर छोड़ता पेट , कपटियों से ऊपर जाती हेयर लाइन | मसल लॉस से थुलथुल होती जातीं भुजाएं | किश्तों  के बोझ से ढले कंधे | निस्तेज चेहरा | टेलर-मेड पैंट , सिल्वर बैंड विंटेज स्टाइल घडी |  हर पोशाक के साथ पहने जाने वाले डल ग्रे चमड़े के जूते, गोल्डन फ्रेम नज़र का चश्मा |   

उफ्फ्फ्फ़ , तो मेरा कमउम्र लिंडा के साथ होना एक नुमाइश था | एक अधेड़ मिडिल क्लास भारतीय मर्द के लिए संभावनाओं का प्रदर्शन |  एक डेमो ! 

भारतीय पुरुष को उसकी नैतिक , सामाजिक और पारिवारिक  जिम्मेदारियाँ जकड़े रहतीं हैं | भारतीय पुरुष इन जिम्मेदारियों से भाग बेहयाई कर बाहर की गैर पारम्परिक संभावनाओं का दोहन करने का सोचे तो ? ये पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे सामाजिक ढांचे पर प्रहार न होगा ? भारतीय स्त्रियोँ की मुझ में जिज्ञासा के मूल में ये खौफ ही था शायद ! जनाब , स्त्री का चेतन संभावनाओं के अंतिम सिरे तक सोचता है | उन्होंने उन परिस्थितियों में मेरी जगह अपने पतियों को रखकर भी सोचा हो तो अचरज नहीं !

और उनके इस खौफ का जैसे ही मुझे एहसास हुआ , मेरे होंठ धनुष की प्रत्यंचा की तरह चौड़ी मुस्कान में खिल उठे | यह एक सैडिस्टिक सुख था ! मैं उन तमाम जिम्मेदारियों , जड़ताओं , निषेधों पर मुस्कुरा रहा था जिन्होंने मेरे अल्हड़पन, मेरे छबीलेपन को मार डाला था | मैं समाज , उसमे एक दूसरे को रोंधते , नैतिकता का पाठ पढ़ाते पुरुष व् स्त्रियों पर मुस्कुरा रहा था |     

मेरी लिंडा से वह आखिरी मुलाकात थी | हमने एक दूसरे के संपर्क में रहने ,अच्छी किताबों के सुझाव देते रहने के वादे किये | उसने मुझे कभी वियतनाम आने का अनुरोध किया | 

 लाइब्रेरी से वापस लौट उस दिन मैं देर तक मुस्कुराता रहा | रात को सोने तक मुस्कुरता ही रहा | 


                                                                                                      -सचिन कुमार गुर्जर 

                                                                                                         सिंगापुर द्वीप  

                                                                                                        ५ अक्टूबर २०२४ 

                                                                                                                                                                                    


सेरेंडीपिटी

नाम 'गेन किम लिन' था वैसे उसका , पर मेरी सहूलियत के लिए उसने बताया कि मैं उसे केटी पुकार सकता था |  छोटे कद की , औसत से सुन्दर मंगोल...