रविवार, 1 अगस्त 2010
ये झुंझलाहट क्यों है
१ अगस्त २०१० ,रविवार की सुबह .. खिड़की के बाहर बारहमासा सावन की मल्हारे है , मौसम ठंडक लिए हुए है..
सोने के लिए हर तरह से अनुकूल वातावरण ...पर मैंने अभी १०-१२ घंटे का लम्बा निंद्रा सत्र अनवरत पूर्ण किया है|
महीनो बाद आज फिर मन विचलित है |जीवन दिशा ,स्वप्रगति से नाखुश कई सवाल मन में उठ खड़े हुए है |
आज आत्म साक्षात्कार का दिन है..
ये भटकाव क्यों है | क्यों कर तार्किक ,सभेद ,उपलब्ध्य सपने मुझ में नवचेतना फूकने में असमर्थ है |
सपने ..सपना अपना आलीशान घर होने का ,सपना अपनी महंगी गाडी का , सपना मोटी आमदनी और ऊँचे ओहोदे का,
सपना भौतिक और वस्तुजनक ऐशो आराम का..
क्यों कर ,मैं इन आम और तार्किक सपनो से अपना जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता | क्यों कर , इन सपनो में जान नहीं ,जुड़ाव नहीं ..
क्यों कर , ना चाहते हुए भी ये प्राण उस पथ पर चलने को विवश है ,जहाँ सब कुछ पहले से तय है |नियम ,शर्तो से बंधा है .जहाँ सब झूठन है |
अगलों के पैरों तले रुंदी जमीन पे विचरण की विवशता क्यों है |
धक्का मुक्की ,धकेलम धकाल,आगे बढ़ने की पुरजोर कोशिश के बाबजूद ,क्यों कर ये प्राण कभी ना ख़तम होने वाली भीड़ का हिस्सा है |
क्यों कर गुमनामी की रात का अंत नज़र नहीं आता
क्या मजबूरी है ,जो सब कुछ जानते हुए भी बने बनाये पुराने रास्तो पे चलने को मजबूर करती है|
क्या मजबूरी है , जो स्वछंद ,निडर उड़ान पंछी के पंख बांधे हुए है|
क्या मजबूरी है , जो हर इंकलाबी स्वर का शमन करने को मजबूर करती है |
ये झुंझलाहट क्यों है |
अमराही में विचरण की जगह, तपते कोलतार, सीमेंट की सडको पे पैरों में छाले लिए चलने की विवशता क्यों है|
नीम ,पीपल की छाया में आराम की जगह , कृतिम वातानुकूलित बंद कमरों में सिमटने की विवशता क्यों है |
कुए बाबड़ी का पानी जहरीला क्यों है , बोतल बंद संवर्धित पानी से प्यास बुझाने की विवशता क्यों है |
सवालों की फेरिश्त लम्बी है , पर जबाब शुन्य में ताकने के आलावा कुछ भी तो नहीं|
पर दूर दिल के किसी कोने में ,एक आशा किरण टिमटिमा रही है | सवाल कठिन है ,पर निरातुरित तो कतई नहीं..
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