गुरुवार, 27 अगस्त 2026

कभी कभी

 कभी कभी 

ऐसा किया कीजिये कि हो जाया कीजिये गायब उन जगहों से जहाँ तुम्हारी मौजूदगी को गैर जरूरी समझा जाता हो | 

लोगो को थोड़ा चखने दीजिये, अपनी गैर मौजूदगी | 


कभी कभी बिना किसी प्लान के उठाया कीजिये झोला, डाला कीजिये कोई किताब और जा बैठिये, कहीं भी | 

किसी पार्क में , कही  बहते पानी  के किनारे | 

देखिये कि कैसे कुदरत में कितनी ही गैर जरूरी चीजे है! 

गिलहरी पेड़ पर चढ़ उतर रही है , खामखा | 

चीटियाँ कतारों में भागी जा रही है | बिलाबजह | जैसे जंग पे जाती हों | 

छोटे छोटे बीटल्स फ़ालतू का कूड़ा कचरा धकेले ले जा रहे है | अपने बिलों में | 

एहसास कीजिये 

कि कैसे इन तमाम गैरजरूरी चीजों के जक्सटापोसिशन से ही दुनिया खूबसूरत बन पड़ी है | 

सिंक होने दीजिये इस थॉट को कि कुदरत में कुछ भी ऐसा नहीं है, जो फ़ालतू है |  

और फिर जाने दीजिये उन लोगों को जिन्हे लगता है कि तुम किसी काम के नहीं हो | 


घर की चारदीवारी

क्यों गिनी जाती हैं सारी बंदिशे औरतो के नाम 

और सारी आजादियाँ मर्दो के नाम 

क्यों माना जाता है घर की चारदीवारी को उम्रकैद 

जबकि मैं अपने आस  पास न जाने कितने ही ऐसे मर्दों को देखता हूँ जो खर्च हो रहे है 

घर से बाहर ही , इस जतन में  कि जुट जाए इतना भर कि जवानी में न सही बुढ़ापे में ही मयस्सर हो जाए घर की चारदीवारी | 

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

सब नसीबों की बात है

सुनो , कभी  कोसना मत किस्मत को , कि कब  तक पापड़ बिलबायेगी | 

कब तक आजमाएगी | 

क्योकि इसी आजमाईश के बीच, इन्ही तनहा सफ़रों में कई बार किस्मत तुम्हारे सामने ऐसे शानदार नज़ारे खोलेगी कि देखने वाले कहेंगे कि सब नसीबों की बात है | 


गुरुवार, 20 अगस्त 2026

ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?

जानते हो ये विलायती शहर इतने सुन्दर क्यों होते है ?

क्योकि ये जवानियों पर फलते फूलते हैं | 

इन नौकाओं में आती जवानियों पर | 

जवानियाँ जो आती है दूरदराज के गाँवों से | 

मेरे इलाके के गाँव से | 

फिर वे सींचती है इन शहरों को , भरती हैं इनकी रगो में अपना खून | 

और जब ये शहर उन जवानियों को निचोड़ चुके होते है , तब उनके बचे खुचे मलबे को वापस भेज देते है | 

इन्ही नौकाओं में | उन्ही गावों में जहाँ से वे आये थे | 

बुधवार, 19 अगस्त 2026

मामूली बातें



ट्रैन पटरी पर चल रही है , सही समय पर | 

एस्कलेटर इंसानो को पाताल में बने स्टेशनो से जमीन की सतह तक ले जा रहे है | 

ट्रैफिक लाइटें जल रही है और ट्रैफिक स्मूथ है | 

आदमी काम पर जा रहा है | 

कैसी रोजमर्रा की बातें हैं | मामूली हैं | 

मामूली चीज़े मामूली होती हैं तब तक जब तक वे हो रही होती है | उनका रुक जाना गंभीर होता है | 



शनिवार, 15 अगस्त 2026

उत्सव

जानती हो ये उत्सव , ये त्यौहार हमे अच्छे क्यों लगते हैं ? 

शायद इसलिए क्योकि ये रोज रोज नहीं आते | दुर्लभ है , लघु हैं | 

रोज रोज कहाँ टांगी जाती है ऐसी रंगीन कंदीले | 

और ये सोचकर मैं सुकून पाता हूँ कि शायद तुम अब भी उत्सव सा मानती होंगी अपने मिलन का 

जो उत्सव की ही तरह लघु था , दुर्लभ था | 

असहज

 असहज 

यूँ ही गाहे बेगाहे , घूमते फिरते देखता हूँ मैं | 

कि कई बार , हाँ कई बार , मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ | 

सब्जी का झोला उठाये , या स्ट्रोलर में बच्चा लिए वे लगती हैं असली  मालकिन , और मालकिन लगती हैं बाईयाँ | 

और फिर सोचता हूँ मैं , वे मालकिनें कैसे जीत पाती होंगी उस असहजता पर  , जो यदा कदा उनके मन में उठती तो होगी | 

कैसे लाँगती होंगी औरत के उस आदिम डर को , कैसे पाटती होंगी स्त्रीमन के मूल में दबी उस ईर्ष्या को जो धधक सकती है महज पड़ोसन के लम्बे बालों से | और वे पति जो  पति होने से पहले मर्द  हैं , पाषाण की गुफाओं से उगे मरद |  मरद जो घोड़े की गर्दनों  पे खींच लाते रहे रास्ते में पसंद  आयी सुंदरियाँ कैसे जीतते होंगे वे  मरद आपने पाषाण पर | 

सोचता हूँ मैं , कैसे सुविधा के लिए असजहता को जीत पाते होंगे वे  परिवार जहाँ  मालकिनों से कही ज्यादा सुन्दर होती है उनकी काम वाली बाईयाँ !



गुरुवार, 13 अगस्त 2026

ये जो अपने होते है न अपने

अच्छी खासी पढ़ती लड़की | 

सपने ऊँचे गढ़ती लड़की | 

फ़िक्र करेंगे कि माहौल बुरा है 

और पढाई छुड़ा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


ऊँचा घर है माल मिलेगा , फिर न ऐसा ताल मिलेगा | 

गुस्सा हों जो बात न मानी , दुनिया मूरख , बस ये ज्ञानी | 

फिर प्रलोभन में बिहा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


फ़िक्र इन्हे है बड़ी तुम्हारी , जीवन कैसे चला सकोगे 

आता क्या है किसके बूते , चार चवन्नी कमा सकोगे | 

भोंदू , लल्लू , पप्पू कहकर 

मनबल सकल गिरा देते हैं | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


तुम क्या जानो दुनियादारी , चार किताब है समझ तुम्हारी | 

दुनिया ठगनी अर तुम भोले , हम पर छोड़ो जिम्मेदारी | 

फिर गाढ़ी म्हणत का पैसा , लेकर कहीं फंसा देते है | 

ये जो अपने होते है न अपने , ये अपनेपन से ही ढ़हा देते है | 


 

सोमवार, 10 अगस्त 2026

Order Number 22

जानते हो मुझे ऐसे कैफे  में बैठ कर चाय पीना क्यों पसंद है | वो यूँ के ऐसे ही चाय के साथ बैठ मैंने न जाने कितने ही लोगो को खोला है |  ऐसे लोग जो खुशहाल शादियों में है पर जिन्होंने सालों से अपने पार्टनर का हाथ तक नहीं थामा | लोग जो ऊँचे ओहदो पर है पर उनका बस चले तो सब कुछ छोड़छाड़  कर पहाड़ भाग जाए ,अकेले।

लोग जिनकी अपने भाई बहनो से बात तक नहीं होती , प्रॉपर्टी के चक्कर में | 

चाय की चुस्कियों के साथ पीना सीख रहा हूँ मैं उनका अकेलापन , उनका गिल्ट , उनकी बेबसी , उनका ट्रामा | 

हर इंसान भरा बैठा है | मैं सीख रहा हूँ उसे खोलना , हर एक कप चाय के साथ | 

शनिवार, 8 अगस्त 2026

मेरी पीढ़ी के लोग



लोग , मेरी पीढ़ी के लोग 

जो मानते रहे और जीते रहे इस फलसफे को कि रहा जा सकता है  एक ही घर में बिना प्यार क्योकि खुद के वजूद से कही बड़ा होता है परिवार 

पीढ़ी आखिरी पीढ़ी जिसके नितम्बों पर आज भी छपे है बचपन में अनुशासन में बाँधने को बरसी कमचियों के निशान 

पीढ़ी  जिसने अपनी पहली तनख्वाह से खरीदा था अपना पहला फ़ोन  

पीढ़ी जो छिपाती रही माँ की बात बीवी से , बीवी की बात माँ से इस उम्मीद कि क्या हर्ज़ है जो जुड़ा रहे परिवार रहकर थोड़ा मौन 

लोग  जिन्होंने अपने शौक अपनी इच्छाएं अपनी पसंद सब बाँध दिया खूंटी पर 

जुट गए ऐसे कामों में जहाँ रोज पीना होता है खून का एक घूँट 

देखता हूँ क्षितिज में कैसे नए आत्ममुग्ध लोग उतरे आ रहे हैं 

सब कुछ सहकर जीने वाली मेरी पीढ़ी के लोग अब बुढ़ा रहें हैं 



बुधवार, 5 अगस्त 2026

असली खेल

​भ्रम में जी रहे हो तुम ,अगर तुम्हें लगता है कि AI, या कोई भी कटिंग एज टेक्नोलॉजी सीख लेने से तुम्हारा करियर उड़ान भर देगा l

हो सकता है ये चंद साल तुम्हारी जॉब बचा ले जाये l सर्वाइवल लेवल पे ही l 

असली स्किल कुछ और है l 

असली स्किल है अपने ऑर्गेनाइजेशन में अपने से ऊपर बैठे ऐसे आदमी तक पहुँच पाना जिसके पास तुम्हे पोडियम पे खड़ा करने की अथॉरिटी है l 

ना सिर्फ़ पहुँच पाना बल्कि उस आदमी को ये एहसास दिला पाना कि तुम उसके बड़े काम के आदमी हो l हर बड़े आदमी को बहुत सारे दाये हाथ बाये हाथ की दरकार होती है जो उसकी ख़ुद तरक्की  झंडा उठा कर चलें lजिस दिन आप ने ये परसेप्शन बना लिया , समझ लो तरक्की की सीढ़ी पे तुम्हारा पाव पड़ गया l बाक़ी सब टेक्नोलॉजी आनी जानी है ल

सोमवार, 3 अगस्त 2026

रविवार भी बदल गया है |

सोचता हूँ मैं , कोई समाजविद क्यों नहीं ढूढ़ता इस बात का जबाब , कि अब अमूमन हर कामकाजी आदमी की जिंदगी में रविवार ऐसे क्यों नहीं आता , जैसे पहले ज़माने में आता था | लापरवाह सा , किसी त्यौहार सा |   अब ऐसे आता है जैसे अगली सुबह जंग पर जाना है और आज ही अपनी रसद जुटाना है | अजीब सा चिड़चिड़ा , feel low day हो गया है रविवार | क्यों हो गया है ऐसा ?   

दुनिया बदल गयी है | रविवार भी बदल गया है | 




बुधवार, 29 जुलाई 2026

मुचलका

मुचलका  

इमारतें , ये बुलंद इमारतें , स्विमिंग पूल , जकूज़ी और जिम से सजी इमारते 

इमारतें जिनमे गाड़ी के लिए गार्ड  बेरिकेडिंग हटाते हैं | 

ये इमारतें दरअसल एक मुचलका हैं पूंजीपतियों और अमीरी का एहसास लेने की ख्वाइश लिए मिडिल क्लास आदमी के बीच दस्तखत किया गया एक एग्रीमेंट 

अग्रीमेंन्ट जो एक मुआयदा है इस बात का कि तमाम जलालत , तमाम हरस्मेंट और टोटल बर्नआउट के बावजूद यह आदमी अपनी नौकरी से चिपका ही रहेगा | हमेशा  


इमारते जिनमे गार्ड गाडी के लिए बेरिकेडिंग हटाते है 


कि तमाम जलालत , तमाम हरैसमेंट , टोटल बर्न आउट के बाबजूद ये आदमी अपनी नौकरी से चिपका ही रहेगा , हमेशा | 

शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

असली मेजोरिटी

 ये जो शक्ति प्रदर्शन करते हैं न लोग , मुद्दे लपक कर भीड़ के बीच में मंच पर मेजोरिटी का रहनुमा बन रहे होते है , ये सब झूठे है | 

कोई भी भीड़ जो प्रदर्शन करती है न कितनी भी बड़ी क्यों न हो मेजोरिटी नहीं होती |  

असली आदमी जो मेजोरिटी में है  वो वह आदमी है जो प्रदर्शन के चलते रास्ता जाम होने की वजह से गलियों से निकल काम पर पहुंच रहा होता है | 

उसकी जिंदगी का मिशन होता है | परिवार के लिए रोटी और अदद सम्मान जुटाना ,बस | 

और इस मिशन के लिए वो न सरकार को ताकता है न यूनियन को न किसी मसीहा को, न इंटेल्लेक्टुअल्स को , न कम्युनिस्ट्स को  | 

वो चुप चाप निकल रहा होता है सब जानते हुए कि कौन सा नारा खोखला है कौन ढोंगी है , कौन उछाला जा रहा है कौन चमकाया  जा रहा है | 

 वो देख रहा होता है कैसे मीडिया बोनो को महामानव बना पेश कर रहा है | कैसे बिना कार्ल मार्क्स पढ़े लोग समाजवादी बने है कैसे गाँधी  को जाने बिना  लोग प्रजातान्त्र पर भाषण पेल रहे होते हैं |  

वो सब जानता है और सब जानने के बाबजूद वह सुकून  चाहता है | सिर्फ सुकून | 



गुरुवार, 23 जुलाई 2026

भिंचाले में फंसा तकिया

आज सुबह उठा तो यकायक ख्याल आया कि एक लम्बे अरसे से मुझे सपने ही नहीं आते | 
काम से लौटता हूँ , कुछ खाता हूँ और बिस्तर पर गिर जैसे मर जाता हूँ | अगली सुबह तक के लिए |
तकिया , जिसे बाँहों में भर मैं तुम्हारी यादें लिए नींद में उतराता था , और जो महीनों से बिस्तर से गायब था  | पाया कि वो तकिया  बिस्तर और दीवार के भिंचाले में फँसा है | किसी यतीम सा | 
एक मकड़ी ने उस पर एक महीन सफ़ेद जाला बुन अपनी मिलकियत का दावा  ठोक दिया है |

दिन भर सोचता रहा क्या कुछ ऐसा  दूँ  कि  तुम लौट आओ | 
पूरी ना सही , इतनी भर कि सपने लौट आये | 
इतनी  भर कि भिंचाले में फंसा तकिया वापस बिस्तर लौट आये आए | 
सोचता रहा कि लिखू तुम्हे कि मेरा तकिया पूछता है कि तुम्हारा तकिया कैसा है !

शनिवार, 18 जुलाई 2026

और फिर एक दिन

कितने ही प्रेम निवेदन ठुकरा दिए मैंने | 

इस गुमान में कि कही कोई फ्यूचर में है जो सबसे बेहतर है और जो मेरे इंतज़ार में है | 

कितनी ही यात्राओं के प्रस्ताव जो मेरे दोस्तों ने रखे , मैंने नकार दिए , इस हुनक में कि अभी समय  नहीं है | 

कितने ही पहाड़ , समंदर , झरने जो मेरी जद में थे , मैंने नहीं घूमे , इस मकसद में कि पैसा बचाना है | 

कितने शगल , कितने शौक जो मुझे जिंदादिली  से जीने का एहसास दिला सकते थे , मैं सबको रौंधता चला गया | 

इस गलतफहमी में , कि एक दिन मेरा दौर आएगा , अभी उम्र पड़ी है | 

आँखो पर पड़े पर्दो से मैंने देखा कि मेरी जवानी का झरना सदानीरा है , जो बस बहता ही जायेगा | बहता ही जायेगा | हमेशा | 

और फिर एक दिन मैं बूढा हो गया | 

जिंदगी उतनी लम्बी नहीं है , जितना हम सोचते हैं !

Life is shorter than it appears . Live it.

          An original by Sachin Kumar Gurjar


कहना सीखो

कहना सीखो | वे बातें जो कहने की हैं | 

उनसे , जिनके होने से तुम हो | 

क्योंकि वक़्त ऐसा भी आता है कई बार | कि तुम जाते हुए आदमी को रोकना चाहते हो | 

चाहते हो कि अपनी जिन्दगी के बैलेंस से कुछ वक़्त उन्हें दे दो | इतना वक़्त कि वो बाते जो तुम उनसे कहना चाहते हो , कह पाओ | 

मलाल कभी उन बातों का नहीं होता जो कह दी जाती हैं | उन बातों का होता है जो तुम कह नहीं पाते |  इसलिए कहना सीखो |  उनसे जिनसे तुम कहना चाहते हो | 


मंगलवार, 7 जुलाई 2026

Takiya


दलील सुने जाने की रिवायत में जब मुझसे कहा गया कि पूछो अगर कुछ पूछना है ,तो
मैंने पूछा "सर,आप ये बताइयेगा कि एक तकिये का क्या इस्तेमाल है ?"
उन्होंने कीबोर्ड पीटना चालू रखा और कहा " तकिया,सिर के नीचे लगाया जाता है "
मैंने कहा " नहीं, तकिया सिर के नीचे भी लगाया जाता है !"
"गुस्ताखी माफ़ पर गत वर्ष में मुझे मेरे दिए रोल के अलावा जहाँ भी फ़िट किया गया ,जब भी किया गया ,मैंने अपनी शिद्दत से काम किया है। बिना इस प्रतिरोध कि यह या वह मेरा काम नहीं है "
उन्होंने हमारे बीच पाले में रखा लैपटॉप एक तरफ़ खिसका दिया और कहा "पता है,तुम्हारा और तकिये का प्रॉब्लम क्या है ? तुम दोनों ही लचर पचर हो l कहीं भी फ़िट हो जाना कोई स्किल नहीं है l
कुछ तो ऐसा हो कंक्रीट,सॉलिड जिसे शोकेस किया जा सके l बोलो "
"आप चाहेंगे कभी,ऐसा तकिया इस्तेमाल करना ,जिसमे कंक्रीट हो !" मैंने कहा l
जबाब में उन्होंने एक गहरी साँस ली बस l
और इस तरह,साल में एक बार होने वाली मेरी अप्रैसल मीटिंग बिना किसी वेतनवृद्धि, बिना किसी शाबाशी ख़त्म हो गई l
                 :सचिन कुमार गुर्जर
             


शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

toxicity

 सभी इंसान अच्छे होते हैं , तब जबतक सब कुछ अच्छा चल रहा होता है | 

अधिकतर इंसान ख़राब होते जाते है , तब जब सब कुछ एक है नहीं चल रहा होता | 

और ये ख़राब इंसान खुद तक ही ख़राब नहीं रहते | किसी टोकरे में रखे आमों में फैली सड़न के माफिक ये सड़न फैलती है | अच्छे आदमी भी इस सड़न की जद में आते जाते हैं | 

ये जो आसमान में छेद करती बुलंद इमारतें हैं ना इन्हे आप किसी गोदाम के सफों पे सजी आम की पेटियों जैसा समझिये और इनमे काम करने वालों को आम | 

आम , जो कुछ सड़े हुए हैं | कुछ सड़न की कगार पे हैं | कुछ ऐसे हैं जो कैसे भी कर इस सड़न से छूट जाना चाहते हैं | 

आज , दस में से आठ आदमी इस सवाल से रूबरू है कि इस माहौल में उसका मुस्तकबिल क्या है | 

क्या उसमे कुछ ऐसा है , कोई भी थोड़ा बहुत हुनर , या कोई भी ऐसा काम करने का बूता जो उसे इस सड़न से मुक्ति दिला सके | 

कुछ क्रिएटिव आर्ट , प्रॉपर्टी , शॉप , कोई ऑनलाइन बिज़नेस , फार्मिंग , कोई फ्रैंचाइज़ी , कोई पीसफुल रिमोट जॉब , कोई अपनी खुद की गुमटी | 

कुछ भी ऐसा है जो उसका खुद का हो ऐसा हो जो सुकून से कुछ कम भी कमा जीवन यापन का झरोखा खोल दे | 

लेकिन क्या सालों की जॉब कंडीशनिंग , फॅमिली की जिम्मेदारी , जकड़े आदमी के पास इतना गूदा बचता है कि वो नए काम की uncertainity में कूदे ? 

ये डर है और ये वाजिब डर है | और ये डर उसे बर्दाश्त करते चले जाने की सलाह देता है | वो सिकुड़ता जाता है | जमीन छोड़ता जाता है | 

और उसका ये जमीन छोड़ना , अपने पाले में पीछे हटते जाना टॉक्सिसिटी की जमीन तैयार करता है | जमीन जिसमे फूल मुरझाते जाते है और कैक्टस फलते फूलते हैं | 

सवाल ये है कि कॉर्पोरेट में क्या वाकई हालात इस कदर ख़राब है कि हर दूसरा आदमी  ड्रैकुला जैसे लम्बे दाँत लिए खून पीने को आतुर हैं  | या खुद की इन्सेक्युरिटीज़ से जूझते लोग अपने साथ काम करने वालो , अपने नीचे काम करने वालों की जिंदगी जहन्नुम बनाते जा रहे हैं | 

आप क्या सोचते हैं ? 


रविवार, 28 जून 2026

सोचो

 सोचो , कितने बंधनों में बँधी रही होगी वह स्त्री , जिसने नौकरी में अपनी आज़ादी ढूंढी | 


कभी कभी

 कभी कभी  ऐसा किया कीजिये कि हो जाया कीजिये गायब उन जगहों से जहाँ तुम्हारी मौजूदगी को गैर जरूरी समझा जाता हो |  लोगो को थोड़ा चखने दीजिये, अप...