शुक्रवार, 3 जुलाई 2026

toxicity

 सभी इंसान अच्छे होते हैं , तब जबतक सब कुछ अच्छा चल रहा होता है | 

अधिकतर इंसान ख़राब होते जाते है , तब जब सब कुछ एक है नहीं चल रहा होता | 

और ये ख़राब इंसान खुद तक ही ख़राब नहीं रहते | किसी टोकरे में रखे आमों में फैली सड़न के माफिक ये सड़न फैलती है | अच्छे आदमी भी इस सड़न की जद में आते जाते हैं | 

ये जो आसमान में छेद करती बुलंद इमारतें हैं ना इन्हे आप किसी गोदाम के सफों पे सजी आम की पेटियों जैसा समझिये और इनमे काम करने वालों को आम | 

आम , जो कुछ सड़े हुए हैं | कुछ सड़न की कगार पे हैं | कुछ ऐसे हैं जो कैसे भी कर इस सड़न से छूट जाना चाहते हैं | 

आज , दस में से आठ आदमी इस सवाल से रूबरू है कि इस माहौल में उसका मुस्तकबिल क्या है | 

क्या उसमे कुछ ऐसा है , कोई भी थोड़ा बहुत हुनर , या कोई भी ऐसा काम करने का बूता जो उसे इस सड़न से मुक्ति दिला सके | 

कुछ क्रिएटिव आर्ट , प्रॉपर्टी , शॉप , कोई ऑनलाइन बिज़नेस , फार्मिंग , कोई फ्रैंचाइज़ी , कोई पीसफुल रिमोट जॉब , कोई अपनी खुद की गुमटी | 

कुछ भी ऐसा है जो उसका खुद का हो ऐसा हो जो सुकून से कुछ कम भी कमा जीवन यापन का झरोखा खोल दे | 

लेकिन क्या सालों की जॉब कंडीशनिंग , फॅमिली की जिम्मेदारी , जकड़े आदमी के पास इतना गूदा बचता है कि वो नए काम की uncertainity में कूदे ? 

ये डर है और ये वाजिब डर है | और ये डर उसे बर्दाश्त करते चले जाने की सलाह देता है | वो सिकुड़ता जाता है | जमीन छोड़ता जाता है | 

और उसका ये जमीन छोड़ना , अपने पाले में पीछे हटते जाना टॉक्सिसिटी की जमीन तैयार करता है | जमीन जिसमे फूल मुरझाते जाते है और कैक्टस फलते फूलते हैं | 

सवाल ये है कि कॉर्पोरेट में क्या वाकई हालात इस कदर ख़राब है कि हर दूसरा आदमी  ड्रैकुला जैसे लम्बे दाँत लिए खून पीने को आतुर हैं  | या खुद की इन्सेक्युरिटीज़ से जूझते लोग अपने साथ काम करने वालो , अपने नीचे काम करने वालों की जिंदगी जहन्नुम बनाते जा रहे हैं | 

आप क्या सोचते हैं ? 


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