Sunday, May 1, 2016

जब जाना ही पड़ा स्कूल

चार दिनों से मेह बरस रहा था । रस्सी के जैसी मोटी मोटी धार बरस रहे थे बादल ।  दादी कई बार राम जी को खरी खोटी सुना चुकी थी ।
गाँव की सबसे बूढी, विधवा  दादी अपने हाथों से गोबर का उलटे पैरों वाला भूत दीवार पे उकेर उकेर थक गयी थी । सब टोटके फेल , मेह ना थमता था ।
ऐसी घनघोर मेघा हुई थी उस बरस कि जमींदार बनियों की पक्की छतों को छोड़ सारे गाँव की कच्ची छतें टपाटप रोई थीं  ।
पिता जी कई बार आशावादी होकर बोलते थे " पूरब की ओर से बादल ऊँचा होता दीखता तो है , राम जी गाय भैंस के लिए घास फूस करने का मौका तो देगा ही । "

पर बारिश न थमी । पांचवे दिन मेह हल्का हुआ तो स्कूल के मास्टर तड़के तड़के मुहल्ले में धमक घोषणा कर गए " अजी ,राम जी न थमे अपनी बला से , आज स्कूल खुल के रहेगा । "
रास्ते कीचड से लबालब , खड़ंजे की ईंटे कई कई इंच मिट्टी गोबर के अंदर धँसी थीं   । बड़े भी इधर उधर पड़ी ईंट पत्थरों  पर पैर जमा निकल रहे थे ।

मेरी नियम की पक्की माँ ! मास्टर की घोषणा के तुंरन्त बाद उसने बिजली की फुर्ती से तैयार कर बस्ता लाद  दिया अपने कुलदीप की नाज़ुक पीठ पर  ।
और वो असहाय बालक महेश बनिए की परचून की दुकान की चौखट के  ठीक सामने धड़ाम से गिर गया । शिखा से नख तक पूरा कीचड ही कीचड !

रोते हुए घर पहुंचा , तो माँ ने कपडे बदल दोबारा भेज दिया । फिर से उसी स्थान,  महेश बनिए के घर के सामने  कीचड में फिर से धड़ाम हो गया अबोध । पूरा कीचड़ में लथपथ ।
इस बार रोता सुबकता वापस लौटा तो माँ को षड़यंत्र जान पड़ा " ढोंग न कर मुन्ना  , जान बूझ फिसला ना इस बार तू , जाना तो पड़ेगा तुझे लल्ला ।  "

कोमल हृदया दादी बीच में कूद पड़ी थी " एक दिन न जायेगा तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा , आज के ही दिन लाट साब बना देंगे क्या मास्टर। "
फिर दोनों में खूब नोक झोंक हुई थी । और माँ तीसरी बार खुद गोद में उठा स्कूल के दरवाज़े तक छोड़ कर आई थी । हलकी हलकी बुंदिया बरस रही थी तब तक भी ।

दादी बीच में न कूदती तो शायद माँ तीसरी बार स्कूल न भेजती । पर दादी पोते के प्यार में अपने आप को थाम  ना  पायी और माँ के अहम् के लिए अपना निर्णय थोपना जरूरी हो गया था ।

शाम होते होते राम जी के बादल तो छितरा के ऊँचे हो गए थे , पर माँ और दादी की नोकझोंक के घनघोर बादल कई दिनों तक टकराते रहे थे रुक रूककर !
                                                                                     --सचिन कुमार गुर्जर

ओए_देहाती _बुड़बक  , आह _बचपन

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