Tuesday, May 3, 2016

बिहा की मोटरसाईकिल

तब स्कूटर, मोटरसाइकिल इक्का दुक्का दिखाई पड़ते थे , उँगलियों पर गिनने भर के । उस समय बड़े मुकददम  ने अपनी छोटी लड़की की शादी में 'राजदूत' दी थी , बड़ा नाम हुआ था उनका काले कोसो तक तूती बाजी थी  !
बारात जब विदा हुई थी तो भरी बारात में एक भी बाराती ऐसा ना था जो मोटर साइकिल चला के ले जाए ।  मुकद्दम ने अपने बहनोई के छोटे भाई को भेज विदा कराई थी मोटर साइकिल ! अनुरोध कर भेजा था कि एक दो रोज़ छुटकी की ससुराल में रुक दामाद को थोड़ी ट्रेनिंग भी दे आएं । 

तेजा बस नाम का ही तेजा था । नौवें दर्जे का आखिरी परचा देने के बाद अपना बस्ता ऊँची खूंटी पे टाँग दिया था उसने । पिता जी हेड मास्टर थे और  इच्छा रखते थे कि  इकलौता पूत तेजा ग्रेजुएट हो जाए , नौकरी खातिर नहीं नाम  इज़्ज़त के लिए  । 

पर तेजा मन बना चुका था । मास्टर थोड़ा बहुत प्रोत्साहित करना चाहते तो बोलता " क्या चाहते हो पिता जी , हम भी गिरधारी काका के सतीश की तरह खूब पढ़ लिख जाये और बम्बई में जा जहाजरानी में नौकरी करे और फिर घर वालो की दवा दारु का  भी न देखे । फिर बलकतरी बहु लाके धरेंगे , देखते रहियो टुकर टुकर ।"

मास्टर कुछ बोलते न बोलते , पर मास्टरनी का  गुर्दा हिल जाता था तेजा की बात सुनकर " ना मेरे वीर , मत पढ़ तू , पर बाहर जाने का सोचियो भी मत मेरे लाल । संखिया खाय मर जाएगी तेरी माँ जो तू परदेसी हुआ तो । "
जमीन जायदाद तेजा के दिमाग में घुस गयी थी । रही सही कसर गाँव वाले पूरी कर देते। वो बस्ता लेकर स्कूल जाता तो कोई न कोई टोक ही देता " तुम किस लिए माथा मार रहे लल्ला, सोने जैसी  जमीन बटाईदार के हवाले कर शहर में चंद सिक्कों खातिर जी हज़ूरी करोगे  पढ़ लिख, क्यों?"

फिर कमी भी तो किसी बात की न थी । हेड मास्टरी की तनख्वाह  थी और ऊपर से पूरी सौ बीघा सिंचित जमीन । जमीन भी ऐसी उपजाऊ कि गन्ना बांस जैसा मोटा मोटा उगता था । तीन तीन  बिहारी मज़दूर दिन रात गन्ना खींचते  थे पर गन्ना समेटे न सिमटता था । 

अब जब औलाद  बस्ता खूंटी पर टांग छोड़े , तो माँ बाप का अगला कर्म उसकी शादी का ही होता है। बेटी वाले तो तेजा पे कबसे  गिद्ध सी निगाह  गढ़ाए बैठे थे।कोई टटोलता तो मास्टर कह देते " अजी दहेज़ मांगने का काम ओछे आदमी किया करै है । घर हमारे कोई कमी नहीं , माल दहेज़ की कोई इच्छा नाही ।  लड़की साफ़ सुथरी हो , लंबी पोई हो और घर परिवार की इज़्ज़त को पहचाने , बस ।"
पर मन ही मन जानते थे और वही क्या बाकि सब भी जानते थे कि तेजा की शादी में मोटरसाईकिल तो मिल के रहेगी।

एक दिन लखमीचंद आ जमे मास्टर साब के दालान पर । बड़े ही हठीले ठहरे लख्मी , बिरादरी में बात थी उनकी । ऐसा खूंटा गाड़ के बैठे दालान पर कि मास्टर साहब से हामी भरा के ही उठे ।
'"हम कहेंगे कुछ न लखमी , पर हमारी इज़्ज़त बाँधियो। तुम समझदार हो, भरोसा है तुम पर। " मास्टर साहब ने चलते वक़्त लख्मी चंद से इतना भर कहा था ।
"निश्चिन्त रहो मास्टर , दूर दूर तक आवाज़ होगी तेजा के बिहा की। धनाढ्य परिवार ढूढ़ा है , किसी बात की कसर न होगी।धन माल इतना होगा कि तुम्हारा मकान छोटा पड़ जायेगा । सवारी भी मिलेगी । "

उधर तेजा की अपनी उमंग थी । उसका सपना था कि बिहा के वक़्त वो मोटरसाईकिल सवार हो ना हो , गौने के वक़्त तक उसका हाथ इतना साफ़ हो जायेगा कि अपनी बिहाता को अकेले ही ससुराल से लाएगा ।  तेजा के दिन रात  मंगा हलवाई के लौंडे , उसके खासम ख़ास यार  की पुरानी यजदी पे बीत रहे थे । पढाई में भले ही कमतर रहा तेजा पर था बड़ा उस्ताद दिमाग । मंगा के लौंडे ने एक दो बार ही कलच और साध बताई थी , तेजा बहुत ही तेजी से नयी विधा सीख रहा था । उसके सपनो में 'राजदूत ' आती थी , काली बॉडी में , चमचमाते स्टील फ्यूल टैंक वाली !

लगन वाले दिन पूरे टोले में बड़ा उत्साह था । बड़ा इंतज़ार हुआ पर 'राजदूत ' ना आई ।
तेजा थोड़ा सकपकाया भी , पर लख्मी चंद स्तिथि भाँप गए " घबराओ न बेटा , धीरज धरो , मोटर साइकिल  विदाई के समय मिल जाएगी । "
"जितना देर मिले उतना सही लख्मी , ये लोहे का घोडा भूसा नहीं , पैसा खाके ही हिलता  डोलता  है " मास्टर साब ने बड़े पते की बात कह दी थी ।

खैर , बिहा का दिन भी आया । बारात नियत समय , नियत स्थान पहुंची । पुरजोर स्वागत हुआ । लड़की के बाप ने मास्टर साब के गले में दस दस के खरे नोटों की माला डाल , पलक बिछा स्वागत किया । तेजा के यार दोस्तों ने घुटनो के बल बैठ बैठ ऐसा जबर नागिन डांस किया कि छतों पे लटकी कुआरी लड़कियों के दिल उछल उछल रास्ते में गिरने को हुए । रसगुल्लों , लड्डुओं , पालक पकोड़ों को बारातियो ने ऐसे ऐठा  जैसे सात जन्मों के भूखे जिन्नों को किसी ने बोतल से निकाल बाहर किया हो ।

सब कुछ सही , पर  मोटरसाईकल  न दिखती थी । निगाहों से छुपा के रखा था ससुराल वालो ने लोहे का घोडा !
तेजा ने एक दो बार पूछा भी " पिता जी , लख्मी मौसा से पूछ भी लो , कही कुछ झोल न हो । "
मास्टर साब डाँट देते " तुम चुपचाप रस्मों पे ध्यानो, ज्यादा उतावलापन काहे ?"
खाना हो गया , फेरे हुए पर मोटर साइकल का पता नहीं । लड़की वाले विदा की रस्म से पहले पत्ते खोलने को तैयार न थे ।

" हाँ जी , दहेज़ की सूची इस प्रकार है , इक्कीस जोड़े लत्ता  , लड़के के लिए सफारी सूट, ग्यारह सोने की चीज़े , लड़के के लिए एक एच अम टी घडी , इक्यावन पीतल के बर्तन , एक दीवान पलंग , दो बक्से एक बड़ा एक छोटा , मर्फी ओरिजिनल ट्रांजिस्टर और..."
" और एक एटलस साईकल मय स्टैंड !" नयी उम्र का वो लड़का दहेज़ की सूची पढ़ हाथ जोड़ लड़की पक्ष के लोगो के झुरमुट में छिप गया ।

बस इस आखिरी आइटम का सुनना था कि मास्टर साब के सीने पे साँप लौट गया । पसीने की लहर माथा भिगो गयी । हलक सूख गया । पूरी बारात में मातम सा सन्नाटा । तेजा की हालत ऐसी कि प्राण अब छूटे कि तब छूटे । उसे लगा कि बस कुछ ऐसा हो कि जमीन फट जाए और वो उसमे समां जाए ।
लख्मी खुद अविश्वास की नज़र से लड़की के बाप को एक टकी  बांध देखे जा रहे थे ।
धोखा हो गया था धोखा !
किसी समझदार बूढ़े ने सन्नाटा तोड़ा " बहुत दिया जी , बहुत दिया । राम जी सबके काज बनाए । "

मास्टर साब की उम्र का अनुभव  तो सदमा दबा गया पर तेजा हुआ नयी उम्र लड़का । बौरा सा गया कतई । सेहरा उतार दर्री पे रख दिया और दोनों हाथ पीछे टिका दिए । उसके कंधे निराशा में नीचे ढलक गए ।
फिर इससे पहले कोई कुछ समझ पाता वो बिजली सा उठा और सीने भर ऊँची चार दीवारी को ऐसे फाँद गया जैसे कोई नया सुतीला, अरबी  घोडा ।
तेजा भाग गया था । हाँ जी , दूल्हा भाग गया था । वो आबादी से पीछे की ओर भागा था । उस ओर जिस ओर उपले बिटोड़ों के खदान थे ।

लड़की पक्ष के दो लड़को ने हाथ में राइफल थामे जगह के निकास पे मोर्चा ले लिया । दो चार बगल की छत पे चढ़ गए । ऐलान हो गया " खबरदार , जो कोई बाराती हिला भर भी । पहले लड़की विदा होगी , फिर बाकी बारातियों की निकासी होगी ।  होश रखोगे तो रिश्तेदारी , जोश दिखाओगे तो लाल खोपड़े लेकर जाओगे सब के सब । "

मास्टर साब ने समधी के हाथ थाम लिए " क्या करो हो हुकुम सिंह , फेरे हुए लड़की हमारी हुई । रिश्तेदारी लठ्ठों से , दुनलियों की बटों से निभाओगे क्या , समधि ? " आँखे छलक आई मास्टर साब की । मास्टर साब के सधे बोलों का सुनना था ,  दुनालियाँ  नीचे झुक गयी , लड़के छतों से नीचे उतर आये ।

फिर शुरू हुई तेजा की ढुंढवार । खेत खलियान , जोहड़ क्यारी , सब टटोले गए , पर तेजा ना मिले ।
बारात , घरात का बड़ा बच्चा सब खोजा , पर दूल्हा ना मिले ।

बालक की नब्ज माँ बाप से अच्छी कोई परख सकता है क्या ? मास्टर साब के कान कुछ टोह ले रहे थे ।
फिर बीच बिटोड़ों के खलियान मास्टर साब ने चेतावनी दी " तेजा बाहर आओ हो , या लगा दे तीली बिटोड़ों में "
मास्टर टोह लेते बिलकुल उसी बिटोड़े तक पहुंच गए थे जहाँ तेजा छुपा बैठा था ।
फिर उपलों के ढेर में जोर की ठोकर मार बोले " बोलो आते हो या लगा दे आग । "

"देर न करो मास्टर साब  , खींच दो तीली और कर दो सब स्वाहा अभी  । तेजा की कहानी इसी बिटोड़े में खत्म हो जाए तो भला ।  दुनिया को मुँह दिखाने से बेहतर मै  स्वाहा ही हो जाऊ ।  ' फिर हिडकी बाँध रो पड़ा तेजा । और ऐसा जोर रोया , ऐसा रोया कि लगा की चारो दिशा रो पड़ेंगी ।

"होश कर रे पूत , तेरा बाप अभी जिन्दा है , आजा मेरे शेर "  मास्टर का गला रूँद गया । हथेलियों से आँखे ढक ली । सात पुश्तो की कमाई इज़्ज़त , बिन अपराध लुटती जान पड़ी ।

किराए की अम्बेसडर में बैठ तेजा अपनी बिहाता  को ले चला आया । बाराती भी अपने अपने साधनों से चल निकले ।
मास्टर साब रुके रहे । एक गिलास पानी मंगाया और लख्मीचंद के सामने खड़े हो गए ।  
"किसी पुराने जनम का बैर रहा होगा हमारा तुम्हारा लख्मी , हम जीते जी अपमान भूल न पाएंगे , हम सीधेपन में रहे और तुम हमारी बगल में घुस हमारे ही पर क़तर गए ।
सुन लो , एक मर्द बच्चा हो तो हमारे खेड़े पाँव न रखियो कभी , सम्बन्ध खत्म हुआ हमारा तुम्हारा "
इतना कह मास्टर साब ने पानी मुँह में ले लख्मी के सामने पानी का कुल्ला किया और गांधी टोपी को साध किराए की जीप में चढ़ गए ।

मौसम आये गए हुए , वक़्त जख्म भर गया ,मास्टर साब का घर परिवार घणी विपदा से उभर फिर से वैभव का जीवन बसर करने लगा । दोनों घर परिवारो का आना जाना तो हो गया पर लख्मी चंद विलेन ही बने रहे ताउम्र। मास्टर साब उन्हें उनकी गैरजिम्मेदारी के लिए माफ़ न कर पाये।

तेजा का लड़का जुआन हो गया है अब । इकलौता है , इंटरमीडिएट कर चुका है और सौ बीघा जमीन है! सुनने में आता है कि तेजा के लड़के के बिहा में 'बोलेरो' मिल के रहेगी ।
बस उसके ऊँची खूँटी पे बस्ता टाँगने की देरी भर है !

                                                                                                 - सचिन कुमार गुर्जर

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