Monday, January 12, 2015

बस तिथि आना शेष है!



बड़ा ही काइंया दिमाग शख्स  है टिटुआ ! चपल चतुर , दुनिया के किसी भी चतुर दुपाये ,चौपाये से भी ज्यादा !
उसे सही से जानने वाले जानते है कि दिमाग का चंट टिटुआ बड़ा ही क्रिएटिव टाइप का जंतु है ।

क्रिएटिव दिम्माग को स्टिम्युलेट करने के लिए दवा होती है सुट्टा और दारु !
आप सच मानें या ना मानें , ये दिल्ली में कुहरे और धुएं के जो  छत्तेदार बादल है न, आधे तो टिटुआ के घर की दुछत्ती से ही उठते है , मार्लबोरो  के धुंए के छल्लो की शक्ल में ! गोल गोल छल्ले, जो हवा में उड़ने के साथ फूलते जाते है ।

उसकी दुछत्ती दारु की सस्ती महंगी खाली बोतलों का कोई म्यूजियम सी लगती है । नाना प्रकार की , कोई छोटी चमकीली सी तो कोई लम्बी सुराही सी । कोई रैपर का महंगा दुशाला ओढ़े बिगड़ैल बाप की नखरीली बेटी सी ,तो कोई किसी गवई लड़की सी सीधी साधी ।

पर टिटुआ दिल का फौलाद है , दिल्लगी किसी से नहीं करता । उसके हाथ में जो आये वही उसकी माशूका । फिर वो चाहे महुआ हो या बसंती ,विलायती ग्लेनफिडीज हो या बकार्डी  या ' मैं और मेरा यार ,बैगपाइपर ' !
 जो  वक़्त पे खुल जाए,लुट जाये ,वही उसकी दिलरुबा और  टिटुआ उसी का दिलदार !
 
उसके गुरु ने उसे कभी सिखाया था 'देख टिटुआ , दुनिया में जीना है तो अपनी तुर्र में..'
 "याद रख , हम हम हैं  , बिना सुतली के बम है ,बाकि पानी कम है !"

गुरु के दिए इस मंत्र ने टिटुआ को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया !उसने जिंदगी तुर्र में जी है ,और जब भी पी है ,पानी कम ही रखा है!

किसी बदलाव के क्रांतिकारी ने उसे दिल्ली की नयी पार्टी के लिए चंदे का निवेदन भेज दिया और सभी संभावनाओ को झुठलाते हुए टिटुआ ने चंदा दे दिया , वो भी पूरे हज़ार रुपया , ना चाराना कम ना चाराना ज्यादा !
टिटुआ की दरियादिली और परिवर्तन के लिए सीने में छिपी आग ! तूफ़ान तो आना ही था ।

नयी पार्टी के नए क्रन्तिकारी चिंतक (ऐसा दुनिया नहीं , वो खुद ही समझते है ) ने घोषणा कर दी , कि ' टिटुआ का ज्ञान चक्षु खुल चुका है और उसके तीसरे नेत्र से आग निकली है जो सब पापियो को जला देगी , साम्प्रदायिकता भसम हो जाएगी , दिल्ली के नालो से बिजली निकलेगी , भ्रष्टाचारी अपनी जीभ काट के खुद व खुद मर जायेंगे । हर दिन दिवाली होगी , हर दिन ईद । राममनोहर रोज हलवा खायेगा और बब्बन खां रोज सींक कबाब ! ये आग बदलाव की आग है "

फिर टिटुआ के फेसबुक वॉल पे नई पार्टी के जमूरों के सन्देश आने लगे । कोई कहता 'टिटुआ साथ आ गया ,समझो हमने दिल्ली जीत ली'
कोई कहता ' जब टटुआ भी हमसे आ मिला तो अब बचा ही कौन? '
कोई नज़ूमी कहता ' जीत हो चुकी है बस तिथि का इंतज़ार है '

सचमुच टटुआ के चंदे के बड़े बड़े मायने निकाले जा रहे थे ।
बात मेरी समझ से परे ,भई ऐसा क्या जादू कर दिया झाड़ू वाले ने कि फटे अंडरवेअर की लास्टिक से नए कच्छे  का  नाड़ा बनाने  वाले शख्स की जेब ढीली करवा दी ! चंदा दे दिया वो भी पूरे एक हज़ार का !


मैंने बहुत कुरेदा " देखो टिटुआ , अब बहुत हुआ , ये बात बड़ी देर से हमें कुलबुलाये जाय रही है । अब बतला भी दो , काहे दिए हो चंदा , वो भी पूरे हजार रूपया !वैसे भी तुम आजकल कम ही लेते हो , हज़ार रूपये में तो पंद्रह दिन का कोटा पूरा हो जाता '

टिटुआ की आँखे चमक रही थी , मानो वो कोई 'अलीबाबा और चालीस चोर' का खज़ाना देख आया हो ।
फिर हँस  दिया ,खैनी को रगड़ रगड़ गोल बना निचले होठ तले दबा लिया और इधर उधर छिटके खैनी के तिनके थूकते हुए बोला "देखो यार ,इह जो नयी पार्टी के बुड़बक है ना , बड़े ही सेन्टी  टाइप के है और बड़े ही उसूलदार  ! हर चीज़ का सबूत मांगते है मति के मारे ।और बिना सबूत के चखना भी न देंगे !इलेक्शन का पारा चढ़ने दो , डोनेशन की लिस्ट का प्रिंट आउट दिखा ,दोगुना वसूल लूँगा !'

फिर वो खिलखिला के हँस उठा , वैसे ही जैसे कोई लौंडा अपनी नयी माशूका का राज़ अपने लंगोटिया यार को बता हँस पड़ता है ।

मैंने बोला " नहीं यार , ये बदलाव की हवा है , इसमें नहीं चलेगा ये सब , तुम लालच में अपनी लुटिया डुबोय बैठे "

टिटुआ ने बात बीच में ही काट दी ' तुम भी ना यार ,कतई भोलूराम ही हो , भैया कभी हुआ है क्या ऐसा कि टिटुआ चाराना भी लुटवा दे ।
देखियो , इस बार दिल्ली की सर्दी में खूब चलेगी , पुरानी तो बहेगी ही ,नयी भी खूब बहेगी । बड़े सही मौसम में इलेक्शन आया है , हल बैल छोड़ो ,दिल्ली आ जाओ , रंग जमेगा !'

'अरे नहीं टिटुआ , ये हवा बदलाव की है '

टिटुआ गंभीर हो गया ' सिर्फ मुखोटे बदलते है दोस्त ,पीछे चेहरे वही पुराने , लार टपकाते , कंबली नयी है ,अंदर वही पुराने उम्मेदवार । सब की राजनीती हलवा पूड़ी वाली ही है । देखते नहीं हो कैसे हड़बड़ाए  हुए है , ऐसी हड़बड़ी माया ही पैदा करती है दोस्त ! '

मैंने फिर कहा ' नहीं टिटुआ ,ये हवा बदलाव की है '

'हवा हमेशा बदलाव की ही होती है दोस्त , साफ़ स्वच्छ ,ताज़ा !पर जमीन पर पड़ी सड़ांध उसे दूषित करती है , वही हवा जब चम्पा को छूती है तो महकती है , वही जब कसाई के अहाते से गुजरती है तो हमारे नथुओ को सिकोड़ती है । हवा हवा है , वो बिना आलिंगन पवित्र है ,प्रदूषण उसमे तैरने वाले कण पैदा करते है । '

'सुनते नहीं हो ,नए वालो को अन्दरखानी ,दिल्ली के पुराने सरदारो का भी समर्थन प्राप्त है। सब अपना उल्लू सीधा करते है ।बस हलवा पूरी खा लो और आगे चल लो '

टिटुआ बहुत आगे की चीज़ है , मुझे पता था । वो प्रैक्टिकल सोचता है । 'हम हम है , बाकी पानी कम है!'

फेसबुक पे हर बधाई सन्देश पर टिटुआ स्माइली फेक रहा है , नए जमूरे सेंटी हुए जा रहे है और गला फाड़ फाड़ चिल्ला रहे है 'टिटुआ हमारा हुआ , समझो दिल्ली हमारी हुई ! बस तिथि आना शेष है! '
 
     सचिन कुमार गुर्जर



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