Friday, December 19, 2014

यूँ ही चलते फिरते

बड़ी अलसाई सुबह है जी आज । रात को बकार्डी से तरबतर होने के बाबजूद जबरन आइसक्रीम खिला दी थी दोस्त ने । शपथ के साथ खायी थी कि आँधी आये या तूफ़ान ,शनिवार की सुबह लम्बी जागिंग के साथ ही शुरू होगी । है कोई अंदर जो लड़का रहना चाहता है ,जवान जज्बाती आशिक़ सा ! और आज शक्ल पे ठन्डे पानी के छींटे तक मारने की मशक्क़त नहीं हुई है , बस जा चिपका हूँ बगल वाले फ़ूड कोर्ट की हिंदुस्तानी दुकान पर । दुकान पे काम करने वाला लड़का अब पहचानने लगा है । सांवला सा इकहरे हाड का लड़का है ,मंझले कद का ,बाल बढ़ाये है शौकीनी में । पच्चीस छब्बीस का है हँसमुख,विनम्र ,थोड़ा शर्मीला ।

बूढी चीनी दादी की व्हीलचेयर को ढ़ेलती एक युवती आई है ,हिज़ाब में । इन्डोनेशियाई केयरटेकर है शायद!
बड़ी बड़ी कटार सी आखें है काजल के  डोरे से बंधी हुई ,गोल नाक ,शरीर भरा भरा सा है,भरपूर गोलाई युक्त । चेहरे पे रौनक है ,उम्र यही कोई बाइस तेहिस की अल्हड , यौवन उमंग के दौर में है!  पराता बनाने वाले लड़के की आँखे  यकायक ख़ुशी से चमक उठी  है । मुस्काने बिखर रही है दोनों ओर से । दोनों एक दूसरे को जानते है ,शायद बड़ी अच्छी तरह,दिल की गहराईयों तक ! आखें रह रह बंध रही है,नाच रही है और फिर थोड़ा बहुत इधर उधर देखने का दिखावा सा होता है । लड़के के हाथों में बिजली सी आ गयी है यकायक  ! एग पराता को बड़ी ही कलाकारी से पलट रहा है ,आशिक़ मोर बन गया है ,नाच नाच मोरनी का मन मोह रहा है । और उसका दिल गा रहा है कोई तमिल नगमा । प्यार का कोई फव्वारा सा फूट पड़ा है उधर,उसके छींटे मुझ तक छिटके है । उस आशिक़ के प्रेमगान को मैं सुनना चाहता हूँ और उस माशूका के नगमे को भी!

उनका प्यार चौकन्ना  भी है ,जंगल में हिरणों के जोड़े जैसा । कोने वाली चेयर से मौन प्रेमप्रदर्शिनी का लुत्फ़ उठाती छोटी आँखो को भाँप लिया है दोनों ने ! हिज़ाब ने हया का पर्दा ओढ़ नज़रे झुका दी है ,पर लड़के का प्रेम निर्भीक है,  हर शंका ,हर विघन से दो चार होने को तत्पर !

'सब ठीक है ' हलकी मुस्कान से मैंने उसकी थोड़ी बहुत हिचक भी हर ली है ।
 तमिल और भासा इंडोनेशिया का ग़ज़ब का मिलन है । मल्टी कल्चरिस्म का एक सुखद नमूना है ये ।
प्यार की सचमुच अपनी भाषा होती है , जो सब जगह बोली समझी जाती है चेन्नई की मरीन ड्राइव से पूर्वी  जावा के जंगलो के पार बसे गाँवो तक में ।
आह्ह ,दिल जवान सा हो गया है ! रात की बकार्डी का असर बाकी  है शायद अभी तक !

सचिन कुमार गुर्जर                                                     
 -सिंगापुर द्वीप प्रवास के संस्मरणों में से

No comments:

Post a Comment

टिप्पणी करें -