Saturday, December 13, 2014

शर्मा फैमिली और विलायती बोतल


यूँ तो शर्मा जी  ज़माने से पीते आ रहे है पर उन्हें शराबी कहना बेईमानी होगा । वो यूँ , क्योंकि उन्होंने जब भी पी है , शौकिया ही पी है और हद में रहकर पी है । गरम जवानी के दिनों से लेकर उम्रदराज़ी के दिनों  तक , मज़ाल है कि किसी ने एक भी बार शर्मा जी को नशे की गफलत में देखा हो । शराबी उसे कहा जाता है जो इस कदर मदिरा प्रेमी होता है कि अपनी दुनियादारी जूते के तल्ले पे रख छोड़ता है । शर्मा जी ने अपनी दुनियादारी की एक एक जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है ।
 हाँ लेकिन वो  पीते उस ज़माने से ही रहे है!

'ब्लैक एंड वाइट ' के उस ज़माने में कभी कभार जब कोई जिगरी दोस्त या रिश्तेदार आ जाता तो कच्चे ,मटियाले दालान के ऊँचे चबूतरे पे महफ़िल जम  जाती,मसालेदार बसंती को अंटी में दबाये चखने का इंतज़ार होता ।
शर्माइन सुलगती तो थी पर शर्मा जी के कभी कभार के इस शगल को बर्दाश्त कर लेती थी । शीशे के मर्तबान से पुराने ,सूखे आम के अचार की कुछ फाखें और नमक में सनी ताज़ा प्याज की गोल गोल कतरने कटोरियों में रख अपने लड़के को दालान भेज देती । सरकंडों के मूढ़ो पे जमीं चौखड़ी के बीच में पड़ी चारपाई मेज का काम करती थी , लड़का जब जब चखना खटिया पर रख वापस जाने को मुड़ता ,शर्मा जी उसे रोकते और कहते 'देखो बेटा ,ज़िंदगी के किसी मोड़ पे अगर दारु पीना भी, तो बस दवा माफिक पीना , ये असुरा है असुरा , इस अंगूर की बेटी से ज्यादा दिल्लगी करोगे तो उल्टा  तुम्हे पी जाएगी !'

शर्माइन भले ही दूर उसारे में तरकारी में छौंक लगा रही होती पर कान उसके वहीं होते !

 'पीना ही क्यों है जी इस करम जली को, इस सुरसा ने  बहुतो के घर बर्बाद किये है ! ' बिना चूके  शर्माइन इस बात को हमेशा जोड़ देती थी ।



उदारवाद के छींटे उस छोटी बस्ती तक भी पहुंचे ।वो दालान , वो उसारा जमींदोज़ हो पक्के मकान में तब्दील हो गया । ऊँचे चबूतरे की जगह अब  वाल पुट्टी से चिकनाई दीवारों वाली बैठकी ने ले ली है । उस बस्ती के बहुते लौंडे पढ़ लिख नौकरी पैसा हो गए है । शर्मा जी का लड़का भी विलायती फर्म में नौकर हो गया है । आप इसे मेहनत कहिये या किस्मत कहिये या स्वाभाविक  परिवर्तन कहिये ,पर उदारवाद के इस दौर में उस बस्ती में भी एक तबका खड़ा हो गया है जिसने हिचकोले खाते हुए मसालेदार से अंग्रेजी तक का सफर तय किया है ।एक अलग क्लास खड़ा हो गया है अंग्रेजी पीने वालो का क्लास !

शर्मा  जी को अब देसी मसालेदार हज़म  नहीं होती , गले में खरांस हो जाती है , पेट अपसेट  हो जाता है, कै होने को होती है । हाँ , रॉयल स्टैग , बैगपाइपर जैसे किफायती अंग्रेज़ीदा ब्राण्ड अपच नहीं है । अब सब रिश्तेदार ,यार दोस्त जानते है कि शर्मा जी सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी ही पीते है !

शर्मा जी आज भी उतने ही जिम्मेदार इंसान है । 'शर्मा एंड फैमिली ' की ब्रांड मेकिंग और शाख  बढ़वार की जिम्मेदारी को समझते है । लड़का विलायत जाता रहता है ,ठीक ठाक कमाता है पर शर्मा जी खुदमुख्तार है , कुछ नहीं मांगते ।

हाँ , पिछली बार बेटा जब विदेश गया था तो लौटते हुए एक अच्छी सी विलायती शराब की बोट्ली लाने की दुर्लभ इच्छा जताई थी उन्होंने !वापस आकर आज्ञाकारी बेटे ने 'ग्लेनफ़िद्दीच सिंगल माल्ट व्हिस्की ' ' १२ साल पुरानी वाली ' लाकर शर्मा जी के हाथ में थमा दी थी ।

ना ना ना ! उस महंगी विलायती शराब मंगाने के पीछे शर्मा जी का निज स्वार्थ न था वो तो  बैगपाइपर व्हिस्की ' 'एक्सपोर्ट क्वालिटी वाली ' से खुश थे !दरअसल  ये उनकी 'शर्मा एंड फैमिली ' की ब्रांड मेकिंग की एक कवायद भर थी ।आल्हे के एक कोने में ग्लेनफ़िद्दीच की महंगी बाटली को सहेज, शर्मा जी गहन चिंतन में पड़  गए । उनकी नज़र में रसूख वाले ऐसे कई लोग थे जिनके लिए उस विदेशी बोतल का न्यायोचित उपयोग हो सकता था । बगल के कसबे से सत्तारूढ़ पार्टी का एक लोकल नेता , जिससे बेहतर सम्बन्धो का फायदा होता , या फिर जान पहचान का थानेदार !
हाँ , हलके का अमीन भी फेरिस्त में शामिल था , उससे जमीन के कागज़ों का कुछ काम अटका पड़ा था ।

हफ्ता बीता , महीना बीत गया , शर्मा जी उलझन को सुलझा ना पाये । बोट्ली पड़ी रही ,लबालब ,बिना किसी कद्रदान के !

संयोग से उन दिनों दूर के दो रिश्तेदार आ टपके जो इंसान तो बुरे ना  थे पर मदिरापान की लत के चलते आवभगत का सौभाग्य कम ही पाते थे।  उन बेचारों का कोई ऐसा रसूख भी था कि जिसे खाद पानी देने से कुछ हासिल होता ।शराब उनकी खुराक में थी सो कच्ची,मसालेदार,महुआ ,बसंती जो भी मिल जाये उसी को प्रेम भाव से स्वीकार कर  शिकायत न करते थे ।शराब पीने की लत आदमी को हम्बल बना देती है , न कोई खाने पीने को लेकर नकचढ़ी ,न किसी और घणी लल्लोचप्पो की आकांक्षा ! बस मूल चीज़ का साधन हो जाये !

 जिस तरह 'दाने दाने पे खाने वाले का नाम ' लिखा होता है वैसे ही हर बोतल ,हर अध्धे ,हर पव्वे पे पीने वालो का नाम लिखा होता है ।संयोग पे अगला संयोग ये था कि उस शाम को शर्मा जी घर न थे ।  लड़के ने शाम के खाने से पहले महीने भर से पड़ी उस गेलफीडीज़ की बोट्ली को उन मदिरा प्रेमी आत्माओ के आगे परोस दिया ।
 बड़ा ही अप्रत्याशित क्षण था वो ! अविश्वास के धरातल से सौभाग्य के अहसास तक आने में उन आत्माओं को काफी समय लगा । माहौल को और भी अद्धभुत बनाने को लड़के ने बोट्ली को घुमाते हुए बताया कि ये वो दारु है जिसे बड़े बड़े अँगरेज़ पीते है और इसके बनने के बाद इसे बारह साल तक गोदाम में पुरानी होने के लिए रखा जाता है ।

उसके बाद तो वहाँ भावनाओं का समंदर सा बह चला । दो पैग गटक आँसुंओं का दरिया बह चला । फिर शिकायतों , लानतो , मन्नतो का दौर चला । बार बार जतावा दिया गया कि शर्मा परिवार उन्हें कुछ समझे या न समझें , वे उस परिवार को अपनी जान से भी बढ़कर मानते है ।देसी घी से तर गरमागरम फुल्के आते जाते थे और विलायती शराब में तर आत्माओं के उदर में उतरते जाते थे । बड़ी लम्बी और बड़ी भावुक शाम थी वो !

अगली सुबह शर्मा जी की नज़र बैठकी के कोने में उपेक्षित पड़ी खाली बोतल  पर  पड़ चुकी थी , पर वो कुछ न बोले ,बस एक ठंडी सी ,दबी सी आह भर के रह गए !छुट्टियों से वापस लौटते हुए बेटे ने चरण छू प्रस्थान की इजाज़त मांगी तो शर्मा जी ने आशीर्वाद के बाद जोड़ा ' सुनो , आगे से कभी ये महंगी शराब बराब मत लाना , पैसे की बर्बादी है '। उन्हें गुस्सा था ,उनकी नज़र में जिस महंगे रतन का इस्तेमाल परिवार की शाख बनाने को होना था ,उसका ये तुच्छ प्रयोग उसे नाली में बहाने जैसा था ।


पर इस बात को वो लड़का ही जानता है , उन  भावुक मदिराप्रेमी आत्माओ ने उस दिन के बाद से जब भी, जहाँ  भी मदिरापान किया है उस विलायती बोतल  को याद किया है और 'शर्मा एंड फैमिली  ' के बढ़ते रुतबे का यशोगान किया है । लड़के की नज़र में विलायती बोतल  का उससे बेहतर इस्तेमाल हो ही नहीं सकता था ।










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