Monday, June 9, 2014

रात का मुसाफिर



उलझे  विचारों की गुथ्थी सुलझाने के अनवरत प्रयास में अटका मैं सड़क पार करने को हरी बत्ती के इंतज़ार में प्रतीक्षारत था , तभी अकस्मात  किसी अनजान ने अपनी कोमल बाहें गले में डाल दी ।मुलायम सफ़ेद हाथ , लम्बी उंगलियाँ । अप्रत्याशित  व्यवहार  से मेरा हतप्रभ होना स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी ।उसके नाखूनों की नेलपॉलिश अभी सही से सूखी भी न थी । 

मेकअप की गहरी परतो में दबे उस चेहरे पे आग्रह के भाव थे । आँखों में आतिथित्य  का भाव , स्वागत में बिछ जाने की आतुरता थी  । अधरों पर प्रयास से लाधी गयी मुस्कान थी ।रात्रि के पहले पहर में स्ट्रीट लाइट की दूधिया रोशिनी में नहाये सड़क के उस छोर पर उसका ये जतन  एक मुसाफिर  में अवसर ढूंढने का एक आवश्यकतावश उपजा प्रयास ही था ।

ठंडी सी वैराग्य भरी भंगिमा  दे बिना कुछ बोले आग़े बढ़ गया मैं ।
आग्रह , निमंत्रण के तिरस्कार का बुरा मानने का वक़्त शायद उसके पास भी नहीं रहा होगा । 




सप्ताहांत की रात्रि के प्रथम पहर में  ,ऑर्चिड रोड के इस छोटे से दृश्य में कुछ भी नाटकीय नहीं है , न ही कुछ अतिश्योक्ति !
सिंगापुर द्वीप के सबसे मशहूर इलाको में से एक आर्चिड रोड शाम होने के साथ ही जवान होता है । सड़क के दोनों सिरो पर जवानी का एक दरिया सा बह निकलता है ।  भांति भाँति के रंग रूप । दुनिया के हर कोने के नर नार ।यहाँ खूबसूरती है ,चटक चमक है । निमंत्रण का भाव देती आँखे है ।
 हक्का नूडल्स है तो इतालियन पास्ता भी है । टर्किश कबाब है तो इच्छा होने पर रोटी पराता भी तैय्यार है!
 सस्ते ,सहज उपलव्ध फिलिपिनो व्यंजन तो हर जगह भरे पड़े है ।थाई मेखोंग से लेकर रसियन बोद्का तक की उपलब्ध्द्ता है । चटक रंगो का और स्वादों का कॉकटेल  आपको दिग्भ्रमित करता है और आपकी इच्छाशक्ति का कड़ा इम्तेहान लेता है । 

लेकिन सिंगापुर की सुंदरता का अक्स ऊपर दिए वर्णन से ही करना बड़ी भूल होगी । द्वीप की सुंदरता विरोधाभासों को समरसता के साथ समेटने के सफल प्रयास में है ।नाईट लाइफ की चमक  , सघन ,घने वनस्पति पार्को के साथ सामंजस्य बिठाये सहअस्तित्व का सन्देश देती है । भीड़ को चीर  बॉटनिकल गार्डन जाने वाली पगडण्डी की तरह जैसे जैसे कदम बढ़ते है ,माहौल ,भूगोल सब बदलने लगता है । इंसानो की भीड़ छितराने लगती है । इंसानो की जगह पेड़ ले लेते है । स्ट्रीट लाइट्स की रोशनी भी शर्मा के धीमी पड़ने लगती है । 
सॉफ्टवेयर कारखानो में काम करने के कारण बेडौल ,स्थूल  हुए जा रहे शरीर में नवप्राण फूँकने  का सपना लिए तेज़ी से बढ़ा चला जाता हूँ । 
चमक धमक की इस मायानगरी में सब कुछ कमाना होता है । पसीना भी !  पसीना कमाने की इच्छा अलसाये पैरो को जोर जोर से सीमेंट की पगडण्डी पर पीटने को मज़बूर कर रही है । 
बॉटनिकल गार्डन के सिरे पर जाकर ठहर गया हूँ । पूरब के सिरे की अट्टालिकाओं के पीछे से जोर का काला बादल ग़रज़ के साथ बढ़ा आ रहा है । वक़्त रहते अपनी आरामगाह  में लौट जाने में ही भलाई है । 
शायद आज रात आर्चिड रोड में जोर का मेह बरसेगा !


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