Monday, April 26, 2010

मैं और अंधी दौड़

चला  जा  रहा  हूँ   धुंधले   जीवनपथ   पर
आशाओं   के  घोड़ो  पर  ,इच्छाओ  के  रथ  पर
बह  रहा  हूँ ,  बिना  किनारे  की  नदी  में
दौड़  रहा हूँ,   बिना  मंजिल  की  दौड़  में |

 पर  मन  कहता  है  रुक  बाबरे ,महसूस  कर  सर्द  दूब  को
छू  किसी  जीवन  तार  को  , महसूस   कर  प्रकृति  रूप  को
चल  छोड़  भाग  मिथ्या  जीवन  को , लौट  चल  अपने  गाँव  में ...
सुबह  सुहानी  ,शाम सुरीली , नीद  ले  रात   की  बाँहों  में |

छोड़  दे  मशीनों   की  नगरी  , लौट  जा  इंसानों  में ..
चल  उतार  नकली  मुखोटा  , वापस  जा  जाने  पहचानो  में ...
भाव  जहा  दिखे  चेहरों   में , फूल  खिले  सच्ची  मुस्कानों  में |

चलते  चलते  सांझ  हो  जाएगी  , मंजिल  उतनी  ही  दूर  रहेगी |
ढलते  ढलते  शाम  आएगी , खुशी  उतनी  ही  दूर  रहेगी |

ये  मृग त्रष्णा   है  अरे  बाबरे  ,इतना  नहीं  समझ  आता
जो  उलझा  है  उलझ  गया  है , निकल  ना  इससे  कोई  पाता
लौट  जा  गाँव  अपने ,जीवन  तुझे  जहा बुलाता
सुबह  का  भूला  लौट  आये  तो  ,बुद्धू  नहीं  कहलाता |

Friday, April 16, 2010

जाने वो कैसे लोग थे , जिनके प्यार को प्यार मिला..

जाने वो कैसे लोग थे , जिनके प्यार को प्यार मिला..
हमने तो जब कलिया मांगी, कांटो का हार मिला....
आजकल रह रहकर ये गाना दिलोदिमाग में घूमता रहता है...

प्यार का जो खुमार फरबरी मार्च के महीने में किसी  नवचेतन  बेल  की  तरह   परवान  चढ़ा   था ..
अप्रैल  के  गर्म  शुष्क  मौसम  में मुरझा  गया  है|
आज  पिछले  3 महीनो  के अठखेलियो  और  अट्टहास  से  भरे  उन  तमाम  प्रयासों  पे  नज़र  डालता  हूँ   , जो अनजाने  ही  मैंने प्रेमपाश  में जकड़े  होकर  किये  ...तो प्रयास  कम  दुसाहस  ही  ज्यादा  लगते   है|
किसी  अनजान  लड़की  की  सीट  पे  जाकर  उससे  अपना  स्नेह  व्यक्त  करना  ,अपनी  उलजुलूल  फिलोस्पी  से  भरी  मेल  लिखना  , उसकी  सहेली  से  उसके  बारे  में बात करना ....क्या  क्या  नहीं  कर  डाला|
पर  वो तस  से  मस  ना  हुई| हालात  पक्ष  में ना  जाते  देख  धीरे  धीरे  आखों  पे  चढ़ा   प्रेम  चश्मा  उतरने  लगा  है |
और  जीवन  की  कड़बी  सच्चाई   एक  बार  फिर  से  समझ  में आने  लगी  है|

प्रेम  एक  ऐसी  अनुभूति  है , जिसका  अनुभव  तो आप  अपनी  मर्ज़ी  से  कही  भी , कभी  भी  दिल  की  रों  में बहकर  कर सकते  हो |इसमें  कुछ  बुरा  भी  नहीं |
जब तक  आप  दूसरे  से  भी  अपनी  अनुभूति  के अनुरूप  चलने  की  उम्मीद  ना  पाले |
यही  पे  हमसे  गलती  होती  है|
प्रेम  को हम  अपेक्षा  से  भर  देते  है|प्रेम  होना  चाहिए  निश्वार्थ , निष्काम,  बिना  शर्त ....
नहीं  तो वो प्रेम  प्रेम  नहीं  , एक  महज  सांसारिक  लेनदेन  का नाता  है|
अप्रैल  की  गर्मी  सूखी  सूनी  पड़ी  जमीन  को सुलगा  रही  है..ऐसे  में सड़क  किनारे  कतारबद्ध  खड़े  नीम  के पेड़  गर्मी  से  राहत दे  रहे  है|
और  मुझे  निश्वार्थ  सेवाभाव , निष्काम  प्रेम  का पाठ  पढ़ा  रहे  है|
मन  शांत  है , अपेक्षित  प्यार ना  पाकर  मन  में जो झुझलाहट   थी ..वो जा  चुकी  है...मन  आज  फिर  मनमौजी  है|
खुला  है, स्वतंत्र  है , इच्छाओ  से  मुक्त,  उन्मुक्त  उड़ान  भरने  को आतुर  है...
कल  तक  ऑफिस  की  कैंटीन   में  जो चेहरा  मुझे  ख़ास  लगता  था ,खीचता  था  , अब  आम  लगने  लगा  है|
सात्विकता लौट आई है |

Monday, April 5, 2010

सपनो की दुनिया

इस बार अप्रैल का महिना बड़ा ही रूमानी है|
जहाँ एक तरफ सुदूर पूर्व सिंगापुर जाने के सपने लेकर मन का तार तार गा रहा है|
वही दूसरी और बरसो से सूने पड़े हृदय में प्रेमबीज का अंकुरण हो जाने से समां और भी रूमानी हो चला है ....

हकीकत  से  दूर  आजकल  ख्वाबो  की  दुनिया  में  जी  रहा हूँ|
सब  कुछ  अच्छा  अच्छा सा  लगने  लगा  है,जीवन रस लौट आया है , प्राण रसमय है |
बरसो  बाद  मन  कल्पनाओ   की  लम्बी  लम्बी  छलांगे मार रहा है |

सिंगापुर परियोजना के बारे में:
सोचा  सिंगापुर  जाने  से  पहले  एक  बार  गाँव  हो  आऊ|
गाँव  पहुचने  से  पहले  ही  मेरे  सिंगापुर  जाने  की  खबर  जंगल में आग की तरह फ़ैल चुकी थी|
हमारे  पूज्य  पिता  जी  और  माता  जी  ने  कोई  कसर  नहीं  छोड़ी  और  ये  सुनिश्चित  किया  कि  गाँव  का
हर  व्यक्ति  इस  बात  से  वाकिफ  हो  कि  उनका  बेटा सिंगापुर  जा रहा है|
उनकी  आँखों  की  चमक  देखते  ही  बनती  है |
उन्हें  इस  बात  से  कोई  मतलब  नहीं  कि  इस सिंगापुर परियोजना कार्य का मेरे career को  लेके  क्या  महत्त्व  है
या  इसका  कुछ  धन  सम्वन्धी  लाभ  भी  है|
उनका  एक  मात्र  लक्ष  ये  सुनिश्चित  करना  है  के  प्रसिद्धी  के  मामले   में  गाँव  में  उनके  बेटे सबसे  ऊपर  रहे ...

पर  गाँव  वालों  के  सीमित  ज्ञान  के  चलते  इस  बड़ी  खबर  का  वो  प्रभाव  नहीं  दिखाई  पड़ा  ,जिसकी मैंने  कल्पना  की  थी |
गाँव  के  काफी  लोग  ये  समझ  बैठे  है  कि  मेरा  ट्रान्सफर  हो  रहा  है  और  मैं  गुडगाँव  से सिंगापुर  नाम  की  किसी  दूसरी  जगह  पे  जा  रहा  हूँ  ..
उनका  सहज  ज्ञान  सिंगापुर  को विदेश  नहीं  मानता |उन्हें  लगता  है  कि  सिंगापुर  कही  हिन्दुस्तान  में  ही  है  ,जैसे  अपना  हसनपुर  वैसे  ही  सिंगापुर :).
नाम  के  अंत  में  लगा  "पुर" उनकी  सहज्व्रती  को  सिंगापुर  के  हिन्दुस्तान  में  ही  होने  का एहसास  कराता  है |
मुझे  कई  लोगो  को  बताना  पड़ा  कि  सिंगापुर  समंदर  के  पार  है  और  हवाई  जहाज  से  जाना  पड़ता  है  , तब  कही  जाके  में  उनके  चेहरे  पे  उभरे  वो  रोमांचकारी  भाव  देख  पाया  , जिनकी   मैंने  सदा से  ही  कल्पना  की  है ..
गाँव  वालो  के  सरल  सहज  स्वभाव  और  सिंगापुर  को  लेके  टिप्पड़ियो  से  मन  गदगद  है|
खैर,  देखते  है  , मिशन  सिंगापुर  में  आगे  क्या  क्या  होता  है ...

बाबरा मन:
अपने लगभग तीन साल के IBM  के कार्यकाल में , लंच ब्रेक की भीड़ में मैंने उस मासूम चेहरे को ना जाने कितनी
बार देखा होगा...
पर पिछले महीनो से ना जाने ऐसा क्या हुआ , के वो चेहरा कुछ ख़ास लगने लगा है..
मन तरंगित है और झूम झूम के गा रहा है " सैया , तू जो छु ले प्यार से .आराम से मर जाऊ.."
हालाँकि मन के किसी कोने से बड़ी ही तार्किक आवाज़ आती है , कि बेटा इस इकतरफा प्यार का हश्र भी वही
होगा जो हमेशा से होता आया है...यानि की शुन्य ..
पर मन है कि रमता जोगी बनने को आतुर है..
उस श्वेतवरनी , मनहरनी बालिका ने मन के जंग लग चुके तारो को झंकार दिया है |

तमाम एक्सपर्ट्स की राय ली जा चुकी है..किसी ने हर रोज़ "गुड मार्निंग" मेल भेजनी की राय दी है ..
तो किसी ने हमारी पर्सनालिटी को आकर्षक बनाने को ढेरो नुक्शे सुझाये है...

खैर , हमने सभी रायो को दरकिनार करते हुए अपने पागल मन को यु ही अपने सपनो के रथ पे बेलगाम छोड़ दिया है|
सपनो की दुनिया हकीकत की बोरियत और तनाव से भरी दुनिया से कही बेहतर जो है...