शनिवार, 7 नवंबर 2026

पुलिस की नौकरी

 मैं जिस जंगल से आता हूँ उस जंगल के युवाओ के बीच जो नौकरी सबसे पॉपुलर है वो है पुलिस की नौकरी | 

और इसकी मकबूलियत की कुछ बुनियादी वाजुआत हैं | 

इनमे से अधिकांश युवा छोटे काश्तकार परिवारों से आते हैं जहाँ जोत का आकार इतना छोटा हो गया है कि महज काश्तकारी में रहना गरीबी की रेखा से चिपककर जीने जैसा है | 

पुलिस की नौकरी उस मुफलिसी को तोड़ने का एक गेटवे है जिसे आसानी से तो नहीं पर लांघा जा सकता है | 

इनमे से अधिकांश युवा सेल्फ स्टडी और ग्रामीण मेहनतकश कदकाठी की बदौलत पुलिस की लौ हियरार्की जॉब्स कॉन्स्टेबल से लेकर सब  इंस्पेक्टर तक पाने में कामयाब रहते हैं 

लेकिन पुलिस की नौकरीऐसी नौकरी है जिसका जश्न सबसे छोटा होता है | क्योंकि गांव से हीरो की तरह ढोल पीट विदा किया गया युवा जब व्यवस्था में घुसता है तो पाता है कि वो एक ऐसे मुकाम पर आ खड़ा हुआ है जहाँ आगे कुआ है पीछे खाई और हमदर्द कोई भी नहीं है | 

एक तरफ वो अफसरान हैं जो ब्रिटिश राज की साहब मानसिकता से आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं | धुप में खड़ा करना , छुट्टियों के लिए बार बार मिन्न्नते करवाना , पूरे ग्रुप के सामने अपने मातहतों की पतलूनें उतारना , बिना किसी आराम , बिना किसी रोस्टर कही भी तैनाती करना , ये सब इन अफसरान का स्टैण्डर्ड मोडस ओपेरन्डी हैं | और ये व्यवहार धड़ल्ले से बिना किसी गिल्ट डंके की चोट पर पेश किये जाते हैं | 

तो दूसरी तरफ आम जनता है जिसके हाथ में मोबाईल का हथियार आ गया है | आम जनता जिसका पाला सिर्फ निचली सफों पर बैठे सिपाहियों और दरोगाओं से ही पड़ता है, हालाँकि इस बात से बाबर है कि अगर पुलिस न हो तो एक रोज में ही पब्लिक आपस में कट मरे , ट्रैफिक ठप्प पड जाए , राहजनी , लूटपाट हर नुक्कड़ का मंजर ए आम  हो , इसके बाबजूद उसकी नज़र में पुलिस वालो का अक्स एक ऐसे बहशियाना कसाई का ही है जो मौका मिलते ही बस उन्हें लूट लेगा |   

जनता की स्क्रूटिनी और धीमी नफरत का आलम ये है कि कही कोई दरोगा किसी महिला सिपाही के साथ गोलगप्पे खाता भी दिख जाए तो चार लोग वीडियो बना सोशल मीडिया पर डाल  देंगे जो 24 घंटे में वायरल हो जायेगा | 

किसी भी सभ्य समाज में ये करना अपराध हो , पर अपने यहाँ इंसानी हुकूक और प्राइवेसी जैसी चीज़े तो जैसे पुलिस वालों के लिए बनी ही नहीं हैं  | 

मैं भोचक्का रह गया यह जानकार जब मेरे कजिन ने बताया कि साल 2025 में उसके ही साथ भर्ती हुए 4 युवाओ ने सोशल मीडिया हुमिलिएशन , काम के दबाब , अफसरों के अंग्रेजी जालिमाना व्यवहार के चलते आत्महत्या कर ली | 

आप सोचिये , उन परिवारों का जिनके ख्वाव , जिनकी होली दिवाली सब का सब छिन गया , सिर्फ इस वजह से कि कोई सुधार जरूरी नहीं समझता | 


मैंने दशक भर सिंगापूर में गुजारा है | सिंगापुर बेहद शांत जगह है , यहाँ क्राइम ना के बराबर है | अभी कुछ साल पहले एक रोड प्रोटेस्ट और आगजनी की छोटी घटना हुई , जो कि भारतीय मजदूर के बस तले कुचले जाने को लेकर हुई थी , मामला बहुत बड़ा नहीं था , लेकिन पुलिस के पसीने छूट गए , यहाँ की पुलिस को एक्सपोज़र नहीं है इस तरह के स्केनरिओस को हैंडल करने का | 

और आप हसेंगे इस बात पर कि जो जांच कमीशन बैंठा उसकी रिकमेन्डेशन ये थी कि पुलिस भूल रही है लाठी चार्ज करना , सही ट्रेनिंग की व्यवस्था हो | 

हमारे यहाँ की पुलिस को व्यवस्था बनाये रखने को जो हथकंडे रणनीतियां और जान के जोखिम रोज उठाने होते है , विलायत में ट्रेनिंग ही नहीं है उन सब हुनरों की ! ऐसे माहौल में काम करती है अपने यहां की पुलिस | 


मुझे ताज्जुब होता है इस बात पर कि जब सभी महकमों में रेस्ट्रक्टिंग , बेहतरी के बदलाव हो रहे , क्योंकर ये महकमा अंरेज़ी दौर की धक्कापलेट गाडी में चलाया जा रहा ?

क्या इसका कारन ये है कि अधिकांश पुलिस वाले उन छोटे काश्तकार परिवारों से आते है जिनका न कोई रसूख है न ही  कोई आवाज़ ! 

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