Tuesday, February 16, 2010

उड़ने दो निराकार गगन में

अपनी पहली उड़ान पर कवि हृदय से फूटी कुछ पंग्तिया ..

उड़ने दो निराकार गगन में
श्वेत श्याम बदली के ऊपर
बिना राग फैली लाली पर
बिना वृक्ष ऊगी बादल-डाली पर
फूला  नहीं समाता तन में
उड़ने दो निराकार गगन में!
स्मृति के पंखो को फैलाकर
सुख-दुख के झोंके खा-खाकर
ले अवसर उड़ान अकुलाकर
हुआ  मस्त ये प्राण  लगन में
उड़ने दो निराकार गगन में!

जाने दो पर्वत से ऊपर
लौटू मैं तारो को छूकर 
मिल आऊ सागर से जाकर
लौटू मस्त बादल सा इतराकर
रह न जाये प्राण किसी बंधन में
उड़ने दो निराकार गगन में !

Monday, February 15, 2010

सपनो की उड़ान

बचपन में मैं और मेरे दोस्त , गाँव के ऊपर से उड़ते हुए हवाईजहाज को बड़ी ही कौतुलता से देखा करते थे ....बड़ा ही रोमांचकारी होता था ...जब तक हवाईजहाज नज़रो से ओझल न हो जाता , तब तक टकटकी बांधे रहते |
.हवाईजहाज बड़े लोगो के लिए हुआ करते थे|कभी हवाईजहाज में सवार हो पाऊंगा उन दिनों ये खव्वाब भी न आता था|

खैर ,वक़्त का चक्का घूमा ,बचपन पंख लगा के उड़ गया|बचपन और बचपन की बातें ,बचपन के सपने , पीछे छूट गये|रोजी रोटी के चक्कर में मैं भी दूसरो की भांति जीवनचक्की में पिसने लगा |
पर स्वभाव हमेशा से ही घुमंतू रहा है|नए नए जगहों पे जाना ,वहां के 'जमीन से जुड़े' लोगो से
मिलना ,प्रकर्ति के बीच जाना ,हमेशा ही मुझे पसंद रहा है|
सो इस बार , जैसे ही मुझे किसी कार्यालय सम्बन्धी काम से केरल जाने का अवसर प्राप्त हुआ,मैंने अवसर को हाथो हाथ लिया|

केरल 'land of gods ' कौन नहीं जाना चाहता|
12 फरबरी को 1:45 PM पे मैं जेट की उड़ान से केरल के लिए उड़ चला|
विमान में सवार होना बड़ा ही रोमांचकारी अनुभव था , जिसका मुझे न जाने कब से इंतज़ार था|
दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल 1 पे बोअर्डिंग पास जारी करने वाली महिला कर्मी से मैं बोला ' window seat please"
"विंडो सीट ही है सर " कर्मी ने हंसमुख जबाब दिया|
मैं अपनी प्रथम रौमान्चक उड़ान के एक एक पल को संजो लेना चाहता था |पल पल का साक्षी बनना चाहता था|

जेट के इंजिन ने धडधडआते हुए रनवे पे दौड़ लगानी शुरू की| Takeoff करते समय विमान की थरथराहट से थोड़ी घबराहट जरूर हुई ,पर ये घबराहट मेरे रोमांच के सामने बौनी साबित हुई|
उन्मुक्त पंछी उड़ चला|रेखाओ से आगे , सीमओं से परे| लगा ,मेरे खुद के पंख निकल आये है !
बाबरा मन उड़ चला अपने सपनो की उड़ान!उन्मुक्त ,मदमस्त उड़ान!

याद नहीं पड़ता , इतनी ज्यादा ख़ुशी मुझे पिछली बार कब हुई होगी?
बादलो के ऊपर एक अलग दुनिया थी |दूर दूर तक श्वेत ,दुग्ध धवल , रूई के फाहे जैसे बादल
अनंत, विशाल ,विराट , आविरल !....

क्या नज़ारा था , लगा ,स्वर्ग में आ गया हूँ ....
मन किया , विमान से बाहर निकल जाऊ , और खो जाऊ इन घने कुहासे बादलो में|
दुनिया दारी की सभी हाय तौबा से दूर ...विशाल शुन्य में ...दुनिया की गला काट प्रतियोगिता से दूर
बहूँ स्वछंदता की हवा में , बहूँ अपने मन के अनुरूप!
बरसूँ दिलो के सूखे मरुस्थल में , सीचू भावशून्य हो चुकी जमीन को!

मैं मंत्रमुग्ध घंटो तक शुन्य में ताकता रहा ,कभी नीचे देखता ,और नाचीज़ इंसान की जमीन
पे खीची आड़ी-तिरछी लकीरों को देख के हंस पड़ता |
एहसास हुआ , कि भले ही इंसान अपनी विकसित तकनीक के बल स्रष्टि का नायक होने की हुंकार भरे , प्रकर्ति के आगे अदना है , बौना है , और रहेगा..
बीच बीच में स्वर्गलोक की अफ्सराओ से सुन्दर एयर हास्टेस , अपनी मधुर आवाज़ और तीखे नैन नक्श से सांसारिक लोक में खीच लाती ,पर मन तो आज अपनी ही रौं में बह रहा था |
कब कोच्ची आ गया , पता ही न चला |पायलट ने बेल्ट कसने की घोषणा की |
विमान नीचे आने लगा |बाहर क्या नज़ारा था....
चहु ओर हरितमा,नारियल के कतारबद्ध वृक्ष,धरती माँ का धानी रूप !
सुन्दर आलोकिक है कोच्ची , हरी चादर में लिपटा,चरण पखारता अरब सागर |
सीधे सादे लोग ,फैशन -फूहड़ता के बुखार से कुछ हद तक दूर !
ताज होटल में आगंतुक तल पे बला की सुन्दर नव्योवना ने पलक- फावड़े बिछा के स्वागत किया |

आज मैं किसी राजा महाराजा से कम महसूस नहीं कर रहा था |
दुसरे होटल कर्मी ने मेरा बैग ले लिया ओर तीसरे ने सुगन्धित गीला तौलिया लेकर मेरे सामने हाज़िर हो गया
ताकि मैं अपनी सफ़र की थकान के निशान अपने चेहरे से मिटा सकूँ|
पैसे की  ताक्कत का एहसास हुआ|
लोगबाग सही ही कहां करते है " पैसा भगवान् तो नहीं है , पर भगवान् से कम भी नहीं है"

सुबह का नास्ता कर मैं केरल भ्रमण पे निकल पड़ा|
बचपन से अब तक समंदर खाली फिल्मो मैं ही देखा था..साक्षात दर्शन कभी प्राप्त न हुए|
सो समंदर दर्शन भी अपने आप मैं एक बड़ा अनुभव रहा |
"बीच" को मलयालम में "कडापुरम" बोलते है , आलपी कोच्ची का सबसे नजदीकी बीच है|
ऑटो से उतरते ही मैंने समंदर की ओर दौड़ लगा दी |
समुद्र की विशालता ने मन मोह लिया..दूर दूर तक पानी ही पानी ,हुंकार मारती लहरें , हिचकोले खाती इक्की दुक्की नौकाये ..

आलोकिक , भव्य नज़ारा था, मेरी कल्पना से कही ज्यादा मनमोहक निकला खुले समुद्र का नज़ारा ..मैंने बैग एक तरफ उतार फैंका , ओर एकटक उस अथाह जलराशि में शुन्य होकर निहारने लगा..

समुद्र की विशालता , इंसान को उसकी तुच्छता का एहसास कराती है
घंटो में बैठा रहा , समंदर का तिलिस्म टूटने का नाम ही नहीं ले रह था ...

समंदर में नहाते कुछ युवको की टोली में मैं भी शामिल हो गया , खूब जम के धमाचोकड़ी की..लहरों से घंटो हम खेलते रहे |फोटो खीचते रहे ...
शाम कब हो गयी , पता भी न चला|अगली सुबह मैंने मुन्नार का रुख किया , मुनार वहा का हिल स्टेशन है , थोडा सा ऊपर जाके एक पुराना जल विधुत संयंत्र भी है|
सुन्दर जगह है..पूरा दिन चाय के बागानों मैं , इलायची की बगीचों मैं घूमता रहा|
स्थानीय लोगो से मिला , उनके साथ समय बिताया|
उस परम परमात्मा का धन्यवाद करता हू जिसने केरल जैसे सुन्दर ,विस्मयकारी, मनोहारी स्थलों की रचना की |
सोमबार की सुबह १०:३० प्रात , दिल्ली की धरती पे एयर इंडिया के विमान से उतरने के साथ ही मैं सपनो की दुनिया से निकल कर , वही पुरानी इंसानी भाग दौड़ मैं शामिल  हो गया...

Monday, February 8, 2010

एक नया अध्याय

महीनो से चली आ रही काम की हाय-धुन से आज कुछ राहत मिली, तो मन में कुछ नए विचार अंकुरित हुए....
सोचा , क्यों न मन में उथल पुथल करते विचारो का संकलन किया जाये..क्यों न अपने विचारो का , मेरे अपनों के विचारो के साथ मन-मंथन किया जाये..सो blogging शुरू कर दी.

अपने ऑफिस के फ्लोर से नीचे हाई-वे पे एकटक देखता हूँ |.
सरपट दौड़ती कारे, बसे, ट्रक ,मशीन ,इंसान ...हर कोई भाग रहा है..हर कोई बदहवास है. एक दुसरे को पीछे छोड़ने की होड़ में लगा है..लाइफ का सीधा सा फंडा है , जो जितना तेज भाग रहा है वो उतना ही आगे है..
साइकिल सवार  पैदल से आगे है | मोटर सवार  साइकिल सवार से आगे , लम्बी लम्बी रपटीली कारो में चलने वाले उनसे भी आगे|..
आखिर सब क्यों भागे जा रहे है?...
एक ही जवाब है ..ख़ुशी के लिए ..खुशहाली के लिए...जो जितना तेज भाग रहा है वो तथाकथित रूप से उतना ही सफल है|
पर क्या वो उतना ही खुश है? ये सवाल दुबिधा पैदा कर देता है...
शायद नहीं ...महंगी गाडियों में घूमने वाले ,नींद की गोलिया खाते मिल जायेंगे  और रिक्शा खीचने वाले मीठी गहरी
नींद सोते मिल जायेंगे|
इंसान की इच्छा ,कस्तूरी मृग की कस्तूरी की तरह ही है..जिस तरह कस्तूरी मृग ,कस्तूरी नाभि में होने के बाबजूद
उसे पाने को व्याकुल रहता है | वैसे ही इंसान अपनी इच्छाओ का शमन करने को जिन्दगी भर भागता है...
और इस कदर इच्छाओ के जाल में फ़सा रहता है, कि उसे कभी अपनी खुशियों का पिटारा खोल के देखने का
मौका ही नहीं मिलता |
पिछले दिनों में किसी Knowledge Talk Seminar में गया हुआ था| सभा में से किसी सज्जन ने वक्ता से पूछा .
"How to make life full of happiness , how to persue happiness?"
वक्ता का जबाब सुनने लायक था ..
"Your answer is in your question itself.If you make your life presuasion of happiness , you can't achieve
happiness in your life. Make your life expression of happiness. Every moment express happiness for what you hold. There lies the happiness"
बात सोलह आने सच है . भबिश्य के गर्भ में छुपी खुशियों की चाह में हम इस कदर अंधे है ,कि वर्तमान का पिटारा खोल कर कभी देखते ही नहीं...
जिसने अपना पिटारा खोल लिया , वो खुश है और रहेगा | बाकि लोगो की लाइफ "Presuasion of happiness" ही
बनी रहेगी...